सहजि सहजि गुन रमैं : प्रदीप जिलवाने

Posted by arun dev on मार्च 24, 2012







प्रदीप जिलवाने

१४ जून १९७८, खरगोन (म.प्र.)  
एम.ए. हिन्दी साहित्य  

पहला कविता संग्रह जहाँ भी हो जरा-सी संभावनाकी पाण्डुलिपि को 
भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार और यही से प्रकाशित भी
हिन्दी साहित्य की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ एवं लेख प्रकाशित
स्थानीय और लोकप्रिय पत्रों में सांस्कृतिक एवं समसामयिक विषयों पर आलेख   

फिलहाल म.प्र.ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण में कार्यरत
ई-मेलः jilwane.pradeep@gmail.com
फोन: 91 97559 80001

प्रदीप जिलवाने की कविताओं में शिल्प की चमक और प्रयोग की सिद्धहस्तता खोजना बेमानी है. वह एक निर्मित होते कवि हैं. उनकी कविता उनके आस-पास की संवेदना और जीवनानुभव से इस तरह भरी हैं कि उन्हें अभिव्यक्त होने के लिए सायास काव्यकौशल की दरकार नहीं.  प्रदीप विवरण में जाते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं और अंतत: उसके काव्यत्व को प्रत्यक्ष कर देते हैं. यह देखना मार्मिक है कि कैसे पिता की सायकल  पिता की तरह हो जाती है ‘कबाड़ में तब्दील’





पिताजी की सायकल

यह सायकल
पिताजी के पास तब से है
जब माँ भी ब्याह कर नहीं आई थी घर में
और नगर के गिने-चुनों के पास
होती थी तब सायकल

बड़े फक्र से बताते हैं पिताजी
जब उन्होंने पास की थी मेट्रिक पहले दर्जे में
तब उनके पिता ने यानी मेरे दादा ने
(जिन्हें पिताजी, काका कहते थे)
उन्हें लाकर दी थी यह सायकल
और वो भी खूब मान-मनौव्वल के बाद

सायकल के किस्से
यूँ भी पिताजी बड़े चाव से सुनाते हैं
क्या-क्या हथकण्डे
नहीं अपनाए थे तब उन्होंने
इस सायकल की खातिर
सुनाते-सुनाते पिताजी के चेहरे पर
एक तरल-सी मुस्कान आ जाती है
जो एक स्फुट-हँसी की बेलगाम धार में
हो जाती है तब्दील
वे काका को
बार-बार याद दिलाते फिरते रहे कि
उन्होंने वायदा किया था
अव्वल दर्जे में पास होने पर सायकल देंगे
काका कभी आज तो कभी कल करते
पिताजी काकी के पास जाते और
खूब पा-लागन करते
कि वह काका को राजी करें
काकी पिताजी को तो हाँ कर देती
लेकिन जानती थी काका के सामने
जबान भी न खोल सकेगी
खाना-पीना छोड़कर पिताजी
चार दिन बैठे अनशन पर
तब कहीं तप फला
काका माने
और मिली यह सायकल

पिताजी बताते हैं
उस दौर में सायकल होना ही
अपने आप में बड़ी बात थी
नगर सेठ की तरह घूमते थे पिताजी
सायकल पर बैठकर
लोग ताकते रह जाते थे विस्मय से
कभी सायकल को
कभी सायकल पर विराजे पिताजी को

पिताजी पूरे नगर में
नित्य इसी शान से निकलते
और हर दूसरे दिन
अपने किसी सहपाठी या मित्र को
पीछे बैठने का सु-अवसर देते थे
एक बड़ी उदारता के साथ

मुझे याद है अच्छी तरह
हम भाई-बहनों को भी
खूब घुमाया है पिताजी ने
अपनी इसी सायकल पर

पिताजी आज भी अपनी इस सायकल को
रोज धोते-पोंछते हैं
हफ्ते-दस दिन में आयल-पानी करते हैं
हालाँकि घर में दो-दो मोटर-सायकलें हैं
और एक चार पहिया भी है
फिर भी पिताजी
आस-पास कहीं आने-जाने के लिए
अपनी सायकल का ही इस्तेमाल करते हैं

पिताजी के इस सायकल-प्रेम को
गली-मुहल्ले के कुछ लोग कंजूसी
तो कुछ लोग इसे
पिता के प्रति पुत्रों की उपेक्षा की तरह भी लेते
कईं बार तो
वार-त्यौहार पर घर आए मेहमान भी
हम सक्षम पुत्रों को संदेह से देखते
जिसमें एक किस्म की हिकारत भी छुपी होती है
तब सच कहूँ,
मुझे भी इस सायकल से घृणा होने लगती है
कभी-कभी तो मन में संशय भी उठता है
कि पिताजी हमसे ज्यादा स्नेह करते हैं या
अपनी इस सायकल से!
खैर यह वहम है मेरा
वहम ही हो!

पिताजी की सायकल आज भी सलामत है
हालाँकि सायकल
अब चलन से बाहर हो गई है
आधुनिक जीवन से समाप्त हो गई और
हो रही कईं चीजों की तरह
खासकर गिलहरी की तरह
दौड़ते-भागते इन नगरों में
जो महानगर में तब्दील होते जा रहे हैं
जहाँ रफ्तार से ही तय होती हैं प्रतिष्ठा
और नापा जाता है आदमी का कद
ऐसे समय में
सायकल से घूमते पिताजी
किसी अचरज की तरह देखे जाते हैं
किन्तु पिताजी इन सब से बेपरवाह....
आज भी संभवतः उतना ही फक्र
महसूसते हैं अपनी इस सायकल पर बैठकर
जितना उन दिनों
जब घर में सायकल होना भी
समृद्धि का प्रतीक था

मैं जानता हूँ यह सायकल
सिर्फ सायकल नहीं है पिताजी के लिए
एक साथी है, एक मित्र है
लम्बी उम्र तक साथ रहने से
स्वाभाविक भी है ऐसी आत्मीयता
लेकिन
कल को क्या मेरे बच्चे समझ पायेंगे?
जब कबाड़ में तब्दील हो रही होगी
पिताजी की यह सायकल.....




उस मुहल्ले के बच्चे....कुछ भूख चित्र

उनके लिए रोटी
कटी हुई पतंग की तरह है

ललचाती हुई दूर तक ले जाती है
और जब करीब आती है
इतने हाथ झपट्टा मारते हैं
एक साथ
कि
माकूल
किसी हाथ में नहीं आती है.


::
उनके खिलौने
किसी बाजार में नहीं बिकते
किसी दुकान में नहीं मिलते

सच तो यह है कि
उनके लिए खिलौने बनते ही नहीं

थोड़ा-सा और सच
सुन सको तो यह कि
वे बच्चे इस बात को नहीं मानते.


::
उनके लिए नींद
भूख से दस घण्टे की राहत है

कईं बार तो ऐसा भी होता
वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं
भूखी प्रार्थना
कि उन्हें नींद आ जाये
एक बेहद लम्बी नींद
एक अनंत गहरी नींद
मगर
ईश्वर - उनका खेल-सखा
उनकी नींद में रोटियाँ भर देता है
और हर बार अनसुनी रह जाती हैं
उनकी प्रार्थनाएँ


::
उनके चेहरे पर हँसी
अचानक चली आती है
अक्सर बेवजह

भूख में भी हँसी

हाँ! सच
भूख में भी हँसी
पिछली भूख की हँसी
पिछली से पिछली भूख की हँसी

कौन हँसाता है ?
इन खाली डमरूओं को
कौन बजाता है ?

भूख!

भूख हँसाती है
और
भूखी हँसी हँसकर
चली जाती है अक्सर
उनके मुहल्ले से
फिर आने का कहकर.


::
बहलाने पर भी
उन्हें
चाँद में रोटी
कभी नहीं दी दिखाई

हाँ! मगर
रोटी में चाँद
उन्होंने देखा है अक्सर.




कविता की चाह

चाहती तो यह भी हूँ कि
चखकर देखूँ जायका माटी का
थोड़ा-सा असभ्य होते हुए

चाहती तो ये भी हूँ कि
रात के दुःखी चेहरे को
पारदर्शी और पवित्र हँसी की उम्मीद दूँ

चाहती तो ये भी हूँ कि
ऊब की ऊँटनी से उतरकर
चलूँ साथ तुम्हारे कुछ दूर तक

चाहती तो ये भी हूँ कि
पोत दूँ दुनिया को
किसी खिले-खिले रंग से

चाहती तो बहुत कुछ हूँ
मगर
तुम तो जानते हो
मेरे चाहने भर से अब
नींद कहाँ आती है चाँद को
रात की शीतल गोद में लेटकर भी




नींद
  
::
नींद अपने लिए जगह तलाश ही लेती है.

बया सुस्ता लेती है टहनी पर बैठे-बैठे
घड़ी दो घड़ी और हो जाती है फुर्रर्र

धूप पहाड़ों से उतरते ही
मैदानों की गोद में जाकर हो जाती है ढेर

हवा तो समन्दर की लहरों पर
खेलते-खेलते ही मारने लगती है झपकियाँ

चाँदनी जहाँ भी पाती है खाली जगह
अपना बिस्तर लगा लेती है

मछलियाँ भी तैरते-तैरते
सोने का हुनर जानती हैं

नींद के लिए जरूरी नहीं
मखमली गद्दे
वातानुकूलित कमरों की अनिवार्यता
गर्म देह का स्पर्श

नींद अपने लिए जगह तलाश ही लेती है
जहाँ भी हो जरा-सी सम्भावना.

::
नींद अजान संकेत-लिपि में
उकेरे गए भित्ति चित्रों-सी होती है रहस्यमय

नींद का कोई रंग नहीं होता
नींद पानी की तरह पारदर्शी और गंधहीन होती है

जिस समय नींद किसी को घेरे होती है
कोई नींद को अपना हथियार बना
किसी का गला रेंत रहा होता है
कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के गलबाहें डाल
टहल रहा होता है समन्दर किनारे
कोई बीमार अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े
प्रार्थना के अंतिम मौलिक गीत रच रहा होता है
कोई नवजात पहली दफा अपनी पलकें खोलकर
देख रहा होता है उजाले का रंग

नींद के घेरे में पड़ा आदमी शायद नहीं जानता
नींद आदमखोर भी होती है
गाँव के गाँव डकार सकती है एक निवाले में
जैसे उजाले को निगल जाती है औखा

नींद के बारे में और भी कईं सच हैं
जैसे नींद आँखों में नहीं होती
ठीक उसी तरह
जिस तरह
सपने आँखों में नहीं होते
जन्मते हैं हमारे ही भीतर
पनपते हैं मस्तिष्क में
पलते-फूलते हैं अन्तस की गहराइयों में
  

:: 
नींद वहाँ भी नहीं है
जहाँ धूप वर्जित है
और वहाँ भी नहीं
जहाँ सिर्फ धूप बची है
बीच की जगह है कोई

और यकीनन यह जगह है
बची है उम्मीद / बचा है भरोसा.


:: 
कभी नींद आदमी को उठाकर
इतिहास के कूड़ेदान में फेंक देती है
तो कभी छोड़ आती है
भविष्य की अंतहीन संकीर्ण गलियों में
जहाँ से लौटता है आदमी पसीने-पसीने
एक चौंक या बड़ी शर्म के साथ
अपने चेहरे पर महसूसता है
उभर आई विकृतियाँ
जो समय अपने चेहरे से उतार
उसके चेहरे पर चस्पा कर देता है धोखे से

नींद के बारे में
कईं तरह के सच और अफवाहों के बीच
एक सच यह भी कि नींद जरूरी है
लेकिन दोस्त
नींद में होना एक बड़ी रिस्क है
खासकर इस दौर में.