मंगलाचार : शायक आलोक

Posted by arun dev on अगस्त 28, 2012












शायक आलोक ने अपनी सक्रियता से इधर ध्यान खींचा है. उनमें संभावना है. कविताएँ प्रेम के इर्द गिर्द हैं, उनमें डूबती उतराती. यह एक ऐसा प्रक्षेत्र हैं जहां आवेग और संवेदना के सहारे अभिव्यक्ति की शैली अपना आकार लेती है. जो लेती दिख रही है. कुछ कविताएँ प्रचलित प्रेम परिपाटी से अलग हैं और नई भंगिमा रखती हैं. सार्थक रचनात्मकता की उम्मीद के साथ.. 



रेने माग्रित

भागी हुई लडकियां

हौव्वा नहीं होतीं 
घर से भागी हुई लड़कियां 

पहनतीं हैं पूरे कपडे 
संभाल के रखती हैं खुद को 
एक करवट में गुजारी रात के बाद 
सुबह अँधेरे पिता को प्रणाम करती है 
माँ के पैरों को देख आंसू बहाती है 
गली के आखिरी मोड़ तक मुड मुड कर देखती हैं दरवाजा 
घर के देवता को सौंप आती है मिन्नतें अपनी 

प्रेयस को देख मुस्कुराती हैं घर से भागी हुई लड़कियां 
विश्वास से कंधे पर रख देती है सर अपना 
मजबूत होने का नाटक करती 
पकडती है हथेली ऐसे 
जैसे थाम रखा हो पिता ने नन्ही कलाई उसकी 
और सड़क पार कर जाती है 

नए घर के कच्चे मुंडेर से रोज आवाज़ लगाती हैं भागी हुई लड़कियां 
वहीं रोप देती है एक तुलसी बिरवा 
रोज रोज संभालती गृहस्थी अपनी 
कौवों को फेंकती हैं रोटी 
माँ से सुख दुःख की बातें 
चिड़ियों को सुनाती है 

फफक कर रो देती हैं घर से भागी हुई लड़कियां 
घर से भागी हुई लडकियां 
हौव्वा नहीं होती ... 



प्रेमी और पिता

अपनी आवारा कल्पनाओं में एक लड़की छोड़ आती है पिता के नाम एक ख़त
'पिता मैं जा रही हूँ ..रहूंगी वहीं उसके संग.. हाँ पिता उसे प्रेम है मुझसे'
पिता चिट्ठी हवाओं को खिला देते हैं/ सांझा बाती में मगन माँ जान नहीं पाती..

आवारा लड़की प्रेमी से पिता का प्यार नहीं मांगतीं / नहीं पूछती प्रयोजन
दो पुरुषों के बीच उसे नहीं दीखता कोई विरोधाभास - दोनों हैं अलग
पिता का प्यार पिता का, प्रेमी का प्रेम वाला- समझती है खूब
कल्पनाओं में माँ को अब भी सांझा बाती में ही मगन रखती है लड़की.

अपनी आवारा कल्पनाओं में लड़की एक साथ दो बच्चों को जन्म देती है
एक का नाम पिता से पूछ कर रखती है तो दूसरे को 'प्रेम' पुकारती है
सांझा बाती से लौट आई माँ जब आँखें दिखाती है / कल्पनाओं से
बाहर आ रसोई में घुस जाती है/ देर तक चाय पकाती है आवारा लड़की.

आवारा लड़की की आवारा कल्पनाओं में तुलसी पर जलता है दीया
प्रेमी गली में होर्न बजाता रहता है, आवारा आवाजें निकालता है / वह
अनसुनी किये पिता के पैर दबाती है / देर तक माँ के जुड़े सजाती है

अपनी आवारा कल्पनाओं में आम लड़की आवारा हो जाती है रोज एक घडी
आवारा लड़की अपनी कल्पनाओं में आम लड़की हो जाती है !!

कल्पनाओं में जब टकराती हैं दोनों तो सखी बन जाती है /मन के
दुःख बाँट लेती हैं / प्रेमियों के दोष गिनाती हैं / पिता पर प्यार लुटाती हैं
सांझा बाती में मगन माँ से जब भी नजरें मिलाती हैं तो ठहठहा के
एक पल फिर आवारा बन जाती हैं.



फिन्गर्ज़ क्रोस्स्ड

तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान तो नहीं
घटनाक्रम जुड़ता ही नहीं
और शर्त यह कि नहीं हो कोई बात पुरानी
स्वाभाविक बाध्यता कि दुहराव हो 

तुमपर कविता का प्रारम्भ तुम्हारी हंसी से हो
फिर बात हो तुम्हारी हथेलियों की
इरेज कर दिया जाए तुम्हारी हथेली का शुक्र पर्वत
प्रेम को देह के दायरे से खेंच लूँ सायास
कनिष्ठा के नीचे एक गहरी लकीर खींच दूँ 

कविता में लाया जाए तुम्हारे आंसुओं का बहाव
आँखों के ठीक नीचे एक मिट्टी बाँध जोड़ दूँ
तिर्यक मोड़ से जब जब गुजरे नदी
बात तुम्हारे अल्हडपन की हो
अपने होठों में दबाकर तुम्हारे सीत्कार के शब्द 
कविता में ही हो बात उस अंगडाई की भी 

तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान तो नहीं 

इस कविता के मध्य में बादलों की बात हो 
तुम्हारे आँचल की गंध और आवश्यकता से बड़े उस चाँद का बिम्ब हो 
खूब जोर से बहाई जाये ठंडी तेज हवा 
तुम्हारे सिहरने को शब्दों में दर्ज किया जाए 
मध्य में ही लाई जाए तीन तारों की कहानी 
कम्पास से मापकर 
अक्षरों में एक समबाहु त्रिभुज बनाया जाए 
अंगुली के पोर से

अंत नहीं होगा कोई इस कविता का 
अधूरी ही रखी जाये यह पूरी अभिव्यक्ति 
अतृप्त ही रहे तमाम ख्वाहिशें 
लबों का गीलापन वाष्पित हो 
हवा में तैरने का सिलसिला शब्द जारी रखें 
प्रेम के ढाई पदचिन्ह टांकती रहे यह कविता 
''
फिन्गर्ज़ क्रोस्स्ड '' !! 

तुम पर प्रेम कविता में करूँगा 
'
भी' निपात का खुलकर प्रयोग 
तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान 'भी' नहीं.


मेरी कविता की काल्पनिक प्रेयसी

मेरी इस कविता की काल्पनिक प्रेयसी 
पहली बार प्रेम में है 
कविता की शुरुआत में ही 
भूल गयी है लड़की होने के कायदे-क़ानून 
उसकी गूंजती हंसी पर नजरें तरेरती है माँ
बिल्कुल इसी हंसी पर प्रेमी कलेजा थाम लेता है 

यह काल्पनिक प्रेयसी लिखती है चिट्ठियां 
चिट्ठियों के हर्फ़ में हैं सकुचाई सी मन की बातें
हर चिट्ठी में सूई से सिल देती है अपना एक तिल 
पहले चूमती है लिफाफे को कई कई बार 
फिर पता लिखती है 

मैंने बोला है उसे सलीका सीखने को 
कहा है कि खैर करे 
यूँ नहीं निखरना चाहिए उसके चेहरे का रंग 
छत की मुंडेरों तक कैद रखे वह अपने देह की खुशबू 
मुझे मेरी कविता के मध्य में 
मोहल्ले मैं फैली कल्पकथा नहीं चाहिए

इन दिनों चुप रहती हैं काल्पनिक प्रेयसियां 
वे नहीं भूलती अपना पहला प्रेम 
नहीं भूलेगी वह भी 
पढ़ी चिट्ठियों को दबा देगी आँगन में 
चिल्ला कर कहेगी कभी प्रेम नहीं किया उसने 
चुप्पी में कहेगी प्रेम नहीं करुँगी अब 

मेरी कविता की काल्पनिक प्रेयसी ने 
मेरी कविता के अंत में तयशुदा शादी कर ली


 ... रु... कि..

ख़त ... रुमाल
किताबें

माँ की चिट्ठी
जिसमे चिंता से ज्यादा व्याकरण दोष है
मेब्लीन का लिप्स मार्क जिसके प्रयोग की जरुरत थी
कार्डिन की कलम
जिसकी स्याही यहाँ नही मिलती
और मेरा बचा हुआ लड़कीपन

मेरे पास एक डब्बे में यह सब है

मेरे प्यार का टायटेनिक जहाज है यह डब्बा
इसी डब्बे के चारों किनारों पर
पहले प्रेम के अहसास दर्ज हैं
इसी एक किनारे
पैर लटकाए हीरो आखिरी बार हीरोइन की स्केच बनाता है
मैं खामोशी से सीना दबाये रखती हूँ

मायके से मिली
कपड़ों की बनी एक गुडिया
जिसके पूरे माथे सिन्दूर है
इसी डब्बे में रहती है

इस बार जब जोर से चलेगी मानसूनी हवा
गुडिया को समंदर में डाल दूंगी

रुमालों को धोना होगा !
किताबें मैंने बेच दी !!

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शायक आलोक 
8 जनवरी 1983, बेगूसराय (बिहार)
शिक्षा- परा-स्नातक (हिंदी साहित्य)
कविताएँ - कहानियां  पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
सन्मार्ग और नव-बिहार दैनिक समाचार पत्र में पोलिटिकल कमेंट्री और स्तम्भ लेखन
सम्प्रति- कस्बाई समाचार चैनल 'सिटी न्यूज़' और साप्ताहिक अखबार 'बेगूसराय टाईम्स' का सम्पादन
ई पता : shayak.alok.journo@gmail.com