सहजि-सहजि गुन रमैं : अमित उपमन्यु

Posted by arun dev on नवंबर 01, 2012



अमित की कविताएँ हिंदी कविता की बनावट और बयान में नया कुछ जोड़ती हैं. यह नया समकालीन है. मध्यवर्गीय नागरिक मन उत्तर औपनिवेशिक और बेलगाम पूंजीवादी  समय में जिसे तरह के संकटों और संत्रास से गुज़र रहा है उसकी अनुगूँज इन कविताओं में है.
एक अच्छी बात यह है कि ये कविताएँ सरलीकरण की  सपाटबयानी से बची हुई हैं. मित और मुहावरे ताज़े हैं. अमित से उम्मीद  है. 



मेरे अपने

कह दूँगा
, लिख दूँगा, गा दूँगा
जो भी मैं कहना चाहूँगा सबसे.
कहना तो बहुत कुछ है,
पर सब कुछ नहीं.
सब कुछ नहीं जो मेरे अंदर है
कल्पित, निर्मित या अवतरित
जैसा भी
पर सिर्फ मेरा.

सब कुछ नहीं है सब के लिए
न कला न सब साहित्य के लिए
कुछ आत्मोद्बोधन है, कुछ आत्मावलोकन
और कुछ मुक्ति
बेड़ीयों से...

कलम अनाथ शब्दों की जननी होती है
जन्म लेते ही कवितायेँ कर लेती हैं जननी से सम्बन्ध विच्छेद
और हो जातीं हैं वैश्विक संपत्ति!
उस अर्थ से मुक्त जिसके सम्प्रेषण के लिये उन्हें जन्म दिया गया था
बल्कि नगरवधू सी.
पर मेरा सब कुछ अनाथ नहीं है
नगरवधू सा भी नहीं
कुछ ऐसा है जो सिर्फ मेरे लिए है
और उसका केवल एक ही अर्थ है जो उसे मैंने दिया
वो अर्थ हमेशा अमलिन रहेगा
नित श्वेतवस्त्रधारी,
मैली ज़बानों से अनछुआ,
उथली आलोचनाओं से अपरिचित,
और अर्थहीन अर्थों से अविचलित.

मेरे शब्द मुझमें!
सदा विस्तृत
और सीमित.
विस्तृत मन में /सीमित तन के / सूक्ष्मोष्ण ह्रदय में.



भाषा

मेरे पास है एक अच्छे वक़्त की भाषा
एक बुरे वक़्त की.
तेज़ हवामें सड़क से भरभराकर उड़ती है भाषा
और देह के अश्लील छेदों से होकर 
सारे मकानों में भर जाती है.

जब मैं रोना चाहता हूँ
तो बच्चों की हंसी पर भी रो देता हूँ.
कोयल का गीत भी एक दुःख बन जाता है मोर के नाच की ही तरह.
मैं ख़ुशी के हर घृणित पल से घृणा करता हुआ
हर एक बात पर रोता हूँ सिवाय उस चिट्ठी के
जो मुझे मिलती है आंसुओं से भीगी हुई.
अपनी गर्म साँसों से उस चिट्ठी को सुखाकर
पीपल के नीचे दफ़न कर देता हूँ

भाषा घुसती है मकानों में
और सोती आँखों को चुभती है;
उनके सपने धुंधला देती है.
मैं सड़क पर निश्चिंत सो रहे लिपिहीन कुत्ते को ज़ोरदार लात जमाता हूँ
वह भड़भड़ाते हुए अपने कुसंस्कृत दांत गड़ाता है मेरी लिपि में 
और भाषा बह निकलती है सारे बाँध तोड़ कर

मेरे पास है दुःख की एक भाषा,
एक सुख की.
मैनें छुपा रखी हैं बरगद नीचे भाषाएँ सच और झूठ की.
मैं एक अनजान धातु का बर्तन हूँ
जिसे खोजा जाएगा चाँद पर किसी अमावस के दिन
फिर मैं विषाक्त कर दूंगा अपनी खोज में आने वाली सारी भाषाओं को खुद में उबालकर.

विसूवियस जब भी बोलेगा बदल देगा इटली के मानचित्र को
पाताली प्लेटें जब भी बतियाएंगीं आपस में
खिचड़ी बन जाएंगीं भाषाएँ.

मैं एक लिपि हूँ जिसकी खुद की कोई भाषा नहीं.
दुनिया की है बस एक भाषा
जो तैर रही है ईथर में
बिना लिपि...

·         विसूवियस-  इटली में स्थित अति-प्राचीन ज्वालामुखी जो कई वर्षों से निष्क्रिय है
·         ईथर-  माना जाता है की यह (काल्पनिक) पदार्थ ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला है जैसे पृथ्वी पर वायु.





संधि

हमारे निर्णयों से स्वाधीन
और मताधिकार से महरूम प्रक्रियाओं के उत्पाद हम
घोर ऋणी हैं उन महान अव्यवस्थाओं के
जिन्होंने हमें लोकतंत्र लिखना सिखाया

भय मनुष्य की पलकें और देवताओं का वीर्य है
मद दैत्य की नाभि,
ज्ञान मनुष्य का तीर.

हर फूल अपनी धरती और मौसम खुद चुनता है
जानवर मौसम के पीछे चलते हैं
पक्षी मौसम के भी आगे उड़ जाते हैं
इंसान अभागा
मुट्ठी में बंद रखना चाहता है
सारी मुस्कुराहटें

जिन-जिन चट्टानों पर सर्वशक्तिमान लिखा गया
वे आपस में टकरा कर चकनाचूर हो गईं.
देवताओं ने स्वर्ग और दैत्यों ने नर्क के दरवाज़े पर अंदर से मोटे लकड़े अड़ा रखे हैं
इंसान लिखी चट्टानें उनसे लगातार टकरा रही हैं
धूसर बादल स्वर्ग और नर्क पर बरस रहे हैं
इंसान खून की नदियों पर पल रहा है
अनगिनत सरस्वतियाँ हो चुकी हैं पाताल में ओझल

एक धनुर्धर चिड़िया की दोनों आँखें तीरों से बेध रहा है
उसकी एक आँख में है स्वर्ग का और दूसरी में नर्क का नक्शा.

सर्द हवाएं गर्म हवाओं की ओर बहती हैं
धाराएँ ऊंचे जलाशयों से निचलों की ओर
वे एक-दूसरे को नष्ट नहीं केवल पदच्युत करती हैं
पर चंगेज़ कमज़ोरों की पहचान का बलात्कार करते हैं
और हिटलर उनकी हत्या

मध्यस्थों ने अपना काम कर दिया
इंसान की दैत्यों और देवताओं से संधि हो चुकी है
उसके हिस्से स्वर्ग से मदिरा, अप्सराएं और दंभ आया
और नर्क से मिला आधा राज्य और मूर्खता!



हत्यारे

तू अकेला ही हत्यारा नहीं है मेरे दोस्त
ये आसमानी उड़ाके भी तो कूद पड़ते है एक दूसरे पर बैलों की तरह
रेलें भर पेट आदमी खाकर एक ही रास्ते पर आमने-सामने आ जाती हैं -
शिकारी कुत्तों की तरह अपने कैनाइन चमकाते हुए
ग्लेशियर अपने मोहल्ले में आने वाले टाइटेनिकों के पुट्ठे से नोंच लेते हैं
गोश का एक मोटा टुकड़ा,
स्टेल्थ विमान छुप कर आग बरसाते हैं बस्तियों पे जैसे बाघ घात लगाता है-
पीली घास में छुप कर,
पुच्छल तारों के झुण्ड घूम रहे हैं घर-घर उजाड़ते हुए जैसे कोई दंगा छिड़ा हो शहर में
मेरा मोबाइल फोन कतरा-कतरा अपना रेडिएशन घोल रहा है मेरी रगों में  -
जैसेकोई मंत्री अपने राजा को ज़हर दे रहा हो धीरे-धीरे
और वो तिकोना बरमूडा ब्लैक-होल की लोकल फ्रेंचाइज़ी ले आया है यहाँ.

यहाँ तो हर तरफ मौत के मेले खेले जा रहे हैं प्यारे
तू तो बस मामूली कतरा है इस सृष्टि का जो युद्धरत है खुद से ही
और प्रसवक्रीड़ा की पीड़ा के बाद ललचाई नज़रों से देख रही है
अपने ही बिलौटों को
होठों पर जीभ फेरते हुए .....



अंतिम इच्छाएँ

वर्तमान एक दोमुंहा सांप है
जिसका एक मुंह अतीत की ओर है
दूसरा भविष्य की.
हमारा अस्तित्व लगातार व्यस्त है
गुज़रते पल की तड़फड़ाती पूंछ की परछाईं को मुट्ठी में जकड़ने में

हाथ से छूटी आत्मकथाओं के पन्ने
तूफानी भंवर में समा सारी दिशाओं में फ़ैल जाते हैं,
मैं निहारता रहता हूँ अपनी परछाईं को वर्तमान में खड़ा
अतीत में उदित, भविष्य में अस्त होते हुए

बचपन के अध्याय
जवान खेतों की पीठ पर लदे
मौसमी गीत गुनगुना रहे हैं.
कागज़ की नावों और हवाई जहाज़ों पर वसीयत लिख
उन्हें भेज दिया जाता है खज़ाने और प्रतिक्रियाएं कमाने के लिए.

जवानी के मोटे-मोटे अध्याय बिखरे पड़े हैं
सूनसान सड़कों, अँधेरी गलियों, बंज़र खेतों और उजाड़ बगीचों में.
दिन के उजालों के आरामतलब कुत्ते
सूनसान रातों में राजप्रहरी नियुक्त कर दिए जाते हैं.
हर रात ठीक दो बजे मेरी परछाइयाँ
नंगे शहर की पीठ पर गुमसुम टहलती हैं
तभी सारे कुत्ते कंधे की सबसे ऊंची हड्डियों पर चढ़
आश्वासन भरे अशुभ गीत गाने लगते हैं

बुढ़ापे के कोरे अध्याय के
आखिरी पन्ने के आखिर में
लिखा है धिक्कार!
ये आत्मा का ख़ालीपन है
जो हमेशा प्रस्तावना में अटकी रही.
ज़िन्दगी में उपसंहार नहीं होता
उसके हर एक शब्द का न्यायसंगत बंटवारा
सारे पन्नों के बीच कर दिया जाता है
ऐतिहासिक परम्पराओं द्वारा.

जीवन भर दमित अरमानों से
फांसी के तख़्त पर
पूछी जाती है अंतिम इच्छा
और दिए जाते हैं चार विकल्प चुनाव के लिए
स्वीकृत बजट के अनुसार

अंतिम इच्छा पूछने के उपक्रम में
जल्लादों की सद्भावना की मवाद
अरमानों के फेंफड़ों में ठसाठस भर दी जाती है
मोटी सुई वाले इंजेक्शन से,
और एक नए सहृदय विचार के काले लिफाफे से मुंह ढांप
उनका गला घोंट दिया जाता है:
दुनिया कितनी ख़ूबसूरत है!

दुःख महकते हैं रातों में रातरानी की तरह
भूखी आत्मा के बुखार से तपते बदन की आंच में,
अलाव की तरह दमकते हैं सर्दियों की कुहरे भरी शामों में
और खांसते जाते हैं खों-खों, जलती लकडियों से उड़ती कालिख पर.
उनके फेंफडों से सेब का रस और महंगी शराबें रिसने लगती हैं बरसातों में
पहले उनके जेनेटिकली मोडिफाइडबीज फेंक दिए जाते हैं उर्वर ज़मीन पर सैलाब उगाने के लिए
और फिर ज़मीनों को बंजर किया जाता है उनकी लहलहाती फसल के लिए;
अंत में छिड़क दिए जाते हैं महंगे आयातित कीटनाशक
दुःख के चेहरे पर मुस्कराहट लाने के लिए

सूरज उगता है और डूब जाता है रोज़
भोर और रात का चल रहा है अब भी चिरकालीन युद्ध
कैसे लिख दूँ मैं अब अंत में दो उम्मीदज़दां क्रांतिकारी शब्द
एक वैश्विक कागज़ी तसल्ली से लिथड़े हुए?
जीवन से बड़ा आसान है छलछंदों में योद्धा बनना.
ऐसे वक्तों की फसलें उगनी होती हैं
हर छाती में अलग-अलग

अपने-अपने शब्द
अपना-अपना वक्त
अपनी-अपनी अंतिम इच्छाएं




सत्य के दांत नहीं होते

सत्य कभी मरता नहीं
विलंबित हो जाता है भीष्म की कालचयनित मृत्यु की तरह
अबूझ हो जाता है मकड़ी के जाले की तरह
धुंधला जाता है किसी मोतियाबिंदी आँख की तरह
पर मरता नहीं
बस एक अधमरे सांप की तरह रेंग कर
किसी ओट में छुप जाता है फिर से बाहर आने को
एक भौंडे वक्त पर
अनचाही आँखों के सामने
किसी पुराने प्रेमपत्र की तरह !

सत्य कभी मरता नहीं
सरकारें उसे दौड़ा सकती हैं थका नहीं
पुलिस उसे कोड़े दे सकती है ज़ख्म नहीं
अदालतें उसे रुसवाई दे सकती हैं फांसी नहीं
क्यूंकि सत्य के पैर नहीं होते
पीठ नहीं होती
गला भी नहीं!

सत्य की ओट में
स्वर्ण-मृग के छलावे
“ अश्वत्थामा हतः ” की अति मंद ध्वनियाँ
और विकास के मानचित्रों की अट्टालिकाएं छुपी हो सकती हैं.
कभी इसे सुन के भी अनसुना कर दिया जाता है
उस अभागन स्त्री सा
जिसे भोगते सब हैं स्वीकार कोई नहीं करता !
जब इसका गर्वोन्मत्त गरलवमन किया जाता है
और नहीं होता कोई महावीर नीलकंठइसे स्वीकार करने
तो वो भटकता है कुछ क्षण के लिए धरा पर
और फिर ऊपर उठने लगता है
(सत्य बहुत हल्का होता है
उसके ह्रदय में पाप नहीं होता)
वो उठते-उठते पृथ्वी की सीमा से बाहर जा
ब्रह्मांड में विलीन हो जाता है;
विश्वात्मा!

जब अंतरिक्ष यात्री जायेंगे ब्रह्मांड में
तो वह उन्हें गूंजता सुनाई देगा वहाँ
शब्दशः वैसा ही
जैसा ठुकराया गया था
बिना वायु भी
क्यूँकी सत्य के फेंफड़े नहीं होते.

आश्चर्य है!
सत्य क्यों काटने दौड़ता है सबको
बावजूद इसके की
सत्य के दांत नहीं होते.

(सभी चित्र :mary-ellen-mark)
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अमित उपमन्यु

दिनांक १७ सितम्बर १९८६ग्वालियर (म.प्र.)

बी.ई. (मैकेनिकल इंजी.)एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य)सर्टिफिकेट इन फ्रेंचभारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा.
थियेटर (अभिनय) से सम्बद्धफिल्म एंड टेलीविज़न इन्स्टीट्युट ऑफ़ इण्डिया (पुणे) से डायरेक्शन शोर्ट कोर्स.
कविता/कहानियाँ/आलेख एवं कुछ लघु फिल्मों के लिए पटकथा/गीत लेखन और म्युज़िक कम्पोजिशन. राष्ट्रीय स्तर पर सॉफ्टबॉल खेल में लगभग १२ वर्षों तक म.प्र. का प्रतिनिधित्व किया और कई   प्रतियोगिताएं जीतीं.
असुविधाअनुनादसिताब दियारा और परिकथा में कवितायें प्रकाशित. कुछ अन्य पत्रिकाओं में शीघ्र प्रकाश्य.
 ई पता : amit.reign.of.music@gmail.com