परख : आदिम बस्तिओं के बीच

Posted by arun dev on जुलाई 09, 2012












आदिम बस्तिओं के बीच (कविता संग्रह)
नन्द भारद्वाज


प्रकाशक :
विजया बुक्स
नवीन शाहदरा, दिल्ली - ११००३२


प्रथम संस्करण - २०११
मूल्य - १७५ रूपये




समीक्षा : अपर्णा मनोज 
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स्मृतियाँ ::

पश्चिमी राजस्थान के सीमावर्ती हलके में रेतीले धोरों के बीच बसा वह गुमनाम सा नाम -स्मृतियाँ अपने आदिम आकारों में वहीँ से चली आ रही हैं. कवि का कल्प-संसार इसी धरातल से जन्म लेता है और धरती की देह से उठकर कवि की देह में प्रविष्ट हो जाता है. अपनी जीवनचर्या में 'स्थान' अवचेतन में बना रहता है, किसी विवरण के तौर पर नहीं बल्कि कविता के भूगोल की निर्मिति के रूप में. अतीत के पैर केवल पुराकाल की खुदाई में होंगे, किसी ऐतिहासिक खुदाई में होंगे ऐसा नहीं, वे कहीं हमारी शब्दावलियों में गुम्फित हैं..हम पलटकर उन तक लौटते हैं. भाषा में उसका अतीत उतना ही रहता है जितना वर्तमान त्वरित गति से भविष्य को दौड़ता है. नन्द जी की कविताओं से वही आदिम संवाद पाठक का होता है. गाँव के प्रत्यय व्याकुलता और घेर-घुमेर संवेदनाओं के साथ उनकी कविताओं में लौटते हैं. एक घड़ा पानी से संवाद करते हुए कवि गाँव की टोपोग्राफी और उसकी भाषा में तल्लीन दीखता है-

"किसी प्राचीन पर्वत श्रृखला के पार
जितनी दूर भी आ सकें आप-
चले आइये,
रेतीले धोरों के बीच बिखरी बस्तियों में,
जहाँ घरों में एक घड़ा पानी ही
संचित पूँजी होता है,
सूरज,चाँद और सितारे होते हैं
उजास के आदिम स्रोत -" (कविता-एक घड़ा पानी
)

स्थानिकता
सहजता से कविता में अंतर्विष्ट होती है और कवि को अंतर्मुखी बनाती हुई जैसे अपने में गुनगुना रही है-

जानता
हूँ,
ज्वार उतरने के साथ
यहीं किनारे पर ही
छूट जायेंगी कश्तियाँ
शंख-घोंघे -सीपियों के खोल
अवशेषों में अब कहाँ जीवन? (आदिम बस्तियों के बीच
)

महत्त्वपूर्ण बात ये है कि यहाँ कीमियागिरी वर्णन या ब्यौरों की मुहताज नहीं, बल्कि विलक्षण तरीके से वह जीवन के अनुभवों की पुनर्रचना जान पड़ती है, जिसे कवि पूरी इंटेंसिटी और भाषिक आवेग के साथ व्यक्त करना सृजन की जरूरत मानते हैं.

मितबोले
क्षणों में ::

जितनी बार कविताओं से संवाद किया,पाया कि वे हौले-हौले बोलती हैं और जरूरतभर बोलती हैं. गहरा बोलती हैं और पूरे स्पर्श के सुख के साथ बोलती हैं. यथार्थ में जीते हुए उनकी शांत भंगिमा कविता के स्त्री होने को सिद्ध कर देती हैं. ये छिपी हुई स्त्री ही कवि को करुणा और प्रेम का कवि बना रही है.


"आज फिर आई तुम्हारी याद
तुम फिर याद में आयीं -
आकर समा गई चौतरफा
समूचे ताल में... (तुम्हारी याद)

कहीं
निचाट उदासी प्रेम में कुछ सोचते -सहेजते थके पाँव चली आती है-
"और यही कुछ सोचते सहेजते
थके पाँव लौट आता हूँ
उन बीते बरसों की धुंधली स्मृतियों के बीच
गो कि कोई शिकायत नहीं है
तुम्हारे मान से-
फ़क़त कुछ उदासियाँ हैं
अकेलेपन कि अपनी." (तुम यकीन करोगी
)

लोक की मरुगंध से::

लोक की मरुगंध में स्नात स्वैर विन्यास नन्द जी की कविताओं की विशिष्टता है. आप कविताओं तक आइये और वे उनके संस्कृतिकर्मी रूप को बोल उठेंगी. मरुधर में मोरचंग की तरह बजती हुई कविताएँ आस्वाद की बहुपक्षीय रीत से हृदय में उतरती हैं. कितनी ही सुपरिचित संज्ञाएँ हैं, जीवन के दृश्यों -परिदृश्यों की आख्यायिकाएँ हैं जो पाठक से उसी तरह बतियाती हैं जैसे चाँद पर बैठी बुढ़िया की कथा में एक तकली चल रही है, एक चरखा चल रहा है...  बहुत पुराना सूत..धुनता हैकतता हैबुनता है और समकालीन सन्दर्भों की काव्य-जिज्ञासा बन जाता है. काव्य -कौतुक से कहीं अधिक उत्सुकता का भाव यहाँ स्थायी रूप से वास कर रहा है. जटिलताएँ जनविसर्जन में सरल हो रही हैं. भाषा भी इसी सरलता में विन्यस्त हो गई है; दृष्टव्य है कि गंभीरता आद्योपांत इन कविताओं की प्रकृति है, जो इनके लोकवृत को विस्तार दे रही है. जन सरोकारों से सीधा कवि को जोड़ रही है. आंधी-अंधड़ के शोर गुल वाले समय में कवि नैराश्य के स्वर को तोड़ता है. अतियथार्थवाद का संत्रास यहाँ नहीं है, बल्कि जीवन को भरोसे से देखने का भाव है.


"आदमी के हाथ" कविता में नन्द जी माटी में खिलते आदमी के सयाने हाथों को लेकर जहाँ विचलित हैं,वहीँ अंततः आश्वस्त होते दीखते हैं.
"धमाकों से थरथरा उठती है
धरती की कोख-
यह किस तरह की आत्मघाती आग में
घिरता-झुलसता जा रहा है
आदमी!

आदमी
के हाथ-
बंजर में फूल खिलाते हैं."(आदमी के हाथ
)

उलझे
हुए सन्दर्भों बीच साफगोई::

चारों तरफ ढेरों उलझे हुए सन्दर्भ हैं. तो हमारे समय की कविता भी उलझ गई है. कहीं वह यथार्थ के जादू में अपना अस्तित्व तलाश रही है तो कहीं यंत्रणा से गुज़रते हुए असंतोष में जी रही है. कविता का मुहावरा बदला है. तकनीक ने इसे मशीनी कलात्मकता की तरफ धकेला है. नाना प्रयोग हैं. हम मिथ तोड़ने में लगे हैं. अस्पष्ट सी बातें हैं. वाद बहुतेरे हैं. विरोधाभास से हम घिरे हैं. लोकतान्त्रिक मांग है पर पूंजीवाद से पीछा नहीं छूट रहा. बाज़ार की अंतर्छायाएँ लेखक और पाठक में डोल रही हैं. आतंक से उबरे नहीं हैं. संशय बढ़ा ही है. ऐसे में नन्द जी का काव्य-संसार संयत होकर अपनी बात कहता -सुनता दिखाई देता है.

सब कुछ स्तुत्य होगा, ऐसा भी नहीं है;पर खुशामदीद पूछती-चाहती कविताएँ हैं.कवि की चिंताएं समय के सन्दर्भ में अपनी प्रासंगिकता खुद-बखुद सिद्ध कर रही हैं. अपनी कविता "उलझे हुए संदर्भ" में आवाज़ों की जात पर कवि प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं..यहाँ यंत्र बेकाबू हो गए हैं,लोग बाज़ारों में लापता हैं.संचार-व्यवस्था अबूझ संकेतों में उलझी है. ये कैसा विरोधाभास है कि कवि को अटल होकर कहना पड़ रहा है कि


"पिछले कई महीनों से-
दमकलें बाधाओं को कुचलती
बेतहाशा भाग रही हैं,
आवाजाही के सारे कायदे उलट गए हैं
सायरन चीख रहे हैं लगातार
समूचा आसमान धुएँ से भर गया है,
परेशान है (उलझे हुए संदर्भ
)

दूसरी ओर गुमनामियों से निकलकर ये आवाज़ आम आदमी पर केन्द्रित हो जाती है. यहाँ वह विद्रोह करता है और प्रश्न पूछने का साहस रखता है. दमित सवालों की पटभूमि से अनुगूंज सुनाई देती है-

"आदमी तड़प कर पूछता है:
आखिर मेरा अपराध क्या है?
क्यों हर बार मुझे
मरने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है-
निहत्था करके ठेल दिया जाता है
अकाल की हिंसक परछाइयों के बीच
आखिर क्यों
?"
 
रिश्तों
की आंच में::

जीवन की बहुवचनीयता में अकसर हम अंतरंगता और निजता की गंध को भूल जाते हैं और कस्तूरी मृग की तरह भटकते फिरते हैं. ये छीना-झपटी चलती रहती हैउहापोह और ऊब की नावों को अपने सिर पर ढो कर हम नदी तर जाना चाहते हैं. आत्मकेंद्रिता बढ़ती है, विखंडन होता है.कविता हमें इस उचाट जिन्दगी से बचाती है. ऐसी शरण्या है कविता, जहाँ आपको सुकून के पल मिलते हैं. अपनी आवाज़ को जगह मिलती है. अंतर्मुखी होकर आप खुद से संवाद करते हैं. ये भी तो जरूरी है न. गृहस्थी भी हो..परिवार भी हो, रिश्ते-नाते हों पर रहे तो कुछ इस तरह जैसे शब्दों में कविता. संबंधों की आंच पर ईख पके तो गुड़ की डलियाँ बनें. नन्द जी में ये मिठास स्वभावगत है तो कविता में ये मुस्कान की तरह आ गई है.सहज प्रीतिकर अनुभव सोते की तरह बह चले हैं...अनकही हामी के पुश्तैनी रिश्तों को देखता कवि आयास पीढ़ियों के पानी में बहता जाता है-

"इस सनातन सृष्टि की
उत्पत्ति से ही जुड़ा है मेरा रक्त -सम्बन्ध
अपने आदिम रूप से मुझ तक आती
असंख्य पीढ़ियों का पानी
दौड़ रहा है मेरे ही आकार में" (पीढ़ियों का पानी )
पर कवि की प्रीति ऊर्ध्वगामी है. वह बादलों की तरह ऊपर उठती है और फिर सरस जाती है. इसी कविता में कवि कहते हैं-
"मेरे ही तो सहोदर हैं
ये दरख्त ये वनस्पतियाँ
मेरी आँखों में तैरते हरियाली के बिम्ब
अनगिनत रंगों में खिलते फूलों के मौसम
अरबों प्रजातियाँ जीवधारियों की
खोजती हैं मुझमें अपने होने की पहचान
."

संवेदनाओं का ये कवि कहीं-कहीं खूब भावुक हो उठा है. "माँ की याद"ऐसी ही कविता है. बचपन के बेतरतीब दिनों में माँ की आवाज़ पीछा करती है.आंसुओं से विगलित अपने जीवन में उसे केवल एक ही चिंता है, "वह बचाए रखती थी हमें/उन बुरे दिनों की अदीठ मार से/ कि ज़माने की रफ़्तार में/ छूट नहीं जाए किसी का साथ/ उसकी धुंधली पड़ती दीठ के बाहर!"

शब्दों
के सफ़र से:: कुछ खींची तस्वीरें:

कविता के भूगोल की समझ के लिए केवल उसकी संवेदना तक पहुंचना पर्याप्त नहीं. कविता के बरक्स आप उसके शब्दों की अंतर्यात्रा करते हैं. वे मात्र अभिव्यक्ति नहीं हैं..उनमें कहीं विस्फोट है तो कहीं मंथर गति. कभी वे कल्पना के सहारे कविता में अंतरित होते हैं तो कभी तमाम विवरण और घटनाएं उनकी नियति तय कर रही होती हैं. मैं शब्दों को मानव के अवचेतन का हिस्सा भी मानती हूँ:खासकर तब जब आप एक ख़ास दशा में अपना होना देख रहे हैं. अवचेतन स्वप्नों के आवाजाही की विशिष्ट जगह है. यहाँ भारी उथल-पुथल है. बाह्य जीवन के प्रभावों के बिम्ब यहाँ तैर रहे हैं ,जिनसे आपका चेतन सुभिज्ञ  नहीं. अचानक इस मनोजगत में कहीं से विचारों का पत्थर झप से गिरता है और झील आपके लिए खुल जाती है. बाद को वही शांति. ऐसे में शब्द आपकी मदद करते हैं. वे इस तहखाने की अभिव्यक्ति हैं. और अभिव्यक्तियाँ एक तरह का स्थापत्य होती हैं. स्थापत्य में जादू रहता है जो पाठक को खींच कर अन्य जगत में ले जाता हैस्थापत्य विरेचन भी है. कभी केवल मोहविष्ट से आप इसे निरखेंगे तो कभी ये आपको रुलाएगा. जम कर हंसायेगा.

शिल्प अपने तरह की ज्यामिति है. एक ख़ास पैटर्न- जिसमें कलाकार और समय दोनों खूब महत्त्वपूर्ण हैं. देखिये, शब्द एक तरह से सिगमा-5 की तरह काम करते हैं. इनके अपने सिगनल हैं. अपने संकेत..बिलकुल उस तरह जैसे रेडियो एक सुनिश्चित आवृति पर साफ़ सुनाई पड़ता है. ठीक इसी तरह कोई भी विधा अपने संकेतों और पाठक की फ्रीक्वेंसी पर निर्भर भी करती है..इसलिए हम ये बंटवारा करने लगते हैं कि ये साहित्य में शामिल है और ये नहीं. इसके पीछे शिल्पकार का शिल्प ही रहता है.

अब नन्द जी पर. उनकी कविता से गुज़रते हुए राजस्थान का एक ख़ास स्थापत्य आपको आकर्षित करता है. खासकर पश्चिमी राजस्थान की विशिष्ट स्थानिकता. देशज शब्द सायास नहीं आये हैं. वे कवि के चित्त के बहुत करीब हैं. पुस्तक में भूमिका पढ़ते समय एक बात ने पकड़ा-"उदारीकरण की प्रक्रिया में इधर बहुत से बाहरी दबाब अनायास ही बाज़ार में प्रवेश कर गए हैं. यह व्यवसायीकरण जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा करके कहीं अपना पाँव नहीं टिका पाता. इन कम्पनियों को जब अपना उत्पाद आम लोगों तक पहुँचाना होता है,तो वे कोई भारतीय भाषा ही क्या, उन भाषाओँ की सामान्य बोलियों तक जा पहुँचती हैं. यह एक अनिवार्य संघर्ष है, जिसके बीच लोक-भाषाओँ को अपनी ऊर्जा बचाकर रखनी है.साहित्य का काम इन्हीं लोगों के मनोबल को बचाए रखना है." तो कई कविताओं में पाया कि कवि की भाषा राजस्थान की मांस-मज्जा का हिस्सा है. वहां खेजड़ी पर कविता का होना अचरज की बात नहीं बल्कि खेजड़ी पेड़ का नाम आते ही एक सजग पाठक के तौर पर आप खेजरली तक पहुँच जाते हैं. अमृता देवी जिक्र न होते हुए भी इस वृक्ष में शामिल रहेंगी. मैंने ख़ास ये महसूस किया. इसका कारण मेरी अपनी जड़ें गहरे तक राजस्थान से जुडी होना हो सकता है. तो ये ख़ास स्थापत्य है, जो हर पाठक को अपने तरह का सुख देता है.कितनी स्थानिक संज्ञाएँ हैं जो कविता में रच बस गई हैं.. बार-बार टीबे आते हैं. बावड़ियाँ हैं.आंधियां हैं. टेराकोटा के घड़े हैं.कुल धारा है, उजाड़ हवेलियाँ हैं..

एक जगह  जब कवि कहते हैं,"उसी निश्छल हंसी में चमकते हैं/ चाँद और सितारे आखी रात तो मैं यकायक चमक जाती हूँ..क्योंकि ये आखा शब्द कितने महीनो के बाद सुना..ठेठ मेरा अपना. कितने ही लोक गीतों में ये शब्द आया होगा. इसी तरह कविता "घर तुम्हारी छाँव में" एक शब्द 'जीवारी' की पुनरावृत्ति हुई है. इन शब्दों का होना मुझे अपने स्थान से जोड़ता है.


कई कविताएँ हैं जहाँ कवि के अवचेतन से आपकी मुलाक़ात होती है और आप ठिठक जाते हैं.. ये तो अपना सा लागे का भाव मुस्करा उठता है."बच्चे के सवाल" एक ऐसी ही कविता है, जो आपको बचपन में ले जायेगी..

कुल मिलाकर कवि का अपना मुहावरा, जैसा की नवल किशोर जी ने कहा है-"उनकी कविताएँ एक विशेष मरुगंधी पहचान देती हैं... मुझे सौ फीसदी सही लगता है.


पुस्तक
और कविता पर ::खोज ली पृथ्वी
"तुम्हारे सपनों में बरसता धारोधार
मैं प्यासी धरती का काल मेघ होता

लौटकर
आता
रेतीले टीबों के अधबीच
तुम्हारी जागती इच्छा में सपने आंजता" (खोज ली पृथ्वी )
कविता के सत्त्व रूप में उपर्युक्त पंक्तियाँ मैंने बतौर पाठक बचा कर रख ली हैं.

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