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स्पिनोज़ा : : नीतिशास्त्र - ३ - (अनुवाद : प्रत्यूष पुष्कर, प्रचण्ड प्रवीर)

Posted by arun dev on दिसंबर 12, 2017







महान दर्शनिक स्पिनोज़ा की प्रसिद्ध कृति 'नीतिशास्त्र' का अनुवाद आप समालोचन पर पढ़ रहे हैं. 

दार्शनिक अवधारणाओं का हिंदी में अनुवाद जटिल कार्य है.  युवा अध्येता प्रत्यूष पुष्कर और प्रचण्ड प्रवीर इस गुरुतर कार्य को पूरी गम्भीरता से कर रहे हैं.  इसका प्रकाशन दर्शन और साहित्य दोनों के लिए मूल्यवान है.  


आज प्रत्यूष पुष्कर का जन्म दिन है. समालोचन की तरफ से बहुत बहुत बधाई. 



Part I.
Concerning God.
______________________________________


भाग
ll      ईश        के       बारे     में   ll
(तीसरा हिस्सा)




PROP. XVI. From the necessity of the divine nature must follow an infinite number of things in infinite ways-that is, all things which can fall within the sphere of infinite intellect.

प्रस्ताव १६.  दैवी प्रकृति के नियमितताओं से असंख्य चीज़ें अनगिणत तरीकों से निश्चित रूप से अनुसरित होती हैं, वे सभी चीज़ें जो असीमित मति के अन्तर्निहित हैं.



Proof. — This proposition will be clear to everyone, who remembers that from the given definition of any thing the intellect infers several properties, which really necessarily follow therefrom (that is, from the actual essence of the thing defined); and it infers more properties in proportion as the definition of the thing expresses more reality, that is, in proportion as the essence of the thing defined involves more reality. Now, as the divine nature has absolutely infinite attributes (by Def. vi.), of which each expresses infinite essence after its kind, it follows that from the necessity of its nature an infinite number of things (that is, everything which can fall within the sphere of an infinite intellect) must necessarily follow. Q.E.D.



प्रमाण: यह प्रस्ताव सबके लिए स्पष्ट होगा, जिन्हें याद है कि पहले दी हुई परिभाषाओं के अनुसार, मति किसी भी चीज़ के कई गुणों का अनुमान करती हैं, जहाँ से यह स्पष्ट है कि (परिभाषित चीज़ के वास्तविक सार से); और मति अधिक गुणों का अनुमान करती है, निर्धारण करती है, जितना उसके अनुपात में उस चीज़ की निर्धारित परिभाषा उसकी वास्तविकता अभिव्यक्त करती है. अब, चूँकि दैवी प्रकृति में अनंत गुणधर्म है (परिभाषा ६), जिसमें से प्रत्येक, अपने प्रकार के अनंत सार को अभिव्यक्त करती है. इसीलिए यह स्पष्ट है कि अपनी प्रकृति से अनिवार्यत: अनंत चीज़ें (जो असीमित मति के अंतर्गत आती हो) को होना होगा.

Corollary I.-Hence it follows, that God is the efficient cause of all that can fall within the sphere of an infinite intellect.



उप-प्रमेय १. अर्थात, ईश उन सभी चीज़ों का दक्ष कारण है जो असीमित ज्ञान में घेरे में आती है.

Corollary II.-It also follows that God is a cause in himself, and not through an accident of his nature.

उप-प्रमेय २. इसका अर्थ यह भी कि ईश स्वयं में एक कारण है, अपनी प्रकृति की कोई दुर्घटना नहीं.

Corollary III.—It follows, thirdly, that God is the absolutely first cause.



उप-प्रमेय ३. इसका तीसरा अर्थ यह है कि ईश निश्चितरूपेण पहला कारण हैं.

{अनुवादक की टिप्पणी: उपरोक्त प्रस्ताव का अर्थ यह हुआ कि वास्तविकता की अभिव्यक्ति बहुत से गुण-धर्मों से संयुक्त है.यह प्रस्ताव जैसे कलाकारों के लिए वास्तविकता के अनुकरण के लिये ब्रह्मवाक्य जैसा रहा है. उपन्यास मादाम बोवारी (1857) के प्रसिद्ध फ्रांसिसी लेखक गुस्ताव फ्लोवेर (
Gustave Flaubert : 1821-1880) की टिप्पणी Le bon Dieu est dans le détail” - अच्छा ईश्वर विवरणों में हैं और जर्मन वास्तुशास्त्री लुडविग मीस (Ludwig Mies van der Rohe : 1886 – 1969) का मशहूर कथन - ईश्वर विवरणों में हैं (God is in the details) इसी प्रस्ताव से प्रेरित सा प्रतीत होता है.}



PROP. XVII. God acts solely by the laws of his own nature, and is not constrained by anyone. 

प्रस्ताव १७ . ईश केवल अपनी प्रकृति के नियमानुसार कार्य करता है, और किसी के द्वारा विवश नहीं है.




Proof. — We have just shown (in Prop. xvi.), that solely from the necessity of the divine nature, or, what is the same thing, solely from the laws of his nature, an infinite number of things absolutely follow in an infinite number of ways; and we proved (in Prop. xv.), that without God nothing can be nor be conceived; but that all things are in God. Wherefore nothing can exist outside himself, whereby he can be conditioned or constrained to act. Wherefore God acts solely by the laws of his own nature, and is not constrained by anyone. Q.E.D.






अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
constrained = विवश


प्रमाण. – हमनें अभी देखा (प्रस्ताव १६)दैवीय प्रकृति की अनिवार्यताओं या जिसे हम प्रकृति के नियमानुसार कहते हैं, अनंत चीज़ें, अनंत तरीकों से अस्तित्व या सत्ता में है, और (प्रस्ताव १५) से, ईश के बिना, कुछ भी संकल्पित नहीं है, सभी चीज़ें ईश में अन्तर्निहित भी है. इसीलिए कुछ भी उसकी परिमिति से बाहर अस्तित्व में नहीं है, और उसे विवश या सशर्त (अनुकूलित या बाध्य) नहीं किया जा सकता. अत:ईश केवल अपनी प्रकृति के नियमों से आबद्ध कार्य करता है और किसी के द्वारा विवश नहीं किया जा सकता.




Corollary I.-It follows: 1. That there can be no cause which, either extrinsically or intrinsically, besides the perfection of his own nature, moves God to act.



उपप्रेमय- १.अर्थात१. ऐसा कोई भी कारण नहीं हो सकता, जो बाह्य या आतंरिक रूप से, अपनी प्रकृति के पूर्णता के अलावा, ईश से कार्य करवा सकता है.



Corollary II.-It follows: 2. That God is the sole free cause. For God alone exists by the sole necessity of his nature (by Prop. xi. and Prop. xiv., Coroll. i.), and acts by the sole necessity of his own nature, wherefore God is (by Def. vii.) the sole free cause. Q.E.D.

उप-प्रमेय. अर्थात२. ईश ही केवल एक मुक्त कारण है, क्योंकि केवल ईश ही अपने प्रकृति के अनिवार्यता स्वरुप अस्तित्व या सत्ता में है (प्रस्ताव ११ और प्रस्ताव १५ के उप प्रमेय १ से), और केवल अपनी प्रकृति के अनिवार्यताओं से कार्य करता है (परिभाषा ७), इसीलिए ईश ही केवल मुक्त कारण है.


Note.—Others think that God is a free cause, because he can, as they think, bring it about, that those things which we have said follow from his nature—that is, which are in his power, should not come to pass, or should not be produced by him. But this is the same as if they said, that God could bring it about, that it should follow from the nature of a triangle that its three interior angles should not be equal to two right angles ; or that from a given cause no effect should follow, which is absurd.




नोट - कुछ लोग ऐसा सोचते हैं, जैसा हमने पहले कहा है चीजें ईश की प्रकृति के अनुसार है (या ईश की शक्ति के अंतर्निहित है), कि ईश वह नहीं कर सकते क्योंकि जो नहीं हो सकते हैं इसलिये वह ईश के द्वारा नहीं पैदा किये गये. इससे वह यह सोचते हैं कि कि ईश एक मुक्त कारण है. पर यह ऐसा ही है अगर ऐसा कहा जाता कि ईश ऐसा भी कर सकते है कि त्रिभुज के तीन अंत:कोणों का योग दो समकोणों के बराबर न होता, या फिर किसी कारण से कोई कार्य न होगा, जो कि अनर्थक है.



Moreover, I will show below, without the aid of this proposition, that neither intellect nor will appertain to God’s nature. I know that there are many who think that they can show, that supreme intellect and free will do appertain to God’s nature ; for they say they know of nothing more perfect, which they can attribute to God, than that which is the highest perfection in ourselves. 



अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
intellect = बुद्धि (मति)
will = संकल्प (इच्छा)(चूँकि desire के लिए भी इच्छा लिखा जा सकता है, हम will के लिये संकल्प का प्रयोग करना ठीक समझते हैं)
perfection = उत्कृष्टता


इसके अलावा, मैं नीचे यह दिखलाऊँगा कि बिना इस प्रस्तावना १७ के, कि न ही मति (बुद्धि) न ही संकल्प ईश की प्रकृति से सम्बन्धित हो सकती है. मैं जानता हूँ कि बहुत से ऐसे है जो सोचते हैं कि वे यह दिखा सकते हैं कि सर्वोपरि मति और स्वतंत्र संकल्प ईश की प्रकृति में है; क्योंकि वे ऐसा कहते हैं कि वे इनसे अधिक उत्कृष्ट कुछ भी नहीं जानते हैं जो ईश से कहे जा सकते हैं जो कि हमारे अति उत्कृष्टता से बढ़ कर हो.


Further, although they conceive God as actually supremely intelligent, they yet do not believe that he can bring into existence everything which he actually understands, for they think that they would thus destroy God’s power. If, they contend, God had created everything which is in his intellect, he would not be able to create anything more, and this, they think, would clash with God’s omnipotence ; therefore, they prefer to asset that God is indifferent to all things, and that he creates nothing except that which he has decided, by some absolute exercise of will, to create.


अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
omnipotence = सर्वशक्ति
will = संकल्प (इच्छा)


आगे, यद्यपि वे ईश को सर्वोपरि मतिमान मानते हैं, तब भी वे यह नहीं विश्वास करते कि ईश हर कुछ अस्तित्व में नहीं ला सकते हैं जो कि समझी जा सकने वाली वस्तुएँ हैं, क्योंकि वे ऐसा सोचते हैं कि यह ईश की शक्ति का विनाश कर देगा. यदि वे ऐसा दावा करते हैं कि  ईश ने सब कुछ बनाया है जो कि उसकी दैवी मति में था, वह कभी भी ऐसा कुछ नहीं बना सकता है जो कि ईश की सर्वशक्ति के विरुद्ध हो जाय; इसलिए, वे ऐसे विचारक यही सोचते हैं कि ईश का झुकाव किसी एक दिशा में हैं नहीं, और ईश ने कुछ ऐसा नहीं बनाया जो उसने मुक्त संकल्प में बनाया हो.




However, I think I have shown sufficiently clearly (by Prop. xvi.), that from God’s supreme power, or infinite nature, an infinite number of things-that is, all things have necessarily flowed forth in an infinite number of ways, or always flow from the same necessity ; in the same way as from the nature of a triangle it follows from eternity and for eternity, that its three interior angles are equal to two right angles. Wherefore the omnipotence of God has been displayed from all eternity, and will for all eternity remain in the same state of activity. This manner of treating the question attributes to God an omnipotence, in my opinion, far more perfect.




पर मुझे लगता है कि मैंने स्पष्टता से दिखा दिया है (प्रस्ताव १६ में) कि ईश की सर्वशक्ति या अनंत प्रकृति अनगिनत चीजों में अनगिनत तरहों से - यह कि सभी सम्भव वस्तुएँ अवश्य ही अनुसरण करती आयीं हैं या हमेशा अनुसरण करेंगी, उन्हीं अनिवार्यताओं के साथ और उन्हीं तरह से जिस तरह त्रिभुज की प्रकृति निर्धारित होती है- जहाँ हम जानते हैं कि तीनों अंत:कोणों का योग दो समकोणों के बराबर होता है. इसलिए ईश की सर्वशक्ति दरअसल शाश्वत से है और उन्ही क्रियाओं के लिए शाश्वत तक यथावत रहेंगी. मैं समझता हूं कि ईश ईश की सर्वशक्ति को अच्छी तरह समझा सकता है कि इस विचार के कि कुछ ऐसी चीजें हैं जो ईश कर सकते हैं पर नहीं करने का चुनाव करते हैं.



For, otherwise, we are compelled to confess that God understands an infinite number of creatable things, which he will never be able to create, for, if he created all that he understands, he would, according to this showing, exhaust his omnipotence, and render himself imperfect. Wherefore, in order to establish that God is perfect, we should be reduced to establishing at the same time, that he cannot bring to pass everything over which his power extends; this seems to be a hypothesis most absurd, and most repugnant to God’s omnipotence.





वस्तुत: - इस बारे में खुले ढंग से सोचे तो मेरे विरोधी ईश के सर्वशक्ति को नकारते मालूम होते हैं. क्योंकि वह यह तो मानते हैं कि ईश अनंत ऐसी चीजें समझते हैं जो कि उत्पन्न की जा सकती हैं पर ईश कभी उसे उत्पन्न नहीं कर सकेंगे. क्योंकि वह हर कुछ उत्पन्न करना जो ईश समझते हैं कि उत्पत्ति के योग्य है (उनके अनुसार) ईश की सर्वशक्ति को निचोड़ लेगी और इस तरह ईश अन-उत्कृष्ट हो जाएँगे. लेकिन इस बात को मानने के लिए कि ईश पूरी तरह उत्कृष्ट हैं, इसलिए वे यह मानने लगते हैं कि ईश वह हर कुछ नहीं कर पाएँगे जो उनकी दैवी शक्ति के अंतर्निहित है. ईश के सर्वशक्तिशाली होने के विरोध में या इससे अधिक निरर्थक मुझे नहीं लगता कि कुछ और सोचा भी जा सकता है.


II. Further (to say a word here concerning the intellect and the will which we attribute to God), if intellect and will appertain to the eternal essence of God, we must take these words in some significance quite different from those they usually bear. For intellect and will, which should constitute the essence of God, would perforce be as far apart as the poles from the human intellect and will, in fact, would have nothing in common with them but the name; there would be about as much correspondence between the two as there is between the Dog, the heavenly constellation, and a dog, an animal that barks. This I will prove as follows. 


मैं बुद्धि और संकल्प के विषय में एक बिंदु और रखना चाहूँगा जिसे आम तौर पर ईश से सम्बन्धित ठहराया जाता ह. यदि संकल्प (इच्छा)और मतिदोनों ईश के शाश्वत सार से सम्बन्धित हैं, तब हमें अवश्य ही इन दोनों को अलग तरह से समझना चाहिये, जिस तरह से लोग आमतौर पर इसे समझते हैं. बुद्धिऔर संकल्पईश के सार को बनाती है, तो ये निश्चित तौर पर हमारी बुद्धि (मति) और संकल्पसे अलग है, जो कि नाम के अलावा किसी और तरह से मेल नहीं खाती. यही एक दूसरे से इससे ज्यादा नहीं मेल खाती जिस तरह से व्याध तारा मंडल (सिरियस) का श्वान तारा  एक भौंकने वाले जानवर से मेल खाता है. मैं इसे इस तरह से सिद्ध करता  हूँ :-


If intellect belongs to the divine nature, it cannot be in nature, as ours is generally thought to be, posterior to, or simultaneous with the things understood, inasmuch as God is prior to all things by reason of his causality (Prop. xvi., Coroll. i.). On the contrary, the truth and formal essence of things is as it is, because it exists by representation as such in the intellect of God. Wherefore the intellect of God, in so far as it is conceived to constitute God’s essence, is, in reality, the cause of things, both of their essence and of their existence. This seems to have been recognized by those who have asserted, that God’s intellect, God’s will, and God’s power, are one and the same.

पहले बुद्धि को लेते हैं. हम इससे यह समझते हैं कि १. या तो यह समझने की क्रिया से पहले हैं (जैसा कि आम लोग सोचते हैं) २. या फिर यह समझने की क्रिया के बाद है. लेकिन यह दैवीय प्रकृति से सम्बन्धित है तो यह हमारी तरह नहीं हो सकती क्योंकि ईश (प्रस्ताव १६ के उपप्रमेय १ से) सभी चीजों के कार्यकारण सम्बन्ध से पूर्व है. अत: ईश की बुद्धि (मति) कुछ दर्शाती है तो वह ये कि वह वस्तु अस्तित्व में है. यह चीजों की मूलभूत प्रकृति है कि ईश की बुद्धि इस तरह से निरूपित है. इसलिए ईश की बुद्धि
, जो कि दैवी सार से बनी है, वस्तुत: सार और अस्तित्व का कारण है. कुछ लेखक इसको समझते हें इसलिए उन लोगों ने कहा है कि ईश की बुद्धि, संकल्प (इच्छा) और शक्ति एक ही है.

As, therefore, God’s intellect is the sole cause of things, namely, both of their essence and existence, it must necessarily differ from them in respect to its essence, and in respect to its existence. For a cause differs from a thing it causes, precisely in the quality which the latter gains from the former. For example, a man is the cause of another man’s existence, but not of his essence (for the latter is an eternal truth), and, therefore, the two men may be entirely similar in essence, but must be different in existence ; and hence if the existence of one of them cease, the existence of the other will not necessarily cease also ; but if the essence of one could be destroyed, and be made false, the essence of the other would be destroyed also.


अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
quality = विशिष्ट गुण


और इसीलिए
, ईश की बुद्धि चीजों के सार और अस्तित्व का एकमात्र कारण है, ईश बाकी चीजों से उनके सार और अस्तित्व में भिन्न होने चाहिए. मैं इसकी व्याख्या करता हूँ, कोई वस्तु जो कार्य के रूप में उत्पन्न हुयी हैवह अपने कारण से उसी तरह से अलग है जो विशिष्ट गुण लेकर वह अपने कारण से उत्पन्न हुआ. उदाहरण के तौर पर, एक आदमी दूसरे के अस्तित्व का कारण बन सकता है, पर उसके सार का नहीं - वह यह कि उसकी मानवीय प्रकृति अलग होगी है - यह नहीं कि वह मानव ही न हो - यह दूसरा वाक्य तो शाश्वत सत्य है. इस तरह दोनों अपने सार में सहमति में है कि उन दोनों के पास मानवीय प्रकृति है. लेकिन दोनों अपने अस्तित्व में अंतर में हैं यदि एक का अस्तित्व नष्ट भी हो जाय तो जरूरी नहीं है कि दूसरे का भी अस्तित्व नष्ट हो जाये. पर यदि एक के सार का विनाश हो जाय और वह असत्य हो जाये - जैसे कि यह सोचा जाय कि कोई मानवीय प्रकृति है हीं नहीं, और वह मानव है हीं नहीं - फिर दूसरे का सार भी नष्ट हो जाएगा.

Wherefore, a thing which is the cause both of the essence and of the existence of a given effect, must differ from such effect both in respect to its essence, and also in respect to its existence. Now the intellect of God is the cause both of the essence and the existence of our intellect ; therefore, the intellect of God in so far as it is conceived to constitute the divine essence, differs from our intellect both in respect to essence and in respect to existence, nor can it in anywise agree therewith save in name, as we said before. The reasoning would be identical in the case of the will, as anyone can easily see.


अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
Cause= कारण
Effect= कार्य प्रभाव 

इसलिए यदि कोई कारण किसी कार्य के सार और अस्तित्व दोनों का निर्धारण कर रहा है, यह अपने कार्य से सार और अस्तित्व से अलग होना ही चाहिए. पर ईश की बुद्धि ही हमारी बुद्धि के सार और अस्तित्व का कारण है. इसलिए ईश की बुद्धि, जो कि दैवी सार को बनाती अवधारित की जाती है, हमारी बुद्धि से सार और अस्तित्व दोनों में अलग है और नाम के अलावा दोनों मे कोई साम्य नहीं है - यही मैंने कहा था. यह देखना आसान है कि इसी तरह हम ईश्वर के संकल्प और हमारे संकल्प में अंतर सिद्ध सकते हैं.



{अनुवादक की टिप्पणी : यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि स्पिनोजा इस तर्क में कारणकार्यवाद का सहारा लेते हैं, जो कि भारतीय दर्शनों में अधिकांशतय: वस्तु चिंतन के सम्बन्ध में प्रयुक्त किया जाता है. स्पिनोजा इस नोट में तदुत्पत्तिऔर तादात्म्यकी ही बात कर रहे हैं. स्पिनोजा का कहना है कि माँ-बेटे, बाप-बेटे का कारणकार्य सम्बन्ध तदुत्पत्ति’ (वैसी ही उत्पत्ति) का है, पर तादात्म्य’ (वैसी ही आत्मा) का नहीं. वे स्पष्ट कहते हैं कि तदुत्पत्ति का अर्थ अस्तित्व की परस्पर निर्भरता नहीं है और तादात्म्य के न होने का अर्थ गुण-धर्मों के नितांत असमानता नहीं है. इस तरह वे ईश के मति और संकल्प से मानव के मति और संकल्प की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कहते हैं कि इनमें न तो तदुत्पत्तिहै न ही तादात्म्य’ - क्योंकि ईश का अस्तित्व शाश्वत है और ईश का सार अनगिणत गुण-धर्मों वाला. मानव की उत्पत्ति ईश से उसकी अनंत गुणधर्मिताया शाश्वत जैसी नहीं हुयी है.


विचारों के आधार पर ज्ञान का ऐसा निगमन भारतीय दर्शनों में अनुमान (inference)कहलाता है. कारणकार्यवाद अनुमान में मुख्य स्थान रखता है. भारतीय न्याय दर्शन में (जो वस्तुवादी दर्शन है) नैयायिकों ने कारणकार्यवाद में कारण की तीन विधाएँ निर्धारित की हैं :-

१.                        समवायि कारण  (उपादान कारण) – कार्य अपने समवायिकारण से समवाय सम्बन्ध में रहता है और उसमें पृथक नहीं है. जैसे घड़े का समवायिकारण मिट्टी है, गहने का समवायिकारण सोना या चाँदी है, कपड़े का समवायिकारण धागा है.

२.                        असमवायि कारण – जो समवाय सम्बन्ध रहते हुए कार्योत्पत्ति में सहायक हो, असमवायिकारण कहलाता है, जैसे कि कपास से धागा बनना समवायि है, धागे से कपड़ा बनना समवायि कारण है, पर कपास से कपड़ा असमवायिकारण है.

३.                        निमित्त कारण - जो अपनी शक्ति (कार्य करने की क्षमता) से समवायि कारण की उत्पत्ति करे , निमित्त कारण कहलाता है. कुम्हार, उसका चाक और दण्ड, सभी मिट्टी के घड़े का निमित्त कारण हैं. समवायि और असमवायि से भिन्न अन्यथासिद्धशून्य सभी कारण निमित्त कारण माने जाते हैं.
अद्वैत वेदांत मेंकारणकार्य का भेद तात्विक भेद न मान कर औपचारिक मानते हैं. इस मत को, विवर्तवाद कहते हैं.

धुएँ और आग (वह्नि) का सम्बन्ध कारणकार्य वाद का प्रमुख उदाहरण रहा है. प्रमाण के लिए पञ्चावयववाक्य का प्रयोग करते हैं

१. पर्वत वह्निमान है (प्रतिज्ञा)
२. क्योंकि वह धूमवान है (हेतु)
३. जो धूमवान है वह नियत रूप से वह्निमान है
, जैसे रसोइघर, भट्टी (उदाहरण)
४. पर्वत धूमवान है जिसका वह्निमान के साथ नियत साहचर्य है (उपनय)
५. अत: पर्वत वह्निमान है (निगमन)

यहाँ प्रतिज्ञा वाक्य में पक्ष में साध्य अर्थात सिद्ध की जाने वाली वस्तु का निर्देश है. हेतुवाक्य में अनुमान को सिद्ध करने वाले कारण का या साधन का निर्देश है.
उदाहरण वाक्य में हेतु और साध्य के व्याप्तिसम्बन्ध या नियतसाहचर्य सम्बन्ध का उल्लेख है. उपनय में व्याप्ति विशिष्ट पक्षधर्मता का ज्ञान होता है. पाँचवा वाक्य निगम या निष्कर्ष है, जिससे प्रतिज्ञा की सिद्धि होती है.

इस अनुमान का प्राण व्याप्ति सम्बन्ध है. धूम और वह्नि में व्याप्तिसम्बन्ध है
, पर वह्नि और धूम में व्याप्ति (नियत साहचर्य) नहीं है. सातवीं सदी के बौद्ध विचारक धर्मकीर्ति के अनुसार तादात्म्य एवं तदुत्पत्ति सम्बन्ध हेतु-साध्य का स्वभाव है और जिसका यह स्वभाव नहीं होता है उसमें अविनाभाव (स्वभाव प्रतिबद्धता – एक दूसरे के बिना न होना) नहीं रहता है. (न्यायबिंदु २.२३)

दसवीं सदी के पार्थसारथी मिश्र
, जो कुमारिल भट्ट की परम्परा के भाट्टमीमांसक हैं,धर्मकीर्ति का खण्डन करते हुए अपने ग्रन्थ शास्त्रदीपिका (?) में दो उदाहरण देते हैं- रस को पीकर रूप का अनुमान (आम के रस कोपीकर अनदेखे आम के रूप का अनुमान), वृष राशि के कृत्तिका नक्षत्र को देख कर वृष राशि के रोहिणी नक्षत्र के उदय होने का अनुमान,जिनमें न व्याप्ति है न अविनाभाव है. इन दोनों में न तो तादात्म्य सम्बन्ध है न ही कारणकार्य सम्बन्ध.

हालांकि यह बात हमें पूरी तरह ठीक नहीं लगती क्योंकि इनमें व्याप्ति नियम तो है ही. रस से रूप का अनुमान अनुभवजन्य व्याप्ति ज्ञान ही है
, वैसे ही कृत्तिका और रोहिणी नक्षत्रों के उदय का नियत सम्बन्ध खगोलशास्त्र के नियमों की व्याप्ति से ही है. हालांकि यहाँ तादात्म्य और तदुत्पत्ति का अभाव है.

बौद्ध दर्शन और काश्मीर शिवाद्वयवाद में व्याप्ति सम्बन्ध निर्धारण और ग्रहण के लिये दो सार्वभौमिक नियमों पर आश्रित हैं -कार्यकारण भाव और सामानाधिकरण्य वाद
, इन्हें तदुत्पत्ति और तादात्म्य नियम कह कर पुकारते हैं. तादात्म्यनियम को स्वभावनियम और तदुत्पत्ति को हेतुहेतुमद्भाव की संज्ञा दी जाती है. यह वृक्ष है क्योंकि यह शीशम है– यहाँ पर तादात्म्य नियम और पर्वत में आग है क्योंकि वहाँ धुआँ है,तदुत्पत्ति नियम है. पहला स्वभाव-कारणता है और दूसरे में जनक-कारणता है.

दसवीं सदी के आचार्य अभिनवगुप्त ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवर्ती में इन नियम शब्द का अर्थ इस अर्थ में लेते हैं कि इसका निर्धारण एक व्यवस्था से अनुशासित और नियमित जिसे शिवाद्वयवादी नियति शक्ति कहते हैं. अभिनवगुप्त मालिनीविजयवार्तिक में लोलट नाम के गुरु का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अनुमान के प्रामाण्य का एकमात्र निबन्धन उसका ईश्वरापेक्ष होना है.

अब स्पिनोजा जो कहते हैं कि कोई वस्तु जो कार्य के रूप में उत्पन्न हुयी है
, वह अपने कारण से उसी तरह से अलग है जो विशिष्ट गुण ले कर वह अपने कारण से उत्पन्न हुआ– इस तरह के प्रमाण में मीमांसक अपना विचार विशिष्ट तरीके से रखेंगे, ठीक बिल्कुल वैसे जैसे वे नैयायिकों का खण्डन करते हैं

   प्रमाण्यं स्वत: उत्पद्यते स्वत: ज्ञायते च l
   उत्पत्तौ स्वत:प्रामाण्यं ज्ञप्तौं च स्वत:प्रामाण्यम् ll

प्रमाण्य की उत्पत्ति और प्रामाण्य का ज्ञान (ज्ञप्ति) दोनो
स्वत: (ज्ञान जनक सामग्री से) होते हैं. ज्ञान का प्रामाण्य और इस प्रमाण्य का ज्ञान दोनों ज्ञान के साथ ही उदित होते हैं और उसी सामग्री से होते हैं जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है. मीमांसकों के अनुसार ज्ञान स्वत:प्रमाण होता है. प्रभाकर मिश्र और कुमारिल भट्ट दोनों का मत है कि ज्ञान का प्रामाण्य बाहर से नहीं आता. जबकि नैयायिक ज्ञान के लिये परत: प्रमाण मानते हैं. }



PROP. XVIII. God is the indwelling and not the transient cause of all things.

प्रस्ताव १८. ईश निबाहने/निर्वहन में हैं, न कि सभी चीज़ों का कोई क्षणिकमात्र कारण.




अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
indwelling = निर्वहन
transient = क्षणिक


Proof. — All things which are, are in God, and must be conceived through God (by Prop. xv.), therefore (by Prop. xvi., Coroll. i.) God is the cause of those things which are in him. This is our first point. Further, besides God there can be no substance (by Prop. xiv.), that is nothing in itself external to God. This is our second point. God, therefore, is the indwelling and not the transient cause of all things. Q.E.D.




प्रमाण. – वे सभी चीज़ें जो ईश में है, ईश के द्वारा ही अवधारित हैं (प्रस्ताव १५), इसीलिए (प्रस्ताव १६, उप प्रमेय १) ईश उन सभी चीज़ों का कारण है जो उसमें अन्तर्निहित है. यह पहला निष्कर्ष है. आगे, ईश के अलावा कोई सत्त्व नहीं हो सकता (प्रस्ताव १६), अर्थ यह कि स्वयं में कुछ भी ऐसा नहीं है जो ईश से बाहर है. यह दूसरा निष्कर्ष है. ईश, इसीलिए, निबाहक है (या सभी चीजों में अन्तर्निवास करता है), सभी चीज़ों का क्षणिक कारण नहीं है. 

{अनुवादक की टिप्पणी:- चूँकि ईश सभी में निहित है, स्पिनोज़ा के इस मत को शुरू में सर्वेश्वरवाद (panthesim) भी कहा गया. यह भारतीय  अद्वैत दर्शनों में जैसे कि अद्वैत वेदांत और शिवाद्वयावाद में मुखर है.

यहाँ जैन तत्त्वमीमांसा उद्धृत करना श्रेयस्कर है जो कि ‘अनेकान्तवाद’ से सम्बन्धित है. यहाँ ‘अन्त’ पद का अर्थ ‘वस्तु’ और ‘धर्म’ दोनों से है. मतलब दुनिया में अनेक वस्तुएँ हैं और प्रत्येक वस्तु के अनन्त धर्म हैं. जैन मत में भौतिक जड़ पदार्थ को पुद्गल और चेतन को जीव कहते हैं, जहाँ चेतन जीव और अचेतन पुद्गल दोनों परस्पर भिन्न, स्वतन्त्र और नित्य हैं. जैन तत्त्वमीमांसा से जीव केवल मनुष्यों, पशुओं व वनस्पतियों में ही नहीं, बल्कि पत्थर और धातुओं जैसे जड़ पदार्थों में भी रहते हैं. चूँकि वस्तु के अनन्त धर्म होते हैं, इसलिए कहते हैं कि एक वस्तु के सारे धर्मों को जान लेने से सारी वस्तुओं के सारे धर्मों को जान लिया जा सकता है. लेकिन हम कुछ ही वस्तुओं और धर्मों को जान सकते हैं, इसलिए हमारा ज्ञान सापेक्ष, अपूर्ण और सीमित है. इसी कारण से जैन ज्ञानमीमांसा ‘स्यादवाद’ से जाना जाता है. यह उदाहरण इस बात को स्पष्ट करने के लिए है कि तत्वमीमांसा की दृष्टि से ही ‘ज्ञानमीमांसा’ को बनाती है. तदुपरांत नैतिक दृष्टि भी इसी से संचालित होती है.

स्यादवाद की चर्चा चलने के कारण उसका थोड़ा परिचय देना भी आवश्यक है. यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है. इस विषय में हाथी के स्वरूप के निर्णय के विषय में चार अन्धों के पारस्परिक कलह का उदाहरण दिया गया है. जैसे एक अंधे का हाथी के पैर छूकर कहना कि हाथी खम्भे के समान है, दूसरे अंधे का हाथी के कान छू कर कहना कि हाथी सूप के समान है, तीसरे अंधे का हाथी की सूँड छू कर कहना कि हाथी विशाल अजगर के समान है और चौथे अंधे का हाथी की पूँछ को छूकर कहना कि हाथी रस्सी के समान है. प्रत्येक का कथन आंशिक रूप से सत्य है, परन्तु समग्र रूप से सभी असत्य है. जैन मत के अनुसार धार्मिक और दार्शनिक विवाद इस प्रकार के हैं.}





PROP. XIX. God, and all the attributes of God, are eternal.
प्रस्ताव १९. ईश, और ईश के सभी गुणधर्म, शाश्वत हैं.

Proof. — God (by Def. vi.) is substance, which (by Prop. xi.) necessarily exists, that is (by Prop. vii.) existence appertains to its nature, or (what is the same thing) follows from its definition; therefore, God is eternal (by Def. viii.). Further, by the attributes of God we must understand that which (by Def. iv.) expresses the essence of the divine substance-in other words, that which appertains to substance: that, I say, should be involved in the attributes of substance. Now eternity appertains to the nature of substance (as I have already shown in Prop. vii.); therefore, eternity must appertain to each of the attributes, and thus all are eternal. Q.E.D.



प्रमाण. ईश (परिभाषा ६ से) सत्त्व है. जो अनिवार्यत: अस्तित्व या सत्ता में है. अर्थ अर्थात (प्रस्ताव ७ से) अस्तित्व अपने प्रकृति का अनुगमन करता है, या अपने परिभाषा से (जो एक ही है) इसीलिए, ईश शाश्वत है (परिभाषा ७ से). आगे, ईश के गुणधर्म से हमें समझना चाहिए, वो जो (परिभाषा ४ से) दैवीय सत्त्व के सार को अभिव्यक्त करता है, जिसका सम्बन्ध सत्त्व से है; वह, जैसा मैं कहता हूँ, सत्त्व के गुणधर्मों में समावेशित है. अब, शाश्वतता का सम्बन्ध सत्त्व की प्रकृति से है (जैसा मैंने प्रस्ताव ७ में दिखाया है), इसीलिए, शाश्वत होने का सम्बन्ध सभी गुणधर्मों से है, और सभी गुणधर्म शाश्वत हैं.



Note. — This proposition is also evident from the manner in which (in Prop. xi.) I demonstrated the existence of God; it is evident, I repeat, from that proof, that the existence of God, like his essence, is an eternal truth. Further (in Prop. xix. of my “Principles of the Cartesian Philosophy”), I have proved the eternity of God, in another manner, which I need not here repeat.

नोट.- यह प्रस्ताव उस तरीके से भी स्पष्ट है जिसमें (प्रस्ताव ११) मैंने ईश का अस्तित्व या सत्ता दिखाया है, यह स्पष्ट है, मैं दुबारा कहता हूँ, उस प्रमाण से, कि ईश का अस्तित्व या ईश की सत्ता, उसके सार की तरह, एक शाश्वत सत्य है. आगे (मेरे ग्रंथ देकार्त के दर्शन के सिद्धांतों के प्रस्ताव १९ से ((सत्रहवीं सदी के दार्शनिक रैने देकार्त के दर्शन पर स्पिनोज़ा का एक अन्य ग्रंथ है), मैंने ईश के शाश्वत होने को प्रमाणित किया है, उसी को फिर दूसरे तरीके सेदुहराने की आवश्यकता यहाँ मुझे नहीं लगती.



PROP. XX. The existence of God and his essence are one and the same.
प्रस्ताव २०. ईश का अस्तित्व या ईश की सत्ता और उसका सार एक ही है.

Proof. — God (by the last Prop.) and all his attributes are eternal, that is (by Def. viii.) each of his attributes expresses existence. Therefore the same attributes of God which explain his eternal essence, explain at the same time his eternal existence-in other words, that which constitutes God’s essence constitutes at the same time his existence. Wherefore God’s existence and God’s essence are one and the same. Q.E.D.




प्रमाण. – ईश (आखिरी प्रस्ताव से ) और उसके सभी गुणधर्म शाश्वत हैं, और उसके सभी गुणधर्म अस्तित्व या सत्ता को अभिव्यक्त करते है (परिभाषा ८ से). इसीलिए ईश के वो सभी गुणधर्म जो उसके शाश्वत सार को अभिप्रेषित करते हैं, दूसरे शब्दों में भी उसके शाश्वत सत्ता या अस्तित्व को व्यक्त करते हैं, वह जो ईश के सार का का निर्माण करता है, उसी समय में उसके अस्तित्व को भी निर्मित करता है. इसीलिए ईश का अस्तित्व/सत्ता और ईश का सार एक ही है.


Coroll. I.-Hence it follows that God’s existence, like his essence, is an eternal truth.
उप-प्रमेय.- इसका अर्थ यह भी कि ईश का अस्तित्व उसके सार की तरह ही एक शाश्वत सत्य है.

Coroll. II-Secondly, it follows that God, and all the attributes of God, are unchangeable. For if they could be changed in respect to existence, they must also be able to be changed in respect to essence-that is, obviously, be changed from true to false, which is absurd.
उप-प्रमेय २.दूसरा, इसका अर्थ यह भी कि ईश, और ईश के सभी गुणधर्म अपरिवर्तनीय हैं. क्योंकि अगर वो अस्तित्व के अनुसार बदल सकते तो वो सार के हिसाब से भी बदल सकते, सत्य से असत्य में भी, जो कि असंगत है.


PROP. XXI. All things which follow from the absolute nature of any attribute of God must always exist and be infinite, or, in other words, are eternal and infinite through the said attribute.
प्रस्ताव २१.   वे सभी चीज़ें जो ईश के किसी गुणधर्म की सम्पूर्ण प्रकृति से अनुसरित हैं, अस्तित्व में हैं और अनंत हैं, दूसरे शब्दों मेंउसी गुणधर्म के माध्यम से शाश्वत और अनंत हैं.


Proof. — Conceive, if it be possible (supposing the proposition to be denied), that something in some attribute of God can follow from the absolute nature of the said attribute, and that at the same time it is finite, and has a conditioned existence or duration; for instance, the idea of God expressed in the attribute thought. Now thought, in so far as it is supposed to be an attribute of God, is necessarily (by Prop. xi.) in its nature infinite. But, in so far as it possesses the idea of God, it is supposed finite. It cannot, however, be conceived as finite, unless it be limited by thought (by Def. ii.); but it is not limited by thought itself, in so far as it has constituted the idea of God (for so far it is supposed to be finite); therefore, it is limited by thought, in so far as it has not constituted the idea of God, which nevertheless (by Prop. xi.) must necessarily exist.




अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
hypothesis = परिकल्पना
conditioned = सशर्त/ अनुकूलित/ बाध्य
finite = सीमित/ परिमित


प्रमाण. – परिकल्पना करें, अगर ऐसा मुमकिन हो (प्रस्ताव को खारिज करते हुए), कोई चीज़ ईश के किसी गुणधर्म से, उसके निर्धारित प्रकृति से से अस्तित्व में हैं, और साथ ही साथ, सीमित भी है, और जिसका अस्तित्व सशर्त है या कालावधि से बाध्य है, जैसे ईश का विचार, विचार गुणधर्म में अभिव्यक्त किया हुआ. अब ‘विचार’ जैसा कि माना गया है ईश का गुणधर्म है, (प्रस्ताव ९ से) अपनी प्रकृति में असीमित/अपरिमित है. लेकिन, जब यह, ईश का होना ध्येय में रखकर चलता है, तो सीमित मान लिया जाता है. इसे लेकिन तब तक सीमित नहीं माना जा सकता है, जब तक यह किसी अन्य विचार से ही परिमित न किया जाए (परिभाषा २ से), किन्तु यह स्वयं में विचार से परिमित नहीं है, जहाँ तक कि इसने ईश के विचार का संगठन किया है (जो हम अब तक सीमित मानकर चल रहें हैं); इसीलिए, यह विचार द्वारा परिमित है, क्यूंकि अभी तक इसने ईश का संगठन या निर्माण नहीं किया है, जो किसी भी परिस्थिति में (प्रस्ताव ११ से), अनिवार्यत: अस्तित्व या सत्ता में है.



We have now granted, therefore, thought not constituting the idea of God, and, accordingly, the idea of God does not naturally follow from its nature in so far as it is absolute thought (for it is conceived as constituting, and also as not constituting, the idea of God), which is against our hypothesis. Wherefore, if the idea of God expressed in the attribute thought, or, indeed, anything else in any attribute of God (for we may take any example, as the proof is of universal application) follows from the necessity of the absolute nature of the said attribute, the said thing must necessarily be infinite, which was our first point.

अब हमनें यह माना है इसीलिए, विचार ईश की अवधारणा से नहीं बनता है, और, इसी तरह, ईश का विचार अपनी प्रकृति से सहजता से अनुगमित नहीं होता है जब तक कि यह नितांत चिंतन हो (क्योंकि इसे ईश के विचार के घटक या ईश के विचार के बाहर सोचा गया है) जो कि हमारी परिकल्पना के विरुद्ध है. जब भी, यदि ईश का विचार चिंतन के गुणधर्म में अभिव्यक्त हो, या, बिल्कुल, ईश के किसी दूसरे गुणधर्म में निहित हो (जैसा कि हम कुछ भी उदाहरण के तौर पर ले लें, जिसकी सार्वभौमिक उपयोगिता हो) उस गुणधर्म की नितांत प्रकृति की अनिवार्यता से अनुगमित होता है, तब वह वस्तु अनिवार्यत: असीमित होगी, जो कि हमारा पहला बिंदु है.
Furthermore, a thing which thus follows from the necessity of the nature of any attribute cannot have a limited duration. For if it can, suppose a thing, which follows from the necessity of the nature of some attribute, to exist in some attribute of God, for instance, the idea of God expressed in the attribute thought, and let it be supposed at some time not to have existed, or to be about not to exist.


अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
limited = सीमित
duration = कालावधि


अर्थात, वह कोई भी चीज़ जो, किसी गुणधर्म के अनिवार्यता से अवधारित है, सीमित कालावधि से बाध्य नहीं हो सकती,. अगर हो सके तो, मान लेते है कि एक चीज़, जो किसी गुणधर्म के अनिवार्य प्रकृति से अनुगमित है, उसको ईश के किसी गुणधर्म के माध्यम से अस्तित्व में होने के लिए, जैसे कि ईश के होने के गुणधर्म ‘विचार’ में, ऐसा मान लेना कि किसी काल में यह नहीं होगा, या न होना बंद कर देगा.



Now thought being an attribute of God, must necessarily exist unchanged (by Prop. xi., and Prop. xx., Coroll. ii.); and beyond the limits of the duration of the idea of God (supposing the latter at some time not to have existed, or not to be going to exist) thought would perforce have existed without the idea of God, which is contrary to our hypothesis, for we supposed that, thought being given, the idea of God necessarily flowed therefrom. Therefore the idea of God expressed in thought, or anything which necessarily follows from the absolute nature of some attribute of God, cannot have a limited duration, but through the said attribute is eternal, which is our second point. Bear in mind that the same proposition may be affirmed of anything, which in any attribute necessarily follows from God’s absolute nature.


अब ‘विचार’ जो कि ईश का एक गुणधर्म है, उसे बिना किसी परिवर्तन के होना होगा (प्रस्ताव ११ व प्रस्ताव २० के उपप्रमेय २ से), और ईश के होने के विचार के समयसीमा से बाहर होना होगा (अगर ईश के होने का विचार अस्तित्व में न रहें, या न रह जाने वाला हो तब), बिना ईश के हुए विचार विवशतापूर्वक रह जाएगा, जो हमारे मूल परिकल्पना के विरुद्ध है, जहाँ हमनें ये माना था कि दिए गए विचार से ईश की उत्पत्ति है.
इसीलिए ईश की धारणा जो कि लिए हुए ‘विचार’ से अभिव्यक्त या अवधारित है, उसकी सीमित कालावधि नहीं हो सकती, क्यूंकि दिए हुए गुणधर्म शाश्वत हैं, जो हमारी दूसरी बात है. यह दिमाग में रखना होगा कि यही प्रस्ताव किसी भी चीज़ के बारे में पुख्ता हो सकती है, जो, ईश के नितांत प्रकृति से अवधारित है.  



PROP. XXII. Whatsoever follows from any attribute of God, in so far as it is modified by a modification, which exists necessarily and as infinite, through the said attribute, must also exist necessarily and as infinite.
Proof. — The proof of this proposition is similar to that of the preceding one.
प्रस्ताव २२. जो भी ईश के गुणधर्म से अनुसरित है, किसी प्रणाली द्वारा उपांतरित है, जो अनिवार्यत: अस्तित्व में है, असीमित है, उसी दिए हुए गुणधर्म से, अनिवार्यत: अस्तित्व में भी है, और असीमित है.
प्रमाण. – इसका प्रमाण पिछली प्रस्ताव के प्रमाण जैसा ही है.


PROP. XXIIIEvery mode, which exists both necessarily and as infinite, must necessarily follow either from the absolute nature of some attribute of God, or from an attribute modified by a modification which exists necessarily, and as infinite. 

प्रस्ताव २३.सभी प्रणाली, जो अनिवार्यत: और असीमितरूप से है, या तो ईश के किसी सम्पूर्ण गुणधर्म से अवधारित है, या किसी उपांतरित गुणधर्म से किसी प्रणाली से, जो फिर से, अनिवार्यत: अस्तित्व में है, और असीमित है.

Proof. — A mode exists in something else, through which it must be conceived (Def. v.), that is (Prop. xv.), it exists solely in God, and solely through God can be conceived. If therefore a mode is conceived as necessarily existing and infinite, it must necessarily be inferred or perceived through some attribute of God, in so far as such attribute is conceived as expressing the infinity and necessity of existence, in other words (Def. viii.) eternity; that is, in so far as it is considered absolutely. A mode, therefore, which necessarily exists as infinite, must follow from the absolute nature of some attribute of God, either immediately (Prop. xxi.) or through the means of some modification, which follows from the absolute nature of the said attribute; that is (by Prop. xxii.), which exists necessarily and as infinite.


अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
mode = प्रणाली





प्रमाण -  प्रणाली से मेरा तात्पर्य सत्त्व के उपांतर, या वो जिससे सत्त्व स्व से इतर सारगर्भित या अवधारित होता है (परिभाषा ५), जिसका अर्थ (प्रस्ताव १५ से), यह कि वह केवल ईश में होता है, और ईश के द्वारा ही अवधारित होता है. और इसीलिए अगर कोई प्रणाली अनिवार्यत: अस्तित्व में है और असीमित है, तो इसका अर्थ यह कि वह ईश के ही किसी गुणधर्म से अवधारित है, जहाँ तक कि गुणधर्म असीमितता और अस्तित्व के अनिवार्यता को संप्रेषित करते है. एक प्रणाली, इसीलिए, जो अनिवार्यत: असीमित है, ईश के ही पूर्ण चरित्र प्रकृति के गुणधर्म से अवधारित है,या तो तात्कालिक रूप से अवधारित है या नहीं तो, किसी उपांतरण के द्वारा, जो उपांतरण उस गुणधर्म की नितान्त प्रकृति है, और जो (प्रस्ताव २२ से) अनिवार्यत: ही, और असीमित है.



PROP. XXIV. The essence of things produced by God does not involve existence.
प्रस्ताव २४. जो चीज़े ईश के द्वारा निर्मित हैं, उनके सार में अस्तित्व अन्तर्निहित नहीं है.

Proof. — This proposition is evident from Def. i. For that of which the nature (considered in itself) involves existence is self-caused, and exists by the sole necessity of its own nature.


प्रमाण. – यह प्रस्ताव परिभाषा १ से स्पष्ट है, वह जिससे प्रकृति अस्तित्व में है वह स्वयंभू (स्वकृत) है, और अपनी प्रकृति के अनिवार्यता के अनुसार अस्तित्व या सत्ता में है.

Corollary. — Hence it follows that God is not only the cause of things coming into existence, but also of their continuing in existence, that is, in scholastic phraseology, God is cause of the being of things (essendi rerum). For whether things exist, or do not exist, whenever we contemplate their essence, we see that it involves neither existence nor duration; consequently, it cannot be the cause of either the one or the other. God must be the sole cause, inasmuch as to him alone does existence appertain. (Prop. xiv. Coroll. i.) Q.E.D.



अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
scholastic phraseology = शैक्षणिक भाषा

उपप्रमेय -   इससे यह अर्थ निकलता है कि ईश न केवल चीज़ों के अस्तित्व में आने का कारणमात्र है, जबकि, उनके अस्तित्व की निरंतरता का भी. मतलब शैक्षणिक वाक्यांश या भाषा में, ईश ही चीज़ों के होने का कारण है. चाहे चीज़ें अस्तित्व में हो या न हो, हम जब भी उनके सार की अवधारणा करते है, हम देखते है कि न वो अस्तित्व न ही कालावधि से ही बाध्य होता है, परिणामत: यह किसी एक का भी कारण नहीं हो सकता. ईश ही केवल एक कारण हो सकता है. जिसमें सभी अस्तित्व सम्बन्धित हैं.


PROP. XXV. God is the efficient cause not only of the existence of things, but also of their essence.
प्रस्ताव २५: ईश केवल चीज़ों के अस्तित्व के लिए दक्ष कारण ही नहीं, बल्कि उनके सार का कारण भी है.


Proof. — If this be denied, then God is not the cause of the essence of things; and therefore the essence of things can (by Ax. iv.) be conceived without God. This (by Prop. xv.) is absurd. Therefore, God is the cause of the essence of things. Q.E.D.

प्रमाण- अगर इसे खारिज किया जाए, फिर ईश चीज़ों के सार का कारण नहीं होगा, और फिर चीज़ों का सार (स्वयंसिद्ध ४ से) ईश के बिना भी संकल्पित या अवधारित हो सकेगा. यह (प्रस्ताव १५ से) असंगत है. इसीलिए ईश ही चीज़ों के सार का कारण भी है.

Note. — This proposition follows more clearly from Prop. xvi. For it is evident thereby that, given the divine nature, the essence of things must be inferred from it, no less than their existence-in a word, God must be called the cause of all things, in the same sense as he is called the cause of himself. This will be made still clearer by the following corollary.

नोट.- यह प्रस्ताव प्रस्ताव १६ से स्पष्ट होता है. इसीलिए क्यूंकि उससे यह स्पष्ट है कि, दिए हुए दैवी प्रकृति से, चीज़ों का सार अवधारित होता है, ठीक वैसे ही जैसे उनका अस्तित्व भी, ईश सभी चीज़ों का कारण कहा जाता है, ठीक उसी रूप में जैसे वह स्वयं का कारण भी कहा जा सकता है. इसे अगले उपप्रमेय ज्यादा स्पष्ट करेंगे.

Corollary. — Individual things are nothing but modifications of the attributes of God, or modes by which the attributes of God are expressed in a fixed and definite manner. The proof appears from Prop. xv. and Def. v.

उपप्रमेय.-  अलग-अलग चीज़ें कुछ और नहीं बल्कि ईश के गुणधर्म का रूपांतरण हैं, या वो प्रणालियाँ है, जिनसे ईश के गुणधर्म एक सीमित परिमित रूप में अभिप्रेषित किये जाते है. यह प्रमाण प्रस्ताव १५ और परिभाषा ५ से निकलता है.

PROP. XXVI. A thing which is conditioned to act in a particular manner, has necessarily been thus conditioned by God; and that which has not been conditioned by God cannot condition itself to act.
प्रस्ताव २६. कोई चीज़ जो एक निर्धारित रूप में कार्य करने को बाध्य है, वह ईश के द्वारा बाध्य की गयी है, और वह जो ईश के द्वारा अनुकूलित या बाध्य नहीं, स्वयं को कार्य करने के लिए अनुकूलित नहीं कर सकता.

Proof. — That by which things are said to be conditioned to act in a particular manner is necessarily something positive (this is obvious); therefore both of its essence and of its existence God by the necessity of his nature is the efficient cause (Props. xxv. and xvi.); this is our first point. Our second point is plainly to be inferred therefrom. For if a thing, which has not been conditioned by God, could condition itself, the first part of our proof would be false, and this, as we have shown is absurd.

प्रमाण- वह जिसके द्वारा ऐसा कहा जाता है कि चीज़ें एक निर्धारित या अनुकूलित रूप में कार्य करती है वह अनिवार्यत: सकारात्मक ही होता है (यह स्पष्ट है); इसीलिए इसके सार और इसके अस्तित्व से, ईश अपनी प्रकृति से एक दक्ष कारण बनता है (प्रस्ताव २५ और १६ से), यह पहली बात हुई. दूसरी यह कि, जो कि पहले से अवधारित है, अगर कोई चीज़ ईश के द्वारा बाध्य या अनुकूलित नहीं हैं तो, वह स्वयं को अनुकूलित कर सकता है, जिससे हमारे प्रमाण का पहला हिस्सा ही गलत हो जायेगा, और जो कि हम दिखा चुके है कि अनर्थकही होगा.



PROP. XXVII. A thing, which has been conditioned by God to act in a particular way, cannot render itself unconditioned.
Proof. — This proposition is evident from the third axiom.
प्रस्ताव २७. कोई चीज़ जो ईश के द्वारा एक निश्चित रूप में कार्य करने को अनुकूलित या बाध्य है, स्वयं को इससे मुक्त नहीं कर सकता.
प्रमाण  —  यह प्रस्ताव तीसरे स्वयंसिद्ध से स्पष्ट है.

प्रत्यूष पुष्कर'




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१. बारुक स्पिनोज़ा के ‘नीतिशास्त्र’ को कैसे पढ़ें?  प्रचण्ड प्रवीर
२.स्पिनोज़ा की दार्शनिक अवधारणाएँ : प्रत्यूष पुष्कर
३.स्पिनोज़ा : : नीतिशास्त्र - १
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