सहजि सहजि गुन रमैं :: लीना मल्होत्रा राव

Posted by arun dev on मार्च 04, 2012






मैं क्यों लिखती हूँ :

मैंने बहुत पहले लिखना शुरू किया जब मैं १६ वर्ष की थी, मेरी दीदी आकाशवाणी  के लिए नाटक लिखती थीं और मैं उनकी स्क्रिप्ट्स पढ़ा करती थी. मेरे पिताजी दिन में १८ घंटे या तो काम करते थे या पढ़ते रहते  थे. हमारे घर पर फर्नीचर से अधिक किताबें थी. मेरे भाई  रूसी साहित्य के प्रेमी थे, तो इस परिवेश में लिखना पढना जीवन में स्वतः ही हवा धूप पानी जैसी जीवन की आवश्यकताओं की तरह शामिल हो गया.

हिंदी साहित्य कभी कोर्स में नही पढ़ा इसलिए मैं इसकी बारीकियों से परिचित नही हूँ. लेकिन अपने मन से लगभग सभी प्रमुख साहित्यकारों को पढ़ा है. कॉलेज में मैं धर्मयुग और कादम्बिनी और हँस पढ़ा करती थी. डा धर्मवीर भारती की कनुप्रिया मुझे पूरी याद थी मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन मेरा प्रिय नाटक था मैंने कई कई बार इसे पढ़ा इसका मंचन देखा.  केदार जी, शमशेर जी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मंगलेश डबराल जीअनामिका जी , कात्यायनीजी,  न जाने कितने ही नाम है, जिन्हें पढ़ पढ़ कर मैंने सीखा है.

मैं कवितायेँ लिखती थी और शीशे के सामने खड़े होकर खुद को सुनाती थी. मैं रंगमंच से भी जुडी. फिल्म्स भी लिख. लेकिन मुझे जो संतोष कविता लिख कर मिला वह किसी अन्य विधा ने नही दिया. जब मैं फेस बुक पर आई तो मेरे सामने मानो साहित्यकारों का एक पूरा संसार ही खुल गया. शुरू में संकोच करते हुए अपनी एक दो रचनाये शेयर की, प्रोत्साहन मिला और इस तरह मैंने छपना शुरू किया. कविता लिखते समय जो सुखद अनुभूति होती है वह कविता के छपने से बड़ी होती है. 

कविताओं में 'मैं'  'मेरा' सर्वनाम का बहुतायत में प्रयोग हुआ है लेकिन वह 'मैं' लीना नही बल्कि वह पीड़ा है जो किसी अन्य की भी हो सकती है लेकिन जिसे मैंने अपने भीतर महसूस किया और शब्द दिए   मेरी यात्रा का ज़रूरी सामान एक स्त्री के वजूद का सामान है जो उसे उसके कर्तव्यों प्रेम और संवेदनाओ से इतर उसे अपने प्रति निष्ठा की याद दिलाता है..वह निष्ठा एक स्त्री होने की नही एक व्यक्ति होने की है.  जीवन एक यात्रा है और इस यात्रा को पूरा करने के लिए विचार, आदर्श और प्रेरणाऐं और इनसे उपजा अनुभव ही  इन कविताओं की सामग्री है.

मुझे जीवन से प्रेम है और स्‍वाभाविक है कि इनकी मौजूदगी मेरी रचनाओं में हो.  कविता कोई शब्दों का जमावड़ा नही है. कविता जीवन में बिखरे मूर्त और अमूर्त को परिभाषित करती है. जब आप कोई बात को पूरी तरह शब्दों में नही कह पाए तो आप कविता में कह सकते हैं क्योंकि कविता मौन का भी सम्प्रेषण करती है. कोई भी जीवित व्यक्ति कविता से दूर नही है, हाँ शायद वह उससे रु-ब- रु नही हो पाया, जिस दिन वह कविता से   मिलेगा उसे पहचान लेगा. क्योंकि कविता जीवन में बहती है. मेरी कविता मैंने अपनी काम करने वाली बाई को भी सुनाई है वह भी सुनकर रोने लगी, तो कविता से सम्बंधित  होने के लिए आपको कोई साहित्यिक व्यक्ति होना ज़रूरी नही है. कविता तो सबके जीवन में है.. 

मैं स्त्रीवादी स्वरों में अधिक बात नही करती क्योंकि स्त्री को स्वरों से नही मन से स्वतंत्र होना होगा, एक नारे  से अधिक कारगर होगा मुक्ति की राह में उठा हुआ कदम, तोडना बहुत सरल है लेकिन अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक परिवार को तोड़ देना अनादर की भाषा बोलना,  मैं इनसे सहमत नही हूँ. .हमें संतुलन साधना होगा क्योंकि परिवार और इस समाज को बचाए रखने की बड़ी ज़िम्मेदारी हम पर है. हम संक्रमण काल में जी रहे हैं इसलिए हमारी लड़ाई बहुत लम्बी और कठिन है हमें इसे हथियारों से नही समझ और बूझ से लड़ना होगा..सिर्फ  अपने अस्तित्व को स्वीकारने की सकारात्मक सोच से ही कई समस्याए हल हो जायेंगी. 



 G.Mezzogiorno as Fermina Daza in Love in the Time of Cholera movie 


 बीत जाने के बाद

आज तुम लौट आये हो
मेरे हाथों में कोई कंपन नही
न ही दृष्टि में नमी
दिल की धड़कन भी अलसाई सी यंत्रवत बज रही है

साफ़ साफ़ देख पा रही हूँ तुम्हे
वैसे नही
जैसे मैं देखना चाहती हूँ बल्कि वैसे जैसे कि तुम हो

सोच रही हूँ की ऐसा क्या था तुममे जो
मैं दांव पर लगा देती अपना जीवन
कैसे एक चित्र में जड़ हो गई थी मैं तुम्हारे साथ
जिसके फ्रेम में समय नही घुस सकता था
प्यार खुशबू का एक पुल बन गया था
जिस पर मैं तुम्हारे साथ एक अनंत यात्रा पर निकल चुकी थी

अब आये हो तो
बेवकूफ शब्द खोखले से बज रहे हैं
होठो की मुस्कान समझदारियों की भाप बनकर उड़ने  को है
रुको
एक कप चाय  पीकर जाना
अभी भी चाय में खौलता है पानी का पागलपन
नहीं यह प्रेम का नहीं आंच का दोष है
तब भी उसी का दोष था

आहा ! मुझे तुमसे नही
उन दिनों से प्रेम था
बहने  से प्रेम था उड़ने से प्रेम था डूब जाने से प्रेम था
नहीं स्वीकारना नहीं चाहती थी
तुम न आते तो क्या ही अच्छा था.




कभी चीनी कभी नमक

बहुत दिन हुए
जब हमने एक दूसरे को जाना ही था
और शुरू ही हुआ था हमारा रिश्ता
हमारे बीच एक सच रहता था

जनसँख्या के माल्थस के सिद्धांत की चर्चा करते हुए
हम एक दूसरे  की आँखों में देखते थे
और तब सच
जिसकी इस सिद्धांत के बीच कतई ज़रूरत नही थी
एक खुरपी की तरह खोदता रहता ज़मींन
जिसकी मुलायम मिटटी में हम धंसते रहते गहरे
अपने रिश्ते की जड़ों को पाताल तक ले जाते हुए

फिर
सच एक प्रयोग था
जिसमे हमें अपनी ईमानदारी सिद्ध करनी थी
बताना था एक दूसरे को
कि कितनी गलतियाँ हम माफ कर सकते हैं
और कितने महान हो सकते हैं
हम  समझाते रहते एक दूसरे को
कि रिश्ता सिर्फ सच की बुनियाद पर ही टिका है
और इसके सरकते ही भरभरा कर गिर पड़ेगी ये इमारत

कुछ दिन बाद जब बासी हो गई जिंदगी
बिजली के बिल से उबाऊ दिन और  रिश्ते
तब बहाने
एक ताजगी से भरे चन्दन लेप की तरह छाने लगे
जिसके लबादे तले सच अपनी ऊब की झुर्रियों को लेकर
दम साधे पड़ा रहा बरसों
एक स्थगित होते मुकदमे की तरह
इसी इंतज़ार में की अंतिम  निर्णय से पहले समझौता हो ही जाएगा

बूढ़े हो गये फिर दिन
और हम तुम,
हमारा  रिश्ता और सच

सच के नीचे छिपा सच छिल छिल कर बाहर आया
तीखे व्यंग्य, ताने, तर्क और जिरह
और तमाम वो घटनाएं जिसका ज़िक्र हमे अधिक से अधिक आहत  कर सकता था
हमने उकेरी
सुबह का अखबार शाम तक साथ साथ पढ़ते
बातें की
अहसान जताए 
इस तरह सच ने साथ निभाया आखिर तक
कभी चीनी
कभी नमक
तो कभी मिर्ची बनकर.




लाल बत्ती वाला लड़का

आपने मुझे देखा होगा..
लाल बत्ती पर
दौड कर आता हूँ
वह दौड मेरे आधे पेट से भर पेट खाने की दौड होती है
इसी लिए तुम्हारी कोई मुस्तैदी काम नही आती और
तुम्हारे शीशा चढा लेने से पहले ही मैं अपना हाथ खिडकी में फंसा देता हूँ
एक बार तो मेरा हाथ उस मशीन से बंद होने वाली खिडकी के बीच दब गया था
और मुझे बहुत जोर का दर्द हुआ था..
वह दर्द तो कुछ देर बाद खत्म हो गया था लेकिन उस  आदमी की गालियाँ
मेरे सपनो की दीवारों पर उलटी लटकी हुई चमगादड़ की तरह चिपक गई थी.


बदले में उसकी कार को खुरच के मैं जो भागा
फिर तो मैंने अपनी २० फुट ऊंचे फ्लाई ओवर के नीचे मले हुए
अपने कोने वाले घर के पास आकर ही दम लिया
इस कोने को मल लेने के लिए भी एक पूरा युद्ध लड़ा गया था
उस युद्ध के समय का  फैसला माँ ने ही किया था
जब मेरा बाप आधी बोतल पी कर टुन्न तो हो गया था पर लुड़का नही था 
वही उसे भड़काने का उचित समय था
क्योंकि उसकी रूह उस अद्धे में अटकी थी
उस समय वह  किसी की हत्या तक कर डालता
पीछे उसे उंगल देती माँ थी और तीसरी पंक्ति में  हम १० भाई बहनों की फ़ौज
और आखिर हमने अपनी गठरी जमा ली थी
अब उस गठरी पर मजाल है कोई आँख भी टिकाये
हमारी गठरी में कुछ चमकीले कपडे भी रहते हैं
और कुछ दो या तीन नम्बर बड़े या छोटे जूते
एक आध नम्बर की  ऐडजस्टमेंट तो कभी पैर तो कभी जूता मोड़ कर हो ही जाती है
लेकिन बड़े वाले जूते तो रात को सोते हुए पहनने के काम ही आते हैं..
और चमकदार कपड़ों का तो क्या कहना
लम्बाई कभी कभार ठीक आ भी जाए
पर चौड़ाई !
उसमे हम दो भाई बहन तो आराम से घुस सकते हैं..
चौड़ाई का ये अंतर तो हमेशा ही बना रहेगा..
एक आध पुरानी छेदों वाली चादर भी ज़रूर होती है
हाँ एक बार माँ को एक कार वाली में एक गठरी दे गई थी उसमे सलवारे ही सलवारे थी
उन सर्दियों हमारी ठंड बहुत भली कटी
एक टांग हम भाई बहन नीचे बिछा लेते
दूसरी ओढ़ लेते
नये कम्बल तो बापू की बोतल खरीदने के काम ही आते हैं.
तब माँ कहती है मरेगा तभी चैन आएगा

और
उस समय मैं सोचने लगता हूँ
कि बाप के मरने के बाद
मेरे रोज़ के कमाए हुए १० तो कभी १५ रूपये बच जायेंगे
जिन्हें वह घुड़क कर रोज़ मुझसे छीन लेता है

उससे मैं एक दिन
मैं गरम जलेबी खाऊंगा
अपने साईज के कपडे खरीद के पहनूंगा
और एक बोतल पानी भी खरीद के पीयूँगा

शहर आने से पहले जो पानी मैं गाँव में पीता था
उसमे कई बार कीड़े आते थे
तब माँ कहती  दांतों की छलनी से छान कर पानी पी जा
और कीड़े थूक कर फेंक दे
फिर आश्वासन भी देती बस कुछ रोज़ में  शहर चलेंगे
शहर में साफ़ पानी मिलेगा
अब यहाँ शहर चले आये दिन भर चौराहे पर भीख मांगो
मिन्नत मुथाजी करके
सुलभ शौचालय का पानी पीयो
इससे तो गाँव का पानी बेहतर था बेशक उसमे कीड़े थे
पर  उसे थूकने में अपनी बेहतरी का अहसास तो था
भूख तो वहां भी ऐसी ही थी यहाँ भी ऐसी ही है
जब माँ से इस बारे में कहता हूँ
तो वो हंस कर कहती है
तू बड़ा भी तो हो गया है अब तेरी भूख  पहले जित्ति थोड़ी रही .




सीमा पार चारपाइयाँ

वो बड़े आँगन वाले घर के बाहर ही छूट गई चारपाईयां
जिन्हें याद कर कर के माँ इतने बरस रोई
याद करती थी वो शहर के क़ाज़ी को रुलाईयों के घूँट पी पी कर
जिसने दंगाइयों के सामने बाजू खोल कह दिया था
उस शहर की पहली लाश वही बनेगा

ज़हर की शीशियों को मुठियों में भींचे 
अपने  बारह बरस के हाथो में
हज़ारो साल पुरानी अस्मत को बचा ले आई थी वह
उन कटते हुए काफिलों के बीच से
मौत को चकमा देकर.

गर्वीली मुस्कान से बताती थीं जब
तब
एक ठिठका हुआ दुःख आधी सदी से वही बिछी चारपाइयों पर थक कर करवट  बदल लेता
जिसकी लहरे समय को साथ बहा लिए चली आती हमारे घर
जिसमे गोते लगाती माँ बताती आगे की कथा
कहा था उन्होंने अपनी माँ से
"ए मंजिया ते अन्दर रख दो" (ये चारपाइयां तो अंदर रख दो)
कांप गये थे नानी के हवेली को ताला लगाते हाथ

कहा था नानी ने
"नी झाल्लिये हुन ऐत्थे थोड़ी आना ए" (पागल! अब यहाँ थोड़ी आयेंगे)
मुठ्ठी भर गई थी माँ के दिल में
पूछती रही थी क्यों लगाया ताला फिर
अनुत्तरित ही रहा वह प्रश्न
चारपाईया टिकी हैं वहीँ जहाँ थी..
रहेंगी वहीँ हमेशा हमेशा
कुछ चीज़े अपनी जगह कभी नही बदलती

सरल प्रश्नों  के सरल उत्तरों के भीतर
सदियों तक गूंजते रहे तार सप्तक में दर्द के विकृत स्वर .




क्रांति चुपचाप

वह जो टूटता हुआ तारा है न
वह एक क्रांति करते हुए शहीद हुआ है
उन सब आकाश गंगाओं के खिलाफ
जो अपनी रफ़्तार की मदहोशी में गुम हो चुकी हैं
और उन  तारों के विरूद्ध जो  अपनी  तयशुदा कुर्सियों पर बैठ गये हैं तन कर
उन सब आँखों के खिलाफ जो आसमान में तारे देखना भूल गई  हैं
और उस प्रदूषण के खिलाफ जो एक गहरा घना सितम बन कर अन्तरिक्ष  में बरामद हो रहा है
और जिसके कारागार आसमानों में बनाए जाने की योजनाये फलित हो रही हैं.

वह जानता था सुने नही जायेंगे उसके नारे
लेकिन उसमे चमक थी फ़ना होकर खो जाने से पहले एक बार चुंधिया देने की आँखों को
उसने फैला दी है  रौशनी
ताकि अंधेरों में  छिपा कर रखा हुआ सत्य  उजागर हो जाए
सच की  रौशनी में भटकते मुसाफिर  ढून्ढ पाए अपने खोये हुए रास्ते

एक आम आदमी की तरह था उस तारो भरे जहान में वह टूटता हुआ सितारा
जिसके पास
दुनिया को जला देने जितनी आग न सही
लेकिन
उजाला फ़ैलाने को पर्याप्त चिंगारी ज़रूर थी.


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लीना का कविता संग्रह, मेरी यात्रा का जरूरी सामान बोधि प्रकाशन से (२०१२) आया है.
leena3malhotra@gmail.com