सहजि सहजि गुन रमैं : निरंजन श्रोत्रिय

Posted by arun dev on दिसंबर 31, 2010




















निरंजन श्रोत्रिय : 17 नवम्बर 1960, उज्जैन
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से वनस्पति शास्त्र में पी-एच. डी.

कविता संग्रह : जहाँ से जन्म लेते हैं पंख (2002),  जुगलबंदी (2008)
कहानी संग्रह : उनके बीच का जहर तथा अन्य कहानियाँ (1987), धुआँ (2009)
निबंध संग्रह : आगदार तीली ( 2010)

अंग्रेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित
1998 में अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा शब्द शिल्पी सम्मान

समावर्तन का संपादन, अध्यापन
ई-पता : niranjanshrotriya@gmail.com



निरंजन इस अर्थ में हिंदी के महत्वपूर्ण कवि हैं कि उनके यहाँ घर-बाहर की अछूती स्मृतियाँ, अनछुए अनुभव की ताज़गी लिए हैं. यह ऐसा क्षेत्र है जो मुख्य धारा की हिंदी कविता में सिरे से गायब है. घर-गृहस्ती में प्रेम के साथ भी बहुत चीजें होती हैं जैसे कि टेलीफोन का बिल, टॉवेल या फिर इस गृहस्ती के पहिये की धुरी में फँसी हुई ऊँगली से रिसता हुआ लहू. जहां कविता की संभावना नहीं होती अमूमन निरजंन वही से अन्वेषित करते हैं कविता. उनकी कविताओं की सुगन्ध ‘आचार की बरनी’ से बाहर आती है-खट्टी-मीठी.
ये कविताएँ बाहर के चीख-पुकार से जब कभी घर लौटती हैं, उनमें घर का विश्वास और उन्ही के शब्दों में कहें तो ‘मध्य वर्ग का भरोसा’ मिलता है. 


G.R Iranna


डूबते हरसूद पर पिकनिक

जब तक ज़िन्दा था
भले ही उपेक्षित रहा हो
मगर इन दिनों चर्चा
और आकर्षण का केन्द्र है हरसूद

जुट रही तमाशबीनों की भीड़
कैसा लगेगा यह शहर जलमग्न होकर
हरसूद एक नाव नहीं थी जिसमें कर दिया गया हो कोई छेद
जीता-जागता शहर था
जिसकी एक-एक ईंट को तोड़ा उन्हीं हाथों ने
जिन्होंने बनाया था कभी पाई -पाई जोड़ कर

फैला है एक हज़ार मेगावाट का अँधेरा 
जलराशि का एक बेशर्म क़फन बनकर
जिसके नीचे दबी हुई है सिसकियां और स्वप्न
                   किलकारियां और लोरियां
                   ढोलक की थाप और थिरकती पदचाप
                   नोंकझोंक और मान-मनौवल
यह कैसा दौर है!
तलाशा जाता है एक मृत सभ्यता को खोद-खोद कर
मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और भीमबेटका में
और एक जीवित सभ्यता
देखते-ही-देखते
अतल गहराईयों में डुबो दी जाती है.

कभी गये हों या न गये हों
फिलहाल आप सभी आमंत्रित हैं
देखने को एक समूचा शहर डूबते हुए
सुनने को एक चीत्कार जल से झांकते
शिखर और मीनारों की....!

अभी ठहरें कुछ दिन और
फिर नर्मदा में नौकाविहार करते समय
बताएगा खिवैया
--बाबूजी, इस बखत जहाँ चल रही है अपनी नाव
उसके नीचे एक शहर बसता था कभी-हरसूद!


पत्नी से अबोला

बात बहुत छोटी-सी बात से
हुई थी शुरू
इतनी छोटी कि अब याद तक नहीं
लेकिन बढ़कर हो गई तब्दील
अबोले में 

संवादों की जलती-बुझती रोशनी हुई फ्यूज़
और घर का कोना-कोना
भर गया खामोश अंधकार से

जब भी होता है अबोला
हिलने लगती है गृहस्थी की नींव
बोलने लगती हैं घर की सभी चीजें
हर वाक्य लिपटा होता है तीसरी शब्द-शक्ति से
सन्नाटे को तोड़ती हैं चीजों को ज़ोर से पटकने की आवाज़ें
भेदने पर इन आवाज़ों को
खुलता है--भाषा का एक समूचा संसार हमारे भीतर

सहमा हुआ घर
कुरेदता है दफन कर दिये उजले शब्दों को

कहाँ बह गई सारी खिलखिलाहट
कौन निगल गया नोंक-झोंक के मुस्काते क्षण
कैसे सूख गई रिश्तों के बीच की नमी
किसने बदल दिया हरी-भरी दीवारों को खण्डहर में
अबोले का हर अगला दिन
अपनी उदासी में अधिक भयावह होता है

दोनों पक्षों के पूर्वज
खाते हुए गालियाँ
अपने कमाए पुण्य से
निःशब्द घर को असीसते रहते हैं .

कॉलबेल और टेलीफोन बजते रहते
लौट जाते आगंतुक बिना चाय-पानी के

बिला वजह डाँट खाती महरी
चुप्पी टूटती तो केवल कटाक्ष से
भलाई का तो ज़माना नहीं
या
सब-के-सब एक जैसे हैंजैसे बाण
घर की डरी हुई हवा को चीरते
अपने लक्ष्य की खोज में भटकते हैं

उलझी हुई है डोर
गुम हो चुके सिरे दोनों
न लगाई जा सकती है गाँठ
फिर कैसे बुहारा जाएगा इस मनहूसियत को
घर की दहलीज से एकदम बाहर
अब तो बरदाश्त भी दे चुकी है जवाब !

इस कविता के पाठक कहेंगे
... यह सब तो ठीक
और भी क्या-क्या नहीं होता पति-पत्नी के इस अबोले में
फिर जितना आप खींचेंगे कविता को
यह कुट्टी रहेगी जारी

तो ठीक है
ये लो कविता समाप्त !.



टॅावेल भूलना

यदि यह विवाह के
एक-दो वर्षों के भीतर हुआ होता
तो जान-बूझकर की गई बदमाशीकी संज्ञा पाता

लेकिन यह स्मृति पर
बीस बरस की गृहस्थी की चढ़ आई परत है
कि आपाधपी में भूल जाता हूँ टॉवेल
बाथरूम जाते वक्त 

यदि यह
हनीमून के समय हुआ होता
तो सबब होता एक रूमानी दृश्य का
जो तब्दील हो जाता है बीस बरस बाद
एक खीझ भरी शर्म में 

सुनो, जरा टॉवेल देना !
की गुहार बंद बाथरूम से निकल
बमुश्किल पहुँचती है गन्तव्य तक
बड़े हो चुके बच्चों से बचते-बचाते

भरोसे की थाप पर
खुलता है दरवाजा बाथरूम का दस प्रतिशत
और झिरी से प्रविष्ट होता
चूड़ियों से भरा एक प्रौढ़ हाथ थामे हुए टावेल
कुछ भी ख्याल नहीं रहताकी झिड़की के साथ .

थामता हूँ टॉवेल
पोंछने और ढाँपने को बदन निर्वसन
बगैर छूने की हिम्मत किये उस उँगली को
जिसमें फँसी अँगूठी खोती जा रही चमक
थामता हूँ झिड़की भी
जो ढँकती है खीझ भरी शर्म को

बीस बरस से ठसे कोहरे को
भेदता है बाथरूम में दस प्रतिशत झिरी से आता प्रकाश !



युवा कवियों की पत्नियाँ 

दुनिया को तरतीबवार बनाने के संकल्प के साथ
सभा में पिछली सीटों पर यह जो हुजूम बैठा है बेतरतीब-सा
वे इस दौर के चर्चित युवा कवि हैं
दुनिया-जहान की चिन्ताओं से भरे
मगर ठहाका लगाते एक निश्चिन्त-सा
घर से बाहर कई दिनों से लेकिन घर जैसे आराम के साथ
युवा कवि एक नई दुनिया की इबारत गढ़ रहे हैं.

वे सुन पा रहे हैं मीलों दूर से आती कोई दबी हुई सिसकी
उनकी तर्जनी की ज़द में है विवश आँखों से टपका हर एक आँसू
उनकी हथेलियों में थमा है मनुष्यता का निराश और झुर्राया हुआ चेहरा
उनके झोले में हैं बारीक संवेदनों और ताज़ा भाषा-शिल्प से बुने
कुछ अद्भुत काव्य-संग्रह
जो समर्पित हैं किसी कवि मित्र, आलोचक या संपादक को.

इस समूचे कार्य-व्यापार में
ओझल हैं तो केवल
उन युवा कवियों की पत्नियों के थके मगर दीप्त चेहरे
जिन्होंने थाम रखी है इन युवा कवियों की गृहस्थी की नाज़ुक डोर

युवा कवियों की पत्नियों की कनिष्ठिकाएं
फंसी हुई हैं उन छेदों में गृहस्थी के
जहाँ से रिस सकती है
जीवन की समूची तरलता

युवा कवि-पत्नियों के दोनों बाजू
झुके जा रहे हैं बोझ से
एक में थामे हैं वे बच्चों का बस्ता और टिफिन
दूसरे में चक्की पर पिस रहे आटे की पर्ची और बिजली का बिल
एक हाथ में है सास-ससुर की दवाओं
और दूसरे में सब्जी का थैला

उनकी एक आँख से झर रहा है अनवरत मायके से आया कोई पत्र
और दूसरी में चमक रही है बिटिया की उम्र के साथ बढ़ रही आशंकाएं
उनके एक कान को प्रतीक्षा है घर से बाहर गये युवा कवि के कुशलक्षेम फोन की
दूसरा कान तक रहा है स्कूल से लौटने वाली पदचाप की तरफ

युवा कवियों की पत्नियों को नहीं मालूम
कि दुनिया के किस कोने में छिड़ा हुआ है युद्ध
या गैरबराबरी की साज़िशें रची जा रही हैं कहाँ
कि इस समूची रचनाधर्मिता को असल ख़तरा है किससे
या कि कैसा होगा इस सदी का चेहरा नये संदर्भों में
वे तो इससे भी बेख़बर कि उनके इस अज्ञान की
उड़ाई जा रही है खिल्ली इस समय युवा कवियों द्वारा शराब पीते हुए

मानवता की कराह से नावाकिपफ उनकी अंगुलियां फंसी हुई है
रथ के पहियों की टूटी हुई धुरी में.


         
अचार

अचार की बरनी
जिसके ढक्कन पर कसा हुआ था कपड़ा

ललचाता मन कि
एक फाँक स्वाद भरी
रख लें मुँह में की कोशिश पर
पारा अम्माँ का सातवें आसमान पर
भन्नाती हुई सुनाती सजा फाँसी की
जो अपील के बाद तब्दील हो जाती
कान उमेठ कर चैके से बाहर कर देने में .

आम, गोभी, नींबू, गाजर, मिर्च, अदरक और आँवला
फलते हैं मानो बरनीस्थ होने को
राई, सरसों, तेल, नमक, मिर्च और हींग-सिरके
का वह अभ्यस्त अनुपात
बचाए रखता स्वाद बरनी की तली दिखने तक .

सख्त कायदे-कानून हैं इनके डालने और
महप़फूज़ रखने के
गंदे-संदे, झूठे-सकरे हाथों
और बहू-बेटियों को उन चार दिनों
बरनी न छूने देने से ही
बचा रहता है अम्माँ का
यह अनोखा स्वाद-संसार !

सरल-सहज चीजों का जटिलतम मिश्रण
सब्जी-दाल से भरी थाली के कोने में
रसीली और चटपटी फांक की शक्ल में
परोस दी जाती है घर की विरासत!

चैके में करीने से रखी
ये मौलिक, अप्रकाशित, अप्रसारित कृतियाँ
केवल जायके का बदलाव नहीं
भरोसा है मध्य वर्ग का
कि न हो सब्जी घर में भले ही
आ सकता है कोई भी आधी रात !