परिप्रेक्ष्य : गॉड पार्टिकल का मिथ

Posted by arun dev on जुलाई 07, 2012












विज्ञान के इस खोज़ को 'ईश्वरी कण' कहा जा रहा है. जो खोज़ ईश्वर की सृष्टि निर्माण की अवधारणा को खारिज़ करता है, आख़िरकार उसे ईश्वरी कहने के पीछे मंशा क्या है ?
युवा विज्ञान लेखक मनीष मोहन गोरे का आलेख जो इस अन्वेषण के महत्व और अर्थात पर केंद्रित है.


मनीष मोहन गोरे

एक आंकड़े के मुताबिक़ मीडिया में विज्ञान का कवरेज 3 से 5 प्रतिशत है और यह माना जाता है कि मीडिया द्वारा विज्ञान की ख़बरों को इतना कम तवज्जो देने से ही देश में वैज्ञानिक जागरूकता नहीं आ रही है. मगर ‘गॉड पार्टिकल’ की खोज से जुड़ी खबर को मीडिया ने इतना हाईक दिया कि जितना आइन्स्टाइन के सापेक्षिकता सिद्धांत को नहीं मिला था. कुछ अख़बारों ने तो इस खबर के पीछे चल रहे वैज्ञानिक शोध के स्वरूप और महत्व को उद्घाटित किया मगर अधिकांश अखबारों और इलेक्ट्रानिक चैनलों ने इस खबर को ईश्वर से जोड़कर इसे भ्रामक बनाने में अपनी खल भूमिका निभाई. एक अखबार ने पहले पन्ने पर इस बड़ी खबर को ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ शीर्षक के साथ प्रकाशित किया. वहीँ पश्चिमी मीडिया ने भूलकर भी इसे ईश्वर, धर्म या ज्योतिष से नहीं जोड़ा. क्या भारत में विज्ञान की यही दशा है? विज्ञान की समझ को समाज व जनता तक ले जाने की एक जरुरी कड़ी के रूप में हम मीडिया को देखते हैं मगर क्या वह अपना दायित्व बखूबी पूरा कर रही है ? इसका आंकलन हमें ही करना होगा.

ब्रह्मांड के बारे में अभी तक हम बहुत ही कम जान पाए हैं. अंतरिक्ष, प्रकृति और इनमें चल रही घटनाओं के बारे में अगर हम कहें कि वैज्ञानिक महज 10 प्रतिशत जान पाए हैं तो अभी शेष 90 प्रतिशत जानना बाक़ी है. प्रकृति और पदार्थ के संचलन के पीछे जिन सिद्धांतों को जाना जा चूका है, अभी हमें उसी दिशा में सोचना-काम करना होगा. मगर हो सकता है कि ब्रह्मांड में कुछ और सिद्धांतों पर पदार्थ व सृष्टि काम कर रही हो, जो कि हमारे लिए अज्ञात है. खैर, ये जो ‘गॉड पार्टिकल’ का शोर पिछले दो-तीन दिनों से सुनाई दे रहा है, उसके पीछे पूरे विश्व को द्रव्यमान प्रदान करने वाले मूल कणों में से एक कण के समान कण ‘हिग्स बोसान’ को खोजने की कसरत है. इन हिग्स बोसान कणों के अस्तित्व की वैज्ञानिकों ने कल्पना की है, परन्तु वास्तव में ये कण स्वतंत्र रूप से मौजूद नहीं हैं. सर्न की प्रयोगशाला में इन कणों की जोरदार टक्कर से उत्पन्न असीम उर्जा से ऐसे कण बने हैं. दरअसल वैज्ञानिकों ने सृष्टि की उत्पत्ति वाले बिग बैंग सिद्धांत जैसी परिस्थितियों का कृत्रिम रूप से सृजन कर इन मूल कणों को खोजने के प्रयास किये हैं.

हिग्स बोसान नामक कण का नाम गॉड पार्टिकल रखा गया और पूरी दुनिया में इसका शोर फैलने लगा. दरअसल इस नाम के पीछे लियान लेडरमैन की कण भौतिकी पर केंद्रित लोकप्रिय विज्ञान पुस्तक ‘दि गॉड पार्टिकल: इफ दि यूनिवर्स इज दि आंसर, व्हाट इज दि क्वेश्चन ?’ मगर इस शीर्षक ने इस कण, कण भौतिकी तथा समूचे विज्ञान जगत को पसोपेश में डाल दिया. लेडरमैन के दिए इस नाम से हिग्स बोसान कण के एक खोजकर्ता पीटर हिग्स भी नाखुश हुए थे. हालांकि लेडरमैन के अपने तर्क थे. चूँकि इस कण की संरचना और गुणों को वर्तमान भौतिकी के ज्ञात सिद्धांतों के द्वारा समझ पाना कठिन है इसलिए लेडरमैन को इसे यह नाम देना पड़ा. हालांकि दोष लेडरमैन का भी नहीं था. वो तो उनकी किताब के प्रकाशक ने शीर्षक को रोचक और ध्यानाकर्षक बनाने के लिए इसे गॉडडैम पार्टिकल (Goddamn Particle) से गॉड पार्टिकल बना दिया .

हिग्स बोसान के बारे में बात करने से पहले मूल कणों की चर्चा करते हैं. वैज्ञानिकों ने जब ज्ञात ब्रह्मांड को बनाने वाले पदार्थों की खोज शुरू की तो आरम्भ में परमाणु को पदार्थ की मूल इकाई के रूप में समझा गया. मगर जब यह देखा गया कि प्रकृति में कुछ आवेशित और न्यूट्रल कण हैं जिनसे ये परमाणु बने हैं तब वैज्ञानिक परमाणुओं को रचने वाले कणों की खोज में जुट गए. फिर पदार्थ की रचना करने वाले क्वार्क, लेपटन, फोटान, ग्लूआन, और गॉस बोसान जैसे कणों की खोज हुई. विभिन्न बलों जैसे विद्युत चुम्बकीय बल और नाभिकीय बल को धारण करने वाले ये कण सैकड़ों की संख्या में होते हैं. वैज्ञानिकों ने व्यंग्य में इन कणों के जमघट को पार्टिकल जू (कणों का चिड़ियाघर) नाम दे दिया. कणों के साथ-साथ प्रकृति में इनके प्रति-कण भी पाए जाते हैं.

हिग्स कण एक सघन मूल कण होते हैं जिसे राबर्ट ब्राउट, फ्रैन्कोयिस एन्ग्लर्ट, पीटर हिग्स, जेराल्ड गुराल्निक, सी आर हगेन और टाम किब्ले ने 1964  में खोजा था और कण भौतिकी (पार्टिकल फिजिक्स) में ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित स्टैण्डर्ड माडल की यह एक महत्वपूर्ण कड़ी है. इस कण में आतंरिक तौर पर कोई स्पिन (चक्रण) नहीं होता. चूंकि बोसान कण में भी स्पिन नहीं होता इसलिए इसे हिग्स की श्रेणी में रखा गया. दरअसल हिग्स बोसान को देखने के लिए अतिशय ऊर्जा वाले प्रोटानों की जरुरत पड़ती है इसलिए यह एक ऐसा मूल कण है जिसे प्राकृतिक रूप में कभी पाया नहीं गया और सर्न में चल रहे प्रयोग में 4 जुलाई 2012 को इसी हिग्स बोसान कण को देखने की घोषणा की गई है. यद्यपि इस बात की पुनः पुष्टि करना अपेक्षित है कि वास्तव में ये कण हिग्स बोसान ही हैं.
हिग्स बोसान की प्रकृति को लार्ज हेड्रान कोलाईडर की मदद से समझने के लिए यूरोपियन आर्गनाईजेशन फार न्यूक्लियर रिसर्च में 2010 के शुरू में प्रयोग-परीक्षण आरम्भ हुए थे.

हिग्स बोसान में बोसान शब्द खंड प्रतिभाशाली भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस को प्रकट करता है. बोस ने गैसों के क्वांटम स्टैटिस्टिक्स पर ढाका विश्वविद्यालय में अपना शोध पत्र पढ़ा और बाद में इसे प्रकाशन हेतु एक ब्रिटिश जर्नल में भेजा मगर उसने इस शोध पत्र को प्रकाशित करने से मना कर दिया. बोस ने तब शायद रुष्ट होकर अपने शोध पत्र की प्रामाणिकता जानने के लिए इसे सीधे अल्बर्ट आइन्स्टाइन को भेज दिया. आइन्स्टाइन ने इसे महत्वपूर्ण पाया और इसलिए इसका जर्मन भाषा में अनुवाद कर जर्मनी के एक जर्नल में इसे छपवा दिया. बोस के शोध को विश्व के वैज्ञानिक समुदाय ने तब मान्यता दी जब आइन्स्टाइन ने बोस के कार्य की पुष्टि में वर्ष 1924 में अपना एक संबंधित शोध पत्र दुनिया के सामने रखा. बोस और आइन्स्टाइन के संक्षिप्ताक्षरों को जोड़कर ‘बोसान’ शब्द दिया गया. दरअसल इन दोनों वैज्ञानिकों के शोध से प्राप्त प्रेरणा भी परमाणु से छोटे हिग्स बोसाब जैसे कणों की खोज के लिए उत्तरदायी रहा.

हिग्स बोसान कणों के स्वरूप को उद्घाटित कर वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड की एक गुत्थी को तो सुलझा लिया, परंतु अनेक ऎसी गुत्थियां और भी हैं जिन्हें सुलझाना अभी शेष है.

गुरुत्वाकर्षण एक बल है या दिक्-काल का एक गुण, इसे जानना बाकी है. गुरुत्वीय क्षेत्र के जो कण हैं, उनका अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है और गुरुत्व की तरंगों को भी वैज्ञानिक अभी नहीं तलाश पाए हैं.

न्युट्रीनो कण जिसे भारहीन समझा जाता है, वे एक से दूसरे रूप में परिवर्तित होने के लिए तत्पर रहते हैं. इसका कारण अब तक अज्ञात है.

ब्रह्मांड में पदार्थों के प्रति-पदार्थ मौजूद नहीं हैं. यह एक बहुत बड़ा सवाल है जिसका जवाब हिग्स बोसान के बाद जानना है.

हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने ऐसे पदार्थ को खोजा है जिन्हें बनाने वाले पदार्थ अज्ञात हैं और इन्हें डार्क मैटर नाम दिया गया है. ब्रह्मांड का निरंतर विस्तार हो रहा है और पिछले 8 वर्षों से इस विस्तार की गति बढ़ गई है. ऐसा क्यों हो रहा है, इसका भी कोई सुराग हाथ नहीं लग पाया है. वैज्ञानिक इसका कारण डार्क एनर्जी को ठहराते हैं. मजे की बात है कि यह डार्क एनर्जी दिक्-काल से संबंधित है मगर हमारे ज्ञात गुरुत्व बल के विपरीत है. समूचे ब्रह्मांड का करीब 77 प्रतिशत डार्क एनर्जी है, करीब 19 प्रतिशत डार्क मैटर और बाकी बचा लगभग 4 प्रतिशत ज्ञात पदार्थ और उर्जा है. है न सर घुमाने वाली बात. यानि हमारे वैज्ञानिक अभी तक ब्रह्मांड में जितने पदार्थ और उर्जा को समझ पाए हैं, उसकी मात्रा महज 4 प्रतिशत है और शेष 96 प्रतिशत लगभग अनजाना है जैसे मानव मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों के कार्य और महत्व अज्ञात हैं.

मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि जो कुछ अज्ञात है, उसे हम ईश्वर का सृजन मान लें. जैसा कि हिग्स बोसान की खोज पर भारतीय वैज्ञानिक और विज्ञान संचारक प्रोफ़ेसर यशपाल ने सही कहा कि यह विज्ञान की खोज है, भगवान की नहीं.

विज्ञान के वास्तविक स्वरूप को आम जन के सामने लाना आवश्यक है ताकि समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में आम जन अपने ज्ञान आधारित निर्णय लेने में समर्थ हों.


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मनीष मोहन गोरे : वैज्ञानिक और विज्ञान संचारक
  कई पुस्तकें प्रकाशित
सम्प्रति : वैज्ञानिक, विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार.
ई-पता: mmgore@vigyanprasar.gov.in