कथा - गाथा : सईद अयूब

Posted by arun dev on नवंबर 14, 2012









सईद अयूब कहानीकार के रूप में अपनी पहचना बना रहे हैं. उनकी कहानिओं के विषय  खासे असुविधाजनक होते हैं. जिन्नात में जहां उन्होंने मदरसों में बच्चों के यौन शोषण का मुद्दा उठाया है वही शबेबरात का हलवा में मुस्लिम समाज में प्रेम के लिए जगह तलाश करते एक युगल की दिलचस्प कथा है. प्रस्तुत कहानी साम्प्रदायिक सोच को लेकर लिखी गई है.  
यह कहानी समकालीन  जीवन के उस यूज एंड थ्रो दर्शन का भी परिचय देती है जिसमें सब कुछ कमोडिटी है - पुरुषों के लिए स्त्रियां भी. कहानी में गालिओं का खुलकर प्रयोग हुआ है. स्त्री के वस्तुकरण से न्यूडिटी भी आ गई है. और एक बड़ा सवाल भी कि  हम क्या केवल दो पहचान भर हैं. 


फ़िरे ख्याल                                  hर

सईद अय्यूब



नींद संभवत: सर में भयानक पीड़ा और बेचैनी से खुली थी लेकिन पलकें अभी भी बोझिल-बोझिल सी थीं. गला प्यास के मारे सूख रहा था परंतु आँखे भी ठीक से नहीं खुल पा रही थीं. आँखें खोलने की कोशिश में मन ही मन रात को पी गयी व्हिस्की को एक भयानक गाली दी....मादरचो....कई बार सोचा है कि बस अब और नहीं, कई बार तौबा की है कि हाथ नहीं लगाना है हरामज़ादी को...रम पी लो, वोदका पी लो, बीयर पी लो या कुछ भी किंतु यह साली व्हिस्की...एक कप कॉफी की तलब उठी. बिस्तर से उठना चाहा तो पैर कहीं फँसे से लगे. आँखों को मिचमिचा के खोला और सर की पीड़ा को बर्दाश्त करते हुए एक नज़र अपने पैरों की तरफ़ डाली और फिर सारा माज़रा समझते देर नहीं लगी. नीना के पैर मेरे पैरों में फँसे हुए थे. वह करवट लेकर लेटी थी और अपने पैरों को मेरे पैरों में फँसा रखा था. ऐसा लगता था कि उसकी रात की भूख अभी भी शांत नहीं हुई है. बिस्तर से उठने की कोशिश में चादर खिसक कर थोड़ा ऊपर हो चला था और नीना की गोरी जाँघ उभर कर सामने आ गयी थी. उसके पैरों के रोयें मुझे सबसे अधिक पसंद थे और अब वे सबके सब मेरे सामने खुलकर मुझे ललकार रहे थे. 

रात की अपनी और नीना की सारी हरकतें एक-एक कर याद आने लगीं. और इसी क्रम में मैंने नीना के उरोजों को अपनी छाती पर महसूस किया. वह जिस तरह से मुझसे लिपट कर सोयी थी, मुझे उस पर फिर से प्यार आने लगा और बदन अपने आप एक कसाव का शिकार होने लगा किंतु तभी एक तेज उबकाई ने बदन के सारे कसबल ढीले कर दिए. मैंने उबकाई को किसी तरह से रोका और नीना के पैरों के बीच जकड़े अपने पैरों को अलग किया. चादर हटाने के बाद महसूस हुआ कि मैं मादरजात नंगा था. मैं इस तरह से न जाने कितनी बार नंगा हो चुका था. पिछले चार महीनों से तो नीना के साथ ही हो रहा था पर अजीब बात थी कि जब भी मैं होश की दुनिया में वापस आता था, मैं इस नंगेपन को बुरी तरह से महसूस करता था. मुझे लगता था कि सामने सोई हुई औरत मेरी माँ है और मैं अभी-अभी उसके स्तनों से दूध पीकर हटा हूँ. मुझे लगता था कि दुनिया की सभी औरतें मेरी माँ हैं, दुनिया के सभी मर्दों की माँ हैं और मर्द उनके सामने एक छोटे बच्चे की तरह कभी भी नंगे हो सकते हैं. यह एक सिरफ़िरा ख्याल था, पर था तो ख्याल ही. कभी-कभी मुझे लगता था कि मुझे किसी साइकेट्रिक की ज़रूरत है पर वह दिन आज तक नहीं आया कि मैं किसी साइकेट्रिक के पास जा सकूँ.     

जैसे ही मैं बिस्तर से उतरने को हुआ, नीना ने एक खास अदा से अंगड़ाई ली और मेरा हाथ पकड़ लिया.

      “कहाँ चले?”
      “कॉफी चाहिए?”
      “नहीं”
      “फिर”
      “फिर...तुम आ जाओ न...”
      “नो, मेरा मन नहीं है. यह साली व्हिस्की...तुमको कई बार बोला है कि मुझे व्हिस्की सूट नहीं करती पर तुमको...”
      “अच्छा, तुम मत आओ, पर उसको तो भेज दो”
      “किसको?”

और यह सवाल पूछते ही अपनी बेवकूफ़ी का ध्यान आया. मादरचोद यह व्हिस्की...जो न करवाए वह थोड़ा. भला इतनी देर से मुझे उसकी याद भी नहीं आयी. रात तो हम दोनों एक ही बेड पर थे. बल्कि हम तीनों. मैं, वह और बीच में नीना. मुझे याद आया कि वह मुझसे ज़्यादा उत्साहित था जैसे नीना के साथ उसका पहली बार हो. पता नहीं क्या बात थी? पर वह बहुत खुश था और उसकी खुशी का अंदाज़ा उसकी हरकतों से हो रहा था. एक दो बार तो नीना ने उसे झिड़क भी दिया था पर उसका उसपर कोई असर नहीं पड़ा था. ऐसा भी नहीं था कि उसने हम दोनों से ज़्यादा चढ़ाई हो. शराब के मामले में वह बहुत एहतयात से काम लेता था. वह शुरू बहुत जोश से करता था पर उसे अच्छी तरह से मालूम था कि कहाँ बंद करना है और उस सीमा के बाद एक बूँद भी नहीं चाहे कुछ भी हो जाए. पर शबाब के मामले में एकदम उल्टा...शुरुआत हिचकिचाहट के साथ पर उसके बाद रुकने का नाम नहीं और बीच में कोई सलीका भी नहीं. वैसे भी वह सलीकेदार नहीं था और मुझे उसकी इसी बात से चिढ़ थी.

“बाथरूम में होगा, आएगा तो खुद बुला लेना. वैसे उस साले को बुलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. वह तो मस्त साँड की तरह खुद ही आएगा.”

मैं किचन से कॉफी के साथ निकला तो नीना उसी तरह से बिस्तर पर पड़ी थी. वह एक बार फिर सो गई थी या सोने का बहाना कर रही थी. चादर उसके शरीर से अलग होकर नीचे ज़मीन पर पड़ा था. उसके गोल-गोल उरोज अपनी पूरी आब-व-ताब के साथ दावत देते मालूम हो रहे थे.

“रात भर की इतनी ज़बरदस्त कसरत के बाद तो इनको थोड़े ढीले पड़ जाने चाहिए थे” मैंने मन ही मन सोचा “पर यह नीना भी...किस चीज़ की बनी है यह छोकरी? कोई और वक़्त होता तो...”

पर रात की बात याद आते ही मन फिर उसकी ओर डोल गया. कहाँ है वह? इतनी देर बाथरूम में तो नहीं लगनी चाहिए. कॉफी का मग हाथ में पकड़े-पकड़े ही मैं बाथरूम की तरफ़ बढ़ा. बाथरूम खुला था और वह वहाँ नहीं था. फ़्लैट में मौजूद दूसरे बाथरूम में भी वह नहीं था. वह पूरे फ़्लैट में कहीं नहीं था. मन में एक अजीब सी आशंका जन्म लेने लगी. वह ऐसा ही था. उसका हर क़दम किसी न किसी आशंका को जन्म देता था. वह पहले भी कई बार यह फ़्लैट छोड़ कर जा चुका था. यह एक ऐसी बात थी जिसकी मैं कभी परवाह भी नहीं करता था. दो-चार महीनों की इधर-उधर की आवारागर्दी के बाद वह फिर लौट आता था. मैं न तो उससे कोई सवाल पूछता था कि वह इतने दिनों कहाँ रहा? क्या कर रहा था? वापस क्यों आया? कितने दिन रहेगा? और न ही वह बताना उचित समझता. पिछली बार तो वह इस लिए चला गया था कि मेरे साथ रहने वाली लड़की श्यामा ने उसके साथ सोने से इंकार कर दिया था. ऐसा नहीं था कि उसे दूसरी लड़की नहीं मिल सकती थी या कि शहर में लड़कियों का टोटा हो गया था. मैंने उसे समझाया भी कि,

“देख, सबकी अपनी अपनी पसंद होती है. श्यामा अगर तेरे साथ नहीं सोना चाहती तो क्या फ़र्क पड़ता है. और लड़कियाँ भी तो हैं? और हो सकता है कुछ दिन बाद श्यामा मान ही जाए.” 

पर न जाने क्यों वह कुछ भी सुनने और मानने को तैयार नहीं था और सुबह होते ही बिना बताए निकल गया था.

पता नहीं क्या था उस शख्स के अंदर. अपनी तमामतर बेतरतीबियों और अख्खड़पने के बावजूद वह न जाने कबसे मेरे वजूद का एक अहम हिस्सा बन गया था. वह जब तक मेरे पास नहीं होता था, मुझे उसकी ज़्यादा परवाह नहीं होती थी पर जब वह मेरे पास होता था तो एकदम मेरी जात का एक हिस्सा बन जाता था. मेरे पूरे फ़्लैट पर उसका एक तरह से कब्ज़ा था. कभी कभी तो मुझे डर लगता था कि एक दिन वह कह देगा कि तुम यह फ़्लैट छोड़ कर चले जाओ और बावजूद इसके कि फ़्लैट मेरा है और कागज़ात मेरे पास सुरक्षित हैं, शायद मैं उसके कहने से यह फ़्लैट छोड़ कर चला ही जाऊं. वैसे अन्य बहुत सारे ख्यालातों की तरह यह भी एक सिरफिरा ख्याल भर ही था. और फ़्लैट ही क्या, वह मेरी हर चीज़ बेझिझक इस्तेमाल करता था. मेरे कपड़े, तौलिए, शेविंग के सामान, जूते गो कि उसको थोड़े बड़े आते थे और न जाने कब से ऐसा हुआ कि मेरी गर्ल फ्रेंड्स भी...और यह अजीब बात थी कि लाखों नाज़-नखरें वाली यह लड़कियाँ भी उसके सामने ऐसे बिछ जाती थीं जैसे वही उनका असली ब्वाय फ्रेंड हो. कई बार मन ही मन मैं कुढ़ कर उसे गाली भी देता कि साला कोई जादूगर है. ज़रूर कोई जादू-टोना जानता है. वर्ना ये लड़कियाँ तो बड़ों-बड़ों को घास नहीं डालती फिर...पिछले दो वर्षों में बस एक श्यामा ही थी जिसपर उसका जादू नहीं चल पाया था और श्यामा ने उससे साफ़-साफ़ कह दिया था कि उसके साथ सोना तो दूर, वह उसका चेहरा भी नहीं देखना चाहती. पता नहीं क्या बात थी, पर श्यामा के इस उत्तर से मुझे मन ही मन खुशी हुई थी. शायद मैं उससे जलता था...शायद नहीं, मैं उससे जलता ही था, पक्का. पर मेरी गर्ल फ्रेंड्स के साथ उसके सोने का मतलब यह नहीं है कि हम दोनों एक ही साथ, एक ही बिस्तर पर उस गर्ल फ्रेंड के साथ होते थे. वह मेरे टाइम से वाकिफ़ था और उस समय पर कभी दखलंदाज़ी नहीं करता था. पता नहीं इतना सलीका कहाँ से आ गया था उसमें? एक साथ एक लड़की को भोगने का ख्याल अचानक मेरे ही मन में उठा था. मेरे अन्य ख्यालों की तरह यह भी एक सिरफिरा ख्याल ही था पर मैं इस ख्याल की लज़्ज़त को पाना चाहता था और इसलिए एक दिन यह प्रस्ताव उसके सामने रख ही दिया. मेरा प्रस्ताव सुनकर वह बहुत देर तक ख़ामोश रहा. वैसे भी वह अधिकतर ख़ामोश ही रहता था. उसकी लंबी खामोशी से उकता कर जब मैं बीयर का दूसरा ग्लास भरने लगा तो उसने अपनी खामोशी तोड़ी-

“लौंडिया मान जाएगी?”
“बात करूँगा. उम्मीद तो है.”
“एक बात बता...यह ख्याल क्यों आया तेरे को?
“बस यूँ ही...मज़े के लिए”
“रात को कोई फिल्म तो नहीं देखी?”

“तू जानता है कि मैं बी.एफ. नहीं देखता. जब सब कुछ सामने है तो फिल्म की क्या ज़रूरत?” मेरा लहज़ा थोड़ा तल्ख था.

“देख लौंडिया तक तो ठीक है पर उसके बाद अगर तू मेरी तरफ़ बढ़ा या अगर मुझसे यह चाहा कि मैं तेरे साथ कुछ करूँ तो मैं उसी दिन चला जाऊँगा.”

“भोंसड़ी के...” न चाहते हुए भी मेरी आवाज़ थोड़ी और तल्ख़ हो गयी, “तू मुझे होमो समझ रहा है?”
“अभी है तो नहीं, पर बनने के लक्षण हैं”, वह कभी-कभी ही मुस्कुराता था और अभी मुस्कुरा रहा था. मेरा मन किया कि बीयर का पूरा ग्लास उस के चेहरे पर उड़ेल दूँ.

नीना को समझाने और मनाने में वक़्त लगा लेकिन आखिरकार वह इस एक्सप्रिमेंट के लिए तैयार हो गयी और शायद धीरे-धीरे उसे इसी में मज़ा आने लगा था.

“पर अभी कहाँ गया बास्टर्ड?”

कॉफी ने सर की पीड़ा और बेचैनी दोनों को काफ़ी हद तक कम कर दिया था. नीना ने बेड पर बेचैन करवट ली और अब उसकी दोनों जंघाओं के बीच की घाटी साफ़ दिखाई दे रही थी.

“मादरचो...” पता नहीं मैंने किसको गाली दी. 

कोई और समय होता तो मैं गाली देने के बजाय अब तक नीना पर दोबारा चढ़ चुका होता पर इस समय तो सारा ध्यान उस कमबख्त पर लगा हुआ था. नीना की पहाड़ियों और घाटियों पर एक उचटती सी नज़र डालते हुए मैंने कॉफी की आखरी घूँट भरी, खूंटियों पर टंगे अपने कपड़े पूरी बेतरतीबी के साथ पहने, फ़्लैट को लाक किया और कार लेकर निकल पड़ा. फ़्लैट की एक चाबी नीना के पास थी, इसलिए मुझे उसकी चिंता नहीं थी.

इतनी सुबह वह कहाँ जा सकता था? शहर के कुछ बार और रेस्टोरेंट के अलावा उसका कोई दूसरा ठिकाना भी नहीं था और वे सब के सब इस समय बंद थे.

“कहीं हवाखोरी की सनक तो नहीं समा गयी?” 

मन ही मन सोचा और आस-पास के सारे पार्क और वे जगहें देख डाली जहाँ उसकी यह सनक परवान चढ़ सकती थी. रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के दो-दो चक्कर लगा डाले. था तो शहर में ही कहीं, क्योंकि कोई भी ट्रेन या बस इतनी सुबह शहर से बाहर नहीं जाती थी.

“आखिर गया कहाँ मादरचोद?” 

मन की खीज बढ़ती जा रही थी और साथ ही उसके साथ किसी अनहोनी की आशंका से भी मन भरा जा रहा था. मन में उसके इस तरह अचानक, रात भर मज़े करने के बाद, इतनी सुबह कहीं चले जाने के कारणों को लेकर भी उथल-पुथल मचा हुआ था. बार-बार एक सवाल दिमाग में कौंध रहा था कि कहीं रात को, नशे की हालत में मैंने उसके साथ कोई गलत हरकत तो नहीं कर दी, या फिर उसने मेरी किसी बात या हरकत का गलत अर्थ तो नहीं ले लिया. इस संदर्भ में वह पहले ही चेतावनी दे चुका था. तमाम तरह की आशंकाओं से घिर कर मैंने अपनी कार कब स्थानीय पुलिस स्टेशन की तरफ़ मोड़ दी, मुझे पता ही नहीं चला. आशंकाओं का एक कारण आजकल के शहर के हालात भी थे. गो कि शहर में शांति थी पर माहौल डरावना हो गया था. दो महीने पहले हुए दंगों की काली घटा से शहर अभी तक आज़ाद नहीं हो पाया था. वर्षों के अपनों के मन में भी एक दूसरे को लेकर शक, नफ़रत और दुर्भाव का जो वातावरण तैयार हो चुका था, वह कभी भी विस्फोटक हो सकता था. मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं, जो उसके गायब हो जाने का कभी नोटिस ही नहीं लेता था, इस बार उसको लेकर इतना बेचैन क्यों था. शायद उसकी वजह इस बार का शहर का वातवरण भी था. इस विस्फोटक स्थिति में मैं चाहता था कि मेरे साथ, मेरे आस-पास कोई रहे. एक से भले दो...किसी आपात स्थिति में वह कुछ न भी कर पाता तो भी मन में एक भाव तो रहता कि वह साथ में है. वैसे उसका डील-डौल देखकर कोई भी उससे उलझने से पहले कई बार सोचता. शायद मैं स्वार्थी था पर सच तो यह है कि सबके अंदर कुछ न कुछ स्वार्थ हमेशा रहता है.

कार पुलिस स्टेशन की तरफ़ भागी जा रही थी. अचानक एहसास हुआ कि मैंने बहुत देर से सिग्रेट नहीं पी है. सिग्रेट सुलगा कर कार का शीशा खोला ही था कि सामने वह नज़र आ गया. सड़क के किनारे हनुमान जी के मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा हुआ. मुझे आश्चर्य का एक झटका सा लगा. मंदिर और वह? कार एक झटके से रुकी और कुछ ही पल में मैं उसके सामने था.

“यह क्या बेहूदगी है?” 

मेरी आवाज़ थोड़ी तेज़ थी पर इतनी नहीं कि कोई और सुन सके. मंदिर में लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी यद्यपि भीड़ अभी नहीं हुई थी. हैरत की बात थी कि इस शहर में इतने दिनों से रहने के बावजूद मुझे नहीं पता था कि इस जगह पर कोई मंदिर भी है.

उसने एक नज़र उठा कर मुझे देखा, पर बोला कुछ नहीं.

“मैं कुछ पूछ रहा हूँ?”
वह चुप.
“बोलते क्यों नहीं?”
वह चुप.
“क्या हो गया है तुमको?”
वह चुप.
“सुबह-सुबह क्यों गायब हो गए?”
वह चुप.
“यहाँ क्यों बैठे हो?”
वह चुप.
“चलो, घर चलो”
वह चुप.
“क्या हो गया यार?”
वह चुप.
“रात को कुछ हुआ क्या?”
वह चुप.
“मैंने कोई गलत हरकत तो नहीं की? 
तुम जानते हो, रात को मैं होश में नहीं था. व्हिस्की...”
वह चुप.
“नीना ने कुछ कहा?”
वह चुप.
“अबे, कुछ बोलता क्यों नहीं बे?
वह चुप.
“मुँह में दही जमा रखा है क्या?”
वह चुप.
“साले...”
वह चुप.
“अबे साले, क्या हो गया है तुम्हें?
वह चुप.
“अबे भोंसड़ी के...”
वह चुप.
“मादरचोद...पागल हो गया है क्या?
वह चुप.
“अबे मादरचोद...”
वह चुप.
“अबे मादरचोद, साले...”
वह चुप.
“कुछ मुँह से तो फूट बहन के लौड़े...” न चाहते हुए भी मेरी आवाज़ तेज़ होती जा रही थी.
वह चुप.
“मादरचोद...अबके नहीं बोला तो मैं तुझे जान से मार दूँगा.”
“हाँ, मार डाल...इसके अलावा ” पहली बार उसका मुँह खुला.
“इसके अलावा क्या...?” उसकी इतनी देर की चुप्पी के बाद इस तरह बोलना...
मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था.
“इसके अलावा और आता क्या है तुम लोगों को?” 

मैंने पहली बार उसकी इतनी तेज़ आवाज़ सुनी थी. यहाँ तक कि मंदिर में आने-जाने वाले चंद लोग भी इस तेज़ आवाज़ पर ठिठक गए.

“तुम्हें हुआ क्या है आज?” मैंने अपने गुस्से को भरसक दबाते हुए पूछा, “बात हमारे-तुम्हारे बीच हो रही है. यह ‘तुम लोगों’ कौन हैं?”

“तुम लोगों का मतलब तुम लोगों से ही है.” 

पहली बार उसके लहज़े में नफ़रत जैसा कुछ था.
“क्या मतलब है तुम्हारा? खुलकर क्यों नहीं बोलते?”
“टी.वी. देखी आज?”
“नहीं, क्यों?”
“सुबह-सुबह उठकर टी.वी. देख ली होती, तो यह सवाल नहीं करता?”
“तुम्हें मालूम है, मैं टी.वी. जैसी फ़ालतू चीज़ पर अपना वक़्त बर्बाद नहीं करता? 
तू बताता क्यों नहीं कि बात क्या है?”
“मेरे शहर में बम ब्लास्ट हुआ है. रेलवे स्टेशन पर. 
बीस लोग मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हैं.”
“ओफ्फ़...मुझे...?”
“इसमें अभी तक चार लोग पकड़े गए हैं और वे सबके सब मुसलमान हैं.”
“होंगे बहनचोद...पर तू मुझसे इस तरह से क्यों बात कर रहा है.?”
“क्यों कि तू भी मुसलमान है. उनका दीनी भाई....”
“मैं...?”
“हाँ, क्या तू मुसलमान नहीं है?”
“हूँ, मगर...?”

“मगर क्या भोंसड़ी के...तुमने एक बार नहीं कहा था कि सारे मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं.” उसके लहज़े की नफ़रत साफ़ पहचानी जा सकती थी.

“कहा होगा, याद नहीं...पर उसका सन्दर्भ...”
“चुप मादरचोद...”

उसके लहज़े की नफ़रत और आवाज़ में इतनी तेज़ी थी कि मेरी नींद खुल गई. मैंने देखा कि नीना की टाँगे मेरी टांगों के बीच फँसी हुई हैं, चादर का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है. नीना की पहाड़ियाँ और घाटियाँ पूरी बेहेयाई से सैर करने का आमंत्रण देती हुई लग रही थीं. वह नीना के बगल में सोया हुआ था. उसका एक हाथ अभी भी नीना की गोलाइयों पर था और उसके होठों पर एक तृप्ति भरी मुस्कान फैली हुई थी.  
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सईद अय्यूब१-जनवरी,१९७८. कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश)
उच्च क्षिक्षा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से
अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ इंडियन स्टडीज में अध्यापन
संस्थापकसह-निदेशक S.A. Zabaan Pvt. Ltd
पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशन

ई-पता: sayeedayub@gmail.com