बहसतलब : २ : मृत्यु से कविता की मौत तक : डोनाल्ड हॉल

Posted by arun dev on जुलाई 20, 2012



साहित्य के भविष्य पर आयोजित बहसतलब - २ - की अगली कड़ी में डोनाल्ड हॉल का लेख जो अमेरिकी समाज में कविता के समाप्त होने की आशंका और उसके बचे रहने की उम्मीद के बीच रह कर लिखा गया है. कविता की स्थिति कमोबेश हर जगह एक सी है. ऐसा लगता है कि भाषा के देश से उसके पुश्तैनी नागरिकों की बेदखली का यह समय है. हर जगह यह कुछ 'नाचीज लोगों' के किसी  समूह में सिमट सी  गई है. क्या यह सभ्यता के विकास का श्राप है ?,  उम्मीद की कुछ उम्मीद भी की जा रही है जैसा की इस लेख में भी  है. 

मृत्यु से कविता की मौत तक                                                                       
डोनाल्ड हॉल



किसी दिन आप अख़बारों में पढेंगे कि अमेरिका तो कविता को समर्पित देश है! खेल के पन्नों के दो हवाले कविता की गतिशीलता  को लेकर आपको भ्रमित कर रहे होंगे. आप पायेंगे कि केंटकी डर्बी में हो रही स्केटिंग प्रतियोगिता में कवि शोर्टस्टॉप की पोज़ीशन लिए खड़ा है और कविता नीले आसमान तले पाल नौकाओं की तरह बह रही है. अखबार के हास्यमय पेज पर ज़िप्पी ज़र्बानिया के कपड़ों की तारीफ़ में कह रहा है: "आह! तुम तो पोलिस्टर की कविता" हो वाकई! एक विज्ञापन में एक फ्यूनरल डाइरेक्टर कहता नज़र आएगा, जीवन में कविता की अपरिहार्यता पर चिंतन करो. आपके लिए अनुमान करना मुश्किल होगा कि आखिर वह किस कविता का खुलासा कर रहा है; पर इतना तो साफ़ हो ही जाएगा कि उसका कविता से कोई वास्ता नहीं. ये बस झपकी लेने जैसी बात है.

कविता फिर कुछ इस तरह परिभाषित हो रही है :
ये उत्कृष्टता और अवचेतनता का भाव शून्य पर्याय है. लोकवृत्त की अभिज्ञता के लिए आखिर कविता में क्या है?
ये सर्वविदित है कि कोई कविता नहीं पढ़ रहा.
ये ख्यात है कि कविता की अपाठ्यता ही (अ) उसकी समकालीनता है. (ब) और प्रगतिशीलता है.
'' से यह राय बनती है कि कविता कभी हमारे पुरखे पढ़ते थे और कवि धनाढ्य और प्रसिद्ध हुआ करते थे. '' के अनुसार पूर्व समय की अपेक्षा आज कुछ ही लोग कविता पढ़ते हैं.(किताबें खरीदतें हैं या कविता पढ़ने जाते हैं.)

आपके सामान्य ज्ञान के लिए:
कविता केवल कवि पढ़ता है.
कवि इसके लिए ज़िम्मेदार हैं और "कविता ने अपने श्रोताओं को खो दिया है."

कई साल पहले गेस्तव फ्लोबर्ट ने Bouvard and Pécuchet में कहा था ,"सब जानते हैं कि आज कविता एकदम फ़ालतू और अप्रचलित विधा है." विस्तार से इस पर बात करने के लिए टाइम्स मैगज़ीन का वह अंक देखिये जिसमें एडमंड विल्सन कहते हैं कि, "क्या कविता मरती हुई विधा है? "हू किल्ड पोएट्री" शीर्षक से "कमेंट्री " के अगस्त अंक में छपे लेख में निबंधकार जोसफ एफेस्टीन ने उन तमाम प्रकाशकों से हुए साक्षात्कारों, कवियों की लिखी समीक्षाओं और पिछली दो शताब्दियों से कविता के चलन से बाहर हुए  मुहावरों  को  एक जगह इकठ्ठा किया है.

१९२२ में 'टाइम' टी.एस.इलियट की वेस्ट लैंड को भ्रामक ठहराता है और १९५० में जाकर कवि के अवदान को कवर स्टोरी की तरह छापता है. तो टाइम्स को, उसके संपादक और लेखकों को अपनी राय बदलने में ३० साल लगे. उसके बाद भी वे अपनी इसी बात पर अटल थे: "जो "विशाल हैं बस वे ही पनप रहें हैं और मरने के बाद अपने पीछे पिग्मीज़ छोड़ जाते हैं." इलियट,फ्रॉस्ट ,स्टीवन्स, मूर और विलियम्स के बाद छोटी-छोटी पौध की तरह जो बचे वे थे-लॉवेल, बैरिमेन, जैरल तथा बिशप. और जब ये बचे हुए भी चुक गए तो उनके पीछे युवा पत्रकार आये. मृत पिग्मीज़ के आगे वे विशाल थे और पिग्मीज़ के बाद बचे रह गए बौने कवि. एलन गिन्सबर्ग की स्तुति में मृत्यु लेख लिखे गए पर क्या तीस साल पूर्व की "बीट जेनरेशन" का कुछ भी हमारी स्मृतियों में है.

इधर प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में कविता की किताबें देश में छप रही हैं. अधिक से अधिक लोग कविताएँ लिख रहे हैं-छपवा रहे हैं, सुन रहे हैं, और अनुमानत: पढ़ रहे हैं! ये आंकड़ा पहले से ज्यादा है. लेकिन हम ये अच्छी तरह जान लें कि जिस तरह स्टीफन किंग की किताबें बाज़ार में बिकती रही थीं उस तरह कविता की पुस्तकें कभी लोकप्रिय नहीं हुईं- लोक प्रियता जो व्यवसायिकता जा  अखाड़ा है. कविता पाठ सुनने वाले भी कम रहते थे. ऊंघ..खर्राटों में आजकल कुछ अधिक लोग कविता सुनने लगे हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ अमेरिका में.

सन १९४० में अपने स्कूली दिनों की याद है. काव्य पाठ गिने-चुने होते थे; केवल फ्रॉस्ट के कई हुए. यदि हम स्टीवेंस और विलियम्स की जीवनियाँ उठा कर खंगालें तो पता चलेगा कि उन दिनों काव्य-पाठ का प्रचलन न्यून सा था. इसी दशक में वॉल्ट विटमैन ने अपनी पुस्तक के कवर पेज पर लिखा, हुत महान कवियों के लिए उतने महान श्रोताओं का होना जरुरी है. किन्तु आज के समय में ये एक निक्कमा ख्याल है. १९५० के उत्तरार्द्ध में पढ़ने का चलन बढ़ा और १९६० तक तो जैसे इसकी बाढ़ आ गई..१९९० तक ये और प्रचंड हुआ है.

पढ़ने से किताबों की बिक्री होती है. १९५० में प्रकाशक किसी प्रख्यात कवि की पुस्तक का तीसरा संस्करण जब निकालता था तो उसकी हज़ार के करीब हार्ड बाउंड प्रतियाँ छपती थीं. यदि संस्करण तीन-चार साल में बिक जाता था तो लोग खुश हो जाते थे. १९८९ तक आते-आते वही प्रकाशक उसी कवि की पांच हज़ार हार्ड और सोफ्ट प्रतियाँ छापता है- और उसके बाद भी किताब के फिर से छपने की उम्मीद बनी रहती है. हाल में अमेरिका के दर्ज़नो कवियों की दस-दस हज़ार प्रतियाँ बिकी हैं- एड्रिन रिच, रॉबर्ट ब्लाय, एलन गिन्सबर्ग, जौन एशबरी,गालवे किनेल, रॉबर्ट सृले, ग्रे सिंडर,डेनिस लेवार्तोव, केरोलिन फोर्च ..और भी अन्यान्य ..डरावने ख्वाब की तरह.

मैं जानता हूँ कि बारीकी से बताई मेरी बातों का कोई भरोसा नहीं करेगा. मुझे उग्र विरोध का सामना करना पड़ेगा. और अगर किसी तरह मैंने ये सिद्ध कर भी दिया कि ये सारे आंकड़े सही हैं तो भी कोई मेरी बात का विश्वास नहीं करेगा. ब्लाय बिकता है क्योंकि वह एक बड़ा शोमैन है; गिन्सबर्ग बदनाम है; रिच स्त्रीवादी राजनीति के कारण बिक रहा है. मुझे समझ नहीं आता कि कविता के हिमायती क्यों ये कहते रहते हैं कि उनके श्रोता घटे हैं? असावधानी वश एक स्रोत्र तो मुझसे छूटे जा रहा है- हममें से कुछ कविता को इतना प्यार करते हैं कि उसका जीवन से बेदखल होना बवाल सा लगता है.ओह! हमारे अभिभावकों ने जेम्स मेरिल को कभी नहीं पढ़ा! बस इन्हीं नाकामयाब जुनूनों के कारण हम अतिश्योक्ति करते हैं. दावा करते हैं: "कविता कोई पढ़ ही नहीं रहा."

वास्तविकता तो यह है कि जिन आंकड़ों को मैं गाये जा रहा हूँ, वे कुछ नहीं हैं. करना तो हमें यह है कि जो भी (कविता) कुछ बिके या पढ़ा जाये उसकी गुणवत्ता हो. अपने आंकड़ों में मैं रोड मेक्युन को नहीं गिनता; मैं केवल कविता को इसमें शामिल करता हूँ-जिसका मनोरथ कलात्मक उत्कृष्टता है.

मैं समकालीन कविता की गुणवत्ता में भरोसा रखता हूँ. मैं भरोसा करता हूँ कि आज की उत्कृष्ट अमरीकी कविता यथेष्ठ साहित्य का उपार्जन करेगी. चार सौ पेज के संकलन तक सीमित लॉवेल के बाद का साहित्य - वही सामग्री एकत्रित करेगा जो १९२० से १९४० के बीच के स्त्री-पुरुषों को विविधता दे सके. जो दक्षता से किया गया हो, सुन्दर हो और प्रेरक होने के साथ स्थायी हो. मैं सचेत करता हूँ कि ऐसा करने पर हमारा प्रकाशित साहित्य सौवें भाग का एक प्रतिशत ही रह जाएगा. अगर अब भी तुम कविता की बात कर रहे हो तो अधिकांशतः वह दारुण अवस्था में है.

हमारी समस्या कविता से अधिक लोकवृत का इसके प्रति दृष्टिकोण है. हमारे पास कविताएँ तो ढेरों हैं पर राष्ट्रीय रोजनामचों की कमी है जो इनका मूल्यांकन करे. हार्पर और एटलान्टिक जैसी पत्रिकाओं ने कविताओं का त्रैमासिक समालोचन करना भी छोड़ दिया है. द न्यू योर्क टाइम्स बुक रिव्यू ने इसमें कभी रूचि नहीं दिखाई, बल्कि जितना कविता का प्रचलन बढ़ा उतना ही टाइम्स का इन पर ध्यान देना कम हुआ. यह पोलिटिकल ज्यादा रहा बनिस्पत पोयटिकल होने के..और कविता के लिए इसमें दिन-ब-दिन जगह कम होती गई. सबसे शोचनीय स्थिति रही नयू योर्कर की. पहले कभी इसमें लुइ बोगन के कविताओं पर बराबर लेख छपा करते थे. लेकिन बाद में हेलेन वेंड्लर की कविता की जगह अनुवादों पर प्रवृति दिखाई दी.

समीक्षाओं की कमी से कविता और पाठक घाटे में चले गए. हमें समीक्षकों के एक संवर्ग यानी कैडर की जरुरत है- जो इस वृहद् असबाब से हमें छान कर चीज़ें दे सके. आंकड़े पाठकों को हतोत्साहित करते हैं. इतनी कविताएँ --बाबा रे! कोई कैसे छांटे आखिर! कैसे नए खूबसूरत काम का पता चले? यदि हमारे पास सही अर्थों में यथेष्ठ  समीक्षक होंगे तो वे साबुन की तरह साफ़-सफाई करेंगे और ये घाल-मेल नहीं रहेगा.

इस महा सागर के अलावा एक और समस्या है- पक्षपातपूर्ण व्यवहार की. जब मैं अपने बीस में चल रहा था और मैं आयंबिक (एक तरह का छंद) मीटर्स लिखा करता था तब एलन गिन्सबर्ग जीता -जागता निंदक था. थोड़ी देर के लिए मैं एलन की अवमानना करते हुए कहना चाहूँगा: "अगर वह सही हैं, तो मैं गलत." हमारी यही सामान्योक्तियाँ और बाध्यताएं मुफलिसी का कारण रहीं. जैसे १९२० के दशक में हम टी.एस. इलियट और टॉमस हार्डी की एक साथ प्रशंसा करने के लिए आज़ाद नहीं थे.

कविता से प्यार करने के हजारों तरीके हैं. एक अच्छा कवि, नए रास्ते बनाता है और वही नए रास्ते अनुगमन के प्रेरक बनते हैं. कवि की आवाज़ और उसकी भाव-भंगिमाएँ हमें कविता में प्रवेश  करना सिखाती हैं. कविता पाठ सहायता करता है - लेकिन यह समीक्षा का स्थानापन्न नहीं है, ये अपर्याप्त है. और कभी-कभी हमें पता ही नहीं चलता कि हम पाठ पसंद कर रहे हैं या कविता.
खैर यहाँ बहुत सारे कवि हैं, ढेरों पाठक हैं- और सुनने के लिए श्रोता भी हैं.

फिर भी अधिकतर पाठक और कवि इस बात से सहमत हैं कि "कविता कोई नहीं पढ़ता"..और हम एक-दूसरे को जोश दिलाते हैं कि ये एकान्तिक कला हमारे भीतर सामाजिकता की चिंगारियां पैदा कर रही है- संभवतः यह नाचीज़ लोगों का समूह है - जो एक जगह एकत्रित होकर महा श्रोता बन गया है -विह्टमैन को यही अपेक्षा रही होगी.



______________________
1989 के Harper पत्रिका में छपे लेख Death to the Death of Poetry के कुछ हिस्सों का  अनुवाद. Donald Hall अंगेजी के सुविख्यात कवि लेखक हैं. अनुवाद कवयित्री कथाकार अपर्णा मनोज ने किया है.

______________
बहसतलब-२- साहित्य का भविष्य