मैं कहता आँखिन देखी : अनामिका

Posted by arun dev on मई 16, 2012










कवयित्री, कथाकार और स्त्री - विमर्शकार अनामिका से अपर्णा मनोज ने उनके लेखन कर्म, रचना - प्रक्रिया और   सरोकारों पर एक बैठिकी की है. अनामिका के पास सृजन और समझ का एक विस्तृत फलक है.उनके नारीवाद में उनके खुद के अनुभव का मिश्रण है. स्त्री -पुरुष के आपसी रिश्ते को वह अपनी ख़ास दृष्टि से देखती हैं.    



अनामिका से अपर्णा मनोज की बातचीत                                      


आख़िरकार कविताओं से क्या छूट गया कि आपको कथा लेखन की ओर जाना पड़ा.


हर दर्ज़ी के पास कुछ कतरनें बच जाती हैं, उन कतरनों से वह गुड़िया सिल देता है कभी-कभी. मुझे ऐसा ही लगता है, कविता चूँकि बहुत कमसुखन विधा है और कविता का स्वाभाव स्त्रियों का स्वभाव है;  वह इशारों में बोलती है, कम बोलती है और थोड़ा बंकिम बोलती है. विवरण की छूट आज हम लेने लगे हैं आधुनिक कविता में. मगर कभी-कभी  विवरण  इतने अधिक  फ़ैल जाते हैं कि कविता में समेटने का मन नही करता, खासकर चरित्रों की, जीवन स्थितियों  और  विडम्बनाओं की इतनी विवरणिकाएँ फ़ैल जाती हैं मस्तिष्क में. जैसे घर और कमरों में सफ़ाई करते हैं कभी-कभी, उसी तरह बिम्बों-चरित्रों को भी हम कहीं संभालकर रखना चाहते हैं. हमारे चारों तरफ़   बिम्बों, चरित्रों, संवादों का एक आभ्यारण्य बन जाता है, उसको हम चाहते हैं थोड़ा तरतीब देना. और इधर इस खाने में, उस खाने में कुछ-कुछ संभाल देना. उसी सन्दर्भ में चरित्र  दस्तक देते हैं, मेरी स्मृतियों में, और उनको  उनकी पूरी परिस्थिति, मनःस्थिति में दर्ज करने के लिए उपन्यास लिखती हूँ.



अपनी कविताओं की कीमियागीरी  कैसी है, क्या-क्या जरुरी चीज़ें आप उसमें डालना नहीं भूलतीं.


कीमियागीरों की जो हालत थी एलिज़ाबेथ के समय में, वही हर लिखने वाले की हालत होती है, सबको सोना बनाना है न. कविता भी इसी संकल्प के साथ शुरू होती है कि सोने की कणिकाएँ  सभी में हैं, हर वनस्पति किसी न किसी रूप में औषधि हो सकती है और हर हृदय  के भीतर एक स्वर्ण तत्त्व है,  उसके अन्वेषण से कविता शुरू होती है. और अगर कीमियागीरी से आपका अर्थ शिल्प से बनता है, तो जैसे हम पहली बार आटा गूंधते है और उसे रोटी बनाने से पहले कुछ देर छोड़ देते हैं, उसी तरह मैं कविता का पहला ड्राफ्ट तो एकदम से लिख लेती हूँ, कहीं भी. धोबी की बही में हो या बस की टिकट पर या  बच्चों की कॉपी में,  जहाँ जो मिला उसमें लिख लेती हूँ पहला ड्राफ्ट, लेकिन उसके बाद जैसे हम आटा छोड़ देते हैं ढँककर छोड़ देती हूँ उसे, माँ कहती थीं कि अगर आटा गूंध  के थोड़ी देर छोड़ दोगी तो रोटी मुलायम बनेगी, इसी तरह से मैं पहला ड्राफ्ट थोड़ी देर छोड़ देती हूँ. और बाद में जब  थोड़ी तटस्थता आ जाती है तो बेलना शुरू करती हूँ.



कभी-कभी ऐसा होता है क्या कि बार-बार के ड्राफ्ट के बाद भी असंतोष बना रहता हो


कभी-कभी तो आदमी चार-पांच ड्राफ्ट से भी असंतुष्ट रहता है. कुछ कहा नहीं जा सकता  कोई-कोई कविता  एकदम से उतर आती है. उसमें कोई झोल नहीं होती. कुछ कविताएँ जो आपके भीतर बहुत दिनों से ब्रियू कर रही हैं, शायद उनमें बहुत कुछ ऐसा रहता है जो बार-बार ड्राफ्ट करने की मांग करता है. तो कुछ कहा नहीं जा सकता. खासकर लम्बी कविताओं में तो बार-बार ड्राफ्टिंग रहती है. आदमी कभी इस कोने से खोलता है तो कभी उस कोने से, जैसे स्वेटर बुनता है न आदमी,  उधेड़-बुन, उधेड़-बुन,  स्वेटर बुनने की प्रक्रिया जैसा.

प्रकाशन के बाद भी क्या ड्राफ्टिंग


हाँ, प्रकाशन के बाद भी मैंने चीज़ें रिवाइज़ की हैं. उसमें मुझे लगता है कि बोल बोल कर पढ़ने से ज्यादा तटस्थता आ जाती है. अपनी कविता अगर बोलिए बार-बार, पढ़ने से भी ज्यादा, क्योंकि कविता बहुत कुछ नादगुण संपन्न होती है,  तो अगर आप कविता को बोलकर पढेंगे न तो उसके झोल जल्दी दिखेंगे.


आपकी कविताओं में दादी - नानी, गरज कि औरतें खूब आती हैं, खासकर रिश्तों से. क्या ये बहिनापा का बड़ा वृत्त नहीं है

असल में हम मध्यवर्गीय स्त्रियों का संपर्क ज़्यादातर स्त्रियों से ही होता है. बचपन में हम लोगों को इतना ज्यादा घेरकर  रखा जाता है, जैसे कि लाइफ इन्श्योरेन्स कम्पनी का वह विज्ञापन  है न- कि दो तरफ़ से हथेलियाँ हैं और बीच में दीया जल रहा है, उस तरह से डिब्बे में पाल के तो मध्यवर्गीय, लड़कियों को बड़ा किया जाता है. तो अपने भाई के सिवा तो ख़ास किसी से अन्तरंग नही हो पातीं.  हमारे समय में तो और भी,  सन ७०, ८०,८५ तक तो मैंने अपने भाई के सिवा किसी लड़के से बात नहीं की. मेरी शादी हुई, उसके बाद  धीरे-धीरे संसार बड़ा हुआ. उसके अलावा पुरुष रिश्तेदार शिक्षक और  पापा के दोस्त वोस्त इतने ही पुरुष हमें देखने जानने  को मिलते हैं और वे भी ज्यादा नही खुलते, तो अन्तरंग  रूप से तो हम पुरुषों का संसार उतना जान नहीं पाते.  

जिसे जानेगा मनुष्य, उसी के बारे में निश्चिन्त होकर  लिख पायेगा.  जब हम मुजफ्फरपुर से दिल्ली आये और यहाँ आकर  रहने लगे तब मैंने पुरुषों का संसार डील करना शुरू किया. तब जाके पुरुष मेरे जीवन में आये, मतलब, बातचीत करने लगे और हम उनका भी अन्तरंग जानने लगे, अब तो जब बच्चे बड़े हो गए तो बच्चों के दोस्त  मोहल्ले के लोग, उनके खेलने के दोस्त, पढ़ने वाले दोस्त और अब तो छात्र भी, वो सब लड़के अब मुझसे खुल गए, अब मेरे लिए वो बात नहीं कि मैं युवकों का मन नहीं जानती. मैं युवकों का मन जानने लगी हूँ. माँ होने से ये लाभ  रहता है कि धीमे धीमे हम  पुरुषों से  भी खुलकर बात करने लागतें हैंपुरुष मन की जो चिंताएं हैं, वो भी समझने लगते हैं. उनका विश्वबोध क्या है, उनके जीवन की विडम्बनाएं क्या हैं, पहले हम किताबों-अख़बारों के माध्यम से ही जानते थे, लेकिन अन्तरंग बातचीत के माध्यम से आदमी ज्यादा जानता है. जिस वर्ग-वर्ण में पैदा होते हैं, तो उसकी अपनी असंगतियाँ तो हमारी होती हैं, उसी हिसाब से हम बनते हैं, जैसी हमारी परिस्थितियां होती हैं.

इधर जो आपकी कविताएँ आ रही हैं क्या वे अब भी नारी चिंतन या विमर्श पर केन्द्रित हैं

मैंने आपसे कहा न, कि अब मेरा वृत्त थोड़ा  बड़ा हो गया है, बच्चों, लड़कों, छात्रों के माध्यम से भी मैंने युवकों का समाज थोड़ा जाना है. इधर कॉलेज में एक काउंसलिंग सेल भी है. मैं उसमें भी हूँ. तो लड़कों का जो सपनों का संसार है, संघर्षों का संसार,  उनकी चिंताओं का संसार, ये मेरे सामने खुला है अब. पति और पति के घर के दूसरे लोगों से बात करके भी मुझे लगा कि ये जो दूसरी तरह का चिंतन है, ये जो दूसरा पक्ष है. वह कैसे सोचता है, यदि साफ़-साफ़ कहूँ तो ये मुझे शादी के बाद ही समझ में आया. बाकी कहीं-कहीं थोड़ी झलकी मिलती थीलेकिन वो बहुत अन्तरंग विज़न नहीं था. तो अब धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा है किताबों के बाहर सचमुच के पुरुष होते हैं,  हाड मांस के पुरुष. 

इधर क्या लगता है आपको कविताओं का भविष्य, स्त्रियों का भविष्य,  क्या इस भविष्य का भी कोई भविष्य है.

मैंने अभी आपसे कहा कि अब मैं युवकों के संसार से परिचित होने लगी हूँ. मुझे लगता है कि हर औरत पुरुष  को गढ़ती है. शिक्षित स्त्री आज बहुत अकेली है. ज़्यादातर स्त्रियाँ अपने पतियों को भी बच्चों की तरह ही पाल कर बड़ा करती हैं. जो हमारी पीढ़ी के पुरुष हैं, वे कई तरह की दुश्चिंताओं से घिरे हैं. वे बहुत निश्चिन्त पुरुष नहीं हैं. किसी में काम का अतिरेक है तो किसी में  क्रोध या लोभ का अतिरेक. तो बच्चों की तरह व्यवहार की असंगति संभालनी होती है, जिस धीर गंभीर सरस और विवेकी  पुरुष की हमने, यानी स्त्री आन्दोलन ने कल्पना की है, वह अभी देखना बाकी है. मतलब स्त्रीवाद के गर्भ से जो एक नया पुरुष पलकर बाहर आ रहा है, हमें उस पुरुष के बड़े होने का इंतज़ार है. युवकों में मुझे कई बार ऐसे सहयोगी पुरुष, दोस्त पुरुष, हमदर्द पुरुष दीख जाते हैं. इसलिए ये जो नया युवक है और ये जो स्त्रियाँ हैं, मिलकर एक नया भविष्य एक नई दुनिया गढ़ेंगी, जिसमें कविता सी तरलता होगी, वैसी ही उद्दात्त दृष्टि होगी जो सबके भले की सोचेगी. कविता की एक नैतिक रूप से भास्वर संरचना होती है जो हमें सुन्दर विश्व की कल्पना की ओर ले जाती है.

यानी नयी पीढ़ी से आप आश्वस्त हैं

मैं बहुत हद तक आश्वस्त हूँ. लेकिन अँधाधुंध  भौतिकता की जो दौड़ है, वह मुझे आक्रान्त करती है. खासकर कॉर्पोरेट सेक्टर का जो जीवन है,  लड़के काम करते हैं, १८-१८ घंटे काम करते हैं. कंप्यूटर कुली का  काम करते हैं,  उसके बाद जो थकान होती है उसे मिटाने के लिए पागलों की तरह खाते पीते हैं और नाचते गाते हैं, कभी सारी रात सोते ही नही. अतिरेक तो किसी तरह का बुरा है, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गिरता है प्राकृतिक छंद से नाता टूट जाए तो. दृष्टि तो  सम्यक और व्यापक होनी चाहिए. क्षणवाद  बेचैन करता है. प्रेम में भी तृप्ति नही मिलती. यूज़ एण्ड थ्रो, फिल- इट, शट-इट, फॉरगेट-इट का दर्शन,  उस तरह से औदात्यपूर्ण या गाम्भीर्यपूर्ण, दायित्वपूर्ण ढंग से संबंधों का निर्वाह नही होने देता चूंकि मैंने कई युवकों से अंतरंग बातचीत की है.  मैं ये भी समझती हूँ कि उनकी मजबूरियां क्या हैं. उनको लगता है कि एक्सल करना है तो इसी तरह से करना होगा और क्षण-भर के लिए ही सही नोच-खसोट के खुशियाँ खरीदनी होंगी, सब कुछ खरीदा जा सकता है. यह लपट-झपट की जो पूरी तकनीक है चिंतित करती है मुझे.  कविता के आस-पास, संगीत के आस्वादन से  जैसे नाटक मंडलियों से, अच्छी फिल्मों से उनका संस्कार प्रक्षालन हो रहा है धीरे धीरे ! हम लगे तो हुए हैं.

और इधर जो नयी पीढ़ी लिख रही है, उसे लेकर कोई मलाल

इधर सक्रिय युवा पीढ़ी ने भाषा में एक नई तरह का अलख जगाया है.  एकदम नई ऊर्जा के साथ,  उनमें डिपार्चर है, और कहीं बात बनाई नहीं जा रही. जीवन को नए  सिरे से गढ़ने  की एक उम्मीद है और तबोताब स्मृतियाँ है और भाषा जो बहुत परतदार होती है; ऐसी भाषा जिसमें स्मृतियाँ होंजातीय और वैयक्तिक होंस्वप्नजीवी भी हों, निजी भी हों और सार्वभौम भी, तो ऐसे बड़े विज़न के साथ कविताएँ आ रही हैं और पुरुषों में भी मतलब कुछ नए  तरह के थीम उठाये जा रहे हैं, अंतर्पाठीयता बहुत बढ़ी है.  विधाओं का एक दूसरे के घर आना-जाना बढ़ा है. 
कहीं कहीं कुछ असुरक्षा है. किसी किसी को डर लगता है कि इतनी पत्रिकाए निकलती हैं  इतनी चीज़ें हैं, कहीं कुछ अदेखा  न रह जाए. तो लोग खुद ही फोन करके कहते हैं कि मेरी कविताएँ पढ़ीं? ये पहले कोई नहीं करता था. भीड़ में कहीं खोने का जो एक आतंक है,  वो ऐसा कहता  है. लेकिन मुझे इसमें बुराई भी नहीं लगती, लगता है जैसे बच्चा माँ का आँचल पकड़ के कहता है माँ ये  देखा ?  मैंने ये चित्र बनाया है, कविता का चौपाल जो आप लोग इंटरनेट पर चलाते हैं, उससे भी मुझे बहुत उम्मीद है अगर कोई अदेखा कर रहा है, अनसुना कर रहा है, तो आप प्रेम से उसे अपनी ओर देखने के लिए कहते हैंइसमें कोई बुरी बात नहीं, क्योंकि कुछ बांटना ही तो चाह रहे हैं आप!  अनुभव बांटने की चीज़ ही है, दुनिया में सब कुछ बांटने के लिए ही होता है. कुछ भी अंदर बचा के रखने के लिए  नहीं होता. जो खुशियाँ, जो तकलीफें, जो विडम्बनाएं हमने आत्मसात कीं अगर हम वो साझा नहीं करेंगे तो उनका निवारण  होगा कैसे?

आज की कविता पर बाज़ारवाद का प्रभाव

सूचना क्रांति में सूचना विस्फोट के तत्व हैं, किसी भी तरह के अराजक विस्फोट पर काबू रखना चाहिए. अतिरेक से बचना चाहिए, एकध्रुवीय दुनिया न रहे - ये कुछ संकल्प हैं युवा कविता के! एस. एम्, एस, में युवकों की कवितायेँ देखी हैं, कभी-कभी बहुत काव्यात्मक सन्देश आते हैं मोबाईल पर कविता की तकनीक का विज्ञापन है यह. फिल्मों की जो तकनीक पर प्रभाव गहरा पड़ा है. दोनों  पर्सनल और पोलिटिकल  को झप से मिला देते हैं.  पर विज्ञापन कहते हैं खरीदो, खरीदो !  कितना खरीदो ? बहुत अच्छा  दिमाग हमारे देश का इस विज्ञापन उद्योग में लगा हुआ है. वही कुछ ऐसा दर्शन  विकसित करें जो काव्य विवेक सम्मत हो.  

         एक विज्ञापन मैंने देखा था एयरटेल की कनेक्टिविटी दिखानी थी. कोई नया जोड़ा पहाड़ पर जाता है, वहीँ से वो दादी को सुनाता  है- केदारनाथ का घंटा, या कि माँ का जन्मदिन मनाने के लिए कोई कहीं से कहीं उड़ के आता है.   लेकिन अंत में सन्देश ये जाता है  कि कम्प्लीट मैन होने के लिए सूटेड-बूटेड, मतलब रोब-दाब का होना जरूरी है, ये सन्देश  गलत है, खासकर ऐसे समाज में जहाँ चारों  तरफ असुरक्षा है, चारों तरफ गरीबी है.  हमारे पुरुषार्थ चार हैं: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- दो भौतिक दो आध्यात्मिक !  आध्यात्मिक गुणों का विकास हमें  त्याग की ओर ही ले जाता है, और मार्क्सवाद भी यही कहता है. मतलब त्याग एक बड़े मूल्य की तरह पहुंचना चाहिए. बाजार के ये जितने भी विज्ञापन हैं, वो ये नहीं कर रहे हैं! और स्त्रियाँ  उनका चेहरा दीखता है...जगह-जगह दीखता है. स्त्रियाँ  हँसती हुई  भी दिखाई देती हैं लेकिन वो हंसी एक तरह का घूँघट है.  मैंने कहीं लिखा भी था,  अंदर पिट कर भी आयें तो हंसना है बाहर. तो ये हँसी भी बिक रही है. प्रेम भी बिक रहा है तो हर चीज़ बिक जाने को जो अभिशप्त है. भेद-भाव की संरचनाएँ नहीं टूट रहीं हैं. उसके खिलाफ तो कविता को जरूर आवाज़ उठानी चाहिए  उठा भी रही है.

आज कविता जो आवाज़ उठा रही है , क्या वह आम जन तक पहुँच रही है 


कविता और कवियों  के बारे में मेरी एक मान्यता है कि उनकी  स्थिति घर के बुजुर्गों जैसी है. घर में कोई है,  है तो है ..बैठा है किसी कोने में. हमारे भले की सोचता है, मगर उस पर ध्यान देने की जरुरत नहीं है. कविता के बारे में भी सामान्यत: लोग यही सोचते हैं कि कवि है. अच्छा है. हमारे हित की बात सोचता है,  लेकिन उस पर ध्यान देने की जरुरत नहीं है  हमारा ही आदमी है, पर क्या कहता है पता नहीं ! ऐसे ही तो हम बूढ़े आदमी के लिए बोलते हैं न  कि बैठे-बैठे पता नहीं क्या सोचता-बोलता रहता है, सुनने की जरुरत नहीं, इसी तरह कवि को अपना समझते हैं लोग. लेकिन कविता में तब तक रूचि नहीं लेते जब तक वो संगीत या चित्र की उंगली पकड़ कर सामने नहीं आती. इसलिए फिल्म के संगीत की, दूसरे संगीत की या चित्रवीथियों की, जरुरत रहती है हमें. मैं हमेशा कहती हूँ कि जैसे हम लोग अलग-अलग वर्गों और वर्णों से आकर भी बहिनें हैं.

        दुनिया की जितनी भी विधाएँ हैं, वे भगिनी विधाएँ हैं.. सारे रंगकर्म या कलाएं,  वो भी बहिनें हैं. इसलिए कवियों को संगीत से, नाटक से, चित्र से.. इन सब से कुछ न कुछ उठाकर एक भव्य स्पेकटेकल  बनाना चाहिए ताकि लोगों को उसकी तरफ देखने के लिए मजबूर होना पड़े. हमें कुछ तो करना ही होगा, मुझे लगता है कि सारे क्लासिक्स का फिल्मांतरण करवानाउन्हें सीरियलाइज़ करवाना, कविता-पोस्टर बनाना ज़रूरी है. चौराहों पर,  जहाँ भी कहीं आपको कोई बाजारू विज्ञापन  दिखाई देता है वहाँ आप कविता का एक कैप्शन भी लगा दें. कविता का एक पोस्टर भी लगा दें ... तो ये बहुत बड़ा काम हो जाएगा.. अगर वो   सिर्फ खरीदने को उकसा रही है तो कविता वहाँ कुछ आपको ताकीद  करेगी कि सिर्फ खरीदने की मत सोचो, जरूरत है तो खरीदो.

पोएट्री, एक स्कूल की तरह हिन्दुस्तान में क्यों नहीं दीख रही.

बहुत तरह  की समस्याएं थीं. आर्थिक सुविधाएँ  ही नहीं थीं लोगों के पास. ज्यादातर लोग जो कविता के क्षेत्र में हैं या तो बेरोजगार हैं या  अपनी योग्यता से कम की तनख्वाह पर काम करते हैं.  और स्त्रियों को तो  दस हाथों से दस तरह के काम करने ही पड़ते हैं. दरबारों का स्पांसरशिप तो चला  गया. हाँ.. और कोई संस्था ज्ञानपीठ,  साहित्य अकादमी आदि प्रोत्साहित   करती है...लेकिन थोडा-थोडा करती है.  अच्छा है कि वो युवको की पांडुलिपियाँ मंगाने लगी है, कस्बों से भी युवकों की पांडुलिपियाँ आती हैं. छपती हैं. सब थोडा-थोडा होता है, लेकिन कंप्यूटर का, इंटरनेट का एक बड़ा विस्तार है. अच्छा हो कि  वह सम्प्रेषण  समूह की तरह उभरे और सबको मिलाकर, साथ चलने का जज़्बा विकसित कर सके, यहाँ लोग कुट्टी-कुट्टी न खेलें,  अहंकार से बचें, और अहम् का विस्तार कर लें,  सोचें कि किसी का भी विकास हो रहा है तो मेरा ही है, ये जो जज़्बा  पैदा हो जाएगा  न.. तो इंटरनेट एक बहुत बड़े माध्यम के रूप में सामने आएगा और एक नए तरह की चौपाल गठित कर लेगा.........

अपर्णा मनोज 
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बातचीत में लीना मल्होत्रा राव और सईद अय्यूब का सहयोग है