रंग राग : निदा फ़ाज़ली

Posted by arun dev on जून 08, 2012












वेद उनियाल राजनीति, पत्रकारिता, खेल, गीत-संगीतनृत्य   और फिल्मों से जुडी चर्चित हस्तिओं पर एक किताब तैयार कर  रहे हैं. अब तक आपने समालोचन पर मुकेश और नौशाद पर उनके संस्मरणात्मक आलेख पढ़े. 
अब प्रस्तुत है मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली पर उनका दिलचस्प आलेख. निदा को जानने समझने की यह एक आत्मीय कोशिश है.


निदा : मैं रोया परदेश में                                       
वेद विलास उनियाल



निदा फाजली की शायरी बहुत सरलता के साथ अपनी बात कह जाती है. वे जमाने के शायर है. कबीर ने जिस रहस्यवाद और फक्कड़पना का तानाबाना बुना, वह उसी परंपरा में खड़े नजर आते हैं. यह जरूर हैं कि दुनियावी रिश्तों में भी वह समरस हो जाने की कोशिश करते दिखते हैं, लेकिन उनके अंतर्मन में कोई ऐसी लहर उठ जाती हैं कि वे फिर अपनी राह चल देते हैं. फिर लगने लगता है कि भले वह  कहें कि "अपनी मर्जी से कहां, अपने सफर के हम हैं, हवाओं का रुख जिधर है उधर के हम हैं," लेकिन करीब से  महसूस करने  वालों को वह मतवाला ही लगते हैं. जिंदगी को अपनी तरह से जीने वाले. जिंदगी को जिस तरह जी लिया, उसी से वह अनगिनत मोती समेट लाए हैं. निदा का अर्थ है आवाज. उनका पुकारना कई तरह से सुना जाता है. कभी स्कूल जाते हुए बच्चों को देखकर, कभी मां की अनुभूतियों को याद कर, कभी अपनों को तलाश करते हुए उनकी भावुकता पन्नों में उतर आती है.

वह कबीर की परंपरा से भी इसलिए जुड़ जाते हैं कि वह कह सकते हैं"सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर, जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फकीर."  न जाने उनसे कितनी बार सुना गया...."जादू टोना रोज का, बच्चों का व्यवहारछोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार. बच्चा बोला देखकर  मस्जिद आलीशान, अल्ला तेरे एक को इतना ब़ड़ा मकान."   निदा आवाज देते हैं तो उसे गौर से सुना जाता है. उन्हें जब भी पाया गहरी आत्मीय से भरे हुए पाया. जो उनसे छूटाउसे उन्होंने अपनी जतन से जोड़ी हुई दुनिया में  पाने की कोशिश की. जब भी मन भीगा, कोई नई पंक्ति निकल आई. वो न तो पूरी तरह सूफियाने हैंन पूरी तरह सांसारिक. मगर गूढ़ा खूब है. जीवन की संवेदनाओं को उन्होंने ऐसे शब्द दिए हैं कि उन्हें बार बार पढ़ा और सुना जाता है. जीवन को देखने का उनका तजुर्बा अलग है, वह कह देते हैं"सीधा साधा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान."


निदा जी तब खार में रहते थे. उनसे पहली बार मिलने जा रहा था  तो मन में ज्यादा कौतूहल नहीं था. सच कहूं  तो तब उनके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था. साहित्य की धुनी रमाने वाले तमाम साथी उनके बारे में  खूब चर्चा किया करते थे. तब इतना ही पता था कि वह कोई दिलचस्प व्यक्ति हैंजिनसे मिलने के लिए साथी लोग आए दिन चल पड़ते हैं. ऐसे ही एक रोज मैं भी चल दिया. या कह सकते हैं कि मुझे साथ में ले जाया गया. मैं उनके बारे में कई तरह से सोच रहा था. न जाने उनका अपना जमावड़ा किस तरह का होगा. मेरे आने को किस तरह लेंगे. मैंने  उनका लिखा  बहुत सरसरी तौर पर पढ़ा था. यह संकोच और डर भी स्वाभाविक था कि कहीं  कुछ पूछ न बैठें. अगर कोई उत्सुक्ता थी तो यही कि पहली बार एक शायर के मिजाज को बहुत करीब से देखने का अवसर मिल रहा था.  निदाजी की शायरी गजल के बारे में तब भले न जाना हो, पर शायरों की फाकामस्ती, बिंदासपने को लेकर चर्चे, किस्से खूब सुने थे. क्या निदा भी कुछ ऐसे ही होंगे, यह सोचते हुए यह पता न चला कि  कब दो मंजिल की सीढ़ियां चढ़ते हुए  उनके घर में प्रवेश कर गए.  आइए, आज  कुछ नए भी हैं. हमारी नमस्ते से पहले उन्होंने यह कहकर वातावरण को सहज बना दिया. परिचय और घुलने मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा. बातों का सिलसिला. यहां-वहां की बातें. पहले ही दिन चुप मैं भी नहीं बैठा. कुछ ऐसा जरूर कह गया कि वह अगली बार जब भी टोले को बुलाते तो यह कहना नहीं भूलते कि उसे जरूर ले आना. उनका स्नेह एक बार मिला तो फिर मिलता ही रहा.

यह भी समझ में आ गया कि वे जितने बड़े शायर हैं उतने ही बड़े महफिलबाज भी.  बहुत प्यार से आगवानी करते हैं और जी भर कर दुलार उड़ेलते हैं. यह भी जान लिया कि उनकी महफिलों का मतलब है किस्सेचर्चे, साहित्य की बातें, कुछ गासिप, चुहुलबाजी, सामयिक विषयों पर चर्चाएं, राजनीति की भी बातें. साथ ही  घर में ही मशीन पर तैयार सोडा के साथ कांच के नक्काशी वाले  सुंदर गिलासों में भरती शराब, उनकी खुद की तैयार की हुई कोई नानवेज डिस और रोटी बनाने की मशक्कत से बचने के लिए पास की ब्रेकरी से मंगाए हुए पॉव. उनके घर में निंदा रस की भी गुंजाइश  रहती थी. इसके चपेट में कवि, समीक्षक, साहित्यकार, फिल्म जगत और अखबारी लोग ही आते थे. या फिर कथित सांप्रदायिक आचरण वाले लोगों पर गुस्सा बरसता था. कभी गीत संगीत शायरी भी होती. जब उनकी इच्छा हो तो राजनीति पर भी बातें होती.  निदाजी के घर पर देर शाम शुरू होने वाली ये महफिलें देर रात तक चलती. उधर हमारी  नियत समय वाली चर्चगेट से विरार की लोकल ट्रेन छूटतीइधर हम निदाजी से कभी पांव छूकरकभी हाथ हिलाकर विदा ले रहे होते. निदाजी की आवाज गूंजती, अच्छा जी, फिर आइएगा. निदाजी के अलग-अलग शामें रही होंगी, लेकिन उनमें कुछ शामें हमारे लिए होती थीं. अपनी तरह से सजी हुई.  कोई कह भर दे कि शायर-ए- आजम ने बुलाया है, सब कुछ भुला दिया जाता था. शाम फिर कहीं और नहीं गुजरती थी.
       
वो शामें याद करने लायक है. पर निदाजी केवल उन शामों से ही याद नहीं आतेउनका साथ बहुत सी अनुभूतियों से भरा हुआ है. छोटी बड़ी मुलाकातों में ही वह हमारे लिए अभिभावक की तरह हो गए थे. हम उनसे बहस भी कर सकते थे. उनकी किसी धारणा से संतुष्ट न हो तो बेबाक कह भी सकते थे. कभी आड़े तिरछे बहस चलती तो कई बार हमसे सहमत न होते हुए भी वह कहते, इसे कहने दो, रोको मत. उनका इशारा होताबोल, बोल.  हमें और कहने की छूट मिल जाती. निदाजी की बैठने की जगह खास होती. वह अपनी दीवान में बैठते. बाकी लोग अपनी- अपनी जगह चुन लेते. यह शामें साल दो साल नहीं, सालों चलती रहीं. निदाजी का बुलाना नहीं छूटा और हमारा जाना नहीं रुका.


निदा के घर में अपनापन मिला.  उनके पास जाना शुरू हुआ तो मुंबई को परदेश कहना भी छूटा. दूर पहुंच कर जब मुल्क की याद सताती है तो ऐसे ठिकाने आपको वहां के माहौल से धीरे धीरे अभ्यस्त करते हैं. निदा के पास यही अपनापन मिला. रिश्तों की समझ बढ़ी.  ​निदाजी के लिखे को गौर से पढ़ना शुरू किया. उन्हें सुना भी.  महसूस करता रहा कि विभाजन की त्रासदी का वह रह-रह कर जिक्र करते हैं. मां की छाया को याद कर वह मन ही मन सिसकते हैं. बचपन को वह हमेशा अपने पास रखते हैं.  ग्वालियर की यादों में तरबतर रहते हैं तो लाहौर  के प्रसंग उनकी आंखों में चमक ला देती है.

शुरू में ही एक दिन उन्होंने कहा, तुमने मीरा को पढ़ा है.  मैंने जिनता पढ़ा था और जिस तरह पढ़ा था उसके आधार पर जवाब मेंनहीं कहा. उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी. पर शायद यही कहना चाह रहे होंगे कि कविता की समझ मीरा से शुरू होती है. उनकी संगत में यही पाया कि वे उपदेशक नहीं हैं, पर देर की बैठकों में बीच-बीच में कुछ ऐसा कह देते थे कि बात गहरे मन में उतर जाए. निदा का साहित्य जीवन का सार बताता हुआ चलता है. आप जितना अंजुल भर सकें भर लें. और उनका जीवन, दुनिया को देख समझने की तहजीब देता है. आप तक पहुंचने के लिए वह आवरण नहीं बनाते, लेकिन अगर थोड़ी-सी परख हो तो निदा समझ में आने लगते हैं.

मैंने देखा कि शायरी गजल लिखने के लिए शायद ही कभी वह अपना खास मिजाज बनाते हों. कब लिखते हैं, पता नहीं चलता.  जब भी नया लेकर आए, उस दिन कुछ देर की संगत के बाद उसे धीरे -धीरे तर्ज मे सुनाने लगते.  हम वाह​!  वाह ! ही करते.  दूसरों को भी खूब सुनते हैं. उनके उसी कमरे में संजय मासूम की नई गजलों को भी सुना गया और धीरेंद्र अस्थाना के उपन्यास की कुछ पन्नों  को भी. उसी जगह कभी उन्होंने मुझेपूरण पंकज, विजय शंकर और हरी मृदल को जगजीत सिंह से भी मिलाया था.  क्षण भर की मगर स्मृतियों में रहने वाली मुलाकात थी वह. इसी घर पर हमने मालतीजी के गजलों को भी सुना. जमघट इस तरह लगता कि अगर साथी लोग प्रेस क्लब में एक साथ नजर न आए तो दूसरे समझ लेते थे कि टोली शायरेआजम के यहां पहुंची होगी.

   
उनके प्रिय पात्र बच्चे हैं. और वो कई तरह से हैं. वे एक घटना बड़ी दिलचस्पी से बताया करते थे. खार- बांद्रा में वो सुबह घूमने जाया करते थे, तो वापसी में एक स्कूल जाती छोटी बच्ची से उनकी मुलाकात होती थी. वह कहती कुछ नहीं थी, पर उन्हें देखकर मुस्कराती थी. इस बच्ची के प्रति उनकी ममता उमड़ती रही. अगर कभी न दिखे तो अजीब लगता. उनका कहना था  उस बच्ची ने उनसे कई पंक्तियां लिखवाई . तब उन्हें लगता था कि सबसे बड़ा सुख यही है कि छोटे -छोटे बच्चे स्कूलों में जाएं. कोई बिना पढ़े लिखे न रहे. वह बच्चों की अपनी आवारगी का सुख समझते हैं. उनकी नादानी को भी चाहते हैं. "बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छू लेने दो, दो चार किताबें पढ़कर ये भी हम तुम जैसे हो जाएंगे." कुछ समय बाद निदाजी की दुनिया में एक छोटी गुड़िया, बिटिया बनकर आई तो उन्होंने एक कविता उस पर भी लिखी. जो बचपन का अभाव था, उसकी कसक बिटिया की झलक दूर करती रही.

 
परिवार का बिछोह जितना रहा, उतनी ही पीड़ा विभाजन की उस रेखा को लेकर रही, जो है तो बहुत बारीक लेकिन उस पर कांटों की चुभन हैं. मुशायरों, शायरी की दुनिया उन्हें पड़ोसी मुल्क में कई बार ले गई. जब अपनी लौ में होते तो कहते, क्या फर्क दिखा यहां और वहां. "इंसान इंसान में हैवान यहां भी वहां भीअल्लाह निगाहबान यहां भी वहां भी." 
    
उनसे हम अक्सर शिकायत करते, आप मुशायरों में बार बार कुछ खास दोहे शायरी ही क्यों पढ़ते हैं, जो नया लिखते हैं उसे क्यों नहीं पढ़ते.  अक्सर इस पर चुप रहते. एक दिन कहने लगे, इसके लिए कुछ सोचा समझा नहीं जाता. कई बार मुशायरों में लगता है कि मैं कुछ सुना नहीं रहा, बस यूं ही कुछ कह रहा हूं. पर जब मैं कहने लगूं, "बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां," तो यह मेरे मन से निकलता है. मैं मुशायरा सजाने के लिए यह नहीं कहता. ऐसे अवसर यदा कदा आते हैं, आप भीग उठते हैं.  वो क्षण याद आता है जब रफी साहब  को गाते हुए देखा था "तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है" ​उन भावुकता के क्षणों को कभी भुला नहीं पाया. ऐसे पल कभी- कभी आते हैं. तब आपका जो खोया हुआ हो उसे याद करते हैं. अथाह दुख के बाद, कुछ चीजें सहारा देती हैं, वह किसी के लिए कविता हो सकती है, किसी के लिए संगीत, कोई आकृतियों में रंगों को भरकर दिल बहला देता है, कोई खुदा को और याद करने लगता है. कभी  यादों का सैलाब बहता है  "मैं रोया परदेश में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार".

इतना जाना उनकी मोहब्बत गहरी है. इस कदर कि उस पर कुछ कहना या पूछना भी ठीक नहीं समझा. बस इतना ही जाना कि जिसे परिवार कह सकते हैं वहां अब एक छत के नीचे तीन लोगों की संगत है. ​अपनी छोटी सुंदर सी दुनिया है.


निदा फाजली के आशियाने में जिंदगी अपने ढंग से इठलाती भी रही.  उनसे सुन सकते थे, "धूप में निकलो  घटाओं में नहा कर देखो, जिंदगी क्या है, किताबों को हटा कर देखो." यह उनका जिंदगी जीने का फलसफा है.  मगर यह भी सोचा कि  वह   इस फिल्म नगरी में अपने लिए ज्यादा काम क्यों नहीं बटोर पाए. वह फिल्मों का मिजाज भी समझते हैं. बीते दौर में राजकपूर से भी उनकी ठीक -ठाक मुलाकात हुई थी. लेकिन फिल्मों में उनके गाने छिटके -छिटके ही रहे. कई बार लगा वह अपने खास मिजाज में, "बदन में सितारे लपेटे हुए" जैसे गीत बखूबी लिख सकते थे. वो भी सोचते जरूर होंगे, लेकिन कभी ज्यादा अवसर न मिलने का अफसोस नहीं जताया. वो भी जानते हैं कि धारा बदल गई है. और जीने की उनकी अपनी शैली है, जो फिल्म की दुनिया में कई मामलों में फिट नहीं बैठती. उनका संतोष यही है कि उनके फिल्मों के लिए लिखे गीत सराहे गए. लोग उनको संजीदा होकर सुनते हैं. गद्य पर उनकी खासी पकड़ रही है. आत्मकथनात्मक भी लिखा, और शब्द चित्र भी. रोचकता बनाए उनके आलेख पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं. यह भी पाया कि किसी  मुशायरा की उनके नाम भर से रौनक बढ़ जाती है. भले वह कुछ पुराना ही दोहरा दें.

"हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना." उन्होंने बखूबी कहा. निदाजी को भी कई तरह से देखा. कभी पिघलते, कभी उमड़ते. मगर कभी -कभार विपरीत हवाओं में भी बहते. उनके आशियाने में कइयों पर प्यार उमड़ता देखा, पर हैरत से  एक बार  गोष्ठी में नीरज के मंच को बिगाड़ने का उनका सुख भी देखा. फिर यही महसूस किया कि थोड़ा बहुत तुनुकमिजाजी चलती भी रहना चाहिए. तभी निदा पूरे होते हैं. उनके व्यक्तित्व को समझने का पैमाना अलग है.

शायरी, गजल से हटकर राजनीति और समसामयिक घटनाओं पर बहसों में भी वह खासी दिलचस्पी लेते रहे हैं. समय पर टिप्पणी भी करते रहे हैं. कभी कभी वह फोन पर इतना कह कर बहस छेड़ते हुए मिल  सकते हैं कि  ये आसिफ जरदारी खाली हाथ आ रहा है, इसके आने से क्या होने वाला है.

चुनाव का समय हो तो  उसके नतीजों पर उनकी दिलचस्प टिप्पणी सुनने को मिल सकती है. वह घटना पर अपनी नजर बनाए रखते हैं. लेकिन कभी- कभी उनमें पूर्वाग्रह भी पाया. नब्बे के दशक में  मुलायम सिंह और लालू यादव पर बाग- बाग थे.  पूरी तरह आश्वस्त थे कि  सांप्रदायिकता के खिलाफ असल लड़ाई  लड़ने के लिए ऐसे ही तेवर  चाहिए. उनके पास इसके लिए अपने तर्क होते थे. मगर इसलिए  राजनीति में घोटा किस तरह लगता है, और बिसात किस तरह से बिछती है, इसके फेर में वह नहीं जाते थे. कह सकते थे कि वे इन चीजों को कभी- कभी साहित्यकविता और मंचीय भाषणों के उपादानों से देखने लगते थे. ऐसे समय में बहस की पर्याप्त गुंजाइश स्वाभाविक थी. मगर खूबी यह भी  कि  वह सब सुनते थे.  आप उनसे किसी पहलू में असहमत हों तो कभी गरजते- बरसते नहीं देखा. हां ! कुछ फीका सा मुंह बनाकर चुप हो जाते थे. फिर माहौल को सहज बनाने के लिए कुछ ऐसा कह देते थे, कि अगले क्षणों में फिर समा बंध जाता. वक्त काफी निकल गया.   निदा की आवाज आज भी सुनने को मिल जाती है, उप्र में ऐसे नहीं जीत सकेगी कांग्रेस.

पिछले दिनों में जाएं तो अयोध्या की बाबरी मस्जिद टूटने का मसला हो या फिर मुंबई में दंगे या फिर जल से तरबतर होता शहरनिदा हर बार मुखर होकर कुछ न कुछ बोले. बाबरी मस्जिद टूटी तो वो भी आहत थे. मगर जब कैफी आजमी 6 दिसंबर की कविता लिख रहे थे तो निदा ने उन स्थितियों से आगे की बात की. इससे उन्हें यहां तक कि  हिंदुओं में प्रगतिशीलों का भी विरोध सहना पडा. तंज भी हुआ. पर निदा डिगे नहीं. वे यही कहते रहे कि पुराना जो हुआ उसे छोड़ अब आगे की सोचनी चाहिए.  वो मुंबई में एक आवाज बनकर रहे. जब भी बोले बहुत बेबाकी से बोले. पर राजनीति के गलियारे में कभी नहीं भटके.
   
वे  कुछ बेपरवाह  हैं. पर कहीं-कहीं  इस तरह कि आपको रास न आए. एक बार कवि लीलाधर जगूड़ी के साथ धर्मवीर भारतीजी के घर जाने का अवसर मिला था. उनकी आपस की साहित्यिक चर्चाओं और कविता पाठ के बीच में  रह- रह कर मेरी निगाह भारतीजी की संपन्न लाइब्रेरी की तरफ चली जाती थी. इसके विपरीत निदाजी के घर पर किताबों को बिखरा हुआ पाता था.  उनके घर की अस्तव्यस्ता यही है कि एक वह किताब, जिसे वह उन दिनों पढ़ रहे होते हैं, आपको सोफे या स्टूल में रखी दिख सकती है. कुछ बेतरतीब से बिखरे पन्ने. ऊपर कांच की अलमारी में धूल सी खाती कुछ किताबें. "दीवारों के बीच"  "खोया हुआ सा कुछ" ​भी वहां रखी होगी, लेकिन सलीके से नहीं, लगे जैसे बस उसे कहीं तो रखना था. हां ! वहां किसी कोने पर आप गालिब का दीवान भी देख सकते हैं. वह पूछने पर आपको बता सकते हैं कि ​उर्दू की वह किताब "मीर" की है. निदाइन नामों को बड़े अदब से लेते हैं. पर  ललक किताबों को पढ़ लेने में जितनी दिखीउन्हें संजोने में नहीं.

उन्होंने कभी प्यार भरे आग्रह को नहीं टाला.  मुंबई भाइंदर वाले घर पर तो आए ही. एक बार देहरादून मुशायरे में आए तो मेरा उनसे घर चलने का आग्रह करना स्वाभाविक था. न जाने कहां कहां के आमंत्रण छोड़कर  वो आए, अपने कवि मुशायरे वाले कुछ साथियों को भी लाए. मैं देहरादून से  कुछ दूर विकास नगर से उनके लिए पहाड़ों में खास कही जाने वाली महासेर मछली लाया. कुछ समय बिताकर  वे मेरी लिए एक अच्छी याद छोड़ गए.

उन्हें तब विचलित पाया जब जगजीत और उनका साथ नहीं रहा. जगजीत उस दुनिया के हो गएजहां से कोई लौट नहीं आता. जिस रोज जगजीत को अग्नि दी जा रही थी, निदाजी से कुछ बातें करनी चाही थी. पर जो कहते थे, उसमें कई बातें  समझ में नहीं आ रही थीं. समझ रहा था कि  निदाजी के ये शब्द,   उस दुःख की प्रतिध्वनियां हैं. समझ रहा था कि  वो जो कह रहे हैं उसे चुपचाप सुनना हैं. कुछ दिन बाद  कहने लगे, उस कमरे को बड़े करीने से सजा कर रखता था जगजीत. बेटे की तस्वीर पर फूल चढ़ाता था, धूप दीप जलाता था. अब तो वो भी नहीं रहा. निदा की अभिव्यक्ति के लिए जगजीत की आवाज गूंजती रही है. निदाजी और जगजीत सिंह का यह मेल अजब है. इसमें रूहानियत है. यह साथ लौकिक अहसास दिलाता है. न  जाने निदाजी में क्या क्या तलाशा. पर उनके पास आकर एक ठहराव मिला. ऐसा ठहराव जिसकी  जिंदगी की रफ्तार में हमेशा जरूरत रहती है. शायरी ने उन्हें शोहरत दी. लोग मिले.  रोशनी भी हुई. लेकिन महसूस करते रहे कि  जिंदगी ने  सब कुछ दिया मगर देर से मिला. सब होने पर भी कुछ बचा है कि निदा कह उठते हैं.
   
सब कुछ है मेरे पास. फिर भी क्या ढूंढती है आंखें.
क्या बात है मैं वक्त पर घर क्यों नहीं जाता.
जो बीत गया वो गुजर क्यों नहीं जाता.
बेनाम सा यह दर्द ठहर क्यों नहीं जाता.

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वेद विलास उनियाल :  वरिष्ठ पत्रकार और लेखक
अमर उजाला से जुड़े  हैं.
vedvilas@gmail.com