सबद भेद : आलोचना क्या नहीं है

Posted by arun dev on मई 18, 2012

पेंटिग :पिकासो 











कवि आलोचक गणेश पाण्डेय साहित्य के आधारभूत तत्वों को अपनी विवेचना शैली में आखों से ओझल नहीं होने देते. उनके लिए रचनाकार का ईमान और आलोचना की ईमानदारी साहित्य के लिए अनिवार्य हैं. उनका व्यंग्य बेधक है. नामवर सिंह की आलोचना  और उन पर आलोचना पर यह आलेख है. 
 

आलोचना का सच उर्फ आलोचना क्या नहीं है                                       
गणेश पाण्डेय


प्रिय अरुण! कोई घंटा भर पहले डॉक्टर को अपनी आँख दिखाकर लौटा हूँ.  कंम्प्यूटर पर बैठा हूँ पर स्क्रीन बहुत तेज चमक रही है. आँखें चौंधिया रही हैं. आलोचना के लोचन जब संकट में हों तो सुबह का इंतजार कौन करे. हालाकि बद्र का शेर कुछ यों है कि ‘‘रात का इंतजार कौन करे/ आजकल दिन में क्या नहीं होता.’’

आलोचना के लोचन आजकल दिनरात, बल्कि क्षण-प्रतिक्षण संकट में हैं. आलोचना ही नहीं, हिंदी की पूरी दुनिया संकट में है. दरअसल आधुनिक काल के बाद हिंदी में जो नया काल साक्षात् फट पड़ा है, उसका नाम ही दुर्दशाकाल है. आधुनिककाल के बाद जाहिर है कि बिना किसी ठोस वजह के जिस काल को हिंदी में  लाने की नासमझी की गयी, भला दुर्दशाकाल से अच्छा उसका और क्या नाम हो सकता था ? इस दुर्दशाकाल की कथा बड़ी विचित्र है. मैं पहले यह समझता था कि हिंदी की लंका सिर्फ गोरखपुर में है.

पर अब आलोचना में घुसपैठ करने वाले को देख कर लगता है कि नहीं भाई, हिंदी की  लंका तो गोरखपुर से बाहर भी न जाने कहाँ-कहाँ मौजूद है. ये लोग आलोचना की पूँछ पकड़कर साहित्य की वैतरणी पार करना चाहते हैं. पर पूँछ तक को पता है कि ये कैसे  आलोचक हैं. एक बार दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार-लेखकमित्र ने पूछा था कि  कविता की जान लेने के सौ तरीके’’ नामक किताब कहाँ  से छपी है और किसने लिखा है ? दरअसल बड़े भोले हैं मित्र. उन्हें बताया  गया कि इस किताब को लिखने और उसे देखने वाले सज्जन सिर्फ नाचीज छोटे  सुकुल हैं. छोटे सुकुल का सौभाग्य कि वे ‘‘आलोचना की जान लेने के सौ  तरीके’’ नामक किताब के भी लेखक और पाठक सिर्फ वही हैं. छोटे सुकुल और  मुझमें कुछ भी बंटा हुआ नहीं है, इसलिए सौभाग्य मेरा भी. पर यह सौभाग्य भी कितना बदनसीब है जो हिंदी आलोचना के दुर्भाग्य से जुड़ा है.

असल में मैं करूँ भी तो क्या. आलोचना के बाड़े में अनधिकृत रूप से हाल ही में धुस आया एक पट्ठा तो बहुत ही बलबलाया हुआ है. खूब उत्पात कर रहा है. अपने थूथन से आलोचना की मिट्टी खोद-खोद कर आलोचना का घर ढहा देना चाहता है. इतना ही नहीं, बड़े से बड़े नामवर आलोचकों को अपने थूथन से उठा कर पटक देना चाहता है. पर मैं क्या कर सकता हूँ. अफसोस कर सकता हूँ. प्रतीक्षा कर सकता हूँ. बहुत हुआ तो कुछ कह सकता हूँ. कहे बिना रह भी तो नहीं सकता. इसलिए कहना जरूरी है.

कविता के इस छोटे-मोटे कार्यकर्ता की पुतलियाँ अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गयी हैं. पर आलोचना के लोचन का  संकट तो फिर भी ज्यों का त्यों है. आलोचना क्या है? जैसा लेख है नहीं और मुझे लिखना है कि आलोचना क्या नहीं है? बड़े सुकुल जी से नामवर आलोचक तक ने यह तो लिखा कि कविता क्या है ? पर यह नहीं लिखा कि ‘‘आलोचना क्या है’’?  कविता क्या है? यह लिखा गया था, इसलिए मुझे यह बताने में तनिक भी दिक्कत नहीं हुई कि कविता क्या नहीं है ? पर आज दिक्कत है.

असल में बड़े सुकुल जी से लेकर आज के बड़े आलोचकों तक ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि गोरखपुर, दिल्ली, कोलकाता इत्यादि तमाम शहरों में आलोचना में भी सूरदास आ जायेंगे. बड़े सुकुल जी जानते थे कि सूरदास सिर्फ कविता में आते हैं. यह जानते कि साहित्य के दुर्दशाकाल में आलोचना में भी फट पड़ेंगे तो जरूर लिख जाते कि ‘‘आलोचना क्या है’’ ? यह जो समय है, कई अतियों और व्याधियों और आलोचना के मान के टूट-फूट का समय है.  तुर्रा यह कि आलोचना के बादशाह हमी हैं. आमवर-नामवर आलोचक क्या चीज हैं. आलोचना भी जिनकी दासी है. कान पकड़कर सभा में उठायें-बैठायें. पहले के आचार्यों की ऐसी-तैसी. कहते रहें कि ‘‘आ समन्तात् लोचनम् अवलोकनम् इति आलोचनम्.’’ और तो और पहले के आचार्य कहते रहें कि कविकर्म को प्रकाश में लाना ही ‘‘भावयित्री प्रतिभा’’ अर्थात् आलोचक की प्रतिभा है.

पुराने आचार्य कहते रहें कि ‘‘यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें तो आलोचना को उस को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा.’’ बाहर के भी आचार्य कहते हैं तो कहते रहें कि ‘‘कला जीवन की सजगता है तो आलोचना कला की सजगता.’’ बहुत से आचार्यों ने आलोचना के बारे में बहुत कुछ कहा है. पर किसी ने यह नहीं कहा है कि आलोचना कला और साहित्य से बाहर की चीज है. सबसे बड़ा संकट आलोचना के लोचन के सामने आज यही है. आज आलोचना की दुनिया में कुछ झूठमूठ के ऐसे लिक्खाड़ आलोचकों का प्रादुर्भाव हुआ है, जिनके सामने आलोचना में बड़े से बड़ा भाड़ झोंकने वाला भी शर्मिन्दा हो जाय. ऐसे लोगों की वजह से ही ‘‘आलोचना की हत्या के सौ तरीके’’ नाम की किताब आयी है. ऐसे ही लोग आज नामवर आलोचक को अनेक मुख से फूँककर उड़ा देना चाहते हैं. मैं परेशान हूँ कि ‘‘कविता क्या है’’ की तरह ‘‘आलोचना क्या है’’ शीषर्क लंबा लेख बड़े सुकुल जी से लेकर नामवर आलोचक तक ने लिखा क्यों नहीं?

किससे कहूँ कि भाई संकट की घड़ी है, आपका ही विद्यार्थी बौराया हुआ है, जल्दी से ‘‘आलोचना क्या है’’ लिख दीजिए. नामवर आलोचक ने तो खैर क्रिकेट के खिलाड़ियों की तरह लिखने से संन्यास ले लिया है, सो अब वह लिखने से रहे. फिर किससे कहूँ, ‘‘ससुरा आलोचक’’ से कहूँ कि अपने जनपद के आलोचना के किसी गद्दार से कहूँ कि पांडे जी से ही कहूँ कि अब बहुत हो गया, लिख दीजिए कि आलोचना क्या है? लिखिए तो ऐसे कि बात बन जाये.

बड़े सुकुल जी की ‘‘कविता क्या है’’ के सामने रखा जाये. बहुत परेशान  हूँ अरुण! कि क्या  आलोचना किसी कृति को देखना और उसके मर्म तक पहुँचने की रचनात्मक प्रक्रिया नहीं है  फिर क्या है आलोचना ? आलोचक यह नहीं करेगा  तो क्या करेगा ? कहाँ भाड़ झोंकेगा ? आलोचक के बारे में, उसकी भावयित्री प्रतिभा के बारे काफी कहा गया है. आलोचक में जिन चीजों को खासतौर से  रेखांकित किया गया है,  उनमें बहुपठित होना तो है, लेकिन  तीक्ष्ण अन्वीक्षण बुद्धि के साथ-साथ मर्मग्राहिणी प्रज्ञा का होना भी बेहद जरूरी  माना गया है. शायद पहले तो वही होना जरूरी है. जिस आलोचक मे मर्म तक पहुँचने की कला होगी भला वह वज्रमूर्ख कैसे होगा ? हरगिज-हरगिज वज्रमूर्ख नहीं हो सकता. थोड़ा-बहुत हो तो कह नहीं सकता.

मुश्किल यह है कि आज आलोचना के लोचन के सामने संकट ऐसे ही लोगों ने अधिक खड़ा किया है, जिनमें कृति के सामने खड़ा होने की न तो कूवत है और न समझ. भला अपने समय की रचनाशीलता सेडर कर किसी उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव पर जाकर उत्तर-उत्तर या दक्षिण-दक्षिण चिल्लाने वाले लोग आलोचक हो सकते हैं ? आलोचक तो दूर, ये हिंदी के भड़भूजे भी नहीं हो सकते कि ठीक से भाड़ ही सही झोंक तो सकें. 
     
कुछ लोगों में छोटे-छोटे स्वार्थों को लेकर खूब गुस्सा है. कोई जे.एन.यू. नहीं पहुँच पाया, चाहे डीयू नहीं पहुँच पाया तो अब नामवर आलोचक को धरती पर रहने नहीं देगा.पुरुषोत्तम क्यों प्रिय शिष्य हुए या कोई और क्यों प्रिय शिष्य हुआ? खफा. पतलून से बाहर हो जायेंगे. अरे भाई किसने रोका आपको कि आप प्रिय शिष्य न बनें ? मैंने  किसी गुरु-फुरु का प्रिय शिष्य होने की कोशिश नहीं की. मेरी एक कविता है- ‘‘जब मुझे मेरे गुरु ने बर्खास्त किया’’  

मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ
न पसीना छूटा, न लड़खड़ाए मेरे पैर
सब कुछ सामान्य था मेरे लिए
जब मुझे मेरे गुरु ने बर्खास्त किया
और बनाया किसी खुशामदी को अपना
प्रधान शिष्य.
बस इतना हुआ मुझसे
कि मैं बहुत जोर से हँसा.
  
मैंने अपने पहले कविता संग्रह की गुरु सीरीज की दस कविताओं में से एक  कविता को न चाहते हुए भी प्रसंगवश दिया है.  

नामवर जी का प्रधान शिष्य बनने की आकांक्षा की विकलता और विफलता में एक बड़े काव्यालोचक के रूप में खुद को सामने लाना चाहिए था. नामवर जी को  मार्क्सवादी समझने से पहले उन्हें साहित्यवादी के रूप में देखना चाहिए.  क्या साहित्य मार्क्सवाद के भीतर है या मार्क्सवाद साहित्य के भीतर मुक्तिबोध मार्क्सवाद को ईमानवाद से क्यों जोड़ते हैं और दूसरे कथित आलोचक  ईमानवाद से दूर क्यों रहते हैं. ईमानवाद को भूल-गलती कविता के संदर्भ में देखें, जहाँ ईमान जंजीरों जकड़ा हुआ है. यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि नामवर  की आलोचना बेशक करें पर पहले यह तो देख लें कि आप के भीतर नामवर जैसा  क्या है और क्या नहीं?

मैं खुद नामवर जी की आलोचना करता हूँ, पर जिन संदर्भों में करना हूँ वहाँ अपने गिरेबान को बचा कर रखता हूँ. बात थोड़े में कहना चाहता हूँ, इसलिए संक्षेप में कि नामवर जी के उस गुण को भी देखा जाना चाहिए जिसका उदाहरण काशीनाथ जी के साथ बातचीत में मौजूद है. नामवरजी ने उस बातचीत में स्वीकार किया है कि फणीश्वरनाथ रेणु के महत्व को समझने में मुझसे भूल हुई, देर से समझा. अपनी गलतियो को स्वीकारने का यह बड़ा जज्बा नामवर जी का प्रधान शिष्य बनने की पंक्ति में लगे हुए लोगों के भीतर शायद नहीं है कि वे अपने साहित्यिक अपराधों को स्वीकार कर सकें. दूसरी बात, नामवर स्वाभिमानी लेखकों की मदद करने वाले लेखक हैं, उनकी पीठ में छुरा भोकने  वाले लेखक नहीं. बेशक नामवर जी का उत्तरार्द्ध अच्छा  नहीं है, लेकिन उनकी आलोचना की भाषा का जिक्र इस लेख में है, वैसी भाषा या उससे अच्छी भाषा और काव्यालोचना का उससे अच्छा उदाहरण नामवर जी का प्रधानशिष्य बनने की आकांक्षा करने वाले शिष्य लेखकों में होना चाहिए या नहीं ? नामवर जी की आलोचना की जाय, लेकिन उससे पहले अपने बारे में भी विचार कर लिया जाय कि कविता और कथा की आलोचना में हम कहाँ खड़े हैं

आप देखें कि आज का झूठमूठ का आलोचक कितना अहंकारी है कि वह सोचता और मानता है कि वह जो कर रहा है, वही आलोचना है. उसे कोई रोक नहीं सकता है. क्योंकि यह लेख तो भी लिखा ही नहीं गया है कि ‘‘आलोचना क्या है’’. क्या बड़े सुकुल जी से लेकर नामवर आलोचक तक ने जिस एरिया को छोड़ दिया है, वह सचमुच आलोचना की चौहद्दी में है ? क्या मीडिया  हिंदी आलोचना का हृदयप्रदेश है? कि रचनाविहीन स्त्रीविमर्श या  दलितविमर्श हिंदी आलोचना का हृदयप्रदेश है? क्या विमर्श ही आलोचना है?  क्या ज्ञान का साहित्य और समाजविज्ञान का अध्ययन हिंदी आलोचना है? महावीर प्रसाद द्विवेदी और बड़े सुकुल जी काम ‘‘सम्पत्तिशास्त्र’’ और  ‘‘विश्वप्रपंच’’ तक सीमित है?  ‘‘कवि कर्तव्य’’ और ‘‘कविता क्या है’’ निबंध किसने लिखा है भाई? उत्तर  आधुनिकता पर तो गोरखपुर के राजनीतिशास्त्र के एक वयोवृद्ध आचार्य अच्छा  बोलते और लिखते हैं ? क्या यही हिंदी आलोचना है? बस? स्त्रीविमर्श और  लिंगभेद पर समाजविज्ञान के कई आचार्य  अच्छा बोलते और लिखते हैं. फिर  हिंदी का आलोचक होने का क्या अर्थ है? रचनाविहीन  लोचना कम से कम हिंदी आलोचना न कभी थी और न है और न होगी.

हिंदी में उर्दू और  अंग्रेजी के लोग काम करते हैं. रचना और आलोचना दोनों में. फिर जिसे सिर्फ और सिफर् उत्तर आधुनिकता या स्त्रीविमर्श का होमगार्ड बनना है, वह समाजविज्ञान अहाते में क्यों नहीं जाता? आलोचना का कार्यकर्ता बनना है या कुछ और, पहले तय तो कर लो भाई. मीडिया का मीडियाकर बनना है तो भी तय कर लो कि क्या यह आलोचना का क्षेत्र है या नहीं? कभी पत्रकारिता और साहित्य में  जो बहनापा था, वह आज नहीं है

नामवर आलोचक से टकराने का अर्थ यह नहीं कि आप यह कहते फिरें कि उसने अमुक को नौकरी दी, अमुक को नहीं. अमुक को प्रधानशिष्य बनाया, अमुक को नहीं. यह आलोचना का विषय नहीं है. यह हिंदी की लंका का विषय है.

छोटे सुकुल ने अभी इस किताब को खैर लिखा तो नहीं है, पर बेवकूफियाँ ऐसे ही बढ़ती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब लिख मारेंगे कि ‘‘नामवर आलोचक से कैसे टकराइए’’. क्या किस तरह कीजिए. ‘‘रचना, आलोचना और पत्रकारिता’’ नामक आलोचना की किताब में एक लेख है- ‘‘कविता का चाँद और आलोचना का मंगल’’. उसमें नामवर आलोचक से टकराने का उदाहरण मौजूद है.नामवर आलोचक को विवेकच्युत समझना ऐतिहासिक भूल होगी. नामवर आलोचक की भावयित्री प्रतिभा को अदेख करना अपने लोचन को ही नहीं बल्कि अपनी पूरी पीढ़ी को शर्मिन्दा करना होगा. प्रतिभा होना और बात है और बेईमान होना और बात है. अभी हाल में ही मैंने अपने समय की आलोचना में ईमान, साहस और धीरज की कमी की बात की है. ऐसा इसलिए कि आज हमें आलोचना के दिग्गज बेईमानों से संधर्ष करना है. उनके प्रमोट करने के धंधे के खिलाफ लड़ना है. इसलिए उन्हें वहीं-वहीं और वैसे-वैसे ही घेरना है.

नामवर आलोचक कहेंगे कि अबछंद  की वापसी का समय आ गया है. छंद रामबाण है. छंद महान कविता की गारंटी है. कविता का जीवन है छंद. इस मुद्दे पर घेरने के लिए नामवर आलोचक से पूछना पड़ेगा कि भाई छंद महान कविता की गारंटी है तो आपके निकट संबंधी  तो गीतों से कविता की दुनिया में आये हैं, वे क्यों नहीं महान कवि बनने के लिए छंद में लिख रहे हैं. नई पीढ़ी को क्यों उल्टा लटका रहे हैं? क्या इसलिए नहीं कि किसी छल छंद वाले कवि को प्रमोट करना है, इसलिए यह झूठ बोल रहे हैं. आखिर छंद में ‘‘रामचरितमानस’’ भी है और ‘‘रामचंद्रिका’’ भी. पर  ‘‘रामचंद्रिका’’ जन-जन का कंठहार नहीं है. आशय यह कि छंद में अच्छी कविता भी होती है और खराब कविता भी. उसी तरह छंदमुक्त कविता में अच्छी कविता भी होती है और खराब कविता भी. सवाल छंद और छंदमुक्त का नहीं है. सवाल अच्छी कविता और खराब कविता का है. ऐसे पकड़िए हाथ. शेर की तरह. हाथी मत बनिए. यह सिर्फ अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए. ऐसा आप तब करेंगे, जब आपकी आलोचना के केंद्र में रचना होगी. आप सिर्फ विचारधारा का हाथी लेकर घूमिएगा तब तो आप कर चुके आलोचना. विचारधारा बुरी चीज नहीं है. उसे बुरी चीज मत बनाइए.

विचारधारा को ताकत बनाइए, कमजोरी नहीं. सिर्फ विचारधारात्मक लेखन आलोचना नहीं है. आप हिंदी के किसी भी बड़े आलोचक को देख लीजिए. ये छुटभैये हैं, जिनके पास भावयित्री प्रतिभा नहीं है. ये सिर्फ विचारधारा के हल्लाबोल से हिंदी का जग जीतना चाहते हैं. है न वज्रमूर्खता की बात. प्रतिभा और ईमान के साथ आइए मैदान में. घेरिए महाबली को. कहिए कि लेखक संघ के आजीवन अध्यक्ष पद को छोड़िए. लेखक संधों के जरिए साहित्य का भ्रष्टाचार खत्म कीजिए. कहिए कि प्रमोट करने का धंधा बंद कीजिए. प्रमोटी कवियों को घेरिए. उन्हें उनका सच बताइए. आलोचना का आईना दिखाइए.

ऐसा आप तब करेंगे, जब आलोचना में आप कहीं खड़े होंगे. अपने पैरों पर. परजीवी नहीं होंगे. आपकी अपनी छाप आलोचना में दिखेगी. अरे भाई जब चोर की हथेली की छाप दरवाजे पर पड़ जाती है तो आप तो प्रतिभाशाली हैं आपकी छाप आपके लिखे में नहीं दिखनी चाहिए ? एक निजी छाप हर बड़े आलोचक और रचनाकार के पास होती है. विचारधारा में भी सभी भूसा नहीं तौलते हैं. मुक्तिबोध प्रेम के प्रतीक चाँद को अपनी कविताई से उल्टा लटका देते हैं. उसे पूँजीवाद का प्रतीक बना देते हैं.

कहते हैं, चाँद का मुँह टेढ़ा है
. ऐसे ही कुछ अपनी आलोचना में कीजिए. मुझ रचना के कार्यकर्ता को जब-तब आलोचना के मैदान में आने के लिए विवश मत कीजिए. मुझे अपना काम करने दीजिए. आप आलोचक हैं तो अपना काम अच्छी तरह कीजिए. साहित्य में कोई किसी को अपना उत्तराधिकारी नहीं घोषित करता. कुर्सी को छीन कर बैठना पड़ता है. जो नामवर आलोचकों की गोद में बैठते हैं, वे जिन्दगी भर अँगूठा चूसते रह जाते हैं. वयस्क बनना होगा . शमशेर ने मुक्तिबोध को मर्द कवि कहा था. आप भी साहसिक आलोचक बनिए. खरे लेखकों के साथ रहिए. अफसोस, आज के आलोचक के पास अकेले चलने का तनिक भी साहस नहीं है. आलोचक ही नहीं, सभी लेखकों के पास. किसी को विचारधारा का साथ चाहिए, किसी को लेखक संगठन का, किसी को किसी गुप्त समूह का. आलोचना का काम है सच का आईना दिखाना. आलोचना के सच का आलोक जब आलोचकों के पास नहीं होगा तो वे अपने समय के अँधेरे से क्या खाक लड़ेंगे ?...

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प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दी.द.उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
संपादक: यात्रा साहित्यिक पत्रिका
ई पता: yatra.ganeshpandey@gmail.com