एकाग्र : मैनेजर पाण्डेय की आलोचना दृष्टि

Posted by arun dev on सितंबर 23, 2012

:: जन्म दिन मुबारक :: 










आलोचना भी रचना है. साहित्य के संदर्भ से वह समाज और संस्कृति के प्रश्नों तक जाती है. वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय सहित्य को देखने की सुगठित वैचारिकी रखते हैं. उनके पास अर्जित अनभै सच है जिसने हिंदी आलोचना को एक विश्वसनीयता प्रदान की है. हिंदी में उपनिवेशवाद विरोधी दृष्टि को उन्होंने एक़ सुसंगत आधार दिया है. 
युवा आलोचक प्रणय कृष्ण का विस्तृत आलेख जो  सखाराम गणेश देउस्कर, महावीर प्रसाद द्विवेदी और माधवराव सप्रे के उपनिवेशवाद विरोधी दृष्टि के प्रो. पाण्डेय के अध्ययन पर आधारित है. 


उपनिवेशवाद के तीन कीर्तिमान                 
(सखाराम गणेश देउस्कर, महावीर प्रसाद द्विवेदी, माधवराव सप्रे)
प्रणय कृष्ण

किताबों और व्यक्तियों की जन्मशतियाँ, जयंतियां आदि न तो महज कर्मकांड हैं और न ही आलोचना की दृष्टि में श्रेष्ठताक्रम में हेर-फेर करने की कवायदें. यह मुख्यतः व्यक्तियों और कवियों की विगत अर्थवत्ता और वर्तमान सार्थकता की खोज का अवसर हैं. सांस्कृतिक स्मृतिलोप के खिलाफ़ उनके पुनर्जीवन की चेष्टाएँ हैं, समकालीन जन-जीवन के साथ उनके संबंध का पुनः संधान हैं. प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने बांग्ला पुस्तक "देशेर कथा" के लेखक सखाराम गणेश देउस्कर 1904 ई. के प्रकाशन के सौ साल पूरा होने पर उसके बाबूराव विष्णु पराडकर  कृत हिंदी अनुवाद देश की बात को एक विस्तृत भूमिका के साथ फिर से प्रकाशित कराया. इसी तरह संपत्तिशास्त्र के लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी, 1908 ई. अपने प्रकशन के 86 साल बाद पाण्डेय जी की विस्तृत प्रस्तावना के साथ प्रकाशित हुई और संपत्तिशास्त्र का जो संस्करण हमें उपलब्ध है वह यश पब्लिकेशन दिल्ली से 2009 में प्रकाशित हुआ. इन युगांतकारी पुस्तकों के साथ-साथ पाण्डेय जी ने "तद्भव" पत्रिका के जनवरी 2008 के अंक 17 में "माधवराव सप्रे का महत्त्व" शीर्षक लेख लिखकर हिंदी में विस्मृत कर दिए गए नवजागरण के एक महान व्यक्तित्व के कृतित्व को आज के दौर में फिर से जीवंत बना दिया. यह तीनों काम एक ही परियोजना का हिस्सा हैं.

जिस तरह 1997 में "संकट के बावजूद" शीर्षक पुस्तक की भूमिका में मैनेजर पाण्डेय ने सोवियत संघ के विघटन से उपजे वैचारिक कुहासे और निराशा को छांटने की आलोचकीय पहल की वैसे ही उपर्युक्त दोनों पुस्तकों की भूमिकाएँ और माधवराव सप्रे पर उनका लेख "नव उपनिवेशवाद, भूमंडलीकरण, निजीकरण, उदारीकरण के वर्तमान दौर में पुराने उपनिवेशवाद के खिलाफ़ चले मुक्ति संग्राम, उसकी जटिलताओं और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता को रेखांकित कर प्रतिरोध संस्कृति कर्म का परिप्रेक्ष्य विकसित और समृद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है. यह तीनों पाठ उन लेखकों और कृतियों से सम्बद्ध हैं जिनका रचनाकाल एक ही है. यानी बीसवीं सदी का पहला दशक 21 वीं सदी के पहले दशक में इनका पुनर्पाठ विशेष महत्त्व रखता है. जिस समय हम यह लेख लिख रहे हैं, अमेरिका अभूतपूर्व ऋण संकट से जूझ रहा है. सन 2008 में यह संकट अमरीकी बैंकों की आत्महत्या में प्रकट हुआ था. कुल मिलाकर पूँजी की सत्ता का सहजात रोग यानी मंदी उसका उसका पीछा नहीं छोड़ रही. मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद इस संकट से निजात पाने के लिए जो भी प्रयत्न करेगा उसकी आयु पिछले प्रयत्न से कम होगी. इसे हम अपने सामने प्रत्यक्ष घटता देख रहे हैं. दूसरे विश्वयुद्ध और उसके बाद के कींसवाद (Keynes) ने पिछली मंदी से विश्व पूंजीवाद को उबारा. लेकिन यह उपाय अनवरत चलते अमरीकी युद्धों के बावजूद 1980 के दशक तक आते-आते काम देना बंद कर चुका था. नयी अर्थनीति और विश्व व्यवस्था के नाम से विख्यात मंदी से बचने के जो खूंखार नए उपाय थैचर, रीगन ने 1980 के दशक में शुरू किये वे इतना भी न जीते रहते यदि सोवियत विघटन का तोहफा विश्व पूंजीवाद को न मिला होता. अमरीकी युद्ध लगातार जारी ही हैं. विश्व स्तर का प्रभाव रखनेवाली कोई बड़ी समाजवादी शक्ति भी फिलहाल नहीं है. फिर भी 2008 और अब 2011 के अमरीकी संकट यही बतला रहे हैं कि ये नए उपाय भी पूँजी के लिए अपनी उपादेयता खोते जा रहे हैं. "संकट के बावजूद" की भूमिका का सच और अधिक उजागर है. इस परिप्रेक्ष्य में उपर्युक्त तीनों पाठों का पुनर्पाठ गंभीर महत्त्व रखता है. 

ऐसा नहीं कि इन पाठों को रेखांकित किये जाने की पहल मैनेजर जी से पहले नहीं हुई. हिंदी के महान उपनिवेशवाद विरोधी मार्क्सवादी आलोचक डॉक्टर रामविलास शर्मा ने इन उपनिवेश विरोधी पाठों के महत्त्व को पहले भी रेखांकित किया था, लेकिन तब सन्दर्भ भी थोड़े अलग थे और दृष्टि भी थोड़ी अलग थी. रामविलास जी के पुनर्पाठ ऐसे समय के हैं जब संकट की आज जैसी गहरी और सर्वग्रासी छाया ने हमारी दुनिया को घेर रखा था. ऐसे में उनके द्वारा किये पुनर्पाठ में इन पाठों का ऐतिहासिक महत्त्व ही ज्यादा उभरकर आया. उनकी वर्तमान अर्थवत्ता का विवेचन उतना स्थान न पा सका. मैनेजर पाण्डेय ने इस सन्दर्भ में रामविलास जी के योगदान का हवाला भी दिया है. संपत्तिशास्त्र की प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि संपत्तिशास्त्र को दूसरा जीवन 1977 में मिला, जब डॉक्टर रामविलास शर्मा ने "महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण" नाम की पुस्तक में उसका विस्तार से विवेचन करते हुए उसकी "विगत सार्थकता और वर्तमान अर्थवत्ता" की व्याख्या की, तब "सम्पत्तिशास्त्र" का महत्त्व हिंदी के विद्वजनों की कुछ समझ में आया. हालांकि "महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण" में "सम्पत्तिशास्त्र" के महत्त्व स्थापन की जो एकांगी शैली है उसने पाठकों को जितना चौंकाया उतना उनमें विश्वास पैदा नहीं किया. इसी पुस्तक में रामविलास जी ने मई 1907 की "सरस्वती" में छपे माधवराव सप्रे के "हड़ताल" शीर्षक लेख के हवाले से उनके महत्व पर कुछ विचार किया है. इस लेख में सप्रे जी ने मजदूरों के संगठन और आन्दोलन के महत्त्व पर लिखते हुए मजूदरों के हड़ताल के अधिकार की हिमायत की है.

कुछ बौद्धिकों की यह बात कि मार्क्स एंगल्स की कृतियों के भारत में काफी देर से खासतौर से सोवियत क्रांति के बाद उपलब्ध होने के कारण भारत में मजदूर आन्दोलन और संगठन की देर से शुरुआत हुई, रामविलास जी के अनुसार गलत है, क्योंकि माधवराव सप्रे के इस लेख में वे मुख्य बातें आ गयी हैं जिनसे मजदूर संगठित होकर अपना आन्दोलन चला सकते थे. रामविलास जी का यह कहना कितनी दूर तक सही है हम नहीं कह सकते, लेकिन कम से कम सप्रे जी के महत्त्व पर कुछ विचार तो उन्होंने जरूर किया वर्ना तो पाण्डेय जी के शब्दों में ऐसे लेखक और समाजसेवक को आज का हिंदी साहित्य संसार लगभग भूल गया है. अब न उनकी किताबें मिलती हैं और न उनकी चर्चा होती है. केवल देवी प्रसाद वर्मा ने उनके कुछ निबंध संग्रहों के संपादन और प्रकाशन का काम किया है और एक कहानी संग्रह भी छपवाया है जब माधवराव सप्रे ने हिंदी में समालोचना का स्वरूप निर्मित करने का प्रयत्न आरम्भ किया था तब हिंदी आलोचना आरंभिक अवस्था में थी. भारतेंदु युग में बालकृष्ण भट्ट और चौधरी बद्रीनारायण प्रेमघन ने उसका सूत्रपात किया था लेकिन सप्रे जी के प्रयत्नों से वह विकसित हुई और उसमें व्यापकता आई. यह देखकर आश्चर्य होता है कि हिंदी साहित्य के किसी इतिहास में या हिंदी आलोचना के किसी इतिहास में सप्रे जी के समालोचन कर्म का कहीं कोई मूल्यांकन नहीं है बल्कि समालोचक के रूप में उनके नाम तक का उल्लेख नहीं है. यह विस्मरण अनायास है या सायास..यह कहीं उस प्रवृति का परिणाम तो नहीं है जिसे जी.एन.देवी सांस्कृतिक स्मृतिलोप कहते हैं! जो भी हो हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन और हिंदी आलोचना का इतिहास माधवराव सप्रे के प्रसंग में स्मृतिहीनता का शिकार है. रामविलास जी ने सप्रे जी के "हड़ताल" शीर्षक लेख के ज़रिये भले ही उनके विचारों के महत्त्व पर प्रकाश डाला, लेकिन यदि समग्रतः उन्होंने उन पर विचार नहीं किया तो इसका कारण सप्रे जी के विषय में उनकी यह राय हो सकती है जो उन्हीं के शब्दों में यूँ है,सप्रे जी के अन्य लेखों से विदित होता है कि वह यथेष्ट प्राचीनता प्रेमी थे. पुरानी समाज व्यवस्था उन्हें प्रिय थी. द्विवेदी जी उस समाज व्यवस्था को दोषपूर्ण मानते थे.उसकी आलोचना करते थे. सप्रे जी के बारे में रामविलास जी का यह कथन कितना असंगत है यह मैनेजर पाण्डेय के लेख को पढ़कर पता चलता है. पाण्डेय जी ने लिखा है कि नवजागरण की केन्द्रीय विशेषता है स्वाधीनता की चेतना


भारतीय नवजागरण में यह चेतना अनेक रूपों में व्यक्त हुई है. उसका सबसे व्यापक रूप उपनिवेशवाद विरोधी भावना के जागरण में दिखाई देता है.उसीका दूसरा रूप आत्मलोचन की प्रवृति के विकास में भी मिलता है. यह आत्मलोचन की प्रवृति भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य के अतीत के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत और अतीत के बोध तथा बोझ में अंतर की समझ और उस बोझ से मुक्ति की आकांक्षा में प्रकट होती है. आत्मलोचन की प्रवृति का लक्ष्य भी उपनिवेशवाद विरोधी चेतना को अधिक तेजस्वी और सत्य सम्पन्न बनाना ही है. माधवराव सप्रे के चिंतन और लेखन में ये विशेषताएँ मौजूद हैं. अपने इस कथन को मैनेजर पाण्डेय ने सप्रे जी के लेखन से कई उदाहरण देकर पुष्ट किया है. 1901 में छत्तीसगढ़ मित्र में स्त्री शिक्षा विषयक "बालाबोधिनी" नामक ग्रन्थ की समीक्षा करते हुए उस ग्रन्थ में स्त्री स्वातंत्र्य के निषेध और दूसरी प्रतिक्रियावादी बातों पर सप्रे जी ने करारा व्यंग्य किया है. इस ग्रन्थ में लेखक ने पति को गुरू मानने, उसकी भक्ति और सेवा करने तथा उसे सदा संतुष्ट रखना ही स्त्रियों का कर्तव्य बताया है.इस पर व्यंग्य करते हुए सप्रे जी ने लिखा है, " वाह! स्त्रियों के कर्तव्य तो आपने खूब कहे! क्या यही स्त्रियों की योग्यता है? क्या यही उनके जन्म का उद्देश्य है? क्या यही उनके जन्म की सार्थकता है? हा! ऐसे ही पक्षपातों से स्त्रियों का सारा जन्म नष्ट हो गया." इतना ही नहीं..आगे वे लिखते हैं, "हम यह पूछते हैं कि पुरुष भी अपनी स्त्री के वश में क्यों न रहे? पहले तो यही बुरा है कि कोई व्यक्ति जबरदस्ती किसी दूसरे के वश में किया जाए. व्यक्ति स्वातंत्र्य का नाश होते ही स्वाभाविक प्रेम का लोप हो जाता है." सप्रे जी की आधुनिकता उनके समीक्षा कर्म में लगातार प्रकट होती है. श्रीधर पाठक के "जगत सच्चाई सार" की विस्तृत समीक्षा लिखते हुए उन्होंने आरम्भ में ही जगत को मिथ्या मानने वाले दृष्टिकोण का खंडन किया है. उन्होंने मिश्रबंधुओं के काव्य "लव कुश चरित्र" की समीक्षा लिखते हुए पहली आपत्ति ही यह की है कि यह रचना आधुनिक रुचि और मानसिकता के अनुकूल नहीं है. एक उर्दू किताब के एक भाग का हिंदी अनुवाद "भारत गौरवादर्श" के नाम से छपा. इस किताब में एक जगह लिखा है कि व्यास जी ने संजय को एक दूरबीन दी थी कि यहाँ से कुरुक्षेत्र का वृत्तांत महाराज धृतराष्ट्र को बतलाते रहना. इस बात को प्रमाणिक बनाने के लिए महाभारत के एक श्लोक का बिना उद्धृत किये हवाला दिया गया है.

सप्रे जी ने उस श्लोक को उद्धृत करते हुए इस झूठ का खंडन किया कि भारत में महाभारत काल में दूरबीन थी. समीक्षा के क्रम में उन्होंने आगे लिखा क्या इसी प्रकार के पॉलिश चढ़ाये चित्र से भारत का सत्य स्वरूप प्रकाशित हो जाएगा.यह बात तो इतिहास के अनुभव के बिलकुल विरुद्ध जान पड़ती है कि भारतवर्ष राजनीति,शिक्षा,सुशासन,गणित ,ज्योतिष, भूगोल,शिल्प, रसायन आदि में सम्पूर्ण संसार का शिक्षणालय था, जिसने सब प्रकार के विषयों में पूर्ण उन्नति कर ली थी और उसके लिए कोई विषय सीखने के लिए नहीं बचा था और न किसी विषय में कुछ उन्नति करने को रह गई थी. पाण्डेय जी ने सप्रे जी के लेखन से ये उदाहरण रामविलास जी के जवाब में नहीं बल्कि सप्रे जी कि आधुनिकता और इतिहास दृष्टि के महत्त्व को रेखांकित करने के लिए दिए हैं. लेकिन इन उदाहरणों के पढ़ने के बाद सप्रे जी के कथित प्राचीनता प्रेम के आरोप का स्वतः प्रत्याख्यान हो जाता है.

सखाराम गणेश देउस्कर कि आन्दोलनकारी पुस्तक के महत्त्व को भी रामविलास जी ने पहचाना. पाण्डेय जी ने लिखा है कि लम्बे समय के बाद हिंदी में एक बार फिर "देश की बात" के महत्त्व की पहचान रामविलास शर्मा की पुस्तक "भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश" के खंड -२ में हुई है. शर्मा जी ने सबाल्टर्न इतिहास लेखन की दृष्टि और पद्धति से सखाराम गणेश देउस्कर की इतिहास दृष्टि की तुलना करते हुए उनकी विशेषताओं का विवेचन किया है. "महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण" शीर्षक पुस्तक में देउस्कर कृत "देश की बात" का ज़िक्र नहीं आता लेकिन इसी शीर्षक से द्विवेदी जी के लेख का ज़िक्र आता है. शर्मा जी ने लिखा है जुलाई 1914 की "सरस्वती" में द्विवेदी जी ने एक टिप्पणी लिखी "देश की बात", इसमें उन्होंने सुधारवादियों की देशभक्ति की कड़ी आलोचना की. यह आश्चर्यजनक है कि उक्त उल्लेख के साथ रामविलास जी ने देउस्कर की पुस्तक के किसी सन्दर्भ की जरूरत नहीं समझी. मैनेजर पाण्डेय रेखांकित करते हैं कि "सम्पत्तिशास्त्र" की भूमिका में गिरीश चन्द्र सेन की अर्थ शास्त्र विषयक दो बांग्ला पुस्तकों का तो ज़िक्र किया लेकिन "देश की बात" का नहीं. मैनेजर पाण्डेय ने द्विवेदी जी के "सम्पत्तिशास्त्र" और देउस्कर कृत "देश की बात"को निगाह में रखकर लिखा. डॉ. रामविलास शर्मा ने "सम्पत्तिशास्त्र" के महत्त्व के प्रसंग में लिखा है, "भारत के सन्दर्भ में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की वैसी आलोचना उस समय तक अंग्रेजी में भी प्रकाशित नहीं हुई थी." अंग्रेजी में भले ही वैसी आलोचना प्रकाशित नहीं हुई हो लेकिन सखाराम गणेश देउस्कर की देशेर कथा में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आलोचना "सम्पत्तिशास्त्र " से अधिक व्यापक, गहरी और प्रभावशाली है. प्रभाव और लोकप्रियता की दृष्टि से देशेर कथा जैसी क्रन्तिकारी किताब शायद ही किसी भारतीय भाषा में स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान लिखी गई हो इसलिए सम्पत्तिशास्त्र के महत्त्व की वास्तविकता ठीक ढंग से समझने के लिए उसे 1940 में छपी रजनी पामदत्त की किताब "आज का भारत" से नहीं बल्कि 1904 में छपी सखाराम गणेश देउस्कर की "देशेर कथा" के साथ मिलाकर पढ़ना उचित होगा.  

अकारण नहीं है कि आलोचना की दुनिया में तीनों पाठों के महत्त्व को न्यूनाधिक रूप से पहले रामविलास शर्मा और आगे विस्तार के साथ मैनेजर पाण्डेय ने रेखांकित किया. इसका मुख्य कारण दोनों आलोचकों की सक्रिय उपनिवेशवाद विरोधी मार्क्सवादी दृष्टि है जिसकी प्रासंगिकता और जरूरत न केवल देश की आज़ादी के बाद बनी रही बल्कि ईक्कीसवीं सदी में भी बनी हुई है. इससे यह भी ज़ाहिर है कि आज जिसे उत्तर औपनिवेशिक आलोचना कहा जाता है उससे भिन्न कोटि का उपनिवेशवाद विरोधी आलोचकीय चिंतन हिंदी में मौजूद रहा है. उत्तर औपनिवेशिकता संभवतः पहला ऐसा विमर्श है जो कि पश्चिम में पैदा तो हुआ लेकिन पश्चिम के बारे में नहीं है, बल्कि उपनिवेशित 'अन्य' के बारे में है. लेकिन अनुवादजीवी होने के चलते पूरब के बारे में मुख्यतः पश्चिमी पाठों की शक्ति संरचना के विखंडन पर केन्द्रित होने के चलते और अंततः उत्तर संरचनावादी संकतशास्त्रीय पाठनीयता की पद्धति अपनाने के कारण उसके आलोचनात्मक उपक्रम बहुधा वास्तविक उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के साथ जन्मे पाठों के साथ ऐतिहासिक यथार्थपरक संवाद बना पाने में नाकामयाब रहते हैं. उत्तर औपनिवेशिक विमर्शों में 'उपनिवेश' जैसा पद भी राजनीतिक अर्थशास्त्र के संदर्भ से खिसक कर अपने व्युत्पत्तिमूलक अर्थों में बहुधा प्रयुक्त होने लगा है. रामविलास शर्मा और मैनेजर पाण्डेय की आलोचना में उपनिवेशवाद विरोधी विमर्श उपरोक्त सभी कमजोरियों से मुक्त है. इसका प्रमुख कारण इन दोनों आलोचकों का मार्क्सवादी होना है जिसके कारण ही वे जानते हैं कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद पूंजीवाद का आकस्मिक रूप नहीं बल्कि अनिवार्य परिणाम है. इस लेख में हम मैनेजर पाण्डेय द्वारा चयनित जिन तीन पाठों के बारे में बात कर रहे हैं उन तीनों के चयन का समान अधिकार है. उपनिवेशवाद विरोध और उसकी समकालीनता महज अकादमिक नहीं बल्कि वास्तविक जीवन को संबोधित है इसलिए "देश की बात" की भूमिका में पाण्डेय जी ने लिखा है, आज़ादी के बाद पैदा होने वाली पीढ़ी को भारत में अंग्रेजी राज के दमन और शोषण का अनुभव नहीं है और वह पराधीनता के यथार्थ के साक्षात ज्ञान से भी अपरिचित है शायद इसलिए वह भूमंडलीकरण के मायालोक की ओर सबसे अधिक दौड़ती दिखाई देती है. ऐसे में पराधीनता के अनुभव और ज्ञान का साक्षात्कार करनेवाली पुस्तक "देश की बात" का नयी पीढ़ी के लिए विशेष महत्त्व है ताकि वह भारत के अतीत को जान बूझकर अपने वर्तमान और भविष्य की दिशा तय कर सके.उनके लिए यह पुस्तक वर्तमान को आलोकित करनेवाली और भविष्य का मार्गदर्शन करनेवाली समृति की कौंध सिद्ध होगी.

उपनिवेशवाद का देशज विश्लेषण और प्रतिकार :                    

साम्राज्यवाद की लूट और झूठ की व्यवस्था के पाखंड का पर्दाफ़ाश इन तीनों पाठों की विशेषता है. देशज अर्थशास्त्रीय चिंतन में बांग्ला से अनूदित "देशेर कथा" से लेकर हिंदी में माधवराव सप्रे के अनेक लेख और "स्वदेशी आंदोलन और बायकाट"शीर्षक पुस्तक, 1906 में द्विवेदी जी की "सम्पत्तिशास्त्र", राधा मोहन गोकुल जी की "देश का धन"1910 और पारसनाथ द्विवेदी की "देश की दशा" 1915 आदि पुस्तकें शामिल हैं जो इस बात का प्रमाण हैं कि औपनिवेशिक युग में अर्थशास्त्र सहित मानविकी के तमाम अनुशासनों में देशी मनीषा ने जो कुछ भी सिरजा उसका मूल प्रस्थान बिंदु उपनिवेश विरोध और जनता की मुक्ति की आकांक्षा ही है. सम्पत्तिशास्त्र लिखते वक्त द्विवेदी जी हमेशा यह याद रखते हैं कि वे ब्रिटिश उपनिवेशवाद के शिकार भारत का अर्थशास्त्र लिख रहे हैं. माधवराव सप्रे तो राजनीति,इतिहास,अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और विज्ञान से संबंधित विषयों पर लिखते हुए प्रत्यक्षतः और मुखर तौर पर उपनिवेशवाद, अंग्रेजी राज विरोधी, होने के चलते प्रतिबंध और गिरफ़्तारी झेलते हैं. देउस्कर कि देशेर कथा अपने शीर्षक में ही इस प्रस्थान बिंदु का पता देती है और प्रतिबंधित की जाती है. मैनेजर पाण्डेय यह रेखांकित करना नहीं भूलते कि अंग्रेजी राज में भारत के शोषण की प्रक्रिया का विवेचन देउस्कर जी से पहले दादाभाई नौरोजी, रमेशचंद्र दत्त और विलियम डिग्वी ने भी किया था और खुद देउस्कर जी ने देशेर कथा लिखने में इनके लेखन से मदद ली.लेकिन एक तो अंग्रेजी में होने के चलते ये लेखन सामान्य पढ़े-लिखे लोगों की पहुँच से दूर था. दूसरे देउस्कर की पुस्तक का लक्ष्य आम जनता में स्वदेशी की भावना जगाना और स्वाधीनता की चेतना पैदा करना था. ये लक्ष्य नौरोजी, रमेशचंद्र दत्त और डिग्वी के सामने न था.

भारत की राजनीतिक आज़ादी के साथ पूंजीवाद की विश्व व्यवस्था में उसके आत्मसातन दूसरे शब्दों में अर्ध सामंती, अर्ध औपनिवेशिक, विशेषताओं वाले भारतीय पूंजीवाद की आलोचना दृष्टि से सम्पन्न देशी भाषाओँ में ज्ञान सृजन का काम रुक सा गया. इसके कारणों का विवेचन स्वतंत्र चर्चा की मांग करता है. प्रगतिशील आंदोलन की प्रेरणा से इस दिशा में जो कुछ काम हुआ भी वह अंग्रेजी में ही ज्यादातर हुआ. हम अन्य भारतीय भाषाओँ के बारे में अधिकार से नहीं कह सकते, लेकिन हिंदी मुख्यतः साहित्य की भाषा बनती गई. स्वदेशी अनुभव प्रसूत ज्ञान की भाषा वह नहीं रह गई.

इन तीनों पाठों में मैनेजर पाण्डेय ने बराबर यह रेखांकित किया है कि इनकी भाषा अनासक्त अकादमिक भाषा नहीं बल्कि अनुभव के दंश से आंदोलित, फिर भी तथ्यपरक, विश्लेषणात्मक और वस्तुपरक ज्ञान की भाषा है. "देश की बात" की भाषा के संबंध में मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं कि देउस्कर जी की यह पुस्तक पराधीनता की पीड़ा से बेचैन और स्वाधीनता की आकांक्षा से उद्दीप्त मानस की रचना है. इसलिए उसकी भाषा में तर्कशीलता के साथ गहरा भावावेग भी है; दुःख के साथ आक्रोश भी है और बोधगम्य सहजता के साथ विचलित करनेवाली प्रवाहमयता भी है. इसी तरह माधवराव सप्रे की पुस्तक "स्वदेशी और बायकाट" के बारे में पाण्डेय जी ने लिखा है कि उनके बहिष्कार के समर्थन को भावुकता का परिणाम न माना जाए बल्कि उसे ऐतिहासिक अनिवार्यता समझा जाए, इसलिए उन्होंने आयरलैंड, अमेरिका, इटली,चीन और इंग्लैंड में बहिष्कार के इतिहास का विवेचन करते हुए यह विश्वास व्यक्त किया था कि "प्रजा कितनी भी दुर्बल हो, वह निःशस्त्र  क्यों न हो, यदि वह दृढ़ निश्चय और ऐक्य भाव से कुछ करना चाहे तो सब कुछ साध्य हो सकता है. वह अन्यायी शासनकर्ताओं और अविचारी सत्ताधारियों को राह पर ला सकती है." सप्रे जी का यह कथा तब जितना प्रेरणादायक था उतना ही आज भी सार्थक और जनता के काम का है. "सम्पत्तिशास्त्र" कि प्रस्तावना में वह लिखते हैं कि "संपत्ति शास्त्र" विशेषज्ञों के लिए लिखी गई पुस्तक नहीं है, इसमें सरल बात को जटिल बनाकर कहने की जगह जटिल से जटिल बात को सरल-सहज रूप में कहने की कोशिश है. इस पुस्तक में अर्थशास्त्र के जटिल सिद्धांतों को साधारण जनता की रोज़-ब-रोज़ की जिन्दगी के परिचित उदाहरणों से समझाया गया है. सम्पत्तिशास्त्र की विश्लेषण पद्धति लेखन शैली और भाषा में एक तरह की संवादधर्मिता है जो पाठकों को आकर्षित करती है, उन्हें आत्मीय बनाती है.

भारत किसानों का देश रहा है और आज भी है इसलिए भारत एं क्रांति चाहनेवाले और उसके लिए प्रयासरत लोग और जमातें कृषि क्रांति को आज भी भारतीय क्रांति की धुरी मानती हैं. इन तीनों पाठों में औपनिवेशिक दौर में किसानों की तबाही का वर्णन, विवेचन और विरोध केन्द्रीय तत्त्व है. मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है कि भारतीय किसानों की दुर्दशा के बारे में देउस्कर की चिंता और समझ आज भी हमारे लिए उपयोगी है. मैनेजर पाण्डेय अन्यत्र भी भूमंडलीकरण के दौर में भारत में किसानों की आत्महत्याओं, जो अब तक दो लाख से भी ज्यादा की संख्या पार कर चुकी है और यह परिघटना जो दुनिया के इतिहास में अभूतपूर्व परिघटना है को लगातार अपने भाषणों और लेखन में उठाते हुए जनजागरण के लिए प्रयत्नशील हैं. देउस्कर ने न केवल "देश की बात" में "किसानों का सर्वनाश" शीर्षक एक अध्याय ही लिखा बल्कि इसी शीर्षक से 1904 में उन्होंने बांगला में एक स्वतंत्र पुस्तक लिखी. "सम्पत्तिशास्त्र" की प्रस्तावना में भी पाण्डेय जी लिखते हैं कि सम्पत्तिशास्त्र के लेखक के मन में सबसे अधिक आक्रोश और बेचैनी भारत के किसानों की तबाही और कृषि की बर्बादी को लेकर है इसलिए पुस्तक में सबसे अधिक चर्चा कृषि और किसान जीवन की समस्याओं की है. "देश की बात" की प्रस्तावना में पाण्डेय जी ने लिखा है कि पूंजीवाद किसानों को सामंती व्यवस्था का अवशेष मानता है इसलिए उनका विनाश अपनी उन्नति के लिए जरूरी समझता है. हालांकि न तो पश्चिमी पूंजीवादी देशों में ही खेती-किसानी तबाह हुई; उद्योग में रूपांतरित भले हुई और न ही उपनिवेशों में उन्होंने खेती को तबाह सामंती अवशेष मानकर किया उलटे उन्होंने सामंतवाद के साथ गठजोड़ कर ज़मीदारी, महाजनी व्यवस्था के माध्यम से किसानों को तबाह किया. पूंजीवाद का सामन्तवाद से विरोध का एक खास अल्पस्थायी ऐतिहासिक क्षण रहा है जिसमें सामंतवादी उत्पादन संबंधों की गिरफ्त में फंसे ज़मीन और अन्य संसाधन तथा श्रम शक्ति को स्वायत्त कर औद्योगिक पूँजी में बदलने की कोशिश पूंजीवाद की होती है और सामंतवाद इसके खिलाफ खड़ा होता है.

यह प्रक्रिया किसानों को मजदूर बनाने की भी प्रक्रिया है जो खासी रक्तरंजित है और मजदूर बनते किसानों के लिए भीषण दुखदायी होती है. विकसित पूंजीवादी देशों में सामंतवाद से लड़ाई मोल-तोल, सुलह-समझौते की लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया में सामन्तवाद की हार हुई और खेती से स्वायत्त हुए संसाधन पूँजी में तब्दील हुए. खुद खेती भी उद्योग बनी. इस प्रक्रिया में इन देशों में किसान बड़े पैमाने पर पूँजी के तंत्र में समाहित हुए.पूरी तरह साफ़ नहीं कर दिए गए. शुरू में पिछड़े पूँजीवादी देशों में भले ही कई जगह पूँजी के साथ उनका टकराव जरूर हुआ तो दूसरी ओर उपनिवेशों का पूंजीवादी विकास कभी भी औपनिवेशिक ताकत का लक्ष्य नहीं था. उन्हें अपने मूल देशों में औद्योगिक क्रांति को संपन्न करना था. इसके लिए देशी उद्योग-धंधों को तबाह कर,अपने उत्पादों के लिए बाज़ार कायम करने के साथ जोर ज़बरदस्ती से अपने उपनिवेशों से आदिम पूँजी संचय करने के लिए उन्होंने खेती और किसानों पर कर और लगान का भयानक बोझ डाला. जिसके चलते करोड़ों किसान अकाल के ग्रास बने. "सम्पत्तिशास्त्र"और "देश की बात" दोनों में इस दारुण प्रक्रिया का सविस्तार वर्णन है. इसलिए उपनिवेशवादियों से विरासत में मिले भारतीय पूंजीवाद का चरित्र उत्पादन प्रक्रिया में तमाम परिवर्तनों के बावजूद अभी भी बहुलांश में अर्ध सामंती और अर्ध औपनिवेशिक बना हुआ है तथा भारतीय राजसत्ता भी "पूंजीपति भूस्वामी" हितों के गठजोड़ की ही राजसत्ता है. खेती में पूंजीवादी हस्तक्षेप पूँजी के युग की अनिवार्य प्रक्रिया है.

औपनिवेशिक दौर में यह हस्तक्षेप भारत जैसे उपनिवेशों में किसानों के विनाश की शक्ल में आया. बड़े ज़मींदारों और राजे-रजवाड़ों का कुछ नहीं बिगड़ा. भूदान जैसे टोटकों से भूमिहीनों को कुछ खास राहत नहीं मिली.किसानों की सहमति पर आधारित सामूहिक या सहकारी खेती या खेती के राष्ट्रीयकरण के ज़रिये; जैसा कि अम्बेडकर का सुझाव था उत्पादकता बढ़ाकर बगैर कृषि पर आधारित आबादी को बेदखल और बर्बाद किया.खेती से निवेश योग्य पूँजी प्राप्त कि जा सकती थी लेकिन इस रस्ते में सबसे बड़ी बाधा खुद भारतीय पूंजीवाद का अर्ध औपनिवेशिक और अर्ध सामन्ती चरित्र ही था. खेतिहर समुदाय की आय में इज़ाफा न होने का मतलब था राष्ट्रीय बाज़ार का संकुचित रह जाना. आज़ादी के बाद किसानों पर भले ही क़र्ज़ का वह बोझ न रहा हो जो कि औपनिवेशिक दौर में था, लेकिन ज्यादातर किसान सीमान्त और छोटे किसान ही बने रहे.भूमिहीनों की संख्या बढ़ती ही गई. खाद, बिजली, पानी पर सब्सिडी और उपज के लाभकारी मूल्यों पर सरकारी खरीद की व्यवस्था, किसान संघर्षों की बदौलत भूमंडलीकरण के दौर से पहले तक ज़ारी रही जिसके चलते खेतिहर आबादी किसी तरह जीती रह सकी. बेशक इन नीतियों से किसानों का एक छोटा हिस्सा अमीर भी हुआ और तथाकथित हरित क्रांति के क्षेत्रों में भारत के किसानों का एक हिस्सा पूंजीवादी किसानों में रूपांतरित भी हुआ. लेकिन आज़ादी के बाद भी बारम्बार कृषि संकट के दौर आते रहे और भूमि, मजदूरी तथा बंटाईदारी व लाभकारी मूल्यों के सवालों पर किसान आंदोलन बराबर फूटते रहे.

भूमंडलीकरण, निजीकरण, उदारीकरण के वर्तमान दौर ने एक बार फिर औपनिवेशिक दौर की याद ताज़ा कर दी है. खेती की सब्सिडी और सरकारी मूल्य समर्थन की व्यवस्था खत्म किये जाने से खेती किसानों के लिए उतरोत्तर घाटे का सौदा होती गई है. अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के दबाव में कृषि उत्पाद भारी संख्या में निर्बंध रूप से आयात किये जाने लगे हैं. पाण्डेय जी ने "सम्पत्तिशास्त्र" में "बंधन रहित और बंधनविहित व्यापार" नामक अध्याय में द्विवेदी जी की इस राय को उचित ही रेखांकित किया है कि विकसित देशों के साथ व्यापार करते हुए पिछड़े हुए देशों को कुछ काल के लिए व्यापार बंधन अवश्य रखना चाहिए और चेताया भी है कि द्विवेदी जी की यह राय आज भी तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के लिए और भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है. आज विश्व मंडी में भारत के किसानों को किसी भी देशी संरक्षण से मरहूम करके खड़ा कर दिया है. जिन विकसित देशों ने भारत पर खेती में सब्सिडी खत्म किये जाने का दबाव डाला उन्होंने अपने यहाँ भारी सब्सिडी ज़ारी रखी.

दुनिया के बाज़ार में नकली फसलों से लाभ प्राप्त करने का सब्ज़बाग भारत के किसानों को दिखाया गया. लेकिन असमान प्रतियोगिता में वे भला कहाँ ठहरते. क़र्ज़ के मकड़जाल में फंस भारत के अपेक्षतया विकसित प्रान्तों के किसानों ने पिछले दो दशकों में दो लाख से भी अधिक संख्या में आत्महत्याएँ की हैं. दूसरी ओर खेती घाटे का सौदा बन जाने के चलते उस पर निर्भर बड़ी आबादी का अनवरत विस्थापन जारी है. ये लोग रोज़ी-रोज़गार की तलाश में शहरी इलाकों में दर-दर भटकते हैं ओर साल के कुछ ही महीने छोटे-मोटे रोज़गार का जुगाड़ कर पाते हैं. २० रूपये रोज़ पर गुज़ारा करनेवाले 70 फीसदी हिन्दुस्तानियों में अधिकांश सतत विस्थापित सीमांत छोटे-गरीब किसान ओर खेत मजदूर हैं. अधभूखे ओर कई जगह भुखमरी के शिकार खेती से विस्थापित ये लोग उद्योगों में भी नहीं खप सकते क्योंकि उदारीकरण की मार से पिछले २० सालों में देश के तमाम छोटे ओर मझोले उद्योग धंधे तबाह हो चुके हैं. नयी विश्व व्यवस्था की अंतर्राष्ट्रीय पूँजी का स्वरूप वित्तीय ओर सट्टेबाज है. उसे त्वरित मुनाफ़ा चाहिए. लम्बे दौर के उद्योगीकरण का उसका कोई लक्ष्य भी नहीं है. द्विवेदी जी ओर देउस्कर के वृत्तांत में आज की परिस्थिति की झलक मौजूद है. द्विवेदी जी ने दिखलाया है कि कैसे खेती-किसानी ही नहीं बल्कि देशी उद्योग-धंधे ओर कारीगरी भी औपनिवेशिक दौर में नष्ट की गई. ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारतीय उद्योगों का कैसा नाश किया. देउस्कर की पुस्तक में उनके वृतांत को लक्ष्य करते हुए पाण्डेय जी ने लिखा है कि जो लोग अंग्रेज़ी राज को भारत में उद्योगीकरण का पोषक समझते हैं वे "देश की बात" पढ़कर अपना भ्रम दूर कर सकते हैं. भ्रम तो आज के भूमंडलीकरण उत्साहियों का भी दूर हो सकता है जो यह नहीं देख पा रहे हैं कि नव साम्राज्यवाद ने किस तरह आज के भारत के तमाम देशी छोटे और मझोले उद्योगों का नाश किया है और उदारीकरण के चलते जो विश्व पूँजी हमारे देश के हर सेक्टर में प्रवेश कर रही है, उसका स्वाभाव ही उत्पादक नहीं है बल्कि देशी उद्योगों के लिए वह काल के सामान है. आज के ज्यादातर उद्यम परिष्कृत तकनीक पर निर्भर हैं. उनमें बहुत कुशल वाइट कॉलर मजदूर को भी रोज़गार की पक्की सुरक्षा नहीं प्राप्त है, फिर विश्व पूँजी के ये उद्यम अधिकांशतः देश के जल, जंगल, ज़मीन, खनिज स्पेक्ट्रम आदि की लूट पर निर्भर हैं. पहले से मौजूद राष्ट्रीय बाज़ार को उन्होंने बगैर नए उत्पादन में गए ही बड़ी देशी पूँजी के साथ साझा कर तथा सार्वजानिक क्षेत्र को सरकारों से औने-पौने दाम पर हथिया कर कब्ज़ा कर लिया है. बाकी का पूँजी निवेश देश की सम्पदा की खुली लूट के निमित्त है, जिसके लिए ज़मीन का जबरन अधिग्रहण किसानों और आदिवासियों के वर्तमान आक्रोश और विद्रोह का कारण है. खेती में कम्बाइन थ्रेशर आदि उच्च तकनीक आधारित मशीनों ने भी खेत मजूरी का काम छीना है. बड़े-बड़े फार्म-हाउस वाली औद्योगिक खेती के लिए बड़ी पूँजी का जो रास्ता खोला गया है वह किसानों की बड़ी आबादी को खेती से उजाड़कर ही अपने निजी मुनाफ़े का लक्ष्य हासिल कर सकता है.

इस मंजर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने में औपनिवेशीकरण के पिछले दौर का देशी वृत्तांत और मूल्यांकन हमारी मदद करता है. द्विवेदी जी, सप्रे जी और देउस्कर का अर्थशास्त्रीय लेखन पराधीनता की पीड़ा से उपजा है और आज के भूमंडलीकृत भारत की पीड़ित जनता के साथ उसका दर्द का रिश्ता है. साथ ही साथ उसका रिश्ता हमारे उस महान राष्ट्रीय जागरण से भी है जिसकी दुर्व्याख्या की कोशिश का भी एक इतिहास बन चुका है. रामविलास जी ने "संपत्तिशास्त्र" का 1857 के संग्राम से सम्बन्ध जोड़ते हुए ठीक ही लिखा है कि अंग्रेजों ने भारत की जनता की सबसे बड़ी सम्पत्ति, उसकी ज़मीन पर इजारा कायम कर उससे उसकी आजीविका का स्रोत्र ही छीन लिया है. इसका विशद वर्णन- विश्लेषण सम्पत्तिशास्त्र में है. जिसे अपने अनुभव से जानने के चलते ही ग़दर में किसानों ने भागीदारी की थी. सम्पत्तिशास्त्र का लेखक उसी तथ्य का विश्लेषण कर रहा है जो ग़दर के बागी किसानों का सहज बोध था. आज जल, जंगल और ज़मीन की लूट इन संसाधनों पर निर्भर जनता की आजीविका का स्रोत्र छीन लेने का वैसा ही व्यापक अभियान है. आज यदि "स्पेशल इकनोमिक ज़ोन" की सभी परियोजनाएं लागू कर दी जाएँ तो भूमि-हड़प का वैसा ही तांडव भारत देखेगा जैसा कि उसने अंग्रेज़ी राज में देखा था. पाण्डेय जी ने "देश की बात" की प्रस्तावना में इस पुस्तक में अंग्रेजों के पाखंड और बर्बरता के विशद विश्लेषण को लक्ष्य करने के क्रम में लिखा है कि इस बर्बरता का सबसे विकराल रूप सन 1857 के महाविद्रोह के दमन के दौरान दिखाई दिया. "माधवराव सप्रे का महत्त्व" शीर्षक लेख में पाण्डेय जी ने लिखा है कि आजकल इस देश में 1857 के महाविद्रोह के कारणों और परिणामों पर बहस हो रही है.उस बहस में अंग्रेज़ी राज की लूट और और झूठ पर भी ध्यान दिया जाए तो महाविद्रोह का एक कारण समझ आएगा.

मैनेजर पाण्डेय द्वारा चयनित इन तीनों पाठों की एक बड़ी विशेषता यह है कि एक ओर वे लिखे जाने से आधी सदी पहले हुए 1857 के विद्रोह के कारणों का प्रकारांतर से सुराग देते हुए ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सही करते हैं तो दूसरी ओर अपने लिखे जाने के एक सदी बाद के नव साम्राज्यवादी भूमंडलीय अभियान के तहत देश की दशा का भी आइना बनते हैं. आज जबकि इस नव साम्राज्यवादी दौर में राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे अनुशासन की खुद अकादमिक जगत से बेदखली हो रही है तब मैनेजर पाण्डेय द्वारा इन पाठों का चयन और पुनःस्तुति राजनीतिक अर्थशास्त्र को हमारे चिंतन जगत में फिर से प्रतिष्ठित करने का उपक्रम भी है. आज अस्मितावादी विमर्शों का बोलबाला है. अस्मिता की राजनीति भूमंडलीकरण के दौर में प्रमुखता प्राप्त कर चुकी है. अस्मिता विमर्शों को भूमंडलीय पूँजी का सांस्थानिक अकादमिक समर्थन भी प्राप्त है. साहित्य की दुनिया में भी ये विमर्श बहुत बड़ा दायरा घेरते हैं. धार्मिक,सामाजिक,क्षेत्रीय,राष्ट्रीय,जनजातीय, लैंगिक और वैचारिक अस्मिताएँ भारत जैसे महा देश में हैं, रही हैं और रहेंगी भी. इससे शायद ही कोई इंकार करे ,लेकिन इन्हें नव साम्राज्यवादी अभियान का मोहरा  बनाये  जाने से तभी रोका जा सकता है जबकि उन्हें राजनीतिक अर्थशास्त्र से संदर्भित किया जाए.

यह अकारण नहीं है कि जिस औपनिवेशिक दौर में हिंदू और मुस्लिम धार्मिक अस्मिताओं का राजनीतिकरण और पृथक राष्ट्रों के रूप में पुनर्निर्माण  और रूपांतरण हो रहा हो, उसकी दौर के इन पाठों में विकसित इतिहास दृष्टि भी इस प्रक्रिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र के नज़रिए से प्रत्याख्यान  भी हो रहा है. इतना ही नहीं बल्कि इन पाठों में विकसित इतिहास दृष्टि भी इस प्रक्रिया का प्रत्याख्यान करती हैं. पाण्डेय जी ने लिखा है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम को कमज़ोर करने के लिए अंग्रेजों ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालने की हर संभव कोशिश की. इसी चाल के तहत मुसलमानी शासन काल को अन्याय, अंधकार और अत्याचार का दौर साबित करने की कोशिश भी हुई. सखाराम गणेश देउस्कर ने "देशेर कथा" में अंग्रेज़ी राज की इस चाल का विस्तार से पर्दा फाश किया है.देउस्कर बाकायदा आंकड़े देकर यह सिद्ध करते हैं कि उच्च पदों पर हिन्दुओं की नियुक्ति मुगलकाल में अंग्रेज़ी काल के मुकाबले कहीं ज्यादा थी. देउस्कर ने बलेंद्र ठाकुर के साक्ष्य पर मुसलमान राजाओं के राजत्व के फलस्वरूप हिंदी जैसी सब प्रदेशों में प्रचलित भाषा के बनने और स्थापत्य में भारत की अभूतपूर्व उन्नति की चर्चा की है. इतिहास के विरूपण द्वारा हिंदू -मुस्लिम विद्वेष को लक्ष्य कर देउस्कर ने लिखा कि अंग्रेज़ इतिहासकार हिन्दुओं के हृदय में मुसलमान विद्वेष की आग प्रज्ज्वलित करने की कोशिश बराबर किया करते हैं, उससे भी बड़े दुःख की बात है कि कई अदूरदर्शी हिंदू लेखक भी काव्य, नाटकादि में मुसलमान भाइयों की वृथा निंदा कर राजपुरुषों की कामना पूर्ण करने में उन्हें सहायता दे रहे हैं.

राजपुरुषगण कभी मुसलमानों के प्रति और कभी हिन्दुओं के प्रति पक्षपात दिखाकर दोनों जातियों में विद्वेष बढ़ाने का प्रयत्न किया ही करते हैं. पाण्डेय जी ने देउस्कर के दृष्टिकोण की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए लिखा है कि आज के सांप्रदायिक उभार के समय में "देश की बात" साम्प्रदायिकता के स्रोतों और रूपों की जानकारी देकर पाठक को सांप्रदायिक सोच से बचने में मदद करेगी. द्विवेदी जी के "सम्पत्तिशास्त्र" का अध्ययन भी इस लिहाज से आँख खोलने वाला है. द्विवेदी जी ने लिखा है कि मुस्लिम शासनकाल में व्यापार की खूब उन्नति हुई जो अंग्रेजों के पदार्पण के साथ ही अवनति में बदल गई. पाण्डेय जी ने प्रस्तावना में लिखा है कि द्विवेदी जी ने "सम्पत्तिशास्त्र" में भी इस भ्रामक मान्यता का खंडन किया है कि मुसलमानों के शासनकाल में इस देश की सम्पत्ति का नाश हुआ. उनके अनुसार किसी देश की सम्पत्ति घटने के तीन प्रमुख कारण हैं- प्राकृतिक, राजकीय और व्यापार विषयक. द्विवेदी जी जोर देकर कहते हैं कि मुसलमानी शासनकाल में इन तीनों में से किसी कारण से देश की संपत्ति नहीं घटी. लेकिन आज भी भारत में मुसलमानों को लेकर न जाने कितनी गलत बातों का प्रचार योजनाबद्ध ढंग से किया जाता है.

साम्राज्यवादी वैचारिकी का प्रत्याख्यान :                             

पाण्डेय जी द्वारा चुने गए इन तीनों पाठों में साम्राज्यवाद के राजनीतिक प्रभुत्व और आर्थिक विनाशलीला का ही पाठ नहीं मिलता अपितु साम्राज्यवाद के वैचारिक वर्चस्व की प्रक्रियाओं का भी, बल्कि इसमें भी सर्वाधिक सजगता देउस्कर की "देश की बात" पुस्तक में दिखती है. मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं कि "देश की बात" का एक अध्याय है "सम्मोहन चित्त विजय"जिसमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद द्वारा भारतीय मानस को उपनिवेश बनने की पूरी जटिल प्रक्रिया और उसके परिणामों का ब्यौरेवार विश्लेषण किया गया है. औपनिवेशिक शासन में रहने वाले लोगों की मानसिकता और उससे मुक्ति की प्रक्रिया का विवेचन बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में फ्रैंज फैनन, एडवर्ड सईद और न्यूगी वा थियांग जैसे विचारकों और लेखकों ने किया है.यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि देउस्कर उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरम्भ में ही इस जटिल समस्या के बारे में इतने सजग हैं और उसका इतनी बारीकी से विश्लेषण करते हैं. देउस्कर ने नैतिक औचित्य स्थापन के लिए भारत के बारे में अंग्रेजों के बनाये जिन मिथकों का पर्दाफ़ाश किया उनमें भारत कि कल्पित असभ्यता एक है. 

देउस्कर ने विस्तार से दिखलाया कि व्यापार शिल्प एक कला ही नहीं बल्कि सड़क के संजाल तक में भारत औपनिवेशिक दौर से पहले कितना सुसभ्य था. उन्होंने पूर्वी देशों या भारत में अधिनायकशाही के मिथक का भी प्रत्याख्यान करते हुए दिखलाया कि उलटे धर्म और राजसत्ता का अधिनायकवादी गठजोड़ पश्चिम के इतिहास का सच है. हिंदू -मुस्लिम वैमनस्य  और उनके दो राष्ट्र होने के मिथक के प्रत्याख्यान की चर्चा पहले हो चुकी है. भारत में वर्तमान सामाजिक बुराइयों को अंग्रेज़ भारत की असभ्यता का प्रतीकचिह्न  बताकर उसे स्वराज्य के योग्य ठहरा रहे थे.इसके ठीक विपरीत देउस्कर जैसे देशभक्त स्वराज्य के अभाव को ही इन बुराइयों का कारण मानते थे.सप्रे जी की पुस्तिका "स्वदेशी आंदोलन और बायकाट " में सप्रे जी की यह स्पष्ट राय है कि जब तक इस देश में स्वराज्य स्थापित न हो जाएगा,तब तक अन्य विषयों में सुधार करने का यत्न सफल न होगा. " सम्पत्तिशास्त्र में भी द्विवेदी जी मुस्लिम काल के दानवीकरण का प्रत्याख्यान करते हुए उपनिवेशवादी नस्लवाद को भी चीह्नित कर उसकी आलोचना करते हैं. औपनिवेशिक,वैचारिक और नैतिक औचित्य स्थापन के प्रतिरोध की दृष्टि से "देश की बात" की भूमिका में पाण्डेय जी ने आज के अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा स्वतंत्रता,लोकतंत्र और मानवाधिकार की स्थापना के नाम पर ईराक, अफगानिस्तान और दीगर तीसरी दुनिया के देशों में अमरीकी हमलों के हवाले से दिखलाया है कि कैसे पुराने उपनिवेशवाद और आज के साम्राज्यवाद के वैचारिक और नैतिक औचित्य स्थापन के पाखंडी तौर-तरीके में एक अद्भुत निरंतरता है. साथ ही वे इनमें आये अंतर को भी स्पष्ट करते चलते हैं.इन प्रस्तावनाओं के ज़रिये पाण्डेय जी ने इन चुने हुए पाठों का प्रकारांतर से अर्थ विस्तार किया है.
पाण्डेय जी द्वारा इन पाठों की व्याख्या में अध्ययन के कुछ नए क्षेत्र भी खुलते हैं. औपनिवेशिक वैचारिक वर्चस्व और उसके प्रतिरोध में अनुवादों की भूमिका ऐसा ही क्षेत्र है."देश की बात" की भूमिका में वे लिखते हैं कि भारत में जब नवजागरण की शुरुआत हुई तब भारत का शिक्षित समुदाय एक विचित्र स्थिति का सामना कर रहा था. 18 वीं और 19 वीं सदियों भारतविदों द्वारा भारतीय पाठों के अंग्रेज़ी तथा अन्य यूरोपीय भाषाओँ में जो अनुवाद हुए थे वे यूरोप वालों के लिए हुए थे. लेकिन अधिकांश भारतीय शिक्षित लोग इन अनूदित पाठों को ही भारतीय कानून, दर्शन और साहित्य आदि के ज्ञान का मूल स्रोत मान रहे थे. यही नहीं वे उन पाठों के माध्यम से भारतविदों द्वारा निर्मित भारत, भारतीयता,समाज, संस्कृति और इतिहास संबंधी विचार विमर्श तथा आख्यान को प्रामाणिक मानकर ग्रहण कर रहे थे क्योंकि वे अनुवादक की दृष्टि, पद्धति और पाठों को स्वाभविक समझ रहे थे. इस प्रक्रिया से भारत की जो पहचान, छवि या अस्मिता निर्मित हुई वह एक प्रकार से अनूदित अस्मिता थी.वह एकान्तिक और अनुकरणपरक भी थी और उससे निकला राष्ट्रवाद भी वैसा ही था. कहने की जरूरत नहीं कि आज़ाद भारत में भी भारतीयता कि एक ख़ास काट की अभिजात्य धारणा ओरियेंटलिस्ट अवशेष ही है जिसे साहित्य में भी कुछ हल्कों में काफ़ी महिमामंडित किया जाता रहा है. दूसरी ओर उपनिवेश पूर्व भारत के उपयोगितावाद अवमूल्यन की भी धारणाएँ अभी बाकी हैं. भारत में अस्मिताओं की राजनीति को इस दृष्टि से देखना भी रोचक होगा कि इनमें निविष्ट अस्मिताओं का कितना हिस्सा औपनिवेशिक प्रक्रिया के अनुवाद में निर्मित हुआ और कितना वास्तविक और ऐतिहासिक है. अनूदित राष्ट्रवाद पुनरुत्थान और अधिनायकवाद का पोषक है, जिसकी विभीषिकाओं से भारत आज भी झुलस रहा है.पाण्डेय जी ने उपनिवेशवादियों और उनके विरोधी लेखकों के अनुवाद की प्रक्रिया में अंतर स्पष्ट करते हुए लिखा है कि उपनिवेशवादियों ने अनुवाद को भारतीय परम्परा और मानस पर कब्ज़ा करने का साधन बनाया था तो भारतीय नवजागरण के विचारकों ने अनुवाद की अपनी परम्परा को मुक्ति और स्वत्व की पहचान का माध्यम बनाया. 

भारतीय लेखक अनुवाद को औपनिवेशिक प्रभावों के विरुद्ध प्रतिरोध के साधनों के रूप में विकसित कर रहे थे साथ ही वे आधुनिक चिंतन और ज्ञान-विज्ञान से भारतीय समाज को परिचित कराने के लिए अनुवाद का काम कर रहे थे.भारत में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राष्ट्र की कल्पना और धारणा के विकास, नवजागरण की चेतना के निर्माण और प्रसार, विभिन्न जातीयताओं के बीच संबंध के विकास और अखिल भारतीय दृष्टि के उभार में अनुवादों की भूमिका के अध्ययन किये जाने का पाण्डेय जी का प्रस्ताव बेहद महत्त्व का है. सप्रे जी द्वारा मराठी से तिलक के "गीता रहस्य" समर्थ रामदास के "दास बोध" और चिं.वि. वैद्य के "महाभारत का उपसंहार" का "महाभारत मीमांसा"शीर्षक से हिंदी में अनुवाद के महत्त्व को उन्होंने इसी संदर्भ में रेखांकित किया है."देशेर कथा" के हिंदी में अनुवाद की दिलचस्प कहानी का उन्होंने बयान किया है.


नवजागरण के स्वरूप की पड़ताल :               

हिंदी में नवजागरण के विभिन्न पक्षों पर लगातार बहसें होती रही हैं.एकांगीपन भी इन बहसों और चर्चाओं में प्राय देखा जा सकता है. मैनेजर पाण्डेय ने इन तीनों पाठों के ज़रिये नवजागरण के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हैं.नवजागरण पर चर्चा के क्रम में अकसर हिंदी नवजागरण,मराठी और बांग्ला के नवजागरण  बीच भिन्नता दर्शाने की चेष्टा होती रही है.भिन्नताएँ हैं भी जिसका एक कारण औपनिवेशिक प्रक्रिया के प्रसार की विषमता भी है.मैनेजर पाण्डेय ने भिन्नताओं के साथ-साथ नवजागरण की अन्तःप्रादेशिक एकता के सूत्रों को भी स्पष्ट करने की कोशिश की है.मराठीभाषी देउस्कर हिंदी क्षेत्र में रहे और बांग्ला में लिखते रहे. मराठीभाषी सप्रे हिंदी के ही लेखक हैं. पाण्डेय जी के शब्दों में,"माधवराव सप्रे हिंदी नवजागरण को मराठी नवजागरण से जोड़ते हैं. जैसे सखाराम गणेश देउस्कर बांग्ला नवजागरण को मराठी नवजागरण से." "सम्पत्तिशास्त्र" की प्रस्तावना "देश की बात" की प्रस्तावना में पाण्डेय जी ने लिखा है कि "देउस्कर भारतीय नवजागरण के ऐसे विचारक हैं जिनके चिंतन और लेखन में स्थानीयता और अखिल भारतीयता का अद्भुत संगम हुआ है." पाण्डेय जी रेखांकित करते हैं कि द्विवेदी जी सामाजिक समस्याओं का विवेचन करते वक्त सिर्फ हिंदी प्रदेश नहीं बल्कि पूरे देश का ख्याल करते हैं. किसानों के सर्वनाश का चित्र खींचते वक्त बंगाल, पंजाब,बम्बई और मद्रास के किसान भी उनके ध्यान में हैं.इतना ही नहीं, बल्कि नस्लभेद के बारे में बात करते हुए दूसरे देशों में बसे हिन्दुस्तानियों,जिनके लिए अब "भारतीय डायस्पोरा" पद का व्यवहार होता है, के साथ गोरी चमड़ी वालों के भेद-भाव के बारे में भी वह लिखते हैं.

नवजागरण के बारे में मैनेजर पाण्डेय ने सर्वाधिक विचार "माधवराव सप्रे का महत्त्व" शीर्षक लेख में किया है. इस लेख के आरम्भ में ही वे लिखते हैं कि यह मानी हुई बात है कि दुनियाभर में उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष संस्कृति के मोर्चे पर भी होता रहा है. साहित्य और दूसरी कलाओं में एक ऐसी देशी विश्व दृष्टि के विकास की कोशिश होती रही है जो उपनिवेशवाद की वर्चस्ववादी विश्वदृष्टि का मुकाबला कर सके. इसी प्रक्रिया में नवजागरण की शुरुआत होती है. हिंदी नवजागरण के निर्माता हिंदी के साहित्यकार थे. वे बंगाल और महाराष्ट्र के नवजागरण के नायकों की तरह मुख्य रूप से समाज सुधारक नहीं थे. बंगाल और महाराष्ट्र के नवजागरण को गति और दिशा देनेवाले अनेक बुद्धिजीवी साहित्यकार भी थे, उनकी भूमिका नवजागरण की प्रक्रिया को व्यापक बनाने की थी जबकि हिंदी के साहित्यकार हिंदी नवजागरण के जनक थे. उनकी नवजागरण की चेतना उनकी साहित्यिक कृतियों में व्यक्त हुई थी इसलिए वह वैसी सुनिश्चित, स्पष्ट और तेजस्वी नहीं थीं जैसी बांग्ला और मराठी नवजागरण की चेतना थी. 

हिंदी में नवजागरण की चेतना का जो विकास हुआ उसका एक स्रोत बंगाल का था तो दूसरा महाराष्ट्र का. इन दोनों क्षेत्रों में नवजागरण की चेतना का जन्म पहले हुआ था. हिंदी नवजागरण के एक निर्माता भारतेंदु हरिश्चंद्र का बंगाल के नवजागरण से गहरा संबंध था तो दूसरे निर्माता महावीर प्रसाद द्विवेदी का महारष्ट्र के नवजागरण से. इन दोनों के संबंधों के पर्याप्त प्रमाण उनके लेखन में मौजूद हैं. हिंदी नवजागरण के निर्माता केवल साहित्यकार न थे, वे सभी साहित्यकार के साथ-साथ जागरूक पत्रकार भी थे इसलिए वे अपने समय और समाज के सामने खड़ी चुनौतियों और समस्याओं के बारे में गंभीरता से सोचने और लिखने वाले आधुनिक बुद्धिजीवी थे. उन्होंने अपने समाज के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर लिखा है. ऐसे बुद्धिजीवी केवल हिंदी नवजागरण में ही नहीं देश के अन्य भागों के नवजागरण में भी दिखाई देते हैं. भारतीय नवजागरण की प्रक्रिया से एक समग्रतापरक सोच का विकास हुआ था, जिसकी अभिव्यक्ति नवजागरण के प्रतिनिधि बुद्धिजीवियों के चिंतन और लेखन में मिलती है.

नवजागरण एक अखिल भारतीय समग्रतापरक प्रक्रिया थी. इसे स्वायत्त भाषाई इकाइयों में देखना परखना भ्रामक भी हो सकता है.इससे बेहतर तरीका यह है कि इसे उसके विकासक्रम और द्वंद्वात्मक संबंधों के नज़रिए से देखा जाए और मैनेजर पाण्डेय ने यही किया है. वे लिखते हैं कि बंगाल और महाराष्ट्र के नवजागरणों में पहले स्थानीय चिंताएं प्रबल थीं. बंगाल में "बंग चेतना"प्रमुख थी और महाराष्ट्र में "महाराष्ट्र धर्म" पर ज़ोर था. लेकिन बाद में भारतीयता की भावना का विकास हुआ. हिंदी में आरम्भ से ही भारत की दुर्दशा का बोध प्रमुख रूप से लेखकों के चिंतन और लेखन की दिशा तय कर रहा था. भारतीय नवजागरण के समय कुछ ऐसे बुद्धिजीवी भी सामने आये जो अपनी भाषा और अपने क्षेत्र के बदले उस भाषा और क्षेत्र के जागरण के लिए प्रयत्नशील रहे जिसे उन्होंने अपना बनाया और माना. ऐसे दो बुद्धिजीवी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं- एक हैं, सखाराम गणेश देउस्कर और दूसरे माधवराव सप्रे.

दरअसल भारत का नवजागरण एक ऐसा समुद्र मंथन था जिसमें अमृत भी निकला और विष भी. आज अजीब बात देखने को यह आ रही है कि जहाँ एक ओर प्रतिक्रियावादी ताकतें नवजागरण के हलाहल को वर्तमान तक खींच ला रही हैं, वहीँ दूसरी ओर प्रगतिशील सोच के कई दावेदार उनके दावों की पुष्टि कर रहे हैं. मानो नवजागरण और कुछ नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक पुनरुत्थानवादी और प्रतिक्रियावादी था. ज़ाहिर है कि यह दृष्टिकोण एकांगी और उथला है. मैनेजर पाण्डेय ने "संपत्ति शास्त्र पर विचार करते हुए लिखा है कि भारत में अंग्रेजी राज के कारण किसान, दस्तकार तबाह हुए.मजदूर असहाय और पूंजीपति दलाल और पिछलग्गू बन गए. क्या यह आज के नवसाम्राज्यवाद के दौर में भी सही नहीं है? अगर है तो नवजागरण के इन निष्कर्षों का आज के दौर में कैसा मूल्यांकन होना चाहिए? "माधवराव सप्रे का महत्त्व" शीर्षक लेख में पाण्डेय जी ने लिखा है, नवजागरण की केन्द्रीय विशेषता है- स्वाधीनता की चेतना. भारतीय नवजागरण में यह चेतना अनेक रूपों में व्यक्त हुई है. उसका सबसे व्यापक रूप उपनिवेशवाद विरोधी भावना के जागरण में दिखाई देता है. क्या यह अच्छा नहीं होगा कि आज के नवजागरण के अध्येता इसी प्रस्थान बिंदु से नवजागरण पर विचार करते हुए आज की परिस्थिति में साम्राज्यवाद विरोध की धारा को सींचने के लिए उसके अमृत को भी खींच लायें, बगैर हलाहल को नज़रंदाज़ किये.


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प्रणय कृष्ण युवा आलोचना के देवीशंकर अवस्थी सम्मान से नवाजे जा चुके हैं.  इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं और समकालीन जनमतपत्रिका के संपादन मंडल से जुड़े हैं. 
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