बहस तलब : रचना और आलोचना का सवाल : ७ सुशील कृष्ण गोरे

Posted by arun dev on फ़रवरी 01, 2012




रचना और आलोचना पर बहसतलब के अंतर्गत सुशील कृष्ण गोरे का लेख. सुशील एक अनुवादक के साथ साथ  समकालीन विमर्श में गहरी रूचि रखने वाले समीक्षक भी हैं. Text और Reading को अलग-अलग मानते हुए वे Reading को तरजीह देते हैं.  आलोचना के बदलते प्रतिमान, उसके क्षेत्र के विस्तार, उसके लैंगिक और अस्मितावादी रुझान को नए संदर्भ में देखा गया है. यहाँ लेखक हाशिए के प्रति  अपना पक्ष भी रखता है. भाषा की जटिलता से बचते हुए प्रखरता और अकादमिक गम्भीरता से इसे लिखा गया है. रचना और आलोचना पर एक अनिवार्य reading.



  पाठ का कुपाठ नहीं उसकी रीडिंग होनी चाहिए    
                                                                                                                                             सुशील कृष्ण गोरे 

कोई भी रचना सिर्फ एक पाठ नहीं होती. पाठ उसका एक बाहरी खाँचा है. वह किसी रचना की देह है. इसलिए देह के ढेरों वाह्याडंबर भी हो सकते हैं. लेकिन इस बहस के दरमियान हमें यह भी देखना होगा कि रचना अपने विदेहपन के शून्य में कहीं गुम न होने पाए. मेरा मानना है रचना की समझ को पाठ आधारित बनाने का प्रयास कहीं न कहीं से उसको रचनाधर्मिता से अलग करता है.

पाठकेंद्रीय विमर्श से रचना की स्वायत्तता छीजती है. साहित्य का स्व एक गहनता में उपजता है. वह रचना की आदिम गहनता है. इसी से रचना की अपनी स्वायत्त अस्मिता भी निर्मित होती है. रचना का रहस्य उसकी स्वतंत्रता में ही छिपा होता है. रचना एक प्रति-संसार है. वह यथार्थ होकर भी एक प्रति-यथार्थ का उन्मेष भी करती है. इस प्रकार रचना निर्माण की एक निश्चित संभावना है पर उसके समानांतर संसार का वास्तु हर बार अभूतपूर्व और हर बार अव्याख्येय ही रहता है. यह सृजन की मौलिक रूप-ग्रहण करने की अपनी एक नैसर्गिक शक्ति है. यह सृजन की लाक्षणिक स्थिति है.

मेरी समझ से किसी भी कृति के पाठ से ज्यादा जोर उसकी Reading पर दिए जाने की जरूरत है. साथ ही यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि Text और Reading एक नहीं हैं. उनके बीच बारीक फर्क है लेकिन है. यह रीडिंग हमें किसी रचना के भीतर की ओर यानी उसकी एक अंतर्यात्रा पर ले जाती है. यह एक प्रकार से एक हो चुके निर्माण के अंत से आदि तक की बड़ी रोचक, विस्मयकारी और सबसे बड़ी बात कि एक पुनरावलोकन यात्रा होती है. पाठ हमसे इसकी विपरीत यात्रा करवाता है. एक रूपक दूँ तो कहूँगा कि पाठ किसी जमी हुई झील पर एक ऊपरी परिवेश का नौका विहार है जबकि रीडिंग बर्फ की जमी तह के भीतर की प्रांजल यात्रा. अभी तक आप इस नतीजे पर तो पहुँच ही गए होंगे कि मेरे पास कहने के लिए कुछ ठोस पदार्थ नहीं है. सचमुच मेरे मन में भी चोर है कि एक गंभीर शास्त्रार्थ की रण में मैं नाहक क्यों उतर गया. जहाँ पौर्वात्य और पाश्चात्य आलोचना की इतनी प्रखर ज्ञान-मीमांसीय परिचर्चा हो रही हो वहाँ सुनने और पढ़ने का सुख लिखने से कहीं ज्यादा होता है. यही पढ़ना ही हमें आखिरकार बहसतलब़ बनाता है. आलोचना इसी पढ़न के केंद्रबिंदु से उत्सर्जित होती है. इसलिए केवल पढ़ना ही नहीं बल्कि A close, careful and critical reading आलोचना बेहद जरूरी है. यह आलोचना की पूर्वगामी है.  हमें कृति के बारे में यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि इस पाठ को क्यों लिखा गया, किसके लिए लिखा गया, किन धार्मिक या नैतिक या राजनैतिक मंसूबों से लिखा गया. साथ ही उन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को भी खंगालना पड़ेगा जिनसे रचना प्रसूत हुई है. तब जाकर कहीं उस ऊँचे पठार की तरफ हमारी दुर्गम चढ़ाई शुरू होती है जहाँ हमें रचना की गहरी समीक्षा के भाषाई उपकरण या प्रतिमान हासिल होते हैं. यहां से भाषा की संरचना, शैली, वाग्मिता और तकनीकों के चश्मों से रचना के लैंडस्केप को निहारना अपने आपमें एक आलोचकीय दृष्टिपात है.

मानविकी और विज्ञान के सभी अध्ययनों में इस रीडिंग के बराबर और खासा महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता. साहित्यिक आलोचना अकेला ऐसा अनुशासन है जो ज्ञान-विज्ञान के समूचे अंतरिक्ष और भूगर्भ को स्कैन करता रहता है. वह अनुभूति और ज्ञान की हर परिघटना को विश्लेषित करती है. उसके लिए आकाशगंगा जितनी कविता है उतना ही एक ब्रह्मांडीय पहेली भी. वह अस्तित्व के प्रश्नों पर जितना केंद्रित है उतना ही जीवन–दर्शन की विकल बौद्धिकता से आवेशित भी. आलोचना अपनी सैद्धांतिकी में दरअसल खुद अपनी प्रैक्टिस की विवेचना है. विभिन्न पाठों की टीकाएं और व्याख्याएं आलोचना की जिस प्रविधि से की जाती हैं या जिस प्रविधि का प्रयोग किया जाता है; सैद्धांतिकी एक बड़े फलक पर उसकी राह तय करती है. यानी रचना को उसके समय-समाज-संस्कृति के पहलुओं से जोड़कर उसे एक व्यवस्थित आधार दे देती है. आलोचना के मामले में हर प्रविधि एक रणनीति हो सकती है, हर आलोचना का अपना एक स्टैंड हो सकता है. आलोचना की सैद्धांतिकी बताती है कि आलोचना का स्टैंड क्या है और क्यों है? यही आलोचना की राजनीति को उजागर भी करती है. विचारधाराओं, सत्ता के ढांचों, खुद हमारे अचेतन की प्रेरणाओं और तमाम प्रकार की संस्थागत जुड़ावों के साथ आलोचना के चोली-दामन के साथ को रोशनी में लाती है. अत: यह कहा जा सकता है कि आलोचना कोई निश्छल विवेक नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक निर्मिति भी है. आलोचना को इस कंस्ट्रक्ट के रूप में भी देखा जा सकता है.

इस प्रकार आलोचना एक गढ़ंत है. वह एक संहिता है. वह मूल्यांकन का एक व्याकरण है. वह स्वभाव से ही सैद्धांतिक है. तार्किक है. किसी दृष्टिकोण से बँधना खुद उसकी अपनी वैधता प्रमाणित करने के लिए अनिवार्य हो जाता है. जहाँ एक ओर रचना अव्याख्येय है वहीं आलोचना का धर्म ही एक प्रकार से व्याख्या है. ज़ाहिर है यह स्थिति एक तनाव को जन्म देती है. रचना हर बार एक नई दुनिया का उद्घाटन है. वह निरंतर किसी अप्रत्याशित और किसी रहस्यमय भूखंड की तलाश है जहाँ रचनात्मक अभिलाषा का प्रस्फुटन छिपा होता है. आलोचना की सार्थकता इसी में है कि वह रचना की इस गूढ़ तलाश और उसके अनुसंधान की अदम्य चाहत की भाषा को पढ़ सके. यदि आलोचना ज्ञान-मीमांसा की सरहदों में भटकने लगे तो मानिए कि वह रचना की जमीन से मीलों दूर निकल गई है.

रचना का मूल्य-निर्धारण एक कठिन चुनौती है. क्या आलोचना का विवेक उस रचना की परख कर सकता है जो अपने भीतर समय, समाज और जीवन के हस्ताक्षर दर्ज करती चलती है. रचना मनुष्य की उन स्मृतिखंडों को नष्ट होने से बचाती है जो अतीत को समेटने या हमारे जीने में सहायक होती हैं और जिनके बिना हम आपने आप से अजनबी बने रहते हैं. क्या आलोचना का शास्त्र रचना की इस भूमिका की थाह लेता है? यदि नहीं तो फिर सवाल उठता है कि रचना का मूल्य कौन और कैसे तय करे? क्या एक रचनाकार ही रचना का सही पाठ और उसका सही मूल्यांकन कर सकता है. यदि यह सही है तो व्यावसायिक आलोचक की गरज़ क्या है? फिर तो आलोचना की सभी सैद्धांतिक ऊठापटक फिज़ूल है. आलोचना का खाद्य-रसद रचना के भीतर से आना मुश्किल है क्योंकि यह रास्ता ही उलटा है. बाहर की वैचारिकी समय-समाज सापेक्ष होगी. वह लगातार रचना में उसकी सामाजिक प्रासंगिकता खोजेगी. उसकी कसौटी विमर्शात्मक है इसलिए उसकी नज़र में किसी रचना की रचनात्मक उष्मा के उमगने की संभावना नहीं की जा सकती है. उसकी निगाह एक परीक्षक की है जो एक फ्रेमवर्क में कुछ उसूली मानदंडों पर किसी रचना को आँकता है.

हर रचनाकार साथ-साथ एक विवेकशील आलोचक भी होता है. सृजनात्मक कल्पना अपने सर्वोत्तम क्षणों में उतनी ही आलोचनात्मक होती है जितनी व्यवसायिक आलोचना अपने गरिमापूर्ण क्षणों में सृजनात्मक. इसलिए ऊपर से देखने पर यूँ लगता है कि रचना और आलोचना के बीच कोई संवाद नहीं हो सकता. लेकिन गहरे झाँकने पर दिखता है कि दोनों अपने सृजनात्मक आयामों में एक धरातल पर एक-दूसरे से विच्छिन्न नहीं हैं. दोनों को अलग-अलग कटघरों में बाँट कर हम एक तरफ आलोचना को निर्जीव और पंगु बनाते हैं और दूसरी तरफ रचना को महज़ कलात्मक सौंदर्य की प्रस्तुति या अभिव्यक्ति. इस तरह यह भी नहीं कहा जा सकता कि आलोचक निरा सनकी है या जिद्दी आइडियोलॉग होता है जो रचना के आभ्यांतर में गूँजते उसके गहनतम संगीत का आस्वादन नहीं कर सकता.

एक संकट अभी भी शेष है कि रचना को किस सीमा तक निरपेक्ष रूप में समझा जाए. क्या वह महज ख्याली पुलाव है जिसकी मीमांसा असंभव है. क्या वह अभाष्य और असमीक्ष्य है? रचना क्या किसी भावुक मन का गान या उसका ह्रदयोद्गार मात्र है? वह किसी व्यक्तिवाची आनंद या पीड़ा का रिप्ले भी नहीं है जिसे जब चाहे शौकिया कविता में ढाल दिया. तब यह आलोचनात्मक साहस केवल वियोगी होने मात्र को रचनात्मक होने की पूर्वापेक्षा नहीं मानता. रचना केवल वही नहीं है जिसकी फलश्रुति ब्रह्मानंद सहोदर में ही हो. डॉ. नामवर सिंह ने एक साहित्यिक की डायरी की अपनी समीक्षा में लिखा है कि मुक्तिबोध के लिए कविता अलग से किसी साधना की चीज नहीं है बल्कि जीने की जटिल क्रिया का ही एक अंग है, जो समाज से लड़ते हुए भी उसकी सहकारिता को संबल के रूप में स्वीकार करता है: जितना कष्टप्रद इसका अस्तित्व-संघर्ष है उतना ही कष्टप्रद सर्जन-संघर्ष और जो अपनी निजी पीड़ा को व्यापक मानवीय पीड़ा से अर्थपूर्ण बनाता चलता है.

यानी सिद्ध हुआ कि जीवन की समग्र दुश्चिंताओं और अनिश्चतताओं के बीच अपना पथ निर्मित करने की जद्दोजहद में संलग्न मनुष्य की सहजात त्रासदी की कथा रचना में दर्ज़ होनी चाहिए. आलोचना रचना में मानवीय संवेदना की एक मुक्कमल तहकीकात है. केवल तहकीकात ही नहीं बल्कि यदि वह न हो तो उसकी बाइज्जत बहाली का एक आश्वासन है आलोचना. क्या यह रचना को एक Sanctum Sanctorum के पर्यावरण में घेरने जैसा नहीं लगता – जाने-अनजाने.

रचना को केवल इसी निगाह से देखने का मतलब उसे एक पवित्र अध्यात्म का बाना पहनाने जैसा होगा. रचना की आलोचना का निषेध किसी भी कला के लिए आत्मघाती है. आलोचना कई बार रचना के साथ संवाद के बहाने ही सही लेकिन एक अदद जरूरी ज़िरह बन जाती है. अगर रचना मूल्यगत या कलागत अपेक्षाओं से डरती हो तो उसमें मनुष्य और उसके जीवन के बीहड़ से जूझने का साहस कहाँ से आ सकेगा. फिर वह अक्षरता के अपने मूल पद से ही गिर जाएगी. इसलिए रचना को चुनौती का जोख़िम उठाने के लिए सुसज्जित होना चाहिए. आलोचना से उसे यह चुनौती मिलती है. आलोचना का रन-अप यदि सही दिशा में है तो वह रचना को बहुत जिम्मेदार, बहुत सचेत और काफी हद तक जवाबदेह भी बनाती है. इस प्रकार आलोचना रचना को वायवीय या अमूर्त होते जाने के खतरे के प्रति आगाह करती है. आलोचना एक Early warning signal है. यह आलोचना का दायित्व है कि वह रचना को मंत्र न बनने दे. यदि वह रचना की मंशा पूरी करेगी तो रचना कुंठित होगी. आलोचना में यह नैतिक साहस और विवेक होना चाहिए कि वह अपनी भूमिका का सच्चाई से निर्वाह कर सके.

मार्क्सवादी दर्शन से अनुप्राणित प्रगतिवाद का सिक्का एक लंबे अरसे तक चला. सोवियत विघटन के बाद की युग-वैचारिकी का दर्जा उत्तर-आधुनिकता को मिल गया. उसके साथ-साथ परिधि की अस्मिताओं का उद्वेलन, सत्ताओं को जेंडर और आइडेंटिटी के नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित करने की विश्व्यापी उत्तेजना ने स्त्री, दलित, आदिवासी, पर्यावरण को 21वीं सदी के एजंडे पर लाकर उन्हें एक मुख्य सांस्कृतिक विमर्श से जोड़ दिया है. साहित्य में भी इन हलचलों की आहटें सुनाई दे रही हैं. दुनिया के जो भूक्षेत्र वर्चस्वशाली यूरो-अमेरिकी के दबदबे में जीने-मरने के आदी हो गए थे उन क्षेत्रीय सरहदों से सत्ता और साहित्य दोनों में एक साथ जमीनी बदलावों की बयारें उठ रही हैं. समकालीन परिदृश्य गवाह है कि अरब और लातीन अमेरिका में कविताओं की एक बिलकुल नई जमीन तैयार हो रही है जिसके गवाक्षों से संभावनाओं का नया आसमां खुलता दिखता है.

दरअसल आलोचना के विवेक में साहित्य की क्लासिकी अवधारणा और समकालीन समय-समाज और उसकी संस्कृति अभिन्न रूप से शामिल रहती हैं. रचना अपने मूलधर्म से न कट जाए इसके लिए उस पर क्लासिकी अनुशासन है ताकि वह कला रूपों के सृजन की न्यूनतम अर्हताओं की कसौटी पर खरी उतरे. दूसरे, उसका मानवीय जीवन और समाज के साथ जुड़ाव का छोर न टूटे इसके लिए जरूरी है कि वह अपने समकालीन परिप्रेक्ष्यों से नाता जोड़े रखे. सामाजिक प्रासंगिकता इन सब परिप्रेक्ष्यों का समुच्चय है. शायद इन्हीं अर्थों में मुक्तबोध के लिए कविता एक सभ्यता-समीक्षा थी. यह रचना और आलोचना दोनों की साझी जिम्मेदारी है कि वह सामाजिक प्रासंगिकता या सभ्यता-समीक्षा का तेवर बचाए रखने के लिए मिलकर काम करें. संवेदना की गहराई और सौंदर्य की शाश्वत चेतना को उभारने वाली सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों का रचना में स्वागत होना चाहिए. यह मत पूछिए कि कोई क्यों अपनी जिंदगी के भोक्ता सच को साहित्य में व्यक्त करने में अब तक के साहित्यिक और आलोचकीय कैनन को अपर्याप्त और पूर्वाग्रहयुक्त मानता है? जब आपने ही अनुभूति की प्रामाणिकता और भोगा हुआ यथार्थ का जुमला फेंका है तो दलित साहित्य के उभार और नए साहित्यालोचन की मांग पर मुँह क्यों बिचकाते हैं? आप स्त्री विमर्श को अपने शीशमहल पर फेंका हुआ पत्थर क्यों मान रहें हैं? हाशिए की आवाजों को दबाने से बेहतर विकल्प है हाशिए पर सदियों से जमे बर्फ के स्तूपों को पिघलने दिया जाए. हिंदी आलोचना के सामने यह एक ऐतिहासिक मौका है कि वह इस विकल्प को चुन ले. आलोचना के लिए यह कोई बाध्यकारी नहीं है कि उसका विचारधारा से नॉन-अलाइनमेंट जरूरी है.

एक बार फिर बकौल डॉ.नामवर सिंहविचारधारा विचार मात्र नहीं, बल्कि अनुभुतियों की एक ऐसी संरचना है जिसमें अनेक प्रतीक, मिथक, आदि भी घुले-मिले रहते हैं. विचारधारा बहुत कुछ संस्कार की तरह समूचे अस्तित्व का ऐसा अंग बन जाती है कि उससे आसानी से छुटकारा संभव नहीं होता. आलोचना की स्वायत्तता की आड़ में आलोचना की वैचारिक तेजस्विता को कुंद करने की राजनीति को समझना भी उतना ही जरूरी है जितना खुद रचना में अनुभूति की प्रामाणिकता प्रतिष्ठित करने की अरसे से जारी मुहिम की जांच-पड़ताल. यह भी एकतरफा दुष्प्रचार है कि विचारधारा रचना और आलोचना दोनों की दुश्मन है. यह दोनों की स्वायत्तता छीन लेती है. इसी प्रकार यदि कोई रचना स्त्री-अधिकारों या वंचितों के प्रति न्याय या पेरीफेरल डिस्ट्रेस को बयां करती है तो हवा उड़ाई जा रही है कि वह रचना नहीं विमर्श है.

कहा जाता है कि अखबारों के संपादकीय पन्नों, क्लबों और विचार-गोष्ठियों तक ही सत्ता और अधिकार से जुड़े मुद्दों पर इस विमर्श को महदूद रखा जाए. हमें देखना होगा कि अमानवीय अन्याय की परंपराओं पर प्रतिरोधी विमर्श छेड़ना किसी दिन रचना में कुफ्र न हो जाए. आलोचना से इसी मुस्तैदी की उम्मीद की जानी चाहिए कि वह रचना में किसी कूपमंडूकता या धार्मिक किस्म की अड़ियलता या अंध-आस्थाओं के पूजन पर अपना लगाम कसेगी. क्या विचारधारा का अंत करने वाली ढोलकिया-कीर्तनिया मंडली के इरादे नापाक नहीं हो सकते? क्या हम बाजार और फेसबुक को ही विचार मान लें? क्या मान लिया जाए कि फेसबुक यदि एक दुनिया है तो मार्क जुकरबर्ग़ उसका भगवान? सोचिए...सोचिए... अभी तो आलोचना की निग़ाह से हमें एक और दुनिया देखनी है. मास-कल्चर और मीडिया के मौज़ूदा दौर ने हमारे हर अंदाजे-बयां को बदलकर रख दिया है. शुरू-शुरू में इस mediology से एक लोकतंत्रीकरण की एक उम्मीद भी जगी थी लेकिन अभी तक के नतीजों का पलड़ा आक्रामक कार्पोरेट प्रौद्योगिकी के पक्ष में ही झुका है. क्या यह एक नए तरह की Gramscian Hegemony का कंस्ट्रक्ट नहीं है. इस सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के परिप्रेक्ष्य में एक फ्यूचरिस्टिक और आलोचनात्मक अनुचिंतन फिर कभी.....किसी मोड़ पर