कथा - गाथा : प्रेमचंद सहजवाला

Posted by arun dev on मार्च 26, 2012









प्रेमचंद सहजवाला
१८ दिसम्बर, 1945.
चर्चित कथाकार.

सभी प्रमुख पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित.
तीन कहानी संग्रह,  एक पुरस्कृत.
एक वृहद उपन्यास और एक संस्मरणात्मक  कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य. 

भगत सिंह: इतिहास के कुछ और पन्ने  शीर्षक से एक इतिहास पुस्तक.
कुछ संस्थाओं द्वारा साहित्यिक सम्मान प्राप्त.  

अंग्रेज़ी में दो पुस्तकें: India Through Questions and Answers   नाम से एक encyclopaedia  प्रकाशित जिसमें भारत के प्रस्तर युग से मनमोहन सिंह तक भारत संबंधी 7,500 प्रश्नोत्तर के अलावा कई महत्वपूर्ण भाषण यथा स्वामी विवेकानंद के शिकागो की धर्मसंसद में दिए भाषण, शेख अब्दुल्लाह के संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर संबंधी भाषण आदि  संकलित हैं.

डायमंड पॉकेट बुक्स से अंग्रेज़ी में 'Mumbai kiski and other articles' शीर्षक से राजनीतिक लेख संग्रह प्रकाशित.  
ई पता : premuncle@gmail.com 

यह संस्मरण भी है और कहानी भी. इसमें एक कहानीकार अपनी किशोरावस्था के आत्मीय और संघर्षशील दिनों को याद करता है, तो इसमें एक ईमानदार पिता के मेधावी संतान की शिक्षा के लिए उसकी संघर्ष-कथा भी कही गई है. इसमें  छठे दशक के दिल्ली की गलियां हैं तो एडमीशन के लिए १४८ रूपये जुटाने की चुनौती भी.
कहानीकार प्रेमचंद सहजवाला ने इस संस्मरण में कथा-तत्वों का बखूबी इस्तेमाल किया है.   

















ऐडमीशन                                       
 प्रेमचंद सहजवाला                                                                                                                  

दिल्ली आ कर कुछ दिन तो मैं और मेरा भाई बब्बन यूं ही घूमते रहते थेमैं महाराष्ट्र के उल्हासनगर कस्बे से सातवीं की परीक्षा अधूरी-सधूरी दे कर आया था और बब्बन ने चौथी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ी थी. अचानक पिता का तबादला दिल्ली हो गया था.

पिता थे एक भ्रष्ट महकमे में. केंद्रीय लोक निर्माण विभाग... यानी सी.पी.डब्ल्यू.डी. पर पिता ईमानदार लोगों में थे. महसाना (गुजरात) की तरफ किसी पुल के निर्माण में बाहर के दौरे पर गए थे.  वहीं कॉपर-वायर्स की चोरी का एक बड़ा गैंग पकड़वाया और उन की जान खतरे में पड़ गईइसीलिये उनके विभाग ने उनका तबादला उनकी सुरक्षा को मद्देनज़र रखते हुए दिल्ली कर दिया.
हम दोनों, यानी मैं और बब्बन अपने भविष्य को ले कर कई दिन अँधेरे में रहे, कि अब हम यहाँ पढ़ेंगे कैसे. नया शहर है, उल्हासनगर की तुलना में तो काफी तेज़ तर्रार लड़के हैं यहाँफिर पिताजी जल्द वापस उल्हासनगर तबादला करवाएंगे या हम सब यहीं सेटल होने वाले हैं.
उन्हीं दिनों एक मास्टर जी एक तांगे में लाऊडस्पीकर हाथ में थामे तांगे को घुमा घुमा कर घोषणा करते रहते थे कि एक नया स्कूल खुला है, पांचवीं से ले कर ग्यारहवीं तक (तब स्कूलों में बारहवीं नहीं थी).  आठवीं के बाद केवल विज्ञान के विषय हैंआइये आइये... इस नए स्कूल में दाखिला लीजिए और अपने बच्चों का भविष्य बनाइये...

मैं और बब्बन भागते हुए घर गए थे और मां को बताया था कि एक नया स्कूल खुला है. हम दोनों उसमें दाखिला आसानी से ले सकते हैं, क्योंकि हो सकता है हमारे सातवीं और चौथी पास करने के प्रमाण पत्र दिखाने का झंझट ही न हो...

पिताजी ने पता किया तो बताया गया कि कोई हलफनामा भरने से काम चल जाएगादाखिला मिल जाएगा. और थोड़े ही दिनों में मैं और मेरा भाई पढ़ने लगे. स्कूल नज़दीक ही था. स्कूल था तंबुओं में! यह देख मैं और मेरा भाई  बहुत हैरान थेतंबू तो जब कोई शादी वादी हो, तब लगाए जाते हैं, पर ये तंबू तो ऐसे लग रहे थे जैसे शरणार्थी लोगों के लिये में सरकार ने लगवाए होंपिताजी बोले थे – ‘गरीबी में ऐसे ऐसे स्कूल में पढ़ना भी पड़ता है. और अंग्रेज़ी वाले स्कूलों में जाएंगे तो खूब फीस लगेगी.’  हमारे घर में दो बड़े भाई थे जो पढ़ाई जैसे तैसे पूरी कर के नौकरियां ढूंढ रहे थे और तीन बहनें जिन में केवल बड़ी बहन प्राईवेट कॉलेज से पंजाब मैट्रिक दे रही थीछोटी तो अभी छोटी थीं सो उनकी पढ़ाई का एकाध साल बाद सोचेंगे पिताजी.

इस प्रकार हमारी पढ़ाई शुरू हो गई. पिताजी ने आ कर मां को बताया – ‘फीस पता है कितनी है? बड़े की छियालीस पैसे और छोटे की ब्रदर-कंसेशन के कारण उस से आधी. यानी तेईस पैसे!’
मां  बोली – ‘इतना बड़ा घर. यहाँ परदेस में आ गए हैं. यहाँ सब कुछ मंहगा है. ये उनहत्तर पैसे भी बचेंगे कि नहीं, देखते हैं. बचाने तो पड़ेंगे ही न.’
पिता लाचार से दिखते पर उन के चेहरे पर एक तेज होता कि वे कभी भी उस भ्रष्ट महकमे में रिश्वतखोरी नहीं करेंगेज़िंदगी की मुश्किलें उन्हें देखनी पड़ेंगी, सो वे देख लेंगे.

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मैं ग्यारहवीं में पहुँच गया. भाई आठवीं में. मैंने खूब मेहनत की थी और हर क्लास में प्रथम आता रहा, सो स्कूल के होनहार विद्यार्थियों में से एक थाछोटा भाई औसत था, सो वह चुपचाप अपनी पढ़ाई आगे खींचता रहा थाएक दिन प्रिंसीपल हमारी ग्यारहवीं की क्लास में आए और हाथ में एक डंडा यानी केन भी उठा लाएयही उनकी पहचान बन गई थीपर आज उन्होंने केन एक तरफ रखा और क्लास जो उनके आते ही खड़ी हो गई थी, उसे बैठने को भी न कहा. चिल्लाए– ‘इस क्लास में एकाध को छोड़ कर कोई लड़का इस काबिल नहीं है कि उसे ग्यारहवीं की बोर्ड की परीक्षा में भेजा जाए. निकम्मे नालायक लड़कों की क्लास है यह. सिर्फ एक लड़के को छोड़ ऐसा कोई लड़का नहीं जो दिसंबर परीक्षा  में हर विषय में पास हुआ होहर कोई कम से कम एक विषय में तो फेल है ही,’ और अचानक उन्होंने मुझ से कहा – ‘तुम बैठ जाओ.’ स्पष्ट था कि पूरी क्लास में मैं ही एकमात्र विद्यार्थी था जो हर विषय में पास हुआ था. वैसे ये प्रिंसीपल साहब बदलते मूड वाले प्रिंसीपल साहब थेजब मैं दसवीं में फर्स्ट आया था तो प्रार्थना से पहले ही मुझे लड़कों की भीड़ में से बुला कर बोले थे – ‘तुम अपने फादर को बता देना कि इस साल भी तुम दोनों भाइयों की फीस माफ होगी.’  और मैंने खुश हो कर धन्यवाद करते हुए उनके चरण स्पर्श कर लिए थेघर जा कर यह बताया था तो मां भी खुश थी – ‘मेहनत करने वालों को तो प्रिंसीपल भी प्यार करते हैं न.’ पर इस बात की खुशी में मैं और मेरा भाई यह भूल ही गए कि बतौर औपचारिकता के हमें फीस माफ का एक आवेदन पत्र भी पिताजी से लिखवा कर स्कूल में देना पड़ेगावह हम भूल ही गए और प्रिंसीपल साहब ने एक दिन रिसेस के दौरान ही अपनी केन के साथ राऊंड मारते मारते एक लड़के को कहा कि मुझे कहीं से भी ढूंढ लाए. और में उनके सामने पहुंचा तो उनकी केन लगातार ऊपर उठी कि केन मेरे शरीर में कहीं भी अभी लगी अभी लगीपर फिर उसे नीचे करते बोले – ‘मैं क्या तुम दोनों के बाप का नौकर हूँ जो तुम ऐप्लीकेशन लाओ ही नहीं और मैं तुम्हारी फीस माफ करता रहूँ? जाओ जा कर बाप से लिखवा लाओ...’

मैं सचमुच घर पहुँचने तक बहुत घबराया हुआ था. रात को पिताजी आए तो उनसे आखिर ऐप्लीकेशन लिखवा ली और स्कूल में जा कर प्रिंसीपल साहब की सीट पर रखी, तब जा कर तसल्ली हुईपिताजी अपने महकमे से रिटायर हो कर अब कोई प्राईवेट नौकरी करते थे जहाँ मालिक इतने कंजूस थे कि उन्हे बहुत कम वेतन मिलता था.

आज भी प्रिंसीपल साहब अचानक अच्छे मूड में भी जल्दी आ गए थेसब को बैठने को कह दियाक्लास में घूम घूम कर उन्होंने सोचा कि बच्चों को ज़रा प्यार से समझा दें कि बोर्ड की परीक्षा में सिर्फ तीन महीने बाकी है, सो सब को बता दें कि कैसे भी हो, मेहनत ज़रूर करेंउन्होंने एक लड़के से पूछा – ‘तुम बड़े हो कर क्या बनना चाहते हो? वाट इज़ यूअर ऐम्बीशन इन लाईफ?’
लड़का खड़ा हो कर बोला – ‘इंजिनीयर.’

सब को हंसी तो आ रही होगी पर सब ने दबा ली क्यों कि वह तो क्लास का सब से नालायक विद्यार्थी थापर प्रिंसीपल साहब बोले – ‘वेरी गुड. और इस क्लास में कौन कौन इंजिनीयर बनना चाहता है?’

वे इस बात को देख कर हैरान थे कि मेरे अलावा सारी क्लास खड़ी हो गई है. अचानक उनके होंठों पर एक मुस्कराहट सी खिल गई. बोले – ‘बहुत अच्छा! आई ऐम प्राऊड ऑफ ऑल ऑफ यू!’ पर फिर उनकी नज़र मुझ पर पड़ी. बोले – ‘तुम? तुम इंजिनीयर नहीं बनना चाहते?’
सर, पता नहीं ऐडमीशन मिले न मिले. मैंने इसीलियिए सोच रखा है कि मैं प्रोफ़ेसर बनूँगा.’
प्रिंसीपल चले गए पर जाते जाते उनके होंठों पर अजीब व्यंग्य भरी मुस्कराहट फैल गई थी. कुछ बुदबुदाने के अंदाज़ में बोलते गए – ‘सिर्फ तुम्हें ही ऐडमीशन मिलेगी शायद. बाकी तो सब छोले बेचेंगे.’

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और सचमुच, वे दिन आ गए, जब ऐडमीशन की भगदड़ शुरू हो गई थीमैं स्कूल में फर्स्ट आया था और क्लास के कई विद्यार्थी या तो फेल थे या थर्ड डिवीज़न में थेकिसी ने पढ़ाई छोड़ दी थी तो किसी को छोटे मोटे कॉलेज में ऐडमीशन मिल ही गयाबहरहाल, असली संघर्ष मेरा थामन में दबी दबी आकांक्षा थी कि मैं भी पिता की तरह इंजिनीयर बनूँपिता ने अब वह प्राईवेट नौकरी भी छोड़ दी थी और घर के अंदर एक चारपाई पर बैठे अखबार पढ़ते रहते थेज़्यादातर विश्वविद्यालयों की खबरें पढ़ते. ऐडमीशन की भगदड़ की तसवीरें और सुर्खियाँकभी कभी बाहर बालकनी में देखते कि नज़दीक ही कश्मीरी गेट के पॉलीटेक्नीक कॉलेज के जो प्रोफ़ेसर साहब रहते हैं, वे सैर करते यहाँ से गुज़रते हैं कि नहींएक दिन गुज़रे तो उन्होंने अधिक पहचान हुए बिना ही उन्हें आवाज़ देनी शुरू कर  दी – ‘ज़रा सुनिए. प्लीज़ ऊपर आइये न, मुझे एक काम है.’

प्रोफ़ेसर बहुत शालीन स्वाभाव के थे. बड़ी उम्र के थे और अक्सर काले गागल्स पहन कर नज़रें नीची किये चलतेसफ़ेद कमीज़ सफ़ेद पैंट और नीचे खेलने के शूज़शायद नज़दीक ही किसी पार्क वार्क में जातेउनके चलने का अंदाज़ बहुत आकर्षक थासब से मुस्करा कर बात करते, पर बहुत कम बोलतेशराफत उनके चेहरे से टपक रही होती. पिताजी ने अचानक उन्हें आवाज़ दी तो वे सड़क से हमारे मकानों की कतार को आने वाली दो चार सीढ़ियां चढ कर फिर हमारे घर की सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर आ गए. पिताजी पिछली बालकनी में सीढ़ियों वाला दरवाज़ा खोले उनके इंतज़ार में खड़े हो गएप्रोफ़ेसर साहब आए तो वे अपनेपन में उनका हाथ पकड़ कर अंदर ले गएकमरे में आए तो मां भी आ गईमां उनसे बोली – ‘ये जो हमारे घर के पीछे रहती है न सुमित्राँ, ये आप की भाभी है न?’

वे बहुत सम्मान से बोले – ‘मेरे एक चचेरे भाई हैं, उनकी मिसेज़ है वह.’ पिताजी भी प्रसन्न हुए कि इन से अधिक पहचान नहीं, पर कोई तो पहचान निकल आई.
पिताजी उन्हें बिठा कर खूब आदर सत्कार करते बोले – ‘मेरे बेटे की फर्स्ट डिवीज़न आई हैइंजिनीयरिंग में अप्लाई कर रखा हैआपके कॉलेज में भी. क्या आप की मदद मिल सकती है?’

प्रोफ़ेसर साहब अदब से बोले – ‘हमारे यहाँ कोई पहचान नहीं चलती. पर फर्स्ट डिवीज़न आई है तो अपने आप भी मिल सकती है ऐडमीशन. क्यों निराश हो रहे हैं?’ पिताजी को पता था, ऊंचे कॉलेज में कोई पहचान नहीं चलती. पहचान चलेगी तो मेरे बेटे जैसे अच्छे अच्छे विद्यार्थी रह जाएंगे. पहचान वाले जा कर पढ़ेंगे.’
प्रोफ़ेसर की खूब आवभगत की उन्होंने. आखिर वह यह कह कर आश्वासन दे कर कर चला गया अगर आपके बेटे का नाम आया तो मैं आप को यहीं बता जाऊँगा. फीस वीस तैयार रखियेगा.’

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फीस का ही सारा मामला था. दोनों बड़े भाइयों को छोटी मोटी नौकरियां मिल गईं थीं. सब से बड़े को तो फिर भी एक कपड़े की दुकान में नौकरी मिली पर दूसरे नंबर वाले को बहुत कम वेतन वाली नौकरी मिली थी. सब लाचार थे कि इंजिनीयरिंग तो क्या, अगर कहीं और भी ऐडमीशन मिल गई तो शुरू में दिये  जाने वाले डेढ़ दो सौ रूपए कहाँ से आएँगेरोज़ यूनिवेर्सिटी आने जाने का किराया बटोरना भी कितना मुश्किल हो जाएगा. बहरहाल, इंजिनीयरिंग की ऐडमीशन में खूब मारामारी थीपॉलीटेक्नीक में भी मैं देख आया और दिल्ली में ब्रिटिश सहयोग से खुले एक नए इंजिनीयरिंग कॉलेज में  भीमेरा नाम नहीं था. तब बड़े भाई कुमार ने कहा – ‘जा कर फिज़िक्स ऑनर्स में पता करो. वह भी अच्छा कोर्स है.’  मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के तीन कॉलेजों में देख आया, मेरा नाम थामन में एक गहरी चुभन तो थी, कि मैं इंजिनीयर नहीं बन पाऊंगा. पर फिर भी, काफी खुश था कि दिल्ली विश्वविद्याय में मैंने छः कॉलेजों में अप्लाई किया था, ज़रूर बाकी तीन में भी मेरा नाम होगा ही.
पर नीचे विद्यार्थियों के लिए लिखी सूचना पढ़ कर मन मायूस भी हो गया था. लिखा था – ‘बाईस तारीख तक हर विद्यार्थी एक सौ अठतालीस रूपए कैशियर के यहाँ जमा करा देवर्ना ऐडमीशन रद्द कर दी जाएगी.’

और हमारे घर में शुरू हो गया एक संघर्ष, कि अब ये एक सौ अठतालीस रूपए  आएँगे कहाँ सेहमारे यहाँ बहुत विचित्र सी स्थिति होती. पंद्रह बीस तारीख के बाद घर में एक धेला न बचतादुकानदार आ कर चिल्लाने लगते जब उन से लिये हुए पिछले महीने के उधार को चुकता a
न किया गया होताऐसे में एक सौ अठतालीस रूपए एक सौ अठतालीस राक्षसों जैसे लग रहे थेबड़े भाई कुमार को  उसकी दुकान के मालिक ने आगे की तारीख का एक चेक दे दिया था, एक सौ इकत्तीस रूपए काउसमें भी कम पड़ेंगे पैसे. अब क्या करेंगे हम सब?

मैं बहुत उदास रहने लगा. अपने ही स्कूल चला गया और खूब खिल्ली उड़वाई अपनी. प्रिंसीपल देखते ही बोले – ‘कहो, कैसे हो? कहाँ पढ़ाई शुरू की? इंजिनीयरिंग में काम बना?’ सब मास्टर भी आ गए. वैसे एक मास्टर ने किसी को बताया था कि जिस दिन ग्यारहवीं का रिज़ल्ट आना था प्रिंसीपल साहब सुबह चार बजे ही जग गए थे. पिछली रात उन्होंने उन मास्टर से कह दिया था कि अखबार आते ही उनके पास ले आएं और बताएं कि कैसा रहा अपने स्कूल का परिणाम. वे  अखबार के ऑफिस के बाहर खड़ी भीड़ में कहीं से रात साढ़े तीन बजे ही पेपर हासिल कर के साईकिल दौड़ाते दौड़ाते प्रिंसीपल साहब के घर गए थे. प्रिंसीपल साहब को बताया कि सब लड़के या तो थर्ड डिवीजन में हैं या फेल. सिर्फ एक ही ही फर्स्ट डिवीज़न आई हैसुन कर प्रिंसीपल साहब ने हथेली से अपना माथा पीट दिया था, बोले थे – ‘सब नालायक हैं. पढते ही नहीं’. उन मास्टर जी ने फिर बताया कि मेरी तो गणित में डिस्टिंक्शन भी है और वे खुश हो गए थे – ‘चलो एक तो अच्छा निकला. यही लड़का जाएगा इंजिनीयरिंग में.’  वैसे सचमुच, उन दिनों भी इंजिनीयरिंग में ऐडमीशन का एक क्रेज़ सा थामैं अपने मन की इच्छा दबाए बैठा था कि इंजिनीयरिंग न सही, फिज़िक्स में ही अच्छा कैरियर बना लूँगा. सो मैं प्रिंसीपल साहब के ऑफिस में उनके द्वारा संकेतित एक कुर्सी पर बैठते बोला – ‘इंजिनीयरिंग में नंबर नहीं आया...’
पर वे बीच में ही बोले – ‘पहली लिस्ट में कई लड़कों का नाम नहीं आता. कई लड़कों को दो दो कॉलेजों में मिल जाता है दाखिला. तब ये कॉलेज दूसरी तीसरी लिस्टें निकालते हैं. इंतज़ार तो करो!’

मैं बोला – ‘फिलहाल मुझे फिज़िक्स आनर्स में ऐडमीशन मिला है, पर मेरे पिताजी के पास एक सौ अठतालीस रुपए नहीं हैं कि ऐडमीशन ले सकें.’
वे बोले – ‘किसी रिश्तेदार से ले लोइंजिनीयरिंग में भी मिल जाएगी. घबराने क्यों लग जाते हो?’

मैं बोला –‘मेरे भाई के पास एक पोस्ट-डेटिड चेक है जो डेढ़ महीने बाद खुल सकता है. तब तक आप मुझे एक सौ अठतालीस रूपए स्कूल के कैश से ही दे दीजिए!’ प्रिंसीपल को हंसी आ गई. आसपास खड़े कुछ मास्टर नज़दीक बुला लिए  और बोले – ‘यह देखो, स्कूल का सब से होनहार लड़का क्या कह रहा है, कि स्कूल का जो कैश है, उसमें से इसे ऐडमीशन के लिए फीस दे दी जाए... हा हा...’ कुछ मास्टर मेरी अबोधता पर मुस्करा दिए, पर एक ने अच्छी तरह समझा दिया कि स्कूल के कैश से तो एक पैसा भी कोई नहीं निकाल सकतालायक विद्यार्थियों की ऐडमीशन के लिए स्कूल पैसे थोड़ेई रखते हैं?’

बहरहाल मैं चला आया. इस बीच कुमार ने खूब भागदौड़ की थी. आखिर उस डेढ़ महीने बाद वाले चेक को किसी को देने पर और दस रूपए अपनी तरफ से देने पर उसे एक सौ इकत्तीस तो मिल गए, पर सवाल था कि बाकी के सत्रह रूपए कहाँ से आएँगे, क्योंकि वहाँ तो एक सौ अठतालीस चाहिये थे. और वे सत्रह रूपए भी किसी के आगे हाथ फैला कर बटोर लिये गए

अब देखिये, क्या होता है. पिताजी कुछ दिन से बीमार से चल रहे हैंमैं मां बाप के चरण स्पर्श कर के वे एक सौ अठतालीस रुपए पैंट की किसी अंदरूनी जेब में एक लिफाफे में मज़बूती से रखे और बाकी दो रूपए ऊपर से ले कर घर से निकल पड़ा हूँ. यूनिवर्सिटी जाने का किराया पच्चीस पैसे और आने का भी पच्चीस पैसे. इस हिसाब से मैं काफी पैसे वाला था. पिताजी ने कहा – ‘खज़ांची से रसीद वसीद ठीक से ले लेना. चाय पीनी पड़े तो पी लेना.’ और इधर मैं निकला हूँ, उधर वे प्रोफ़ेसर साहेब आए हैं, पिताजी से कहते हैं – ‘आपके बेटे का नाम दूसरी लिस्ट में आ गया है. अभी तो सिविल में ऐडमीशन मिला है, एक हफ्ते बाद इलेक्ट्रिकल में भी नंबर आ जाएगा.’ और कह कर वे पिताजी को एक पोस्ट कार्ड भी दे देते हैं जो अगर कॉलेज से डाक के रस्ते चलता तो शायद दो दिन बाद हमें मिलता.’ पिताजी का सर चकरा गया. पर उन्होंने प्रोफ़ेसर से कुछ न कहा, बहुत खुशी दर्शाई  और प्रोफ़ेसर साहब भी जल्दी निकल गए क्योंकि वे तो उस समय ड्यूटी पर जा रहे थे.  

पिताजी ने उत्तेजना में चिल्ला कर मां को बुला लिया. बोले – ‘अब तक तो वह यूनिवर्सिटी की बस में चढ़ चुका होगा. उसे कैसे रोका जाए कि वे एक सौ अठतालीस रूपए वहाँ उस कॉलेज में न दे. दे दिये तो फिर इंजिनीयरिंग कॉलेज को कहाँ से देंगे फीस?’ मां पूरी बात समझ कर बोली – ‘आप को तो अब निकलना नहीं है. डॉक्टर मना कर गया है, किस को भेजूं कि जा कर उसे रोके?’ पिताजी को डॉक्टर ने सख्त ताकीद कर दी थी कि घर से निकलना नहीं है. बड़ी बहन अंजना एक स्कूल में टीचर लग गई थी और साथ में पढ़ाई  भी कर रही थी. पर उसका स्कूल काफी दूर था. अचानक मेरा भाई बब्बन आ गया. स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ थी. पिताजी ने क्या किया कि लपक कर उसी को पकड़ लिया, बोले बेटे, तू बस पकड़ कर कहीं जा सकता है? तेरे भाई को इंजिनीयरिंग में ऐडमीशन मिल गया है पर वह बी.एस.सी ऑनर्स में ही फीस भरने चला गया है.’

हैं?’ मेरा भाई अचानक बड़ा उत्तेजित हो उठा. अपनी पढ़ाई में औसत रह कर भी उसका मुझ में बहुत मोह था. वह हर किसी को बताता फिरता था कि मेरा भाई फर्स्ट आया है पूरी क्लास में. पूरे चार साल बाद हमारे स्कूल में कोई फर्स्ट डिवीज़न आई है. एक उसे ही इंजिनीयरिंग में ऐडमीशन मिलेगी देखना.’ पिताजी से सारी बात समझ ली बब्बन ने. पिताजी से बोला – ‘मैं क्यों नहीं जा सकता यूनिवर्सिटी. नज़दीक ही बस स्टॉप है. सीधी बस जाती होगी. पता कर लूँगा. उस के कॉलेज में उस से पहले ही पहुँचने की कोशिश करूँगा. कैसे भी उसे रोक लूँगा...’

मां और पिताजी को चिंता तो बहुत हुई. पर बब्बन तो दोनों को लगभग डांटता हुआ उन से सिर्फ एक रूपया ले कर घर से निकल पड़ाजल्दी में उसने स्कूल की यूनीफोर्म वाली सफ़ेद शर्ट और नेकर ही पहन ली, जैसे स्कूल जा रहा हो. बस मिल गई और उसमें वह खड़े हुए मुसाफिरों के बीच एक सीट की रेलिंग ऐसी मुस्तैदी से पकड़े खड़ा रहा जैसे बहुत ज़रूरी काम में उसे फ़िक्र ही नहीं कि बस में जाने में कितनी तकलीफ होती है. अलबत्ता वह नेकर की जेब में हाथ डाल डाल कर अंदर कंडक्टर द्वारा वापस दी हुई अठन्नी और चवन्नी को बार बार मुट्ठी में ज़रूर कस लेता कि कहीं कोई निकाल न देखासा मोटा था बब्बन. किसी किसी क्षण सीट की रेलिंग छोड़ ऊपर का डंडा पकड़ने का भी प्रयास करता. सोचता सोचता ऐसे खड़ा था जैसे बस उसी को लिए जा रही हो. किसी बुज़ुर्ग ने पूछ ही लिया – ‘बेटे कहाँ जा रहे हो? साथ में कोई नहीं?’ बब्बन ने उस से  अकड़ कर कहा – ‘मैं कहीं  भी आ जा सकता हूँ. मेरे भाई को ऐडमीशन तो मिली है इंजिनीयरिंग में और वह फीस भरने चला गया है बी.एस.सी की.’ सुन कर खड़े हुए मुसाफिरों में एक हंसी की लहर सी छा गई. पर एक ने कह दिया– ‘इंजिनीयरिंग में ऐडमीशन किस्मत वालों को मिलती है. जाओ जा कर पकड़ो भाई को...’ और भाई को जाना था हिन्दू कॉलेज, वह उतरा हंसराज कॉलेज के बाहरउसे कॉलेज का नाम तो याद था पर बस से उतर कर तेज़ तेज़ वह किस कॉलेज में घुसा है, इसका उसे होश नहीं था. एक लड़के से तेज़ी से चलते चलते पूछा – ‘ज़रा बताना, ऐडमीशन के बाद फीस कहाँ भरी जाती है?’
लड़के ने कहा – ‘मैं भी वहीं जा रहा हूँ.’

और बब्बन तेज़ तेज़ उस लड़के से भी आगे चलने लगा. उस लड़के को भी हंसी आ गई. पर वह उस से बोला – ‘सामने जो एंट्री है न, उस से बाईं ओर मुड़ना.’
एंट्री मतलब? जहाँ से अंदर जाते हैं?’ बब्बन जैसे उस लड़के को बता रहा था कि उसे अंग्रेज़ी के शब्द भी आते हैंलड़का फिर हंसा – ‘ह्म्म्म.’ कह कर उसने गर्दन हाँके अंदाज़ में नीचे कर दी, जैसे उसे भी इस लड़के पर प्यार आ रहा हो.

बब्बन तेज़ी से हंसराज कॉलेज के कैशियर के पास पहुंचा. वहाँ खासी लाईन लगी थीबब्बन मुझे ढूँढने लगा वहाँ. फिर अचानक कैशियर के कमरे में ही चला गया, बोला – ‘मेरा भाई फीस देने आए, तो मत लेना.’

कैशियर बिगड़ कर बोला – ‘कौन तुम्हारा भाई? कहाँ है वो? फीस क्यों न लूं?’
बब्बन बोला – ‘वह घर से निकला ही था कि उस के इंजिनीयरिंग में ऐडमीशन का कार्ड भी आ गया. यह देखो.’ और बब्बन ने कार्ड भी दिखा दिया, आगे बोला – ‘अब हमारे पास थोड़े से पैसे थे. अगर आप उस से फीस ले लेंगे तो इंजिनीयर नहीं बनेगा मेरा भाई.’
कैशियर इस समस्या से परिचित था कि कई लड़कों को यहाँ फीस भरने के  बाद इंजिनीयरिंग का लैटर आता है. सो भाई से उसने पूछा – ‘क्या नाम है तुम्हारे भाई का और कौन से कॉलेज में ऐडमीशन मिली थी?’

बब्बन बोला हिंदू कॉलेजतो कैशियर झल्ला कर बोला – ‘यहाँ से बाहर निकल कर किसी से भी रास्ता पूछ लो, हिंदू कॉलेज दूर नहीं है.’ और बब्बन तेज़ी तेज़ी से बाहर आ गया. रस्ते में वह दौड़ने लगा. लड़कों के एक ग्रुप के पास पहुंचा – ‘भाई साहब, हिन्दू कॉलेज कौन सा रास्ता जाता है?’

लड़के बोले – ‘वहाँ से बाईं ओर मुड़ जाओगे न तो किरोड़ीमल कॉलेज पड़ेगा. उसी के बीच बीच में से ही निकल जाना.’ अब मेरा भाई बब्बन उत्तेजित सा हंसराज कॉलेज से किरोड़ीमल कॉलेज तक दौड़ता है और फिर किरोड़ीमल कॉलेज के बीच में ही तेज़ी तेज़ी से दूसरी तरफ जाता है. यहाँ वह इसलिए नहीं दौड़ा कि लड़के पता नहीं क्या समझ लें. कोई समझे कुछ चोरी कर के भाग रहा है तो?’

आखिर इस उत्तेजना को साथ लिये बब्बन हिंदू कॉलेज भी पहुँच जाता है और हिंदू कॉलेज के कैशियर के पास भी पहुँच जाता है. कैशियर उस समय इत्तिफाक से खाली बैठा दूसरे लड़के लड़कियों का इंतज़ार कर रहा हैउस ने अभी अभी कम से कम सत्तर रसीदें काटी हैं और अब लाईन में कोई नहीं. सुस्ताने के अंदाज़ में वह कुर्सी की पीठ पर टेक लगाने के लिए पीछे झुकता ही है कि खिड़की के बाहर एक सफ़ेद नेकर शर्ट पहने मोटा सा लड़का आ खड़ा होता है. खज़ांची पूछता है – ‘कहिये, मैं आप की क्या सेवा करूं?’

बब्बन तो हांफ रहा है. हाँफते हाँफते कहता है – ‘मेरा भाई फीस देने आए तो फीस मत लेना. उसे इंजिनीयरिंग में ऐडमीशन का लैटर आ गया है. यह देखो.’ यह खज़ांची भी पूरी बात समझ गया. बोला – ‘तुम्हारे भाई का क्या नाम है? उसे कौन से कोर्स में ऐडमीशन मिला था?’
बब्बन ने बता दिया – ‘मेरे भाई का नाम प्रेमचंद है. उसे बी.एस.सी फिज़िक्स में ऐडमीशन मिला है.’
खज़ांची बोला – ‘प्रेमचंद?’
-‘हाँ हाँ. मेरी तरह ही मोटा है. स्कूल के लड़के हमें बम्बे बाम्बे कह कर चिढ़ाते भी हैं
खज़ांची ने इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया. पर वह अपनी रसीद बुक और रजिस्टर उलट पलट कर बोला – ‘बी.एस.सी फिजिक्स?’
हाँ हाँ. बहुत होशियार है मेरा भाई.’
होशियार तो है पर वह तो अभी अभी फीस दे कर चला भी गया है. आखिर में वही तो था? आप के आने से बस पांच मिनट पहले दी है उसने फीस. यह देखो रसीद.’
खिड़की के बाहर खड़ा बब्बन फफक फफक कर रो पड़ता है –‘अब कैसे बनेगा मेरा भाई इंजिनीयर? हमारे पास ये पैसे भी बहुत मुश्किल से आए थेपर अब वह इंजिनीयरिंग कॉलेज की फीस तो भर ही नहीं सकेगा?’
खज़ांची ने खूब तसल्ली दी मेरे भाई को. बोला – ‘एप्लीकेशन देने पर फीस वापस भी मिल जाती हैपर पूरी नहीं. एक सौ अठतालीस रूपए में से सिर्फ एक सौ दस ही मिलेंगे. वो भी वापस मिलने में पंद्रह दिन लग जाते हैं.’

मेरा भाई बब्बन उस दिन किस हालत में यूनिवर्सिटी से लौटा होगा, सहज ही समझा जा सकता है. एक तो मैं भी तेज़ी से निकल गया था और वह मुझे नहीं मिल पाया था, पर उस दिन हमारे घर खूब उदासी छा गई थी. इंजिनीयरिंग कॉलेज का प्रोफ़ेसर अगले ही दिन दूसरी बार भी आया था – ‘अब आप के बेटे का नाम इलेक्ट्रिकल में भी आ गया है.’ फिर दो ही दिन बाद वह खुद ही एक तीसरा कार्ड भी दे गया – ‘मिकैनीकल. मिकैनीकल में जिसको मिला, समझो खुशकिस्मत.’ पिताजी की आँखों से आंसू  टप टप बहने लगते थे, जब जब वह प्रोफ़ेसर कार्ड दे कर चला जाता था. सब कुछ तेज़ी तेज़ी से हो रहा था. इन चार दिनों में यह भी हुआ कि ब्रिटिश सहयोग से खुले नए कॉलेज जिसे कॉलेज ऑफ इंजिनीयरिंगकहा जाता था, वहाँ से भी दो कार्ड डाक के रस्ते आ गए थे, एक सिविल में ऐडमीशन का दूसरा इलेक्ट्रिकल में. पिताजी को समझ ही नहीं आ रहा था, यह आखिर हो क्या रहा है. चार दिन में पांच कार्ड. दोनों कॉलजों में एक सौ अठासी रूपए के लगभग फीस भरनी थी. पिताजी पूरी तरह ठीक न हो कर भी एक दिन ज़रा बुखार में ही ज़िद कर के अकेले चले गए.

हिंदू कॉलेज के प्रिंसीपल के चैंबर में पहुँच कर प्रिंसीपल से बोले – ‘मैं सिंध में आसानी से इंजिनीयर बन गया थावहाँ ऐडमीशन इतनी मुश्किल नहीं थी. क्योंकि पूरे कस्बे में कोई कोई लड़का आगे तक पढ़ता था. अब खूब कम्पिटीशन है, सो दूसरी तीसरी लिस्ट तक इंतज़ार करना पड़ता है. आप प्लीज़ मेरे बेटे के दिये हुए एक सौ अठतालीस रुपए रिफंड कर दीजिए, मेरे बेटे की ज़िंदगी बदल जाएगी. मैंने जिंदगी भर ईमानदारी से नौकरी की. कभी एक रुपया भी रिश्वत नहीं खाई, वर्ना आज मेरी भी एक कोठी होती. कार होती. मैं ऐसी दस ऐडमीशन की फीस भर सकता था. मेरे बेटे को ऐडमीशन मिल गई तो देश को एक और ईमानदार इंजिनीयर मिल जाएगा...’

पर प्रिंसीपल रईस खानदान का कोई अमीरज़ादा था. बोला – ‘यह कोई स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया नहीं है कि जब मर्ज़ी कोई आ कर चेक तुड़वा जाए. जाइये जा कर फॉर्म भरिये और दस पन्द्रह दिन बाद भी आप को कौन से सारे पैसे मिल जाएंगे. जा कर कैशियर से पता कीजिये कि कितना रिफंड हो सकेगा... प्लीज़, जाइये, मुझे और भी बहुत सारे काम हैं...’ बाहर लड़कों लड़कियों का खूब शोर उभर रहा था और उस शोर को बीच से चीर कर पिताजी कैसे बाहर निकले होंगे, यह वर्णन ज़रूरी नहीं...

कॉलेज में रिफंड की एप्लीकेशन दे कर भी वापस लेनी पड़ी थी क्योंकि पंद्रह दिन से ज़्यादा लग गए थे और तब तक दोनों कॉलेजों की अगली अगली लिस्टें भी शाया हो चुकी थीं.
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