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रंग- राग : पदमावत : सत्यदेव त्रिपाठी

Posted by arun dev on फ़रवरी 21, 2018




  
मलिक मोहम्मद जायसी (१३९८-१४९४ ई.) की कृति पदमावत पर आलोचक रवि रंजन का आलेख– ‘साहित्य  और पदमावत’ आपने समालोचन पर पढ़ा. अब फ़िल्म पदमावत पर प्रस्तुत है लेखक रंग-समीक्षक सत्यदेव त्रिपाठी  का आलेख ‘पदमावत : भव्यता की विद्रूपता’.

आक्रामक बाज़ार  कृतियों की अतिवादी व्याख्या प्रस्तुत कर अपना दायरा विस्तृत करता चलता है.  भारतीय फिल्मों में कालजयी कृतियों को भव्यता से प्रस्तुत करने की होड़ लगी हुई है चाहे इस होड़ में कृति ही विकृत क्यों न हो जाए. फ़िल्म पदमावत को लेकर जो हुआ आपके समक्ष है.

सत्यदेव त्रिपाठी  ने कृति और फ़िल्म के बीच कथा और किरदार की जो दुर्गति हुई है उसे यहाँ प्रत्यक्ष किया है.

                                     
पदमावत : भव्यता की विद्रूपता                  
सत्यदेव त्रिपाठी 





ख़िर भंसाली के थैले से बिल्ली बाहर आ ही गयी.(द कैट इज़ आउट ऑफ भंसालीज़ बैग)!! और थैले में हमेशा के लिए बन्द कर रखने की मंशा रखने वालों ने भी देख लिया कि यह बिल्ली वैसी क़तई नहीं है, जैसा सोचकर उसे बाहर आने से रोका जा रहा था. हो सकता है, बल्कि ज्यादा उम्मीद इसी की है कि रोकने वालों की ताक़त से डरकर गिरगिट ने रंग बदल लिया है और प्रेमी-युगल के अंतरंग दृश्य के बदले भर फिल्म क़दम-क़दम पर राजपूती आन-बान-शान को भर दिया है, जिससे रोकने वालों को भरमुँह का जवाब मिल गया है और अवाम की भावनाओं का दोहन भी हो गया है. इस तरह अवरित नयी बिल्ली में संजय की लीला रंग ला रही है पाँचवें दिन फिल्म सौ करोडी संघ (क्लब) में शामिल हो गयी तथा आज (यह लिखते हुए) सातवें दिन भारतीय बाज़ार में डेढ सौ करोड एवं विश्व-बाज़ार को मिला लिया जाये, तो ढाई सौ करोड की कमाई कर चुकी है. ऐसे दोहन बहुत हैं फिल्म में, जो यहाँ आगे आते रहेंगे और जिनके बल उनकी कमाई आगे बढती रहेगी.
     
अभी यह कि काट-छाँटक समिति (सेंसर बोर्ड) की परीक्षा में पद्मावतीउत्तीर्ण हुई पद्मावतहोके, तो समिति को तसल्ली हो गयी कि अस्वीकरण’ (डिस्क्लेमर) के मुताबिक फिल्म को जायसी-काव्य का ही नाम मिल गया और शीर्षक भी व्यक्तिवाची से भाववाची बनके अधिक उपयुक्तता पा सका, लेकिन इन (और तीआदि) से भंसाली को कोई फर्क़ नहीं पडा, क्योंकि बाज़ार को नहीं पडा. असली मक़सद पूरा हो रहा साहित्यिक मिथकों पर बनी भंसालीजी की देवदासबाजीराव मस्तानी से भी अधिक कमाई हो रही.... और इस सफलता ने थप्पड (यदि वह भी प्रायोजित न रहा हो) का ग़म भी भुलवा दिया होगा. अब वे बेचने के लिए और भी साहित्यिक मिथकों की खोज में लग जायेंगे.

पद्मावत’ : फिल्म बनाम काव्य – ‘फिल्म कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है, न ही संजय ने बनाने की कोशिश की है’, जैसी गलतबयानी करने वाले आलोचक तीन तक नहीं गिन पा रहे कि मंगोलों को परास्त करने के उल्लेख व चाचा को मारकर सुल्तान बनने के अलावा पूरी फिल्म साहित्यिक मिथक है, इतिहास नहीं. फिर अस्वीकरण’ (डिस्क्लेमर) में इसे जायसी के महाकव्य पद्मावतपर आधारित बताया गया है. ऐसा कर देना निरापद होता है, क्योंकि अब जायसी या शरत बाबू तो आज रहे नहीं कि अस्वीकरण और असलियत को लेकर सवाल या मुक़दमा करें. उनके लिए लडने वाली कोई करणी सेनाभी नहीं. और उनका दुरुपयोग करने वालों में ऐसे कला-संस्कार व दियानत नहीं कि क्लासिक के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने से बाज आयें. लिहाज़ा संजय भी अब स्क्रिप्टको सर्वोपरि माननेके लिए तो अपने कलाकारों को आगाह करते पाये जा रहे हैं (2 फरवरी, 2018 - दैनिक जागरण’), परंतु यह नहीं बता रहे हैं कि जब स्क्रिप्ट के लिए आप किसी क्लासिक को आधार बनाते हैं, तो किसे सर्वोपरि मानते हैं - अपनी स्क्रिप्ट को या उस क्लासिक आधार को कुछ उदाहरण लें -

क्या जायसी ने रावल रतन सिंह को सिंहल भेजा था नागमती के लिए नायाब मोती लाने या इसमें उनके बुद्धिशाली तोते व रानी नागमती के बीच की कोई कहानी और तोते की कोई अहम भूमिका थी, जो ली जाती, तो फिल्म के लिए कहीं ज्यादा मोहक होती. जिस निर्गुण सूफी मत के चलते पद्मावतक्लासिक बना, उस दर्शन में गुरू सुआ तेहिं पंथ बतावा, बिनु गुरु कहहु को निरगुन पावा कितना मायने रखता है...? लेकिन फिल्म में उस तोते का तो भ्रूण भी नहीं आने दिया और उस दर्शन के संस्पर्श को भी शामिल करना आज की कमाऊ मंशा में कहाँ सम्भव था? सो, सब कुछ को रूपसी नायिका के तीरन्दाज़ी के निखार पर वार दिया!! फिर उसके साथ एकांत गुफा में इलाज़ कराके सीधे प्रेम पनपा दिया गया !!

क्लासिक में तो सिंहल का राजा यूँ ही नहीं व्याह देता अपनी बेटी को, बल्कि गुरू सुआसे सुनकर रतन सेन हजारों सैनिकों को साधु वेश में लेकर सिंहल जाते हैं. पद्मिनी-सौन्दर्य के प्रथम दर्शन में बेहोश भी हो जाते हैं, लेकिन लाते हैं उसे जीत कर ही. परंतु संजय जी पद्मिनी के ग्लैमर के सामने रतनसेन की बुद्धि-बहादुरी को क्यों दिखाते? सो, बस गुडी-गुडी कर दिया....

काव्य के राघव चेतन ने तो पण्डितों को अपना विद्या-बल दिखाने के लिए एकम के दिन ही दूज कर दी थी, इसलिए देश-निकाला दिया था स्वत: रतनसेन ने. पद्मिनी का तो इससे कुछ लेना-देना ही न था. लेकिन फिल्म ने कथा के इस भाग को तोड-मरोड (ट्विस्ट) करके तीन-तीन तानें तोडी हैं. एक तो पद्मिनी के शयन-कक्ष में राघव चेतन से ताक-झाँक कराके और कुछ उसके हाव-भाव भी बदलवाके एक तांत्रिक को पद्मिनी के रूप पर लट्टू या आशिक़ बना दिया है.

दूसरे यह कि देश-निकाला में पद्मिनी की पहल दिखाकर उससे बदला लेने वाला फोक़स भर  दिया है और इस तरह तीसरी बात यह बन गयी है कि पद्मिनी के चरित्र की उठान के लिए रावल रतन प्रेमी नहीं, पत्नी-भक्त मेहरबस (हेनपैक्ड) बन गया है.

बन्दी रावल रतन को छुडा लाने में अलाउद्दीन से बेतरह क्षुब्ध उसकी पत्नी मेहरुन्निसा की मदद से भी बाज़ार के कई तोड जोडे गये हैं, पर यह महाकवि से एकदम ही टूट कर मेहरुन्निसा और पद्मिनी दोनो के दुख से फिल्म के एक सुख वाली भंसाली की ही स्क्रिप्ट हो गयी है. 

कई मामले में निर्णायक भूमिका वाला मलिक काफूर का किरदार कपोल कल्पना है. फिर बादशाह के लिए शूटर जैसा काम करने वाला शख़्स और किन्नर!! गज़ब का विरोधाभास है तथा बादशाह की मलिका बनने की इच्छा में विद्रूप भी.

ऐसी बहुतेरी बातें-वारदातें हैं, छोटी-छोटी ढेरों शृंखलाएं (सेक्वेंसेज़) हैं, जिन सबका उल्लेख यहाँ सम्भव नहीं, पर इन सबके मद्देनज़र यह सवाल उठता है कि जब सिर्फ प्रमुख पात्रों एवं स्थलों के नामों तथा रतन सिंह की धोखे से गिरफ्तारी और रानियों के जौहर जैसे कथा-ढाँचे के स्तम्भों के सिवा भंसाली को सबकुछ भहरा ही देना था, तो सरनाम साहित्यिक मिथकों को उठाया ही क्यों? अपनी कथा बनायें. जो चाहें, करायें. लेकिन नहीं, लोकविश्रुत देवदास, बाजीराव मस्तानी और अब पद्मावती जैसे चरित्रों व कथाओं की लोकप्रियता का जो बम्फर मुनाफा और नाम मिलता है, वह कैसे होता? यदि पसन्दीदा साहित्यिक कृतियों या मिथकों को साकार करने का जुनूँ (पैशन) होता, उन्हें लेकर नयी व्याख्या की वैचारिक चेतना होती, तो आम्रपाली’, ‘तीसरी कसम’, ‘नटसम्राटया फिर सूरज का सातवाँ घोडाही सही...जैसा कुछ बनाते. लेकिन वैसी ज़हनियत व नीयत से महरूम लोगों की क़ुदरत ही है - सरनामों-सम्मान्यों को उठाना, विवाद पैदा करना और कमाना.... पद्मावत-कथा पर भारत : एक खोजकी मात्र 25 मिनट की प्रस्तुति के समक्ष भुनाने और सृजन का फर्क़ देखा जा सकता है. ख़ैर,



किरदार बनाम कलाकार
जब मूल कथा के प्रति कलात्मक सरोकार की जवाबदेही ही ऐसी है, तो उसे व्यक्त करने वाले किरदारों का क्या पूछना!! जड-चेतन गुण-दोषमयका ऐसा विद्रूप है कि अच्छे को इतना अच्छा बनाया, जिसे देख स्रष्टा भी चकरा जाये और बुरे को इतना बुरा कि बुराई भी त्राहि-त्राहि करने लगे.... यही जलजला है अलाउद्दीन खिलजी और रावल रतन के किरदारों में. राजपूती उसूलों व शान-स्वाभिमान को भरने में रत्नसेन देवता हो जाते हैं और अपनी सारी हविश को किसी भी कीमत पर पूरा करने में खिलजी राक्षस हो जाता है. आज के दौर में यह विलोमी रूप आम दर्शक के लिए हिन्दू-मुस्लिम का पर्याय बने बिना न रहेगा, जिसके लिए फिल्मकार ने कोई परहेज़ न बरता...क्या इरादतन? दोनो के धवल-कालिमा लिए पहनावों में भी यह साफ है. शादी के दिन किसी अन्य के साथ देह-रति तथा पत्नी के साथ जबरदस्ती सेक्स करने की हविश में मनमाना खिलजी बनाने के लिए रनवीर के चलने-बोलने व ख़ासकर मांस खाने से लेकर सभी अदा-ओ-अन्दाज़ व मेकअप-वेश-भूषादि पर जितना काम किया गया है, उसका दसवाँ हिस्सा भी रतन बने शाहिद पर नहीं. मूल्यवता रत्नसेन की, पर फिल्म रनवीर की हो गयी है. मूल्यों की मर्यादाएं लिये रतन बने शाहिद (विशाल भारद्वाज के हैदर के मुक़ाबले)  बुझे-बुझे व फ्लैट हैं; तो सबकुछ को ध्वंस करता खिलजी बना रनवीर डाँफ रहा है.

यही सलूक पद्मिनी बनी दीपिका पडुकोण के समक्ष भी शाहिद का है. पद्मिनी पर ही फिल्म है और राजा रतन के मुक़ाबले रानी के महिमा-मण्डन की थोडी झाँकी ऊपर दिखायी गयी. रतन के जीतेजी मृत्यु की आशंका के साथ जौहर करने की आज्ञा लेने तक में महत्ता दिखती है दीपिका की ही. और इस सलूक में सिनेमाई फितरत कम, टिकिट खिडकी पर इनकी औक़ात से प्रेरित पसन्दगी का ही मामला ज्यादा है. बाकी कलाकारों को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी गयी है. जैसे अलाउद्दीन के लिए काम-पूर्त्ति तक का साधन है राघव चेतन, उसी तरह पद्मिनी-खिलजी के अलावा सारे किरदार व कलाकार भंसाली के लिए काम-पूर्त्ति तक ही कीलित हैं. गोरा-बादल को राजपूती शान में शरीक़ करके उनकी मिथकीय हैसियत का सम्मान किया जा सकता था. बादल की माँ में किंचित ऐसा हुआ भी है, पर उसका भी ज्यादा हिस्सा दीपिका के चरित्र को उभारने में परवान चढ गया है. नागमती का होना भी पद्मिनी के उठान की बलि है. ऐसी पूर्वग्रही किरदारी और कलाकारियत के साथ ऐसा सलूक!! कम ही मिलेगा कहीं.   



भव्यता बनाम वास्तविकता
भव्यता भंसाली की फिल्मों की अपनी ख़ासियत है. और यह भी अपने महिमा-मण्डन में वास्तविकता और सामाजिक चेतना को रौंदती हुई नुमायां हुई है. नयनाभिराम दृश्य संयोजन हर चौखटे (फ्रेम) में मौजूद हैं, किन्तु भव्यता की ऐसी भी कैसी आत्मरति कि स्त्रियों, जिसमें गर्भवती भी शामिल हैं, के सामूहिक अग्निस्नान के संवादहीन 15 मिनट सजी-धजी सुन्दरी नायिका की मारक गति और उस पर जँचते पार्श्व-संगीत के साथ भंसालीजी जैसे निर्देशक के लिए अविस्मरणीय क्लाइमेक्स’ (की जुगाली) बन जायें. वरना खिलजी का सिर्फ आना और धुआं उठते राखों के ढेर को देखने भर से इस लम्बी फिल्म के 15 मिनट तो बचते ही, वह भीषण त्रासदी जितनी गहराती, वो इस भव्यता में बह गयी है....
सौन्दर्य-हानि और उससे छीजती भव्यता के डर से शिकार करती नायिका के भी सर-कमर तो बँधते नहीं, केश भी खुले ही रहते हैं, पर संजय की लीला ऐसी कि मज़ाल है जो आँचल तक खिसक जाये.... घूमर नृत्य दिखाने का कथित उद्देश्य तो राजस्थानी संस्कृति के प्रतीक का निदर्शन है, पर हाय री भव्यता की लत (लस्ट) कि उसे रानी पर ही फिल्माना है, जिससे वस्त्र-आभूषण की भव्यता का निख़ार भी आ जाये - फिर चाहे भले महारानी को नचाने में उसी राजपूती संस्कृति का पूरा विखण्डन ही क्यों न हो जाये...!! और विरोध न हुए होते, तो भंसाली की रानी पद्मिनी भरी महफिल में ही नाचती. और क्या अब कहने की ज़रूरत रह जाती है कि इस पूरे प्रकरण की चाबी दीपिका-रूप के दोहन में छिपी है. भव्यताओं की ऐसी विद्रूपतायें शयन-कक्ष में होली-गीत जैसी तमाम और भी हैं, जो 3डी की तकनीक में अधिक जगमगा उठी हैं.



फिल्म बनाम दर्शक
ऊपर से शालीन लगती फिल्म में बडी चतुराई से पिरोये उक्त हॉट तत्त्वों से हिट हुई जा रही फिल्म को अधिकांश समीक्षाओं में ढाई स्टार देने वालों ने शायद समझा भी है. लेकिन आम दर्शक को तो यही भाता है, जो और जिस तरह भंसाली परोस रहे हैं. और असल बात यही है कि जायसी की कालजयी कृति, दीपिका पडुकोण के सौन्दर्य व अलाउद्दीनी नृशंसता के नाम पर रनवीर सिंह के जलवे...आदि सब कारक मात्र ही हैं. सच में दोहन तो हो रहा है अवाम की इसी मानसिकता का, जिसे भंसाली ने देवदाससे लेकर पद्ममावततक निरंतर बढाया है बल्कि ऐसे तमाम फिल्मकार अवाम की सोयी हुई ईहाओं को जगाने का यही काम कर रहे हैं और इसी के बल उसे लूट रहे हैं. इससे समाज और संस्कृति पर पडने वाले फर्क़ को भी वे जानते हैं, पर दुर्योधन के जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:की तरह उन्हें इसकी पडी नहीं और अवाम को इसका पता नहीं. सो, आम दर्शक इन्हीं सब पर दिल खोल कर पैसे लुटा रहा है और अपनी इसी लीला को लूट रहे हैं भंसाली..आदि.

लेकिन लूटने वाले भी काव्य, कला व सौन्दर्य को बज़ार में बेचने के बदले वही माँग-पा रहे हैं, जिसके लिए बाबा तुलसी कह गये हैं – ‘का माँगौँ कछु थिर न रहाई. तो, नाम-दाम लेकर ये लोग भी थिर न रहाईहो जायेंगे.... लेकिन छह सौ सालों से जड जमाये पद्मावतको हिला न सकेंगे, जैसे 16 साल हो गये देवदासका विद्रूप बनाये, पर शरत् बाबू के देवदासका कुछ न बिगडा. सच्ची कला व संस्कृति की फ़ितरत यह भी है.


पर बरवक़्त क्या हो इसका कि रनवीर के कारनामे सडकों-नुक्क्डों पर सराहे जा रहे हैं. मूल्यों के लिए क़ुर्बान हो जाने वाले रावल रतन बने शाहिद के साथ फिल्म ने जितनी अनवधानता बरती, वही जनता में उतर रही.... दीपिका की देहयष्टि पर फ़बते विविध रूपरंगी लहँगों और विशिष्ट कोणों से नुमायां किये गये आंगिक सौन्दर्य व दिलक़श अदाओं पर फ़िदा हैं लोग. 

दुष्यंतकुमार के शब्द उधार लेकर कहूँ, तो इन तथाकथित रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो..... 
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सत्यदेव त्रिपाठी
बनारस
satyadevtripathi@gmail.com

सबद - भेद : मित्रो मरजानी का मर्म: नंद भारद्वाज

Posted by arun dev on फ़रवरी 21, 2018












कृष्‍णा सोबती के  लेखन पर समालोचन पर आपने रवीन्द्र त्रिपाठी  का आलेख पढ़ा - 'पहले दिल-ए-गुदाख़्ता पैदा करे  कोई. इसी क्रम में आज प्रस्तुत है नंद भारद्वाज का आलेख – ‘मरजानी मित्रो की मर्म-कथा’.

नंद भारद्वाज ने इस चर्चित उपन्यास पर लेखकों-आलोचकों के मतान्तर को दृष्टि में रखते हुए इस कृति के मन्तव्य को सलीके से उद्घाटित किया है.  

फरवरी  कृष्णा सोबती के जन्मोत्सव का महीना है.



मरजानी मित्रो की मर्म-कथा                  
नंद भारद्वाज





कृष्‍णा सोबती के अधिकांश समानधर्मा रचनाकारों, समालोचकों और हिन्‍दी के बड़े पाठकवर्ग ने जहां अपने समय-समाज में उनकी रचनात्‍मक भूमिका को मुक्‍त मन से सराहा है, वहीं उनके कुछ समकालीन रचनाकारों और भिन्‍न सोच रखनेवाले आलोचकों ने उनके स्‍त्री चरित्रों की वैयक्तिक छवि, उन्‍मुक्‍त आचरण और उनकी बेबाक बयानी पर सनातनी शंकाएं उठाते हुए उन पर मनमाने आरोप भी लगाए हैं. 


मसलन, लेखक-संपादक राजेन्‍द्र यादव को जहां ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में कृष्‍णा सोबती की नारी एक खतरनाक दिशा की ओर मुड़ती दिखाई दी और उन्‍हें यह लिखना जरूरी लगा कि ‘डार से बिछुड़ी’ में आदमी ने औरत को ‘चीज’ की तरह इस्‍तेमाल किया था, यहां औरत आदमी को एक दूसरी दृष्टि से इस्‍तेमाल करती है. (औरों के बहाने, पृष्‍ठ  43) 
वहीं कृष्‍णा सोबती के इन्‍हीं उपन्‍यासों को हवाले में लेते हुए उन पर अपनी तंजभरी टिप्‍पणी ‘कौन-सी जिन्‍दगी कौन-सा साहित्‍य’ में अमृता प्रीतम यह कहती दिखीं कि “आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य के यौन आचरण का एक बड़ा खूबसूरत हवाला कृष्‍णा सोबती के उपन्‍यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में मिलता है." इसी क्रम में हिन्‍दी कथाकार और लेखक कमलाकान्‍त त्रिपाठी ने ‘दस्‍तावेज’ पत्रिका के अंक 138 में प्रकाशित अपने एक लेख में हिन्‍दी की स्‍त्री कथाकारों में मुक्‍त-यौनवाद का मसला उठाते हुए कृष्‍णा सोबती, मृदुला गर्ग, और मैत्रेयी पुष्‍पा के कुछ उपन्‍यासों की कथावस्‍तु और उनके नजरिये को निशाने पर लेते हुए काफी तीखी टिप्‍पणियां की हैं. 


कृष्‍णा सोबती के दो लघु उपन्‍यासों ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ और ‘मित्रो मरजानी’ के प्रमुख स्‍त्री-चरित्रों की चीर-फाड़ के बहाने उन्‍होंने लेखिका के मंतव्‍य (नीयत) पर ही सवाल उठा दिये हैं.

‘मित्रो मरजानी’ की पूरी कथा की अपनी मनमानी व्‍याख्‍या करते हुए कमलाकान्‍त त्रिपाठी लिखते हैं-  “ऐसे घोर व्‍यक्तिवादी, बल्कि  देहवादी, दांपत्‍य-विरोधी और समाज-विरोधी पात्र को उपन्‍यास का केन्‍द्रीय चरित्र बनाने के पीछे लेखिका का क्‍या मंतव्‍य हो सकता है. अंत के बेहद नाटकीय दृश्‍य का निहितार्थ बहुत गोलमोल है. कोई संकेत नहीं है कि पति को लेकर मां से भय और असुरक्षा का क्षणिक बोध रातों-रात उसमें कोई दिव्‍यांतर ला देता है और वह अपने स्‍वभाव से ऊपर उठकर घर-परिवार के प्रति अनुरक्‍त हो जाती है. इस दृश्‍य को छोड़ दें तो मित्रो में कहीं कोई मानवीय स्‍पंदन नहीं है." (दस्‍तावेज 138, पृष्‍ठ 9) और इसी रौ में उनके दूसरे उपन्‍यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ पर ‘सॉफ्‍ट पॉर्न’ की चत्‍ती लगाते हुए अपनी मनोगत व्‍याख्‍या में वे लिखते हैं – “पूरी कथा घोर दैहिकता पर टिकी होने के बावजूद एक अयथार्थ, स्‍वप्निल दुनिया में विचरती है, जहां आर्थिक-सामाजिक विसंगतियां, जीवन की आपा-धापी, ऊहापोह सिरे से गायब है." (वही, पृ 10) और अंत में वही खीझ-भरा निष्‍कर्ष कि “उपन्‍यास स्‍त्री–चेतना और स्‍त्री-विमर्श को एक सूत भी आगे बढ़ाता नहीं लगता." (वही, पृ 11)


जहां तक राजेन्‍द्र यादव और अमृता प्रीतम की टिप्‍पणियों का सवाल है, उन पर महिला एवं बाल कानून के विशेषज्ञ और नारी-लेखन के समाजशास्‍त्रीय अध्‍येता अरविन्‍द जैन ने कृष्‍णा जी के लेखन पर इस तरह की आपत्ति उठाने वालों को अपनी पुस्‍तक ‘औरत : अस्तित्‍व और अस्मिता’ में विस्‍तार से सटीक जवाब दिया है. ऐसे सभी आक्षेपों का तार्किक और शालीन उत्‍तर देते हुए वे लिखते है - “मैं इसे दुर्भाग्‍य ही कहूंगा कि उपन्‍यास को सिर्फ ‘मांसल धरातल’ पर ही पढ़ा और ‘पूजा’ गया. ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ मुख्‍य पात्र रत्‍ती के बचपन में बलात्‍कार से जुड़ी कहानी है, जिसमें रत्‍ती एक लंबी लड़ाई लड़ती है. हारती है, पर हार मानती नहीं. हर बार सिर उठा आगे बढ़ती है. रत्‍ती के लिए भविष्‍य वह अंधी आंखोंवाला वक्‍त बना रहा, जिससे रत्‍ती ने कभी साक्षात्‍कार नहीं किया, मगर रत्‍ती का बार-बार सिर उठा आगे बढ़ना देखना ही रत्‍ती की ताकत हैहिम्‍मत है." (औरत : अस्तित्‍व और अस्मिता, पृ 29)

बहरहाल, राजेन्‍द्र यादव और अमृता प्रीतम की टिप्‍पणियों पर अपनी बात फिर कभी. यहां जरूरत फिलहाल इस बात की है कि ‘मित्रो मरजानी’ के संबंध में कमलाकान्‍त त्रिपाठी की इन आपत्तियों को इस कथा-कृति की अंतर्वस्‍तु, मूल संरचना और कृष्‍णा सोबती की कथा-संवेदना के साथ मिलान कर जांचा-परखा जाना चाहिए, ताकि ऐसी भ्रान्त धारणाओं का निराकरण किया जा सके. बेहतर है कि पहले हम इस कथा-कृति की कथावस्‍तु को उसके मूल स्‍वरूप और निहितार्थ में ठीक से जान-समझ लें.  

‘मित्रो मरजानी’ शहरी निम्‍न-मध्‍यवर्ग के काम-काजी परिवार की ऐसी कथा है, जिसमें एक भिन्‍न वातावरण (रमणी की हवेली) में जन्‍मी-पली उन्‍मुक्‍त मिजाज वाली युवती मित्रो के बहू रूप में आ जाने से पारिवारिक वातावरण और घरेलू रिश्‍तों में जो नई स्थितियां और टकराव पैदा होते हैं और घर के बड़े किस तरह संतुलन बनाये रखने की कोशिश करते हैं, यह इसी जद्दोजहद की कहानी है. दिलचस्‍प बात यह है कि यहां खुद मित्रो भी अपने खुले मिजाज के बावजूद उसी बदले हुए वातावरण में ढलने का प्रयास करती है. जिन बातों का उसे अभ्‍यास नहीं है, उन्‍हें  अंगीकार करने का प्रयत्‍न करती है, परिवार और रिश्‍तों की मर्यादा समझने लगती है और इस तरह हिन्‍दी का पाठक पहली बार रूप में एक ऐसे स्‍त्री-चरित्र से रूबरू होता है, जो सामाजिक दायरे में वर्जित समझी जाने वाली दैहिक आकांक्षाओं और बुनियादी मानवीय भाव-वृत्तियों को बहुत सहज ढंग से अभिव्‍यक्‍त करती है. यह उपन्‍यास ऐसे ही घर में रहने-जीने वाले चरित्रों की मार्मिक कहानी के रूप में आगे बढ़ता है. इस घर के सदस्‍य हैं - मुखिया गुरूदास, उनकी पत्‍नी धनवंती, बड़ा बेटा बनवारीलाल, मंझला सरदारीलाल और एक छोटा गुलजारी. तीनों शादीशुदा हैं, जिनकी पत्नियां हैं – सुहागवंती (सुहाग), समित्रावंती (मित्रो) और फूलावंती (फूलां). मित्रो की मां बालो अपनी हवेली और रसूख के भुलावे में इस मध्‍यवर्गीय परिवार में अपनी बेटी मित्रो की शादी करवा तो देती है, लेकिन  जब उसका पति सरदारीलाल इस असलियत को जान लेता है तो पति-पत्‍नी के बीच का रिश्‍ता सहज नहीं रह पाता. उन दोनों के बीच तकरार बढ़ने लगती है और घर का वातावरण अशान्‍त होने लगता है, जिसे घर के बड़े (सास-ससुर, जेठ-जेठानी) किसी तरह संतुलित बनाए रखने का प्रयास करते हैं. 

पति-पत्‍नी के बीच की इसी आपसी तकरार के बाद रात में धीमे स्‍वभाव वाली जिठानी सुहाग देवरानी मित्रो को समझाने का प्रयास करती है तो वह कह उठती है - “जिठानी, तुम्‍हारे देवर सा बगलोल कोई और दूजा न होगा. न दुख-सुख, न प्रीत प्‍यार, न जलन-प्‍यास – बस आए दिन धौल-ध्‍प्‍पा --- लानत मलामत."  फिर एकाएक अपनी ओढ़नी, कुरता और सलवार उतार हंसते हुए सुहाग से बोलती है – “बनवारी कहता है, मित्रो तेरी देह क्‍या, निरा शीरा है शी-रा." इस बात पर सुहाग का चेहरा स्‍याह पड़ जाता है. वह कानों पर हाथ रख कहती है – “हाथ जोड़ती हूं देवरानी, मेरे सिर पाप न चढ़ा." मित्रो को उसी तरह अनावृत्‍त लेटी देख उसके बदन में सुइयां-सी चुभने लगती हैं और सोचती है - ‘इस कुलबोरन की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती औरत की देह निरे पाप का घट है.' कपड़े उतारकर पास बैठी मित्रो अपने हाथों से छातियां ढक मगन हो कहती है – “सच कहना जिठानी, क्‍या ऐसी छातियां किसी और की भी हैं?"  

अपना सिर पीटते हुए सुहाग उसे फटकारती है – “दिन-रात घुलती इस औरत की देह पर तुझे इतना गुमान? अरी, लानत तुझ पर! घर-घर तेरे जैसी काली-मकाली औरतें हैं, उनके तुझ जैसे ही हाथ-पांव हैं, आंखें हैं और यही तुझ जैसी दो छातियां! क्‍या तू ही अनोखी इस जून पड़ी है?” जिठानी का गुस्‍सा देख मित्रो ने हंसते-हंसते लीड़े पहन लिये, जिसे देख सुहाग अपने से ही कहती चली – ‘ऐसा पाप वरत गया है कि डोले में लाई, परणायी बहू के ये हाल-हीले! हे जोतोंवाली देवी, इस घर की इज्‍जत-पत रखना.' फिर मित्रो से कहती है – “देवरानी, तेरी किस्‍मत बुरी थी जो तू आज इन भाइयों के हाथों से बच निकली. मर-खप जाती तो इस जंजाल से छूटती और वे भी सुर्खरू हो जाते ! फिर अचरज से पूछती है – “सच सच कह देवरानी, तू इस राह-कुराह कैसे पड़ी?” 

इस पर मित्रो बेझिझक बोल उठती है – “सात नदियों की तारू, तवे-सी काली मेरी मां, और मैं गोरी-चिटृी उसकी कोख पड़ी. कहती है, इलाके बड़भागी तहसीलदार की मुंहादरा है मित्रो. अब तुम्‍ही बताओ, जिठानी, तुम जैसा सत-बल कहां से पाऊं–लाऊं ? देवर तुम्‍हारा मेरा रोग नहीं पहचानता. --- बहुत हुआ हफ्‍ते पखवारे --- और मेरी इस देह में इतनी प्‍यास है, इतनी प्‍यास है कि मछली सी तड़पती हूं." सुहागवंती फटी आंखों से देवरानी को तकती रहती है, जैसे पहली बार देखा हो, फिर सिर हिला फीके गले से कहती है – “देवरानी, इन भले लोगों को भुलावा दे, तुम्‍हारी मां ने अच्‍छा नहीं किया !” 

इस पूरी कथा में स्‍त्री देह और यौनिकता को लेकर कुल जमा इन्‍हीं संवादों को लेकर सनातनी लोगों में जो कुहराम मचा है, वह वाकई आश्‍चर्यजनक है. वे यह तक मानने को तैयार  नहीं कि दो हमउम्र पारिवारिक स्त्रियों (देवरानी-जिठानी) के बीच अकेले में इस तरह के हंस-बोलों अनैतिक या अस्‍वाभाविक कहना, एक तरह से अपनी कुंद-जेहनी और तंगदिली का ही इज़हार करना है. क्‍या इतने मात्र से मित्रो जैसी नवयौवना ‘निर्लज्‍ज’, ‘कामुक’, ‘कामोद्मादिनी’ या ‘स्‍वैरिणी’ स्‍त्री हो गई? और वह भी उस हमउम्र जिठानी के सामने जो बराबर उसके बेलिहाज बोलों और उन्‍मुक्‍त दैहिक हास-परिहास पर आत्‍मीय लगाव और चिन्‍ता के साथ उसे डांट-फटकार तक लगाने में कोई संकोच नहीं करती.

देवरानी-जिठानी के बीच हुए इस हास-परिहास भरे संवाद के बाद अगली सुबह जब सास धनवंती उन्‍हें यह बताने के लिए जगाती है कि छोटी बहू फूलावंती की तबियत ठीक नहीं, उसके लिए कुछ दवा-पानी का इंतजाम करना है, तो वही पारिवारिक वातावरण फिर से सजीव हो उठता है. यही मुंहफट मित्रो एक संजीदा गृहस्थिन की तरह अपनी सास से कहती है कि उसकी देवरानी बहाने कर रही है, उसे कुछ भी नहीं हुआ, बस घर के बाकी लोगों से उसका तालमेल नहीं बैठ रहा, इसलिए ऐसे हालात पैदा कर रही है. इतना ही नहीं, फूलावंती ने जब सीधे-सरल स्‍वभाव वाली जिठानी सुहाग पर यह आरोप लगाया कि वह उसके गहने दबाए बैठी है तो इस झूठे आरोप के कारण सुहाग के मन को भारी ठेस लगती है. मित्रो सुहागवंती का पक्ष लेते हुए फूलावंती को समझाने का पूरा प्रयत्‍न करती है कि उसकी ऐसी धारणा न परिवार के हित में है और न खुद उसके. जबकि देवर गुलजारी इस विवाद में अपनी बीबी फूलां को कुछ भी समझाने में असमर्थ रहता है. विवाद के दौरान जब परिवार के और लोग बीच में आ गए तो वह सुलझने की बजाय और उलझ गया. परिवार के प्रति ऐसी दूरन्‍देशी और व्‍यापक सोच रखने वाली मित्रो पर अगर कोई ‘घोर व्‍यक्तिवादी और ‘समाज विरोधी’ होने का आक्षेप लगाए तो ऐसी मनोगत धारणा रखने वालों की मानसिकता पर तरस ही खाया जा सकता है.   

उधर मित्रो और पति सरदारी के बीच की तकरार को सुलझाने के लिए घर के मुखिया गुरूदास अपने दोनों बेटों और बहुओं को बुलाते हैं. तकरार की मूल वजह यही थी कि जब मित्रो की पारिवारिक पृष्‍ठभूमि और उसके चाल-चलन को लेकर कुछ अवांछित बातें सरदारी के कानों तक पहुंची तो उसने परिवार में इसकी चर्चा कर दी. बड़े भाई और पिता सचाई जानने के लिए मित्रो से ही इसका खुलासा करना उचित समझते थे, इसी मकसद से जेठ बनवारी ने अपने मां-बाप और छोटे भाई की मौजूदगी में उसी से पूछ लिया – “बहू, मालिक को हाजर-नाजर जान के कह दो कि जो तुम्‍हारे घरवाले ने देखा सुना है वह झूठ है." लेकिन मि‍त्रो ने इसका तुरंत कोई सीधा उत्‍तर नहीं दिया तो थोड़ी तीखी जुबान में वही सवाल फिर दोहरा दिया गया.

आखिर मित्रो ने इस का जवाब कुछ यों दिया – “सज्‍जनो यह सच भी है और झूठ भी. जब और पूछा तो खुलासा करते हुए कहा – “सच तो यूं जेठ जी कि दीन-दुनिया बिसरा मैं मनुक्‍ख की जात से हंस-बोल लेती हूं. (इसमें काहे की लाज-शरम और किस बात की नाराजगी?)  झूठ यूं कि खसम का दिया राजपाट छोड़ मैं कोठे पर तो नहीं जा बैठी?” मित्रो के इस बेबाक उत्‍तर पर गुरूदास की प्रतिक्रिया काबिले गौर थी, जिन्‍होंने बहू की जगह लड़कों को डांटकर कहा - “बोधे जवानो, बेमतलब तिल का ताड़ बना रखा है." जबकि इस पर सरदारी की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह की रही. वह चीखकर बोला – “तू छिनालों की भी छिनाल ! आज न माने बापू, पर एक दिन इसके यार और याराने……

इस बात पर मित्रो ने ससुर की ओर उलाहने से ताका और मनुहार से कहा – “सुन लिया न बापू? कोई मां-जाई ऐसी गालियां सुन चुप रहेगी?”

जवाब में गुरुदास ने ही अपने बेटे को फटकारते हुए कहा – “लानत है, सरदारीलाल ! तेरी मत को सधाने का ढंग-अकल नहीं और ऊपर से यह गुनहगारी !

ससुर से ऐसी तरफदारी पाकर मित्रो ने उनके पांव छू लिये और कहा – “पांव पड़ती हूं बापू जी ! आज जो ओट आपसे पाई है, वह मित्रो के लिए सुरगों से बढ़कर है ! कहना न होगा कि इस नये पारिवारिक माहौल में मित्रो के लिए बड़ों की ओट और उनका स्‍नेह कितनी अहमियत रखता है, इसे वही समझ सकता है जो मित्रो जैसी परिवार-सुख से वंचित युवती के प्रति सच्‍ची सहानुभूति रखता हो. 

गुरूदास के बेटे मंडी में व्‍यापार का काम देखते थे. वे बाजार के कर्जे के कारण परेशान थे. उधर छोटा गुलजारी दुकान की जो भी उधारी उगाह कर लाता, वह दुकान के खाते में जमा करने की बजाय खुद ही हजम कर जाता. बनवारी और सरदारी इस बात से परेशान थे. घर में फूलावंती ने अलग तनाव का वातावरण बना रखा था, मित्रो ने बीच-बचाव कर उसे हर तरह से  समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. मित्रो ने जब बाजार के कर्जे के कारण पति के चिंतित होने की बात जानी तो उसने मदद के लिए पेशकश की, अपनी बचत में से पति को कुछ देना चाहा, इस सरदारी ने सवाल किया कि वह कहां से मदद कर देगी? यही सोच कर वह बोला, क्‍यों सिर खपाने बैठी हो, मर्दों के फिकर मर्दों के लिए. तेरे बस का नहीं है." 

मित्रो को बुरा तो लगा, लेकिन अपने पर काबू रख इतना ही बोली – “महाराज जी, न थाली बांटते हो, न नींद बांटते हो, दिल के दुखड़े ही बांट लो."

और जब यह जाना कि उन्‍हें तीन हजार की तुरंत जरूरत है तो अपनी पेटी से निकाल कर पति के सामने कर दिये. सरदारी हक्‍का-बक्‍का देखता रह गया. फिर जब मित्रो से पूछा कि ये धन कहां से आया, तो मित्रो ने सहजता से उत्‍तर दिया – “अम्‍मा के भोले भुलक्‍कड़, आपकी धन्‍नो सास की मैं इकलौती बिटिया हूं." जब सरदारी कुछ और कहने को हुआ तो उसने अपने शरबती होठों से मुंह पर सांकल लगा दी. यह प्रसंग और संवाद अपने आप में मित्रो के चरित्र में आए सकारात्‍मक बदलाव और परिवार के प्रति उसकी जिम्‍मेदारी की भावना को बेहतर ढंग से व्‍यक्‍त करता है. आश्‍चर्य है त्रिपाठी जी के लिए मित्रो के इस पारिवारिक अनुराग और मानवीय गुण की कोई कीमत नहीं !   

कथा में गुरूदास की शादीशुदा बेटी जनको के पहली जचकी के बाद पीहर आने का रोचक प्रसंग है, जो प्रकारान्‍तर से मित्रो के उस चारित्रिक पक्ष को ही उभारता है, जहां एक अलग तरह के माहौल से बहू के रूप में आई मित्रो कितनी सहजता से अपनी ननद के प्रति गहरा लगाव व्‍यक्‍त करती है, जिसे पारिवारिक रिश्‍तों को जीने-बरतने का कोई अनुभव नहीं है. इसी तरह गुरूदास के छोटे बेटे गुलजारी और उसकी तुनक-मिजाज स्‍वार्थी पत्‍नी फूलावंती की अलगाववादी प्रवृत्ति को ही उजागर करती है, जबकि मित्रो फूलावंती को भी समझा-बुझाकर परिवार के साथ बनी रहने की ही सलाह देती है.

मित्रो के समझाने-बुझाने के बावजूद फूलावंती आखिर ससुराल में तनाव के हालात पैदा कर पति के साथ अपने पीहर पहुंच ही गई, जहां उसकी मां ने अपनी बहुओं के सामने पहले ही बेटी के पक्ष में माहौल बना रखा था. लेकिन भाभियां उसकी हकीकत पहले से जानती थीं, पर खुलकर किसी ने कुछ भी नहीं कहा. खुद गुलजारी को भी ससुराल में कुछ दिन गुजारने के बाद अपनी भूल का अहसास हो जाता है, लेकिन उसे तुरंत सुधार लेने का कोई संभव रास्‍ता उसे नहीं नजर आता. यही वह निम्‍नमध्‍यवर्गीय पारिवारिक माहौल है, जिसमें स्त्रियां अपने छोटे-छोटे स्‍वार्थों के लिए आपसी मन-मुटाव, जोड़-तोड़ और खींच-तान में पूरी उम्र गुजार देती हैं.

सास धनवंती को एक सुबह जब रसोई में मित्रो को चूल्‍हा सुलगाते देखती है तो सुखद आश्‍चर्य होता है, क्‍योंकि मित्रो इस तरह के पारिवारिक काम की आदत नहीं थी, लेकिन उसी के मुंह से जब यह जानकारी मिलती है कि उसकी जिठानी सुहागवंती गर्भवती है, ऐसे में चूल्‍हे–चौके के काम में उसका हाथ बंटाना अब जरूरी हो गया है. सास धनवंती मित्रो के मुंह से यह खबर सुनकर फूली नहीं समाती, जा इन शब्‍दों में व्‍यक्‍त होता है - “तेरा ही मुंह मुबारक हो समित्रावंती, तेरे मुंह में घी-शक्‍कर.” और फिर दोनों बहुओं को आशीष देने लगती है.

सुहाग के गर्भवती होने की जितनी खुशी थी धनवंती को, मित्रो और सरदारी की अनबन से उतनी ही चिंतित. वह अपने बड़े बेटे बनवारी को मित्रो की खुशी के लिए उसे उपहार स्‍वरूप झुमके बनवाने का सुझाव देती है, ताकि परिवार में सौहार्द्र का माहौल बना रहे. जब मित्रो को अपने लिए झुमके बनवाने की बात पता लगी तो वह अचरज से भर गई. उसने यही कहा कि यह सब करने की क्‍या जरूरत है, यह तो जेठानी सुहाग के लिए करना चाहिये, जिसकी कोख खुलनेवाली है.

धनवंती ने अपनी मंझली बहू का मन रखने के लिए यह भी सुझाव देती है कि वह दो-महीने अपनी मां के पास रहकर व्रत-उपवास करे, जिससे विधाता खुश होंगे और उसके मन की मुराद पूरी करेंगे. मित्रो को सास का यह सुझाव पसंद आया. वह खुशी से सास के आगे माथा टेक इठलाकर कहती है – ‘बड़ी सरकार, तुम्‍हारा कहा सिर माथे. जो कहोगी, वैसा ही करूंगी. अपने कान्‍त से आनंद पाने महीना-दो क्‍या, मैं पूरे चौबीस पख व्रती रह लूंगी.' 

मित्रो की पीहर रवानगी के बाद सास धनवंती और सुहागवंती के बीच जो दिलचस्‍प संवाद हुआ, उसमें मित्रो के प्रति उनका गहरा लगाव ही प्रकट हुआ है. धनवंती को मित्रो अच्‍छी तो लगती है, लेकिन उसके बेबाक बरताव और इधर-उधर की चर्चाओं के कारण वह तय नहीं कर पाती कि दुनिया जिस तरह उसके बारे में अलाय-बलाय बात करती है, क्‍या उसमें कुछ सचाई भी है? यही बात जब वह अपनी बड़ी बहू से पूछती है तो सुहाग का ईमानदार जवाब होता है – “हम बिचके जन अपनी छोटी बुद्धि से दूसरों के छल-छिद्र, दोष-विचार क्‍या पड़तालें अम्‍मा? खुली-डुली देवरानी एक घड़ी स्‍याह, दूसरी घड़ी सफेद. उसके मन में क्‍या है, वही जाने, पर तन उसके तो ऐसी प्‍यास व्‍यापती है कि सौ घट भी थोड़े."  

सुहाग सास के पूछने पर कहने को तो यह बात कह बैठी, लेकिन उसके मन को तसल्‍ली  नहीं हुई. इसलिए रवाना होती सास को रोककर उसने अपनी बात और साफ करके कहा – “कहने को तो कह बैठी हूं पर एक बात मेरे चित्‍त में आती है अम्‍मा, कि मंझली को तौलने-परखने वाली मैं कौन?” सुहाग की इस निर्मल बात पर धनवंती भी रीझ गई, उस पर ऐसा प्‍यार उमड़ा कि आंखें छलछला आई. उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली – “तेरे मन में कोई द्वैत मैल नहीं सुहागवंती, मालिक तुझे बड़े भाग लगाए !” 

घर में मित्रो के व्‍यवहार और घर के प्रति उसके दायित्‍वबोध को लेकर धनवंती और सुहाग ही नहीं, ससुर गुरूदास के मन में भी मित्रो के प्रति गहरा लगाव है. धनवंती से बात करते हुए आखिर उन्‍हें कहना पड़ा – “सच पूछो तो इस घर की रौनक है मंझली बहू! भले बोली-ठोली में तेज-तर्रार, पर उठते-बैठते चहकती-कहकती तो है ! 

मित्रो अपने पति सरदारीलाल के साथ जब अपने पीहर नूर महल पहुंची तो चारों तरफ हलचल-सी मच गई. मित्रो की मां ने बेटी और दामाद का जी खोलकर स्‍वागत किया. दामाद ने भी सास के पांव छुए तो बालो ने आशीष बरसाए. मित्रो और उसकी मां के संवाद इतने बेतकल्‍लुफ और बेबाक कि जैसे दोनों मां-बेटी नहीं कोई सहेलियां हों. तभी तो मित्रो ने मां की ओर हंसकर कहा था – ‘अपने कबूतर से दिल को किस कैद में रखोगी बीबो, यह तो नित नया चुग्‍गा मांगेगा.' और इस पर मां का यह जवाब – ‘तेरी यही शीरीं बातें सुनने को मैं तरस गई मित्रो !' रात को जब वही सास सज-धज कर जमाई को भोजन परोसने बैठी तो ‘सरदारी को मित्रो की मां अपनी सास-सी नहीं कोई धंधेवाली व्‍यापारिन-सी लगी.

मां-बेटी के बेतकल्‍लुफ संवादों को सुनकर सरदारीलाल शर्म से पानी-पानी हुआ जा रहा था – एक दूसरे को उखाड़ती-पछाड़ती ये कैसी मां-बेटियां ! बाहर जाते सरदारी का बांका लाचा देख बालो के मन में जो मरोर उठी तो मित्रो ने आंखों से ही समेट ली और गेंदे के फूल-सी घुटी-घुटी आवाज में बोली – “बीबो, मुझ गरीबनी से क्‍या होड़? तुम्‍हें तो नित नए रास-रंग और मित्रो बेचारी हर दिन अपने इसी एक निठल्‍ले के संग !” 

खसम पर घमंड करनेवाली की बात से बालो के पपोटे जल उठे, पर ऊपर से लाड का फन फैलाकर बोली – “मेरी भोली मित्रो, मुझे तो अंग-अंग प्‍यासी तिरसाई जापती है! अरी, लहर हो तो बुलाऊं तेरी बगीची के लिए कोई माली?”

मित्रो के मुंह पानी भर आया. घरवाले के मान-गुमान सब उड़न-छू हो गए. सजरी आंखें चमकने लगी और ओढ़नी तले दो पंछी मचलने लगे. मां पर आंख गड़ा हौले से कहा – “अह-हय बीबो, तुम्‍हारे मुंह गुलाब. पर घोड़े-से लद्धड़ तुम्‍हारे इस जमाई का क्‍या करूं?” 

बालो ने हमजोलियों की नाईं लड़की को चिकोटी काटी – “ये झमेला तू छोड़ मुझ पर. अरी, तेरी मां खिलाड़िन ने बड़े बड़े बाघ छका डाले ! दरअसल यही वह पारिवारिक माहौल था, जिसमें पलकर मित्रो बड़ी हुई थी और उसकी मां की यही इच्‍छा थी कि उसकी बेटी किसी इज्‍जतदार घर में ब्‍याही तो जाए, लेकिन वहां से इज्‍जत और कुछ सुख-सुविधाएं बटोर कर वापस उसी माहौल में लौट आए.

और फिर इस खिलाड़िन मां ने अपने बुढ़ापे और अकेलेपन से उबरने के लिए बेटी मित्रो को फिर से अपने धंधे में खींच लाने के लिए आखिरी दांव खेला – उसने मित्रो को बना-संवारकर सरदारी लाल के पास इस हिदायत के साथ भेजा कि वह उसे रिझाकर इतनी शराब पिला दे, जिससे वह बेसुध हो जाए. फिर वह उसे अपने जाने-परखे डिप्‍टी बग्‍घा के पास रंगरेलियां मनाने भेज देगी और इस तरह मित्रो वापस उसी के धंधे में लौट आएगी.

मित्रो मां के इस जाल में फंसकर उस ग्राहक के पास जाने ही वाली थी कि अचानक मां बालो का मन पलट गया, उसे यह अच्‍छा नहीं लगा कि ‘जो डिप्‍टी सौ-सौ चाव कर उसकी शरणी आता था, आज वही इस लौंडिया से रंगरेलियां मनाएगा. थू री बालो, तेरी जिन्‍दगी पर !’ और उसने रोने का स्‍वांग कर मित्रो को वापस बुला लिया.

जब मित्रो ने मां से पूछा कि ‘बीबो, खैर तो है? धुर दहलीज से बुला लिया?’ लेकिन बार-बार पूछने पर भी जब बालो कुछ न बोली और रोती रही तो उसी ने फिर दिलजोई की – ‘बीबो, डिप्‍टी अगर तेरा इतना ही प्‍यारा है तो इस घुग्‍घुचिया को क्‍यों उससे मेल-ठेल करने भेजा?’ 

वह बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई – तेरी मां के जमाने लद गये री मित्ती ! अब कौन उसका मित्र-प्‍यारा और कौन संगी-साथी !

भौंचक्‍की मित्रो ने रुककर कहा – ‘तेरे दिलगारों की गिनती तो सैकड़ों में थी, बीबो!’ इस पर बालो ने रोते हुए कहा – “न न री, अब इस ठठरी ठंडी भट्टी का कोई वाली-वारस नहीं!" वह आख्रिर अपनी मूल बात पर आते हुए लड़की को अपनी ओर खींचकर बोली – ‘बेटी ! अब अकेले छोड़कर मत जाना ! मैं सरदारीलाल को मना लूंगी.‘

अंधेरे में दमदमाते नीले पपोटोंवाले मां के काले चेहरे पर दो चील की-सी आंखें देखीं तो चीख मार मित्रो परे जा छिटकी. - “क्‍यों री, क्‍यों?” गहरा फुंकार भर मां को अपनी ओर बढ़ते देख पहले तो मित्रो की घिग्‍घी बंध गई. फिर जाने किस जोर-जाम से संभली और तड़पकर चीखी – “तू सिद्ध भैरों की चेली, अब अपनी खाली कड़ाही में मेरी और मेरे खसम की मछली तलेगी? सो न होगा बीबो, कहे देती हूं!’ फिर तीर-सी छलांग मार ओसारे से देहरी कुलाची और मां के ठेलते-ठेलते सरदारीलाल वाली बैठक की कुंडी चढ़ा ली.

दिन चढ़े सरदारी ने जब आंख खोली तो पास में लेटी मित्रो ने अपने सैंया के मुंह पर चुम्‍मे जड़ दिये. फिर पूछा – “गिरदौर जी, पिछली रात कहां कहां हुए दौरे, पड़ाव?” सरदारी ने घरवाली को घूरा और सिर पर छोटी-सी चपत दे कहा – “रात तो न कहीं ढुकाव हुआ न पड़ा पड़ाव. बस, बैठ हवा के घोड़े बांटे, कहां की कहां निकल गई !” 

मित्रो ने इतना ही कहा – “मेरे हरमन मौला! यही बीता तुम्‍हारी मित्रो के साथ ! फिर बाहों में अंगड़ाई ली, हाथों को चटखा-मुरका उठ बैठी. सैयां के हाथ दाबे, पांव दाबे, सिर-हथेली होठों से लगा झूठ-मूठ की थू कर बोली – “कहीं मेरे साहिब जी को नजर न लग जाए इस मित्रो मरजानी की !और इसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचकर कृष्‍णा सोबती ने अपनी इस कथा को विराम दिया, जहां से उनके जीवंत चरित्र मित्रो की मुख्‍य धारा के सामाजिक जीवन में लौटने की साध पूरी होती है और यहीं से एक स्‍त्री की सहज जीवन-यात्रा आरंभ होती है.

कितनी विचित्र बात है कि कृष्‍णा सोबती ने जिस गहरी मानवीय दृष्टि से यौन-व्‍यवसाय से जुड़ी एक स्‍त्री की कोख से पैदा हुई और उसी माहौल में पली-बढ़ी उन्‍मुक्‍त स्‍वभाववाली युवती की वैयक्तिक उूर्जा और उसके मानवीय गुणों को उभारते हुए उसे एक मध्‍यवर्गीय परिवार की जिम्‍मेदार बहू के रूप में चित्रित किया है, और जो विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए हर कदम पर अपने सास-ससुर, जेठ-जिठानी और परिवार के सदस्‍यों से गहरा लगाव अनुभव करती है, कमलाकान्‍त त्रिपाठी को उसमें कोई ‘मानवीय संवेदन’ ही नहीं दिखाई देता. कहीं ऐसा तो नहीं कि मानवीय संवेदन देखने की यह दृष्टि ही किन्‍हीं और कारणों से बाधित हो गई हो. 


कृष्‍णा जी की व्‍यापक मानवीय दृष्टि की खूबी यह है कि वे सामाजिक दृष्टि से बुरा या वर्जित समझे जाने वाले किसी कर्म में परिस्थितवश घिरे इन्‍सान से घृणा नहीं करतीं, बल्कि उसे उस परिस्थित से उबारने में सभी से सहयोग की अपेक्षा करती हैं, जो स्‍वयं उबरने के लिए संघर्ष करता है, उसका हौसला बढ़ाती हैं और अपनी सर्जना में ऐसे संघर्षशील चरित्रों को बल प्रदान करती हैं, जिन पर कलम चलाने से सनातनी लेखक संकोच करते हैं. मित्रो ऐसा ही जीवंत चरित्र है, जिसकी मां देह-व्‍यापार में मुब्तिला थी. जो मां अपनी बेटी को एक सोची-बूझी चाल के तहत ऐसे मध्‍य-वर्गीय परिवार में ब्‍याह कर उसे वापस अपने धंधे में खींच लाने की कामना रखती है, यह मरजानी मित्रो की अपनी हूंस, विवेक और सूझ-बूझ का ही परिणाम रहा कि वह उस दुष्‍चक्र से उबरकर एक जीवंत चरित्र के रूप में विकसित हो सकी. निश्‍चय ही इस अर्थ में मित्रो की मर्म-कथा को कृष्‍णा सोबती ने जिस मनोयोग से रचा है, वह अपने आप में अनूठी उपलब्धि है.  
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नंद भारद्वाज
1/247, मध्‍यम मार्ग
मानसरोवर, जयपुर – 302020
Email : nandbhardwaj@gmail.com

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