बहसतलब -२ : साहित्य का भविष्य और भविष्य का साहित्य

Posted by arun dev on जुलाई 16, 2012



कविता ::

भूमिकाएं जहां से शुरू होती हैं                 


हिंदी कविता अपने कथ्य की संप्रेषणीयता और शिल्प की कलात्मकता में किसी भी विकसित भाषा की कविता के समक्ष और समतुल्य है. अर्थ के निकटतर जहां तक कविता जा सकती हैं हिंदी कविता गई है.  उसके पास कई भाषाओं के शब्दों का वैभव और उनकी परम्पराओं का बल है. उसके पास कालिदास हैं तो कबीर भी. मीर, ग़ालिब, फैज़ हैं तो पाब्लो नेरूदा भी. सामाजिक सरोकारों से अपने को जोड़ने और हस्तक्षेप की सार्थकता को उसने कई बार प्रमाणित किया है. आज भी कविता ही सबसे अधिक लिखी जा रही है.

इतने मजबूत विरसे के बावजूद हिंदी कविता अपनी पहचान और पहुंच को लेकर संशय में है. आज हिंदी भाषी समाज में कविता की एक पहचान हंसोड़ तुकबन्दियों से की जाती है तो दूसरी तरफ गीतों से. आम जन और मधयवर्ग जहां साहित्य पैदा होता है, जहां उसे पढ़ा जाता है, और जहां उसकी चर्चा होती है समकालीन हिंदी कविता से बेज़ार और बेलज्जत है.

आज हिंदी कविता की पहुँच का दायरा सीमित हो चला है. इसीलिए उसके प्रभाव का पता भी नहीं चलता. वृहतर समाज से उसके जुड़ाव से ही उसकी मुक्ति संभव है, उसकी सार्थकता प्रमाणित होनी है.

यह जानते और मानते हुए भी की उच्चतर कलाओं के सहचर, रसिक, सह्रदय हमेशा से कम होते हैं और आज के वैश्विक परिदृश्य में इनकी तादात हर जगह कम हुई है. लेकिन हिंदी में जो गत कविता की हुई है वह कही नहीं है, पड़ोस की उर्दू में भी नहीं.

हिंदी कविता अपनी व्यापक वैचारिकी और कलात्मकता में उर्ध्वाधर विकास को प्राप्त हुई है. आज उसके क्षैतिज विस्तार की भी आवश्यकता महसूस हो रही है.  कविता को मित्र-कविओं और मित्र-अमित्र आलोचकों से बाहर निकलना होगा. उसे साहित्य की राजनीतिक गोष्ठियों और गोष्ठियों की राजनीति से भी बाहर आना होगा. उसे सिर्फ छपने से संतोष नहीं करना होगा उसे सुना जाए उसे गुना जाए उसे प्रतिध्वनित होना होगा. उसे अंततः लोककंठ में जाना ही होगा. उसे बाजारू हुए बिना अपनी गरिमा के साथ लोगों के बीच जाना होगा. उसे हर शहर, हर कस्बे, हर गाँव में अपने कार्यकर्ता चाहिए.

यह सिर्फ कविता का मसला नहीं है यह भाषा और संस्कृति का मसला है. परम्पराएँ हमें बताती हैं कि कैसे कविताएँ धर्म ग्रंथों में बदल गई और शायद आगे धर्म ग्रंथों का स्थान कविताएँ ले लें. किसी भी समाज की सांस्कृतिक बुनावट और वैचारिकी की सघन पहचान कविताएँ कराती हैं. अगर कविता पढ़ने वाले नहीं होंगे तो तय मानिए कुछ दिनों बाद कविता लिखने वाले भी नहीं होंगे और तब शायद भाषा भी न रहे.

हिंदी कविता की इस दुर्गति के अनेक कारण तलाश किए जा सकते हैं. किए भी जाने चाहिए जिससे कि हम आगे सबक ले सके. इससे बाहर निकलने के भी रास्ते हैं जिन्हें खोजा जाना है.

इस बहसतलब आयोजन में आपका स्वागत  है.
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अरुण देव 
devarun72@gmail.com
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