कथा - गाथा : अशोक आत्रेय

Posted by arun dev on नवंबर 22, 2012

Shane Sutton




स्कूटर                  
अशोक आत्रेय





मैं. मेरी पत्नी. मेरा बेटा. बेटी की बात अभी नहीं. सिनेमा हाल से हम बाहर आ गए. बाहर आते ही देखा- सामने के मोटर गैरज पर बरसों से बंद पडे़ ताले के आसपास टीन के लहरियादार बड़े दरवाजे पर जंग लगी थी. फुटपाथ पर चिकनाई, काई और बिच्छूपत्ती और घास के साथ-साथ सफेद रंग के कीड़े उड़ रहे थे. खुजली पैदा करने वाले कीड़े. उसी के पास कुछ स्कूटर खड़े थे. एक स्कूटर की धुलाई चल रही थी. तेज फव्वारे की धार से मेरा मन भी अपने लैम्ब्रेटा की धुलाई या सर्विस का हो आया. आज वैसे भी सण्डे था... और फुरसत ही फुरसत थी. अब घर में न ताश खेलने वाले आते थे न शतरंज या कैरम खेलने वाला . इस सब को गुजरे जमाना हो गया था. सण्डे के दिन किसी न किसी बात को लेकर पत्नी से झगड़ा जरूर होता था, जो बेटे और बेटी को भी लपेट लेता. सारे घर में विचित्र प्रकार का तनाव सन्नाटा भर जाता था. सभी पत्थर के बुतों से बन कर बैठ जाते थे. बेटी की बात बाद में. वह तो चली गई.

तेज-तेज तीखा फव्वारा स्कूटर पर पड़ता, मिट्टी उतारता, और आसपास का इलाका पानी से भर जाता. एक-आध फटी हुई चप्पल पानी में आधी डूबी वहीं पड़ी थी. कुछ अखबार के गीले टुकड़े. कोई चीटियों के लिए आटा डाल गया था. यह कोई पुण्य का कार्य नहीं था बल्कि पाप उतारने के लिए किया गया जुगाड था.



अगले चौराहे से सड़क मुड कर कबाड़ी बाजार चली गई थी. यह एक आश्चर्य क़ी बात थी कि लगभग पन्द्रह-बीस साल बाद मैं मेरा बेटा और मेरी पत्नी पिक्चर देखने साथ आए थे. इसका श्रेय जाता था टाइटेनिक फिल्म को. मुझे लगता है कि टाइटेनिक ने कई टूटते, टूटे या बिखरते परिवारों को जोड़ने की कोशिश की थी. वह समुद्र पर फिल्माई गई पारिवारिक फिल्म थी. उसका रोमांस अद्भुत था. समुद्र की लहरों की तरह उसकी नायिका की सफेदी समुद्र के सर्फ जैसी थी. गहराई से पैदा हुई. और.....नायक के तो क्या कहने वह तो साक्षात कामदेव ही था. मेरी पसंद का नायक. वह किसे पसंद नहीं आता ?



खैर. बात काफी आगे निकल गई. इतना आगे बात को जाना नहीं चाहिए. बात जब स्कूटर को केवल सर्विस कराने की हो तो इतनी सारी बातें क्यों ? पहले नाटक जैसी लगती इस कहानी के हम तीन ही पात्र थे. लड़की कही घोर अंधेरे में गुम हो गई थी. फुल फैदम फाइव उसकी आखें मोतियों की तरह चमक रहीं थीं. मुझे शेक्सपीयर की याद आने लगी थी. कहां अचानक गहराई में चली गई बिटिया. फिलहाल इस कथा नाटक में हम तीनों ही थे. मैं मेरी पत्नी मेरा बेटा ! दूसरा था लघु नाटक या मिनी नाटिका जिसमें था स्कूटर का मिस्त्री और उसके साथ के दो चिकने लड़के ....... तीसरे में अब उभर रही थी अकेली एक विजय-मुद्रा में खड़ी स्त्री ....... मेरी पत्नी.... अर्थात मेरे बेटे की माँ.


इस कथा, नाटक या उपन्यास या फिल्म का नाम बन रहा था –“ माँ तुझे सलाम.यानि वन्दे मातरम्-. वहीं कहीं आसपास डिजोल्व होते घुंधले घुंघराले बालों के बीच उभरता संगीतकार रहमान एक झण्डा लेकर आगे बढ़ता हुआ चला जा रहा था.........और यह कि उसके पीछे भोंक रहे थे कुछ गली के कुत्ते भी. हंस की पंक्तियाँ नहीं... गुलाब की पंखुड़ियां का तूफान भी नहीं..... कीचड़ में नहीं इंद्रधनुष भी नहीं..... भूखे लोगों की भीड़ भी नहीं......और कारगिल भी नहीं......... मैं कुछ देर के लिए ठगा ठगा सा स्तब्ध हो गया था. अपने आप से अजनबी! मेरे पास खड़ा था कलाकार मकबूल फिदा हुसैन. सफेद दाढ़ी वाला नंगे पैरों वाला... और चारों और से कोई फूल फेंक रहा था. कोई पत्थर.... और वहीं उभर रहे थे स्वर मेरी पत्नी के आस-पास माँ तुझे सलाम!

क्या हुआ तुम्हें ? घर नहीं चलना है - यह पत्नी की आवाज थी. मैं हक्का बक्का हो गया. मैंने पत्नी की आंखों की ओर देखा. मेरी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली.
यह क्या हुआ तुम्हें -पत्नी ने मुझे देख कर कहा . बेटा ऊबने लगा था. फास्ट जेनेरेशन का लड़का.
बेटा बोला - पापा, कम ओन यार !
मैंने सोचा कहां जाना है ?

मेरे मुंह से निकल ही गया- अपने स्कूटर की सर्विस करा लेते हैं. कितनी अच्छी सर्विस हो रही है यहां. तुम बेटे बस से घर चले जाओ, मैं और मिस्त्री बाद में स्कूटर लेकर आते हैं.
-क्यांे दुबारा देखनी है क्या यह फिल्म- बेटे ने व्यंग्य से पूछा. मैं मुस्करा दिया. पत्नी के कुछ समझ में आया कुछ नहीं. उसका चेहरा स्टिफ हो गया. फिर भी पत्नी ने कहा- इसे क्यों भिजवा रहे हो. यह भी साथ ही चलेगा. पर यह अभी स्कूटर सर्विस की बात कैसे सूझ गई ?
मुझे लग रहा है, हमने इसी जगह, इसी तरह, बिल्कुल आज की ही तरह अपने स्कूटर की सर्विस कराई थी...... यही मिस्त्री था. यही दोनों चिकने लड़के थे. बहुत अच्छी सर्विस की थी इन लोगों ने... मुझे कुछ और भी याद आ रहा है........ मैं कहीं डीप चला गया था.
ग्रेट............बेटा बोला था. मेरे महान पापा. सेल्यूट. अबे उल्ले के पट्ठे.....सैल्यूट करना हो तो अपनी माँ को करना .
बेटा तत्काल सैल्यूट के लिये तैयार हो गया. माँ तुझे सलाम...... मैंने कहा-बन्दे मातरम् ........

तभी हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो गई. कुछ लोग जो सड़क पर खड़े थे आस-पास के पेड़ों के नीचे चले गए. कुछ और लोग उस गैरेज के टिन-शेड के नीचे आ गए. हम तीनों भी स्कूटर लेकर वहां पहुंच गए.
मुझे लगा अब अगर मैं सर्विस की बात करूंगा तो मिस्त्री को लगेगा-बरसात मैं खड़े रहने का फायदा उठाने के लिए ही यह आदमी सर्विस की बात कर रहा है - जब कि मेरा ऐसा कुछ भी मूड नहीं था. मैंने तो बरसात आने से पहले ही सर्विस की बात सोच ली थी.
मैंने कहा- सर्विस करवानी है स्कूटर की.....
मिस्त्री ने स्कूटर की हालत देखी..... साब इसे बेच क्यों नहीं देते? यह तो ....
इस खटारा को कौन लेगा ? सिक्टी फाइव का लैंब्रेटा है. ... पर आज भी इस पर हम तीनों चलते हैं एक साथ.
मिस्त्री हंस दिया. उसने उड़ती सी नजर से मेरी पत्नी को देखा. बेटा गंभीर हो गया. धीरोदात्त नायक की तरह.
मिस्त्री ने इशारा करके स्कूटर छोकरों से अलग रखवा लिया.
कितनी देर लगेगी- पत्नी ने पूछा.
अभी हो जाता है मैडम- मिस्त्री बोला.
मुझे जाने क्यों लगा कि जितना कांफीडेंस मिस्त्रियों को अपने धंधे में होता है वैसा कांफीडेंस प्रधानमंत्री को भी देश चलाने में नहीं होता. मैं मन ही मन अपने विचार को लेकर एक कबूतर की तरह गुटरगूं करने लगा.
मैंने फिर अपनी पत्नी को देखा..... और मेरी आंखों से फिर आंसुओं की धारा बह निकली...... मैंने धीरे से अपने आंसू रुमाल निकाल कर पौंछ लिये.
स्कूटर वाले मिस्त्री ने मेरे पास आकर मुझ से पूछा- सर ऑयल डलेगा ?
मेरी आंखों में आंसू देख कर वह एकदम से ठिठक गया. .... अरे साहब आप तो रो रहे हैं. क्या फिल्म इतनी रुलाने वाली थी?
मैं बार-बार सब के बीच पकड़ा जा रहा था. यह क्या हाल बना रखा था मैंने अपना.
नहीं बेटा, ये तो कभी कभी यों ही निकल जाते है ये आंसू.....इनका कोई अर्थ नहीं....
मिस्त्री, जो मुसलमान था, गंभीर हो गया. साहब ! कुछ हुआ है आपके साथ?. क्या पिक्चर में आपकी जेब कट गई ?

पागल!जेब कट जाती तो सर्विस कैसे कराता स्कूटर की.....?
अरे वो तो साहब पैसा कहां जाता है, आप से कभी भी ले लेता. फिर एक बार स्कूटर वाले मिस्त्री की नजर मेरी पत्नी पर पड़ी और वह अपने पाने लेने चला गया. .... दोनों छोकरे आए और नट बोल्ट खोलने लगे.
स्कूटर वाला फिर मेरे पास आया. वह बोला- अभी मुझे ख्याल आया आपने मुझे बेटा कहा.
-क्यों ? क्या मैं तुम्हें बेटा नहीं कह सकता ?
मैं मुसलमान ..... आप........ वह रुक गया.
तुम मुसलमान मैं हिन्दू यही न....... मैं बोला ! तो इसमें क्या बात हुई ? क्या मुसलमान किसी हिन्दू का....... फिर वैसे अपनी ही बात कहते हुए मैं. रुक गया....... अरे यह तो सब चलता है. तुम मेरे बेटे न सही मैं तुम्हारा बाप नहीं. पर हम सब हिन्दुस्तानी तो हैं ही.
मिस्त्री को अचानक जाने क्या हुआ. यह तो ठीक है साहब. फिर वह अचानक सैल्यूट को मुद्रा में आ गया और मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर बोला- माँ तुझे सलाम.......! (गजब.... पिक्चर वाली सिचुएशन आने लगी थी)
बरसात एकदम से बंद हो गई थी. मोटर गैराज के साइड में खड़े स्कूटर फिर सड़क के किनारे आ गए थे. लोग धमाधम स्कूटर स्टार्ट करके जाने लगे थे. मुझे देख कर मेरी पत्नी ने पूछा- यह तुम्हें अचानक क्या हो गया है...? ये आंसू तुम्हारे चेहरे पर...... क्या फिल्म इतनी भावुक थी?
मैंने मन ही मन सोचा- कितनी भोली है मेरी पत्नी! मुझे जाने क्यों लग रहा था. यह सब पहले भी घटित हो चुका है.

यह आज नया कुछ नहीं हो रहा. धीरे-धीरे जैसे हम तीनों पुनर्जन्म की किसी बेला में प्रवेश कर रहे थे. यह अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाला कोई चौराहा था. यही पर हम खड़े थे. स्कूटर वाला मिस्त्री अब हमारे स्कूटर की धुलाई करने लगा था. दोनों छोकरे इधर-उधर हो रहे थे. चिकने छोकरे. उन्हें मिस्त्री गालियां देता. एक छोटे लड़के के अभी उसने जोर से किसी गलती पर झापड़ जड़ दिया था. छोटा लड़का बिना बोले पाने से कोई पेंच खोलने लगा था. जिस तरह बरसात चिकने घड़े पर असर नहीं करती वैसे ही इस चिकने लड़के पर उस मिस्त्री की गाली और झापड़ का असर नहीं हुआ था..... कम से कम तक ऊपर से यही लग रहा था.
पापा कोई खास बात....? इस बार मेरी गंभीर स्थिति देखकर बेटा पूछा रहा था. मम्मी पापा को मेंटल हॉस्पिटल में दिखा क्यों नहीं देते! वहां डॉ. भटनागर तो इनके अच्छे दोस्त भी हैं.
मेरी पत्नी एकदम स्तब्ध रह गई. हालांकि मैं यह ठीक समझता था कि जो बेटा कह रहा था, उसमें कहीं कोई दो राय नहीं थी. बस, बात बड़ी जल्दी क्विक-डिसीजन में बिना किसी प्रसंग के सीधे-सपाट कह दी गई थी.... शायद इसी का अफसोस मेरी पत्नी को था.

Jack_Vettriano
मैं डिप्रेशन का शिकार तो कई दिनों से था. डिप्रेशन के एक हजार एक सौ आठ कारण थे- मेरा बेटा इंजीनियरिंग करने के बाद भी बेरोजगार था. मेरी पत्नी को तपेदिक की दूसरी स्टेज थी. मेरी बिटिया टी.वी. और फिल्म के चक्कर में अपना सब कुछ लुटा बैठी थी और एक शादीशुदा तीन बच्चों वाले एक डायरेक्टर के साथ, जो कभी मेरा दोस्त था, की अब एक रखैल बन कर रहने लगी थी. वह बहुत से लोगों से मिलने जाती थी. कभी-कभी किसी सीरियल में उसका कोई छोटा-मोटा रोल हम देख लेते थे. एक्ट्रैस वह गजब की थी, किन्तु अब थोड़ी मोटी और स्थूल हो गई थी, इसलिए मेन-रोल की बजाय उसे सादा रोल ही मिलता था. मेरे घर से मेरा प्रिय तोता इलू भी उड़ गया था. एक दिन पिंजरा खुला रहने के कारण.... और सबसे बड़ी परेशानी थी मुझे इस देश के बारे में सोच कर बार बार चुनाव आ रहे थे. कारगिल का युद्ध हो गया था. अणु-बम की चेतावनी थी. देश में मंहगाई और भ्रष्टाचार बढ़ रहा था..... और मेरे पास सिक्सटी फाइव के मोडल का लैब्रेटा था अभी भी जिस पर हम तीनों बैठ कर शहर का चक्कर लगा आते थे.
मेरी आंखों से फिर अश्रुधारा बह निकली.
मैं बार बार जाने क्यों रो पड़ता था. जैसे यह सड़क नहीं, कोई रंगमंच हो. जैसे यह यहां मेरे पास खड़ी मेरी पत्नी मेरी पत्नी नहीं, पत्नी का करैक्टर हो. जैसे स्कूटर की सर्विस करता मिस्त्री और उसके दोनों छोकरे ऐसे करैक्टर हों जो किसी सभी ‘‘सीरियल के अंग’’ में इस सारे मामले का हिस्सा बन गये हों. मैं सचमुच कहीं गहराई में डूबता जाता था. अब सब कुछ मुझे बदला बदला नजर आता था.

इसी बदलाव को एक बिल्कुल नया ही रूप देता मिस्त्री मेरे पास आया और मुझ से कहने लगा- सर आपका यह स्कूटर जिसकी मैंने आज सर्विस की है- मुझे कुछ अलग सा नजर आ रहा है. इसे छू कर देखता हूँ तो इसमें किसी मनुष्य जैसी फीलिंग होती है. यह स्कूटर मुझसे कुछ मांग रहा है. वह मांग रहा है आपसे एक बड़ा बलिदान.
मैं उसकी बात कुछ-कुछ समझ रहा हूँ. मेरी पत्नी भी शायद कुछ बदली हुई लगती है. बेटे में बदलाव दिख रहा है. पर वह अधिक गंभीर नहीं है. मैं स्कूटर वाले मिस्त्री से पूछता हूँ- ऐसा क्या बलिदान चाहिए इस स्कूटर को मुझसे?
 यह बलिदान विचित्र है. यह कहता है मुझे चाहिएं- आपकी पत्नी के हाथ और पैर. इसी समय.
-क्या होगा इससे-? मैं मिस्त्री से पूछता हूँ.
-क्योंकि यह स्कूटर......एक बड़े काम के लिए कहीं जा रहा है.... यह मुझे कोई देवता ही लगने लगा है. शायद कोई जिन्न...या कुछ और....
मिस्त्री के शरीर उसके हाव-भाव और बोलचाल में बिल्कुल परिवर्तन हो गया है. वह बदल चुका है.

मेरी पत्नी भी कहती है- मैं तैयार हूँ. हाथ-पैर देने के लिए. इट्स माई प्लेजर अगर इस स्कूटर को मेरे हाथ-पैर चाहिएं.
-हाँ, किसी बड़े जन-कल्याण के लिए चाहिएं- इस स्कूटर को हाथ-पैर. पर ये हाथ-पैर तो मैं भी दे सकता हूँ... या फिर मेरा बेटा.
-हाथ-पैर ममा के दिए जा सकते हैं. वे घर में अकेली पड़ी रहती हैं. आजकल बोर भी बहुत होती हैं. फिर मैं तो अभी बहुत सी बातें करने की सोच रहा हूँ. पापा ! आपके भी कई सपने अधूरे पड़े हैं. कई फिल्में भी तो बनानी हैं न आपको.
मिस्त्री कहता है- मैं ये हाथ-पैर ले कर उनमें स्कूटर के पहिये जोड़ दूंगा. वे पहियों से चल फिर सकेंगी. स्कूटर वाला एक हैंडल मैं उनकी गर्दन के दोनों ओर जोड़ दूंगा. वे आसानी से काम निकाल सकंगी. माँ तुझे सलाम........
पर यह सब काम किस बदलाव के लिए जरूरी था? मैंने पूछा. हालांकि मैं जानता था. यह बदलाव जरूरी और स्वाभाविक लग रहा था. यकायक सामने उपस्थिति नई परिस्थिति या नया नाटक जैसा. शायद यह कोई नई फिल्म भी हो सकती थी!

मेरी पत्नी तैयार थी. उसने स्कूटर के अंग अपने शरीर पर जोड़ लिए.
जन-कल्याणके लिए स्कूटर ले कर मिस्त्री कहीं दूर चला गया. दूर…..बहुत दूर....
 
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अशोक आत्रेय की कहानी स्कूटर’!
हेमंत शेष

हर अच्छी कला की एक खासियत ये है कि उसकी व्याख्या कई कई ढब-ढंगों से संभव हो सकती है, और इस कथा को भी एक अच्छी आधुनिक कलाकृति की तरह ही अनेक मानसिक-कोणों से देखा-परखा जा सकता है. वरिष्ठ हिन्दी लेखक अशोक आत्रेय की एक ताज़ा कहानी हम कुछ मित्रों ने अभी-अभी पढ़ी  शीर्षक है- स्कूटर जो लेखक के आगामी कहानी संग्रह में शुमार होगी ! मानसिक अलगाव, अवसाद, अकेलेपन और सामाजिक तौर पर एकाकी होते जाते दबे कुचले पात्रों की मानसिक ऊहापोहों के सृजन में सिध्ह्हस्त लेखक की यह छोटी सी कहानी एक बड़ी सचाई की मार्मिक कथा है. और अगर तत्काल एकदम साफ़ कहने की ज़रूरत हो तो- वह सचाई है, स्त्री के यंत्रीकरण की, जिसमें मध्यवर्ग की अनेक दुखद-विडंबनाएं,पारिवारिक-टूटन और अंततः हमारा सारा अंतर्विरोधी हिन्दुस्तानी-समाज अपनी ठेठ मानसिकता के साथ एक अजीबोगरीब फंतासी के माध्यम से उजागर हो जाता है.

यों तो अशोक आत्रेय (६६) की कलम से हिन्दी को कई मूल्यवान गद्य-कृतियाँ सुलभ हुई हैं, और वह साठ के  दशक के हिन्दी के उन इने-गिने कहानीकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी पहली रचना ही से एक अलग और मौलिक अंतर्दृष्टि से हिन्दी कथा-शिल्प को कई रोचक और महत्वपूर्ण कथा-ढंगों से रू-ब-रू कराया है, पर अचानक एक मित्र के अनुरोध पर लिखी अशोक आत्रेय की ये कहानी स्कूटर केवल इसीलिये पठनीय और चर्चनीय नहीं, कि इसमें नितांत मामूली  भाषिक  बुनावट के भीतर  समकालीन आम हिन्दुस्तानी परिवार के त्रास और विघटन के अनेक सन्दर्भ और संकेत हैं, बल्कि मनुष्य, खास तौर पर एक पारिवारिक स्त्री को एक यन्त्र, एक, मशीन, एक स्कूटर में बदल दिए जाने की गल्पात्मक-उड़ान के बहाने हम सारे वर्तमान सांस्कृतिक सामाजिक-अंतर्विरोधों की तह तक जा सकते हैं.

यहाँ इस कथा के अंतर्सूत्रों में, पागल होने की सीमा-रेखा पर ठिठका हुआ अकेला, उदास-भावुक पिता है, जीवन के प्रति केजुअल दृष्टिकोण रखता उसका  युवा एक बेरोजगार इंजीनीयर बेटा, एक फिल्म निर्माता दोस्त की रखैल बन चुकी उसकी लड़की भी. कथा-नायक की टी बी से ग्रस्त पत्नी, आरम्भिक तौर पर  कुल तीन पात्र- मैं’, पत्नी और बेटा- जो १९६५ मॉडल के पुराने खटारा स्कूटर पर टाइटैनिक फिल्म देख कर लौट रहे हैं! गेरेज में स्कूटर की धुलाई करने वाला एक मामूली अपढ़ मिस्त्री भी अचानक एक जिन्न की तरह कथा में प्रविष्ट हुआ है. मिस्त्री अचानक एक मुख्य भूमिका में आ जाता है जब वह लेम्बरेटा की सर्विस करने के बाद एकाएक किसी बड़े अभियान के नाम पर पत्नी के हाथ-पैरों का बलिदान मांगता है,उन्हें पुराने खटारा स्कूटर में किसी बड़े जन-कल्याण के हित में लगा सकने के लिए ! विसंगति यह नहीं कि एक ठन्डे क्रूर निर्लिप्त भावरहित चेहरे के साथ माँ तुझे सलाम गाने पर मुग्ध, बार बार  वंदे मातरम कहने वाला पुरुष और उसका बेटा दोनों ही मिस्त्री के सिरफिरे और स्वैर-आवाहन पर माँ के हाथ-पांव उसे दे देने को सहमत हैं- पर खुद स्त्री आगे बढ़ कर अपने शरीर में पुराने स्कूटर के हेंडिल और पहिये लगवाने के लिए तत्पर है, जो एक नाटकीय विडंबना है ! यह दृश्य हमारे चरित्र, सोच और व्यवहार पर एक टिप्पणी जैसा है कि कथा के अंत में पत्नी को स्कूटर बना कर मिस्त्री माँ तुझे सलाम’ कहता है और उसे चलाता हुआ आँखों से ओझल हो जाता  है, पर कहानी का यह अतीव नाटकीय अंत हमें एक गहरे सांस्कृतिक धक्के या संवेदनात्मक झटके, सोच और ठिठुरन भरी बेचैनी में छोड़ जाता है... 

निस्संदेह यह प्रतीक-कथा हमारे मनुष्य समाज की विगलित जेंडर-संवेदना की बेहतर व्याख्या भी है... एक असाधारण फंतासी रूपान्तरण के ज़रिये आधुनिक संवेदनाओं के जटिलतर रूपाकारों को समेटती ये कहानी बहुत सारे (स्वयम्भू) तथाकथित कहानीकारों, अपने आप पर मुग्ध (नार्सिसिस्ट) कहानी-लेखिकाओं और हिन्दी के हितैषी पाठकों को तत्काल पढ डालनी चाहिए. कहना न होगा कि १९६५ का यह पुराना लेम्बरेटा पाल गोमरा के स्कूटर से अपनी तरह भिन्न है!
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अशोक आत्रेय  :
२६ दिसम्बर, १९४४, राजस्थान,जयपुर सृजनात्मक लेखन, पत्रकारिता, कला आलोचना, फ़िल्म निर्माणऔर पेंटिग .