सबद भेद : अज्ञेय और मैं : आशुतोष भारद्वाज

Posted by arun dev on जुलाई 12, 2012

चित्र : ओम थानवी के सौजन्य से 







परम्परा से परे जाने के लिए भी परम्परा को पार करना होता है. धँस कर गहरे अंदर. कलाओं में इसी लिए घर, घराने और परम्पराएं होती हैं. युवा कथाकार आशुतोष भारद्वाज का लेख अपनी लेखन की जड़ों की तलाश में अज्ञेय तक जाता है. आशुतोष को अज्ञेय आत्मलिप्त आख्ययाक लगते हैं. शेखर एक जीवनी और नदी के द्वीप जैसे उपन्यासों से होते हुए यह लेख अज्ञेय को एक अलग आयाम से देखता है. इस तरह देखने को भी मूल्यवान मानते हुए समालोचन की यह प्रस्तुति. 

कोई आहट नहीं                                        
आशुतोष  भारद्वाज

क लेखक और सामान्य पाठक के पाठ में बुनियादी भेद है. किसी रचना से गुजरते वक्त उनके सरोकार भिन्न होते हैं. लेखक, खासकर उन लम्हों में जब वह उस विधा में रची कृति से गुजरता है जिसे वह खुद भी बरतता है, उसे पाठकीय और लेखकीय आइने में भी टटोलता है. आरंभिक लेखक तो ख़ासकर. उसके पास समय कम है, भयाक्रांत हड़बड़ी में जीता अपने पुरखों की किताबों के वजन तले कुचला जाता वह जल्दी से अधिकाधिक लिख, पढ़ लेना चाहता है, इस प्रक्रिया में उन किताबों के सानिध्य में अधिक समय बिताता है जो उसके लेखकीय नक्षत्रमंडल को आलोकित करती हैं. महज मानवीय संसार का विस्तार उसे स्वीकार नहीं. वह इन रचनाओं की कोशिकाओं में वे सूत्र ढूढ़ता है की उसकी हफ्ते भर से अटकी कहानी आगे बढ़ सके, उसके अधूरे किरदारों को बूंद भर रोशनी मिल सके, उसकी उपमाओं में उड़ान, मुहावरों में मस्ती आ सके. पगलाये प्रेम के लम्हों में हम हर लड़की में अपनी प्रेमिका तलाशते हैं, उसी तरह यह कथाकार हर कथा में अपने किरदार खोजता है, उस रचना से भागते, उचटते हुये गुजर जाता है जहां उसका नैरेटिव अपनी परछांई नहीं देख पाता. 

कथाकार अज्ञेय के साथ मेरा संबंध त्रासद है. उनकी रचनात्मक उपस्थिति का सम्मान करते हुये, सृजन कर्म के प्रति उनकी निष्ठा से उर्जा ग्रहण करते हुये भी मेरा गल्पकार उनके कथाकार से कुछ हासिल नहीं कर पाता. उनके किरदार, उनका संवेदन तंत्र, नैरेटिव तकनीक, संवाद, वाक्य, भाषा --- कहीं कुछ नहीं जो मेरे लेखकीय संसार को समृद्ध कर सके. 


::

प्रथम पुरुष आख्यायक के संदर्भ में हेनरी जेम्स ने फ्लूयिडिटी आफ सैल्फ रैविलेशन  उर्फ आत्मउद्घाटन की आर्द्रता का जिक्र किया है. कथाकार का अक्षम्य अपराध जब वह अपना आत्म कथा और किरदार पर आरोपित करता है. प्रथम पुरुष में लिखी गयी अज्ञेय के पहले उपन्यास की भूमिका कथा की भूमि निर्धारित कर देती है, बतला देती है उपन्यास लिखा ही नायक, उसके जीवन, उसकी दृष्टि और प्रकारांतर से खुद लेखक को महिमामंडित करने के लिये गया है.

उपन्यासकार भूमिका में अपने बंदी जीवन, क्रांतिकारिता का उल्लेख करता है, उपन्यास को एक विराट चित्रघनीभूत वेदना की एक रात में देखे हुये विजन को शब्दबद्ध करने का प्रयास  बतलाते हैं, मानता है उनको जानने वाला पाठक इसमें लेखक के जीवन, देशाटन के सूत्र पायेगा लेकिन पाठक को यह भी मनवा देना चाहता है इलियट के कथनानुसार मैं बहुत बड़ा आर्टिस्ट हो चुका हॅूं, अज्ञेय की प्रसिद्ध निर्वैयक्तिकतालेकिन दो पंक्ति बाद ही स्वीकारता है शेखर में मेरापन कुछ अधिक है इलियट का आदर्श मुझसे निभ नहीं सका है.

यह आग्रह उनका कमोबेश हर किताब की भूमिका में बना रहता है. अपनी रचना को पाठक के सम्मुख रखने से पहले इस लेखक को आखिर क्यों जरूरत पड़ती है अपने बचाव की? वे आखिर क्यों हमें बतलाना चाहते हैं कि उन्हें, उनकी कृति को किस तरह पढ़ा जाये किस तरह न पढ़ा जाये? उन्हें अपने पाठक, उसकी समझ पर भरोसा क्यों नहीं

शेखर कोई बड़ा आदमी नहीं है, वह अच्छा भी आदमी नहीं है....लेकिन उसके अंत तक उसके साथ चल कर आपके उसके प्रति भाव कठोर नहीं होंगेऐसा मुझे विश्वास है. और, कौन जाने आज के युग में जब हम, आप सभी संष्लिष्ट चरित्र हैं, तब आप पायें कि आपके भीतर भी कहीं पर एक शेखर है जो बड़ा भी नहीं, अच्छा भी नहीं, लेकिन जागरूकस्वतंत्र और ईमानदार है, घोर ईमानदार.


कौन उपन्यासकार भूमिका में अपने नायक की ऐसी अर्चना करेगा? इलियट, अहं के विलयन आदि सिद्धांतों पर निरंतर बलाघात, इनका क्यायह पिलपिली भूमिका क्या उपन्यास को एक आत्मवक्तव्य में परिवर्तित नहीं करती खासकर तब जब लेखक स्वीकार चुका है कि शेखर में उसकापन अधिक है, उसका ही प्रतिरूप है. अज्ञेय के कथाघर में न सिर्फ फ्लूयिडिटी आफ सैल्फ रैविलेशन  है, बल्कि सैल्फ ग्लोरिफिकेशन और सैल्फ पिटी भी. 

क्या उनके समूचे औदात्य, घनघोर आत्मविश्वस्त मुद्रा के नकाब के पीछे एक थरथराता लेखक दुबका है? अगर उपन्यासकार ने शेखर पर अपना आत्म आरोपित नहीं किया होता तो शायद आरंभ में ही उसे निर्धारित, परिभाषित नहीं करता, कहीं तटस्थ, क्रूर और निर्मम निगाह से देख-उकेर पाता. तब वह अनुमानेय और एकरंगी और आत्मव्यामोहित नायक नहीं होता. उसमें उन रंगतों, छटपटाहटों का अभाव न होता जो किसी किरदार को वृहद फलक पर ले जा उसकी रूह में बारूद लगा विस्फोट करती हैं, कृति को मानव जीवन के उन्मादे एडवैंचर में परिवर्तित कर देती हैं. 

यह नायक प्रश्नाकुल है लेकिन अपने संशय अभिव्यक्त करने के लिये नहीं पूर्वनिर्धारित निष्कर्षों को हासिल और सत्यापित करने के लिये ही प्रश्न  करता है. उसकी सारी क्रियायें उसे वैधता प्रदान करने के लिये हैं. एक जगह नायक का अपनी मां से झगड़ा हुआ है, मां उस पर विश्वास नहीं करती. वह अपना कमरा बंद कर डायरी में लिखता है ---

अच्छा होता मैं कुत्ता होता, चूहा होता, दुर्गन्धमय कीड़ा होता बनिस्बत ऐसे आदमी के जिसका विश्वास नहीं है.‘ फिर वह जोर से कहता है --- आई हेट हर, आई हेट हर. वह घर से बाहर निकल आता है, प्रतिज्ञा करता है उसे कागज पर लिखता है कुछ ऐसा काम नहीं करेगा जिससे माँ को उस पर रत्ती भर भी विष्वास करना पड़े. पर तभी --- पर तभी उसके भीतर एक और परिवर्तन हुआ, उसने उस कागज के चिथड़े किये, उन्हें गीली जमीन पर फेंका और पैरों से रौंदने लगा तब तक जब तक कि वे कीच में सनकर अदृष्य नहीं हो गये ---
मैं योग्य हॅूं, योग्य रहॅूगा. उसमें विश्वास की क्षमता नही तो मैं क्यों पराजित हूँगा. 


एक चौदह पंद्रह साल के लड़के का मां से तीखा झगड़ा. उसे अपनी सार्थकता पर संदेह लेकिन उसे उबरने में, अपने कर्मों पर पुनार्विश्वास हासिल करने में जरा देर नहीं लगती. रोचक कि अपने को सत्यापित करते वक्त वह मां और उनके संशय नकार देता है. महज पंद्रह का लड़का. 

यह नायक बहुत महान होगा, बुद्ध होगा, लेकिन मेरा, मेरे किरदारों का इस लड़के से कोई संबंध नहीं जुड़ पाता. मेरा नायक कितना आत्मविष्वस्त हो, पंद्रह नहीं पच्चीस या पैंतीस का हो, अपने से प्रश्न करेगा क्यों उसने विश्वास खोया, कभी सरलीकृत दंभ की षरण नहीं लेगा मैं योग्य हॅूं, योग्य रहॅूगा.

उपन्यासकार बड़े मासूम ढंग से अपने नायक को महानायक बनाता चलता है. एक जगह वे लिखते हैं --- शेखर को एक बड़ी खतरनाक आदत पड़ गयी -- वह अकेला बैठ बैठकर सोचने लगा. 
अकेले बैठ बैठ कर सोचने लगने को उपन्यासकार बड़ी खतरनाक आदत बतलाता है. नायक को इतने सरल ढंग से परिभाषित करना अक्षम्य एरर आफ स्टाइल तकनीकी खामी है.

शेखर निरीह नहीं हैं. भले वो पांच साल का बालक हो या बीस का युवक. उसमें अनछुई निरीहता, तुतलाती मासूमियत, बेबाक छटपटाहट, बेखौफ वासना, चिल्लाती हवस का अभाव है. वह किसी शिखर पर पहुंचा नायक है, दुनियावी आवेग व संशय या तो मिट गये हैं या नायक की अपने उपर आस्था के जरिये उनका सरलीकृत समाधान हो गया है. किन रास्तों से हो, जख्म खरोंच अपने जिस्म-रूह पर झेलकर वह वहां पहुंचा, आस्था हासिल की इसका जिक्र अज्ञेय नहीं करते. शेखर के भीतर द्धंद्ध नहीं, उसे अपने कर्म, विचार, उनकी वैधता पर पूरा भरोसा है. उसका अलगाव महज बाह्य सृष्टि से है, एक छोटी सी खाई जिसे वह सहजता से संसार को ठुकरा या एकांत, प्रकृति के सुनहरे सानिध्य में आ मिटा देता है. न उसके भीतर भटकाव, विचलन न बिखराव. चॅूंकि वह हमेशा अपने को सही मानता है उसके भीतर अपराध बोध भी नहीं. ऐसा नहीं वह जड़ है, वह विचारमग्न है, संवेदनषील भी, लेकिन बेहतर और उससे बेहतर का संघर्ष उसके भीतर नहीं. वह नहीं कहेगा अबकी बार लौटूगा तो वृहत्तर हो लौटूगा. वह आरंभ से ही खुद को वृहत्तर माने बैठा है. 


शेखर मेरा नायक नहीं है जो स्खलित होता है, अपनी रूह आत्मभर्त्सना के नुकीले खंजर पर अटकी थरथराती पाता है. अज्ञेय का नायक कभी स्खलित नहीं होता, पाठक को उसका स्खलन-पतन दिखलाई दे भी जाये वह आश्वस्त जीवन जीता चलता है. 

क्या वह खुद को छलावे में रखता है? नहीं, क्योंकि वह अपने आत्म से खुद को छलने वाले सभी तत्व पहले ही मिटा चुका है. 

इसे हम मनुष्य की सिद्धावस्था भी कह सकते हैं. सूरदास व तुलसीदास में फर्क करते हुये रामचन्द्र शुक्ल लिखते थे सूर की कविता लोकमंगल की सिद्धावस्था है जबकि तुलसी का साहित्य लोकमंगल की साधनावस्था. अज्ञेय के किरदार सिद्धावस्था के केंद्र में हैं. वे सब कुछ पहले ही अर्जित कर चुके हैं महज उसे प्रतिपादित करना बाकी.

इस सिद्धावस्था से मेरा कोई सरोकार नहीं. मेरी दिलचस्पी उस साधना में है जिसके जरिये सिद्धि हासिल की जाती है. वह दुर्गम, कठिन रास्ता जिससे गुजर मनुष्य लुढ़कता है, गिरता है, बदन पर खरोंचें आतीं हैं, आत्मा लहूलुहान होती है, उसी पीड़ा की राख से नायक का पुनर्जन्म होता है. 

उपर एरर आफ स्टाइल का जिक्र किया था. अपने अपने अजनबी  ब्लंडर आफ स्टाइल है. विलक्षण संभावनाशील उपन्यास. बर्फ में दबे घर में फंसे दो किरदार --- एक बुढि़या, एक लड़की. राशन खत्म हो रहा है, मौत का खौफ कि लड़की बुढि़या का कत्ल कर देना चाहती है. लेकिन अज्ञेय प्लाट साध नहीं पाते, बजाय किरदारों को उकेरने के दर्शन में उलझ जाते हैं. कथा को गढ़ते-बुनते नहीं. मरियल, सूखी भाषा में लिखा गया यह उपन्यास एक आवेगहीन रास्ते पर चलता खत्म हो जाता है. सतह से रत्ती भर उपर उठने की कशमकश इस उपन्यास में नहीं. 
इस उपन्यास में क्रियायें नहीं, किरदार खुद को क्रियाओं के जरिये व्यक्त नहीं करते बल्कि चिंतित से चिंतन में डूबे रहते हैं. क्या इसलिये कि अज्ञेय के पास गल्प की समझ कम है या वे औजार नहीं जिनसे कथा की गल्प संभावना निचोड़ सकें

अ स्टोरी टैलर मस्ट शो, नाट टैल. एक अच्छा कथाकार वक्ता या उपदेशक नहीं होता, वह कथा दिखलाता है, बतलाता नहीं.

कृष्ण बलदेव वैद का दूसरा न कोई. अकेला मरता बूढ़ा. वैद का उपन्यास भी मानव नियति को अंतिम बूंद तक निचोड़ लेना चाहता है लेकिन यह क्रियारत बूढ़ा है. हमेशा किसी हरकत, फितूर, शगल में लिप्त. उसका दर्शन आप उसकी क्रियाओं से ही जान पाते हैं, वह एक दृष्य की तरह आपके समक्ष अपनी समूची वासना, खब्त, निराशा, उब के साथ उद्घाटित होता है. वह नहीं बतलाता वह सनकी, खब्ती है, घनघोर हवस से हरहरा रहा है. आप उसकी हरकतों से उसकी अदम्य लिप्सा को जान पाते हैं. एक बायस्कोप चलाते लेखक की तरह वैद पाठक और अपने किरदारों के बीच से खुद को मिटा देते हैं. 

इसके बरक्स अज्ञेय के किरदार अगर अपने रचयिता के बंदी, उसकी गिरफ्त में फंसे प्रतीत होते हैं तो क्या इसलिये कि कथाकार अज्ञेय वह आख्यायकीय विधा नहीं चीन्ह पाये जिससे गल्प के तंतुओं का दोहन हो. या इसलिये कि अज्ञेय एक आत्मलिप्त आख्ययाक हैं, अपने किरदारों को वह स्पेस नहीं दे पाते या देना चाहते जहां उनका सहज विस्तार हो सके? वे जायस के पैरिंग नेल्स इन द कार्नर, कोने में चुपचाप नाखून तराशते आख्यायक नहीं. क्या यह विडंबना नहीं कि आत्म व उसकी स्वाधीनता पर निरंतर बलाघात करता यह लेखक अपने ही किरदारों को स्वतंत्र नहीं बना पाया?

उनके नैरेटिव के एकदम सपाट होने की वजह संभवतः यही --- उनके किरदार इतने आत्मवश्वस्त कि विचलन की संभावना से परे हैं. चूँकि  आत्म में फांक नहीं, कथानक भी इकहरा. दूसरा, लेखक का अपने किरदारों पर फंदा इतना संपूर्ण है उन्हें विकसित होने का अवसर नहीं मिल पाता. वे लेखक के पूर्वनिर्धारित दार्शनिक एजेंडा के वाहक बन रह जाते हैं. 

यह आख्यायक मेरे आख्यायक से एकदम विपरीत है जिसका समूचा संघर्ष इस पर टिका है कि कैसे अपने किरदारों को मुक्त किया जाये जहां वे अपनी वासना, बेईमानी, प्रेम, हसरत, चाहना, कमीनेपन, पवित्रता की द्धंद्धात्मक बारूदी सुरंग में धंसी अपनी रूह के भीतर होते विस्फोट को अनुभूत कर सकें. 


नदी के द्वीप. यहाँ भी उपन्यासकार कथा दिखलाता नहीं महज उपदेशक के अंदाज में बतलाता है. इस उपन्यास के किरदार किसी शास्त्रार्थ या वाद विवाद प्रतियोगिता के भागीदार प्रतीत होते हैं, एक निर्धारित कार्यक्रम के तहत उन्हें लेखक ने स्क्रिप्ट थमा दी है, वे अंतहीन रौ में, बिना थमे बोले चले जाते हैं. सूखे, मांसल संवाद. हो सकता है ऐसे भी नायक-नायिका होते हों, लेकिन मेरे लिये ऐसे किरदार असंभव है जिनके शब्द नहीं लड़खड़ाते, अपने कहे पर संदेह नहीं करते. 

नदी के द्वीप में भी क्रियाहीनता है. इसके किरदार किसी कर्म में रत नहीं दिखते, अपनी क्रियाओं के जरिये उद्घाटित नहीं होते, उनकी चेतना का विस्तार उनके आत्म व बाह्य जीवन के मध्य घर्षण से नहीं होता. उनके संवाद उनकी व्याख्या करते हैं. लेखक को पाठक की समझ पर भरोसा नहीं वह अपने किरदारों के बारे में सब कुछ खुद ही कह देना चाहता है. अपने काव्य में शब्दसंयम अर्जित करता यह लेखक गल्पात्मक संकट से अनभिज्ञ रहता है जब उसके किरदार उस सीमा के पार नहीं पहुंचते जहां उन्माद, जुनून और खुमार का नक्षत्रमंडल शुरु होता है.


निर्मल वर्मा कई अर्थों में मेरे सृजनात्मक पिता रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में मेरा गल्पकार उनसे मुक्ति पाने के फेर उनसे दूर हुआ है लेकिन अभी भी निर्मल के रचनात्मक डीएनए की कोशिकायें अपनी धमनियों में स्पंदित होता पाता हॅूं. विचित्र कि अज्ञेय निर्मल के सृजनात्मक पिता रहे हैं, निर्मल ने शेखर से अपने अतंर्संबधों का जिक्र किया है. यानी अज्ञेय मेरे पितामह हुये और संभव है निर्मल से होकर गुजरते उनके कुछ अंश मेरे भीतर भी आये होंगे. मैं अपनी धमनियों में उन कोशिकाओं को टटोलता हूँ. लेकिन अज्ञेय कहीं नहीं दिखाई देते. बिना किसी पूर्वाग्रह के चाहता हूँ इस कृतिकार से कोई, दूर का ही सही, संबंध जोड़ पाउॅ, लेकिन नहीं .


क्या यह वही त्रासदी है जिसका जिक्र उपर हुआ था

अज्ञेय की मृत्यु के अगले दिन जनसत्ता में प्रभाष जोषी ने संपादकीय लिखा था -- सोने के पंख लगा गरुड़ उड़ गया. अज्ञेय की उपस्थिति को स्वीकारते हुये भी श्रीकांत वर्मा की पंक्तियों से थोड़ा खेलते हुये अंत करना चाहॅूंगा --

गिद्धराज आओ
गरुड़ को किसने देखा है
जिन्होंने गिद्ध नहीं देखा
गरुड़ सिर्फ उनकी कल्पना में मंडलाता है
मंडलाने दो
गिद्धराज आओ
गरुड़ को किसने देखा है
गरुड़ महज मेरी कल्पना में परिंदा है

(यह पाठ भारत भवन, भोपाल, में अज्ञेय और मैं’ विषय पर हुयी गोष्ठी में पढ़ा गया.)
__________________________________________________________




पत्रकार, कथाकार. युवा आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह,
कुछ अनुवाद, आलोचनात्मक आलेख आदि प्रकाशित हैं.
इधर इंडियन एक्सप्रेस में छतीसगढ़ के नक्सली इलाके से लगातर रिपोर्टिंग और डायरी प्रकाशित हो रही है.
कथादेश के विशेषांक “कल्प कल्प का गल्प” का  संपादन .
ई पता : abharwdaj@gma