बहसतलब : २ : कविता तो रहेगी : मोहन श्रोत्रिय

Posted by arun dev on जुलाई 17, 2012




साहित्य के भविष्य को लेकर  बहसतलब  आयोजन  - २ में हिंदी कविता की दशा और दिशा पर वरिष्ठ  लेखक और कवि  मोहन श्रोत्रिय  का आलेख, जो कविता की पहुंच की सीमा को समझते हुए, उसके विस्तार की आवश्यकता को महसूस करते हुए यह नहीं भूलता की कविता के किसी सरलीकृत फार्मूले के क्या ज़ोखिम हैं. उम्मीद के साथ बहस की अगली कड़ी.


कविता तो रहेगी                



मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा दिन आने वाला है जब कविता पढ़ी नहीं जाएगी. और इसलिए कविता लिखी भी जाती रहेगी, और भाषा भी बची रहेगी. इसके उलट की कल्पना करना अकारण चिंतित होना है, और उस चिंता को बढा-चढ़ाकर बयान करना भी है. मौजूदा दृश्यपटल कितना भी असंतोषजनक हो, इस निष्कर्ष तक स्वाभाविक रूप से नहीं ले जाता कि कविता पढ़ा जाना बंद होने वाला है, और कविता लिखा जाना भी. भाषा के बारे में ऐसा निष्कर्ष तो इसलिए भी आधारहीन है, क्योंकि भाषा अन्य विधाओं में भी अभिव्यक्ति का माध्यम बनी ही रहनी है. चिंतन और सामाजिक व्यवहार भाषा के माध्यम के बगैर स्वप्नातीत है.

कविता का जन्म सामूहिक श्रम के साथ जुड़ा होने का कारण, इसके (कविता के) साथ मनुष्य का रिश्ता सुनने-सुनाने वाला रहा है. कथा का भी, क्योंकि उसका जन्म सामूहिक विश्राम से जुड़ा है. हम लोगों का साहित्यिक संस्कार वाचिक परंपरा से जुड़ा है. वहीं से बना-बिगड़ा भी है. कविता अनौपचारिक पठन-पाठन की चीज़ कब रही हमारी भाषा में, इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए. शैक्षिक पाठ्यक्रमों के माध्यम से बना कविता से जुड़ाव कहीं न कहीं पाठ्यक्रम के स्वरूप और चरित्र से नियमित-निर्धारित भी रहा है. कविता के रूप को लेकर जो आग्रह अधिकांश कविता पाठकों के दिखते हैं, जब-तब. उसके पीछे यही तथ्य प्रमुख कारक की भूमिका निभाता है. इन पाठ्यक्रमों से असंपृक्त व्यक्ति घर में कविता के नाम पर यदि कुछ पढते रहे हैं, हिंदी प्रदेश में, तो वह रामचरित मानस है, और उसे कविता के रूप में नहीं बल्कि धर्मग्रंथ के रूप में पढ़ा जाता है.

छंद को कविता की अनिवार्य पहचान के रूप में लोक-चेतना में स्थापित कर दिया जाना कविता की घटती लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण रहा है. दुनिया भर की तमाम भाषाओँ में कविता का रूप बदला है, पर मुझे याद नहीं पड़ता कि कहीं भी छंद को कविता की प्रमुख कसौटी के रूप में रेखांकित किया गया हो. यहां तो विधिवत हिंदी साहित्य के अध्येता रहे लोग भी इतने आग्रह के साथ इस बात को रखते हैं कि इसकी अनुपस्थिति मात्र के आधार पर वे उसे न-कविता घोषित करने में एक पल भी नहीं खोना चाहते. इसे कुछ कवियों-आलोचकों की दुरभिसंधि के रूप में धिक्कारने में भी कोई समय नहीं गंवाते. मुक्तिबोध-अज्ञेय तक को इस आधार पर कवि के रूप में ख़ारिज कर देने वालों का कोई टोटा नहीं है. मुझे लगता है कि कविता के इतिहास, और अपने समय के साथ उसके संबंधों के निरूपण में कहीं न कहीं गहरी चूक हुई है. छंद के चले जाने से कविता के याद रखे जाने में होने वाली आसानी कम हुई हो, इतना भर कह दिया जाना तो समझ में आता है, केवल आसानी से याद रखे जाने की कसौटी को कविता की परिभाषा और पहचान के साथ नाभि-नाल संबद्ध कर देने के कुचक्र ने भी गडबड की है. छंद की जगह लय पर इतना ही आग्रह रहा होता तो शायद इतना बुरा नहीं होता.

सुनकर चीज़ें बेहतर ढंग से और आसानी से समझ आती हैं, ऐसा कुछ लोगों का मानना है. मंच से कविता सुनते थे तो ज़ाहिर है, शब्दों के अतिरिक्त भी बहुत कुछ संप्रेषित होता था. जवानी के दिन थे स्मरण-क्षमता भी ज़बरदस्त थी, इतनी कि आज पचास साल बाद भी वे कविताएं याद हैं, सुनाई जा सकती हैं, और लगभग वैसे ही जैसे कवियों के मुंह से सुनी थीं. पढ़ने, और पढ़कर समझने में हमें अन्य माध्यमों से वह मदद नहीं मिलती, इसलिए परीक्षा के आतंक की वजह से या तो रटनी पड़ती है या हम आसानी से उसे अपठनीय घोषित कर देते हैं.

हमारी प्रकाशन-वितरण व्यवस्था के चलते कविता को संभाव्य पाठक तक पहुंचाया ही कहां जाता है? पत्रिकाओं का प्रसार भी यदि अधिकांशतः साहित्यकारों के बीच ही है, तो यह माध्यम भी नए पाठक निर्मित करने में उतनी बड़ी भूमिका नहीं निभाता जैसा कि हम सामान्यतया कहते-सुनते हैं.
कविता की नए लोगों तक पहुंच दो तरीकों से ही बनाई जा सकती है :

१.
कविता पाठ के अधिकाधिक कार्यक्रम इस तरह आयोजित करके, कि कविता को संभाव्य पाठकों के बीच ले जाना सुनिश्चित किया जा सके. कविता को श्रोता तक ले जाने से एक नए मंच का गठन भी होगा, और प्रचलित मंचों की विकृतियों से भी बचा जा सकेगा (दिल्ली में आयोजित कविता-पाठ कार्यक्रमों पर की गई टीप से ही बहस की यह “भूमिका” भी निकली है.).

२.

पुस्तक प्रकाशन को अधिक लोकतांत्रिक और सह्कारितापूर्ण (बंगाल और केरल के अनुभवों से ज़रूरी सीख लेकर) बनाने के संगठित लेखकीय प्रयासों को मूर्त रूप देकर कर कविता के पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी सुनिश्चित की जा सकती है. 


कविता के सरल और सहज संप्रेषणीय होने का यह आशय क़तई नहीं होना चाहिए कि पाठक को कभी भी शब्दकोश का सहारा लेना ही न पड़े. अंग्रेज़ी में वर्ड्सवर्थ काव्यभाषा और जनभाषा के ऐक्य के पक्षधर थे, पर उनकी कविता का हर शब्द हर पाठक को समझ आजाता हो, ऐसा तो नहीं है. भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियां हैं :

जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख
और उसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख!

क्या इसका यह अर्थ यह लगा लिया जाए कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा वह इतना सरल था कि पाठक को किसी भी शब्द का अर्थ किसी से पूछना ही नहीं पड़ता था? पूछने की बात इसलिए कह रहा हूं कि आम हिंदी पाठक शब्दकोश देखने की ज़हमत उठाना ही नहीं चाहता. उर्दू का सामान्य ज्ञान न रखने वाला पाठक उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कविता गीत फ़रोश के शीर्षक का अर्थ ही कैसे समझता? पढ़ते वक़्त तो शीर्षक पर ही अटक जाता. सुनने से तो पहली पंक्ति में ही अर्थ स्पष्ट हो जाता है. कविता का काम मनुष्य की चेतना को विकसित करना भी तो होता ही है. सरलता का अर्थ यही होना चाहिए कि कवि जान-बूझ कर ऐसे शब्दों के प्रयोग से बचे जो सहज-ग्रहण की प्रक्रिया को बाधित करते हैं. कविता में बिंबों/रूपकों का सहारा भी तो लिया ही जाएगा. क्या कितनी ही बार यह नहीं होता है कि सारे शब्दों का अर्थ पता है,पर पंक्ति का अर्थ संप्रेषित नहीं होता. तो इसके लिए क्या पाठक को कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना चाहिए? या ऐसा करने से उसे क्यों कतराना चाहिए? अर्थशास्त्र के सिद्धांतों, दार्शनिक स्थापनाओं, भौतिकशास्त्र के अथवा प्रकृति विज्ञान के सिद्धांतों और नियमों को समझने के लिए तो सिर खपाने को तैयार पर कवि/कविता से यह मांग कि सब कुछ सीधा-सरल परोसो तर्कसंगत नहीं है. यह बात पाठकों तक पहुंचाई जानी चाहिए, बिना अपनी कविता को लेकर क्षमा-याचना की मुद्रा अपनाए हुए.

कविकर्म कोई निष्प्रयोजन कर्म नहीं है. कविता-सृजन एक महत्वपूर्ण सामाजिक / सांस्कृतिक कर्म है तो उसके सामाजिक सरोकार भी होंगे ही. इन सरोकारों की खुली अभिव्यक्ति भी पाठकों से कवि/कविता की निकटता और जुड़ाव को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है. ऐसा होने पर अतिरिक्त कलावादी आग्रहों से भी मुक्ति पाई जा सकती है. यह कोई छिपी हुई बात नहीं है की कलात्मकता पर अतिरिक्त आग्रह कथ्य/अंतर्वस्तु की कमी/कमज़ोरी को ढंकने के इरादे से भी होता है. आज का सामाजिक यथार्थ पहले की तुलना में जटिलतर बनता जा रहा है, समाज की विकृतियां भी चुनौती बन कर सामने खड़ी हैं. ज़ाहिर है, कवि अपने समय के सवालों से सीधी मुठभेड़ से बच नहीं सकता, और समय के सवालों से जूझने का सीधा असर यह भी बनता है कि उन सवालों से रोज़मर्रा ज़िंदगी में जूझने वाले लोगों के बीच कवि की प्रमाणिकता ही नहीं बढ़ती, अपनापा भी बढ़ता है. कवि उन्हें अपना आदमी लगेगा तो उसके लिखे हुए में उनकी दिलचस्पी भी बढ़ेगी ही. लोक से जुड़ने का मतलब यह भी है ही कि यहां-वहां कवि की अभिव्यक्ति में वे लोकोक्तियां-मुहावरे भी जगह पाएंगे जो पाठक से उसे और घनिष्ठ रूप से जोड़ देंगे.

कविता लिखने का कोई फॉरम्युला न तो पहले था, और न अब प्रस्तावित किया जा सकता है. ज़रूरत के मुताबिक कविता कभी बयान की शक्ल भी ले सकती है, और कभी पोस्टर पर लिखी इबारत की भी. इससे कवि की हेठी नहीं, कवि की सजगता का ही पता चलता है. श्रम के सौंदर्यशास्त्र और संपन्नता के सौंदर्यशास्त्र में कोई फ़र्क़ तो होता ही होगा. जन पक्षधरता से कोई भी सजग कवि कैसे बचा रह सकता है?

कविता के पाठक बढ़ें, यह सबके लिए खुशी की बात होगी, और इसके लिए अभियान चलाने में खुद कवियों का हित भी निहित है. जब तक यह आदर्श स्थिति नहीं आजाती है, यह निष्कर्ष निकालना तो फिर भी सही नहीं होगा कि कविता का पढ़ा जाना बंद हो जाएगा, और लिखा जाना भी, तो भाषा भी खत्म हो जाएगी.

कविता पंक्तियां याद रखी जा सकें, बहुत कविता पंक्तियां याद रखी जा सकें,बहुत अच्छा पर यह एक मात्र कसौटी नहीं हो सकती, कविता की शक्ति-सामर्थ्य की.


मोहन श्रोत्रिय
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बहसतलब -२ :