परिप्रेक्ष्य : कान्हा विवाद पर राजेश जोशी और निरंजन श्रोत्रिय

Posted by arun dev on सितंबर 07, 2012












राजेश जोशी
11 निराला नगर , भदभदा रोड , भोपाल 462003


प्रिय भाई,

कान्हा में शिल्पायन के सान्निध्य शीर्षक से आयोजित कविता समारोह पर विष्णु खरे की द्विअर्थी-अश्लील शीर्षक वाली हास्यास्पद और कुछ वरिष्ठ तथा लगभग पच्चीस से अधिक युवा और युवतम कवियों पर घृणा और हिंसा से भरी जो कुत्सित टिप्पणी आपने 2 सितम्बर 2012 के रविवार्ता में प्रकाशित की है, उस पर टिप्पणी करने की न तो मेरी कोई्र इच्छा है ना ही मुझे यह ज़रूरी लगता है. लेकिन इसमें कुछ तथ्यात्मक भूलें हैं जो इस ख़ाक़सार से सम्बन्धित हैं उनका स्पष्टिकरण किया जाना मुझे ज़रूरी लग रहा है, इसलिए यह पत्र लिख रहा हूँ.

1.         मैंने अपने पिता की स्मृति में किसी पुरस्कार की कोई स्थापना नहीं की है . मेरे पिता पं. ईशनारायण जोशी संस्कृत के विद्वान थे. संस्कृत के साथ ही उर्दू और गुजराती भाषा पर भी उनका समान अधिकार था. संस्कृत से उन्होंने कई महत्वपूर्ण अनुवाद किये हैं. उन्होंने लगभग 300 से अधिक लेख और टिप्पणियाँ भी अनेक विषयों पर लिखीं हैं. तीस के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने जयपुर के एक महत्वपूर्ण केन्द्र से धर्मशास्त्र का अध्ययन किया था. वर्ष 2007 में उनके निधन के बाद मेरे सहित उनके पाँच पुत्रों ने अपने निजि साधनों से एक न्यास की स्थापना की है. यह न्यास इसी पूंजी से प्रति वर्ष पं. ईशनारायण जोशी की स्मृति में एक स्मृति -व्याख्यान का आयोजन करता है. इस स्मृति -व्याख्यान के अन्तर्गत - परंपरा और आधुनिकता, तुसली की कविताई, पुनर्जागरण और स्वाधीनता संग्राम में भगवत् गीता की भूमिका, संस्कृत नाटकों का काल संवादी स्वर और मोहन जोदाड़ो  विषयों पर श्री अष्टभुजा शुक्ल, श्री केदारनाथ सिंह, श्री कमलेश दत्त त्रिपाठी, श्री श्रीनिवास रथ और श्री ओम थानवी के व्याख्यान हो चुके है. इस वर्ष इस आयोजन के तहत डॉ. भगवान सिंह ऋगवेद और आधुनिक इतिहास विषय पर व्याख्यान देंगे. हमने इस आयोजन की कोई स्मारिका भी आज तक प्रकाशित नहीं की है. किसी तरह का कोई्र विज्ञापन अथवा किसी तरह का कोई निजि या सरकारी अनुदान भी आज तक नहीं लिया गया है. इसमें किसी भी प्रकार की कोई संदिग्ध संस्था का सहयोग नहीं लिया गया है. सिर्फ केन्द्र सरकार के उपक्रम राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान द्वारा इसे अपना सभागार बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराया जाता है.

2.         श्री लीलाधर मंडलोई ने इस आयोजन के लिये जो भी मदद की है या की होगी उसमें मुझे कुछ भी अनुचित नहीं लगता. जबलपुर में लेखकों को कुछ घंटों के लिये रूकने , हाथ मुँह धोने आदि के लिये रेल्वे स्टेशन पर बने अतिथि गृह ( रिटायरिंग रूम्स ) में ही प्रबंध किया गया था. संभवतः इसमें लीलाधर मंडलोई की कोई भूमिका नहीं थी. स्मारिकाओं में विज्ञापन दिलवाने के लिये किसी पद के दुरूपयोग की आवश्यकता नहीं होती. विष्णु खरे जी ने हिन्दी के लेखकों को लगभग भिकमंगा बना दिया है. वो खुद भी अच्छी तौर से जानते हैं और नहीं जानते हैं तो जानना चाहिये कि आज के किसी भी कवि लेखक को आकाशवाणी या दूरदर्शन के असाइनमेंट का लालच नहीं लुभाता. उन्हें( विष्णु खरे जी को) लुभाता हो तो पता नहीं?

3.         खरे जी ने लिखा है कि कौन लेखक है जो प्रकाशकों का लाडला नहीं बनना चाहता? इस आरोप की रोशनी में क्या एक बार विष्णु खरे जी स्वयं को देखना नहीं चाहते ? पूछा जा सकता है कि हिन्दी का एक बड़ा प्रकाशक विष्णु खरे जी को फ्रैंकफर्ट (जर्मनी) में होने वाले पुस्तक मेले में अपने खर्च पर क्यों लेकर गया था? आपने अपने रसूख से उसके कौनसे हित साधने का लालच उसे दिया था? सोवियत संघ के विघटन से पहले और जर्मनी के एकीकरण से पहले आप पर पश्चिम जर्मनी की एम्बेसी क्यों इतनी मेहरबान थी ? वो कौनसी ताकतें थीं जो महिनों और बरसों आपको जर्मनी में रहने और बार बार विदेश जाने के लिये आमन्त्रित करती रहती थीं ?

4.         आपने मेरे मैच-फिक्सिंग की जाँच के लिये तो कुमार अम्बुज और नीलेश रघुवंशी से अनुरोध कर दिया है लेकिन आप जो आये दिन विदेशी दौरे करते रहते हैं, विदेशों की एम्बेसियों से अपने सम्बंध बनाये रहते हैं , नवभारत टाइम्स में रहते हुए उसके मालिकों से जो मैच -फिक्सिंग आपने की उस पर कौन नज़र रखेगा? क्यों आपको (खरे साहब को) हमेशा से पूंजीवादी या साम्राज्यवादी देशों की एम्बेसियाँ ही इन्टरटेन करती रहीं? शीतयुद्ध जब समाप्त नहीं हुआ था, उस समय आपकी भूमिका क्या थीं? खरे साहब जानते होंगे की नवभारत टाइम्स में उनके सहकर्मी उन्हें सी. आई.ए. का एजेन्ट कहा करते थे.

5.         खरे साहब ने भोपाल के तीन लेखकों द्वारा भारतीय जनता पार्टी की सरकार की सांस्कृतिक नीतियों और कार्यकलापों के बारे में जारी किये गये परिपत्रों का हवाला देकर कई सवाल उठाये हैं. इस टिप्पणी में भी उन्होंने महत्वाकांक्षी व्यक्तियों द्वारा चलायी जाने वाली संस्थाओं और उनके कार्यकलापों पर सवाल खड़े किये है. मैं कहना चाहता हूँ कि व्यक्ति और सरकार या किसी शक्ति संरचना में फर्क किया जाना चाहिये. अनेक व्यक्ति अपनी निजि महत्वाकांक्षाओं के चलते कई किस्म की अ-पोलेटिकल ( गैरराजनीतिक ) स्पेसेस साहित्य के लिये निर्मित करते हैं. ऐसी किसी भी लोकतान्त्रिक स्पेस में दूसरी और विरोधी विचारधारा से जुड़े लोगों के साथ भी संवाद करना संभव होता है. होना चाहिये. उनके साथ संवाद किया जाना चाहिये. उनके साथ रचना पाठ भी किया जाना चाहिये. मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता. कान्हा में युवा कवि गिरीराज किराड़ू द्वारा जो छोटी सी टिप्पणी पढ़ी वह लगभग माक्र्सवाद विरोधी थी. क्या वागीश सारस्वत की ही तरह किरिराज किराड़ू के साथ भी किसी प्रगतिशील जनवादी को एक मंच पर नहीं बैठना चाहिये ? तो फिर तो यह सवाल भी उठेगा कि श्री विष्णु खरे के साथ भी किसी प्रगतिशील जनवादी को एक मंच पर कविता क्यों पढ़ना चाहिये ? विचारधारा के ही मामले में नहीं सैकयूलरिज़्म के बारे में भी विष्णु खरे की विश्वसनीयता उतनी ही संदिग्ध है जितनी वागीश सारस्वत की है.
         
आपका
राजेश जोशी
6 सितम्बर 12
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आदरणीय विष्णु जी,

कान्हा-प्रसंग पर आपकी टिप्पणी को लेकर मेरे पास कई फ़ोन और सन्देश आये लेकिन चूँकि मैंने वह पढ़ी नही थी इसलिए कुछ भी कहना मुश्किल भी था और अनुचित भी. आज मुझे किसी ने बताया क़ि वह हरेप्रकाश की पत्रिका में है तो देखा. हालाँकि आपने 'प्रभात वार्ता' में इसे सार्वजनिक कर दिया है लेकिन मुझे लगता है कि "शायद" और (नि) रंजन (श्रोत्रिय) को लेकर आपको कोई विभ्रम तो नहीं है? ऐसा इसलिए कि कान्हा में वागीश्वर के अलावा एक रंजन कुमार सिंह भी थे जिन पर बोधिसत्व ने भाजपायी होने का आरोप लगाया था (facebook). हालाँकि F. B. पर मेरी ही वाल पर दिल्ली के प्रभात रंजन ने यह कमेन्ट लिखा था कि  रंजन कुमार को बिला वजह विवाद में घसीटा जा रहा है. वे हिंदी लेखक  शंकरदयाल सिंह के पुत्र हैं  और  'नवभारत टाइम्स' में काम करते थे. मैं इस स्तर पर बात को सार्वजनिक करना नहीं चाहता. "शायद" शब्द और दो-दो कोष्ठकों की वजह से लगता है कि कुछ गड़बड़ ज़रूर है. इसी को लेकर दो पंक्तियों की टिप्पणी मैंने हरेप्रकाश की पत्रिका में भी की है. और यदि वह संदिग्ध चरित्र मैं ही हूँ तो स्पष्ट रूप से बताएं और "शायद" हटा कर क्योंकि मुझ पर इस बहस में ऐसी टिप्पणी किसी ने भी नही की है. तभी इस बात का उत्तर बहुत बेबाकी और निर्भीकता के साथ यथास्थान दिया जा
सकता है.

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सुलभ सन्दर्भ हेतु:

Bodhi Sattva Ashok Kumar Pandey जी इस फोटो में आपके दाहिने जो रंजन जी  विराज रहे सुनने में आ रहा है कि दाहिने बाजू के यानी दंक्षिण पंथी हैं. वे भारतीय जनता पार्टी या संघ से जुड़े हैं. संघ निश्चित रूप से जनवादी लेखक संघ नहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है. इस पर कृपया अपना पक्ष रखें.

Prabhat Ranjan रंजन जी को लेकर विवाद अनावश्यक है. वे नवभारत टाइम्स में काम करते थे. हिंदी-लेखक शंकर दयाल सिंह के पुत्र हैं.
सादर,

निरंजन श्रोत्रिय
         

विष्णु खरे का उत्तर

इसमें कोई संदेह नहीं कि मुझे विभ्रम हुआ. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे वेरिफाई नहीं करना चाहिए था. यदि आप मानते हैं कि आप हिन्दुत्ववादी तत्वों से बहुत दूर और वाकई प्रगतिकामी हैं तो मैं आपसे सार्वजनिक रूप से क्षमा-याचना करता हूँ.


एक बात मैं अवश्य कहना चाहता हूँ. आप एक ऐसी पत्रिका से उच्च स्तर पर सम्बद्ध हैं जिसकी या तो कोई विचारधारा नहीं है और यदि है भी तो बहुत संदिग्ध है.आपके साथ उसके सम्पादक-मंडल में ऐसे कई लोग हैं जो दशकों  से प्रतिक्रियावादी विचारधारा से जुड़े हैं और जब भी मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार आती है उसके सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्थानों से अत्यंत सामीप्य और अधिकार  के साथ संलग्न हो जाते हैं.ऐसे में यह संदेह स्वाभाविक है कि फिर शायद आपका सोच भी अंदरूनी तौर पर उन जैसा ही हो.साफ़ बात तो यह है कि  इसीलिए मैं  आपकी पत्रिका से न कभी जुड़ा न कभी जुड़ना चाहूँगा. मैं तो कभी उसका मालिक या प्रधान सम्पादक भी नहीं होना चाहूँगा. मैं आभारी हूँ कि इस विवाद के बहाने मुझे अपनी एक बात रखने का दुर्लभ मौक़ा मिला.

फिर भी,इस caveat  के बावजूद, मैं आपसे मुआफी चाहता  हूँ. चूंकि मैंने अपना वह लेख " युग ज़माना" या किसी और ब्लॉग को नहीं भेजा था ,इसलिए मैं वहाँ नहीं जाऊँगा.आप बेशक मेरे इस पत्र और इसपर अपनी प्रतिक्रिया को वहाँ या कहीं भी भेजने के लिए स्वतंत्र हैं ही.

विष्णु खरे
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विष्णु जी कि मासूमियत देखिये...किस तरह वे अपना शक दूर करते हैं. जिस पत्रिका (समावर्तन) के बारे में वे कह रहे हैं उसने साहित्य जगत में पिछले ५ वर्षों में अपनी ज़बरदस्त पहचान बनाई है. इसका "रेखांकित" स्तम्भ युवा कवियों के लिए एक विश्वसनीय मंच बना है. कान्हा में ही मुझे इस स्तम्भ के लिए कई नए युवा कवि मिले. उन्होंने उस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया है जो उन्हें कभी भेजा ही नहीं गया! खैर, दूर बैठ कर फैसले देने और सबको प्रमाणपत्र बांटने की व्यग्रता (और जो नहीं ले उसको गरियाने ) की दुर्लभ मिसाल है ये!

निरंजन श्रोत्रिय
niranjanshrotriya@gmail.com