सबद भेद : मोहन डहेरिया : अशोक कुमार पाण्डेय

Posted by arun dev on नवंबर 07, 2012












हिंदी कवि मोहन कुमार डहेरिया का नाम शायद सुना हो आपने. शायद इसलिए कि अपने तीन प्रकाशित संग्रहों के बावजूद उन्हें नजरंदाज़ किया जाता रहा. हिंदी सहित्य की दुनिया का तन्त्र और तिलिस्म ऐसा ही है. जोड़, जुगुत और जुड़ाव से परे रहने वाले आत्मसम्मानी सर्जकों को ऐसी दुर्निवार उपेक्षा का आखेट होना होता है.
युवा कवि और आलोचक अशोक कुमार पाण्डेय ने अपने इस आलेख में न केवल मोहन डहेरिया के कवि – महत्व पर प्रकाश डाला है बल्कि  उनकी और ध्यान खींचकर एक प्रतिबद्ध रचनाकार की अपनी ज़िम्मेदारी का परिचय भी दिया है.  

उनका बोलना - मोहन डहेरिया                      
अशोक कुमार पाण्डेय




आसान नहीं है जीवन के बारे में लिखना[1]



टेरी इगलटन ने एक जगह लिखा है कि उनके लिए बौद्धिक होने का अर्थ है ‘बिना किसी लाग लपेट या समझौते के उन विषयों पर राय देना जिन्हें लोग स्वार्थों के कारण कालीन के नीचे सरकाने की कोशिश करते हैं’. मोहन डहेरिया अपने पहले कविता संकलन ‘कहाँ होगी हमारी जगह’ की एक कविता ‘कविता नहीं लिख रहा हूँ मैं’ में लिखते हैं :

कविता नहीं लिख रहा हूँ मैं
कई-कई तेवरों से झिझोंड रहा हूँ अपना वज़ूद
कई-कई कसौटियों पर परख रहा हूँ झूठ की धार
कई-कई निगाहों से
भेद रहा हूँ धरती के गर्भ में छिपे हुए रहस्य...
इस वक्त जबकि
खड़ा कर दिया है न्यायधीश ने मुझे अपने ही अन्दर की अदालत में

वाकई कविता नहीं लिख रहा हूँ
बता रहा हूँ कई-कई बयानों से पूरी दुनिया को
इस पृथ्वी पर अपने होने की वज़ह.

यह अनायास नहीं कि वह ‘आत्मा के बीचोबीच की दरार’ में स्थित विडम्बनापूर्ण आवाजों और दृश्यों से उलझते हैं, मंच की ‘सक्रियताओं’ से निराश होकर खुद से शिकायत करते हैं, मनुष्य से लेकर ईश्वर तक से उलझते हैं और अंत में इस निष्कर्ष तक पहुँचते हैं कि ‘आसान नहीं जीवन के बारे में लिखना’. ज़ाहिर है इस एहसास के साथ उन्होंने लगातार उस मुश्किल काम को अंजाम देने की कोशिश की है जिसका इशारा इगलटन के पूर्वोद्धरित वाक्य में है. उनके पहले दोनों संकलनों ‘कहाँ होगी हमारी जगह’ और ‘उनका बोलना’ से गुजरते हुए नज़र के सामने और पीछे भी उपस्थित उन तमाम विषयों से उनकी मुसलसल जद्दोजेहद की गवाही मिलती है और इसके साथ ही इस जद्दोजेहद के लिए ज़रूरी आत्मसंघर्ष की भी. वह सबकुछ जानने समझने वाले तथा दुनिया की मुक्ति के लिए रास्ता ढूंढ चुके सिद्ध विद्वान की तरह नहीं, बल्कि कदम-दर-कदम फासले तय करते, उलझते, चोटिल होते, गिरते, निराश होते, पस्त होते और फिर उठकर धुल झाड़ चल देते अन्वेषी की तरह. यहाँ तक कि जब वह कहते हैं कि ‘सबसे अलग दिखना चाहता हूँ मैं’ तो भी वह विशिष्टों से अलग लगते हुए सामान्य दिखने की चाह होती है :

इस तरह हो मेरा अलग होना
आतंक न पैदा करे मेरी महानता
धूर्तता की तरह न हो मेरा सौजन्य
खो जाऊं गर कभी यातनाओं के तिलिस्म में
जुगनू सा चमके
स्याह अँधेरे में भी हौसला


(एक)
वरना क्या बात कर नहीं आती!

तीन संकलनों और लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन के बावजूद मोहन डहेरिया समकालीन कविता की दशक-सूचियों से अक्सर अनुपस्थित रहे हैं. ‘बड़े आलोचक’ निजी बातचीत में चाहे जो कहें लेकिन लिखते हुए वह उन्हें भूल जाते हैं. मध्यप्रदेश जैसे पुरस्कार प्रचुर साहित्य क्षेत्र से और प्रलेस जैसे प्रदेश साहित्य सत्ता के नियंत्रक संगठन में लम्बे समय से होने के बावजूद जीवन के छठें दशक में जाकर उन्हें उनका पहला सम्मान मिला है – सुदीप बनर्जी स्मृति सम्मान. अपने अल्प अध्ययन में छिटपुट समीक्षाओं के अलावा उन पर कोई महत्वपूर्ण आलेख भी नहीं देखा है. इसकी वजूहात उनके लगभग निष्पृह व्यक्तित्व में ही नहीं, उनकी कविताओं में ढूंढी जा सकती हैं. कविता की समकालीनता का दबाव उनके यहाँ नहीं है. एक तरह की जो आलोचकोन्मुख प्रवृति हमारे यहाँ दिखती है, जिसमें चलन के हिसाब से कविता की काट और कात का चुनाव किया जाता है, मोहन डहेरिया उसके प्रति सचेत रूप से असावधान नज़र आते हैं. पहले दो संकलनों में ही नहीं, प्रेम कविताओं के अपने संकलन ‘न लौटे फिर कोई इस तरह’ में भी. उनके यहाँ स्त्री है, लेकिन वह स्त्री विमर्श के दबाव में आई हुई नहीं अपितु इस दुनिया के एक वंचित हिस्से के रूप में. उसके दुःख-दर्द-उल्लास-गीत-आँसूं यहाँ बेहद सहज तरीके से आये हैं. जैसे कि कोई घर की तस्वीर बनाते हुए उधड़े हुए प्लास्टर को कैद कर ले. उनके यहाँ वंचित जन हैं, उत्पीड़ित और विस्थापित आदिवासी समाज के विविध रंगी चित्र हैं तो उनका उत्सव और उम्मीद से भरा जीवन भी है, उनके यहाँ ‘सही इतिहास’ को जानने की ज़रुरत भी है और भविष्य के त्रिआयामी चित्र भी. वह हाशियों को मुख्य से अलगा कर देखने वाले उत्तराधुनिक कवि नहीं बल्कि हाशियों और मुख्य के बीच की दूरी को ख़त्म करने की लड़ाई में लगे आधुनिक कवि हैं. चमत्कारों के ज़रिये रातोरात चर्चा के केंद्र में आ जाने की यह महान कला उन्होंने सीखी नहीं लेकिन इस पूरे खेल को बखूबी समझते हैं. ‘एक विवादास्पद किताब के बारे में आलोचकीय बयान’ में वह लिखते हैं :

आलोचक ने कहा
समकालीन मुहाविरे का नहीं इस पर असर
यह कहीं से भी शुरू और कहीं भी ख़त्म
जीवन का क्रमबद्ध अध्ययन जो करना चाहते
क्षमा करें
प्रचलन से बाहर हो चुका रचना पाठ का यह शिल्प
अंत में उसने किताब में बांधा धागा
और उसे पतंग की तरह उड़ाने की कोशिश करने लगा
चीजों के उपयोग की यह
आलोचक की उत्तर-आधुनिक दृष्टि थी

ज़ाहिर है मोहन भाई खेल को समझते हैं और इस समझ के चलते ही उसका हिस्सा बनने से इंकार करते हैं. वह ‘जीवन का क्रमबद्ध’ अध्ययन करने के लिए प्रतिबद्ध कवि हैं. इसीलिए वह समकालीन आलोचकों और साहित्य सत्ता के लिए गैर ज़रूरी कवि हैं, जनता के लिए ज़रूरी. साहित्य की राजनीति के साथ जटिल होती जा रही सत्ता-संरचना तथा तद्जन्य विरोधाभासों की सटीक शिनाख्तें उनके काव्य संसार में बिखरी पड़ी हैं. यहाँ उनके पहले संकलन में शामिल चौदह खंडों में बंटी उनकी कविता ‘गूंगा’ का ज़िक्र मैं करना चाहूंगा. यह कविता एक मूक मनुष्य की मजबूरियों, आकांक्षाओं, क्रोध और विडम्बनाओं के सहारे इस समाज के उस हिस्से की एक आदमकद व्यंजना रचती है जिसकी आवाज़ रोज़-ब-रोज़ दबा दी जा रही है. जिससे अपनी असहमति को दर्ज़ कराने का न्यूनतम अधिकार भी छीना जा रहा है. अपनी इस बेआवाज़ स्थिति में वह अपनी असहमतियों के लिए नए-नए रास्ते तलाश करता है, उसका क्रोध ‘पहाड़ों के पत्थर को भी तपा देता है’, यह वंचना उसकी दृष्टि को और तीखा कर देती है, दोस्त और दुश्मन की पहचान को और स्पष्ट कर देती है, वह रंग-ओ-बू से भरे ‘शब्द बोना चाहता है’ इस श्मशानी चुप्पियों के बीच. अपने शिशु के मुंह से बोला शब्द उसे ख़ुशी देते हैं और वह

अक्सर रातों में
जब बच्चा गहरी नींद में होता है
वह चोरों की तरह जाता है उसके पास
उतारता है खूँटी से बस्ता
और चुरा ले जाना चाहता है
उसकी किताबों के सारे शब्द
अपने पीने नाखूनों से खुरच कर.

शब्द चुरा लेने की यह लालसा ययाति की लालसा नहीं है. यह अपनी दमित आवाज़ को नयी संभावनाओं के साथ मिलाकर जीवित कर लेने की आकांक्षा है, फीनिक्स की तरह राख से फिर उठ खड़े होने की आकांक्षा है. यह पैदा होती है क्योंकि अपनी बेआवाज़ लाचारगी के बावजूद वह ‘जानता है/ शब्द भी/ आदमी के खून की तरह नमकीन होते हैं/ फीका तथा बेस्वाद होता है जिनके बिना जीवन’ और वह अपने इस फीके तथा बेस्वाद जीवन में रंग भरने की उद्दाम जीजिविषा को मरने नहीं देना चाहता. कविता का अंत जहाँ होता है वहाँ मोहन जी जब गूंगापन को ‘गहरी अंधी बावड़ी’ कहते हैं तो अचानक मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस कौंध जाती है. यह उससे बाहर आने के रास्ते के अब तक न जाने जाने के कवि के अफ़सोस के बीच क्षीण संभावना की कौंध की तरह टिमटिमाती है और इसके ठीक बाद की कविता की अंतिम पंक्तियों की तरह ‘इच्छा होती है/ दुखों से भरी इस विशाल पृथ्वी को/ रुई के बोरों सा कंधे पर लादें/ और एक लम्बी दौड़ लगा दें.

साम्प्रदायिक वैमनस्य और दक्षिणपंथ के उभार के दौर में लिखते तमाम कवियों की तरह धर्म मोहन डहेरिया के सम्मुख एक बड़े सवाल की तरह आया है. गौरतलब बात यह है कि वह अयोध्या या गुजरात की घटनाओं पर लिखने की जगह सीधे-सीधे धर्म से मुठभेड़ करते दिखाई देते हैं. अपने कई अन्य चमकदार समकालीन कवियों की कैलकुलेटेड उदासी की जगह उनके यहाँ धर्म पर सीधा प्रहार है, उस विषवृक्ष की ज़हरीली छाया के नीचे बैठकर मोहन विलाप नहीं करते बल्कि उसकी जड़ों में मट्ठा डालने की कोशिश करते हैं. उससे आक्रान्त नहीं होते, उसकी आँखों में आँखें डाल सवाल करते हैं. धर्म शीर्षक कविता के पहले खंड में वह इसे ‘बदबूदार गोबर देने वाली गाय’ कहते हैं जिससे अब न तो घरों के आँगन लीपे जा सकते हैं न ही कंडे बनाये जा सकते हैं. उन्हें दूर से इसके ‘खंजर की तरह चमकते सींग’ दिखाई देते हैं तो दुसरे खंड में यह सटीक पहचान कर पाते हैं कि धर्म से दीक्षित बच्चा जिसे ‘होना चाहिए था पाठशाला में/ दंगाइयों की भीड़ में सबसे आगे है’. ईश्वर या ‘यह हैं हम- इस पृथ्वी की सर्वश्रेष्ठ प्रजाति’ जैसी कविताओं में वह सर्व धर्म समभाव के समकालीन विगलित स्वर में मिमियाने की जगह धर्म के पूरी तरह अमानवीय होते जाने की प्रक्रिया और उसके मानवीय विकल्पों के निर्माण की ज़रुरत को पहचानने की हिम्मत बरतते हैं. 

(दो)

क़त्ल करते हैं और हाथ में तलवार भी है

दूसरी बातों तक जाने से पहले मोहन डहेरिया के शिल्प पर थोड़ी बात ज़रूरी होगी. विष्णु खरे ने पहले संकलन के फ्लैप पर उनकी भाषा और शिल्प को व्याख्यायित करने के लिए ‘धोखादेह सादगी’ का जो प्रयोग किया है, वह उनकी बाद की कविताओं तक आते-आते बहुत साफ़ हुई है. मोहन भाई की काव्यभाषा ऊपर से भले सादी और सीधी लगे लेकिन उसमें वह ताकत है जो सरल दिखने वाले वाक्यों और बिम्बों की व्यंजनाओं को बड़े ही कौशल से समेटती है. यहाँ हथकड़ी का दुःख शीर्षक कविता की यह पंक्ति देखिये : ‘हथकड़ी को जब तक दुःख है/ उसके टूटने की पूरी संभावना है!

एक बड़ी बात यह कि एक तरफ उस पर किसी बड़े या समकालीन का सीधा प्रभाव नहीं दिखता तो दूसरी तरफ मौलिकता का वह अतिरिक्त दबाव भी नहीं दिखता जिसके चक्कर में कई कवि बहुत जल्दी खुद को दुहराते और चमक खोते दिखाई देते हैं. यह हिन्दी कविता की समकालीन बहुवर्णी परिदृश्य में एक सहज लेकिन आवश्यक उपस्थिति की तरह है जो सबसे अलग भी है और सबका हिस्सा भी है. यहाँ अपने दैन्दिन जीवन, चतुर्दिक उपस्थित परिवेश और परम्परा से चले आये बिम्ब हैं जो कविता की गर्दन पर सवार नहीं होते बल्कि अर्थ छवियों को और स्पष्ट करते हैं. दुसरे संकलन की एक कविता वापसी में वह लिखते हैं – “कोई लौटता है अपनी बन्दूक को सितार सा बजाता/ किसी की आत्मा की लौ में पहले से ज़्यादा धुँआ/लौटा हो जैसे ईश्वर से गहरी बहस के बाद/ होती है/ एक न एक दिन सभी की वापसी.” लौ में पहले से ज़्यादा धुंए का मतलब वही समझ सकता है जिसने लालटेन की लौ में रात गुजारी हो कभी. वैसे इस कविता में लौटने की बात है वह उनके यहाँ कई बार आया है. इसी संकलन की एक कविता ‘मजदूरों का लौटना’ में वह लिखते हैं : ‘ख़त्म होगा ही अंततः यह सफ़र/ लौटेंगे सब अपने घरों की ओर/ देखेगा उनका गाँव उन्हें/ भारी भू-स्खलन के बाद नाप रहा हो जैसे कोई पहाड़ कद अपना’. विस्थापनों की जमीन पर रहते हुए ‘कहाँ होगी हमारी जगह’ का सवाल पूछते कवि का इस घर लौटने से मोह अस्वाभाविक नहीं है. गौर से देखा जाय तो यह लौटना संघर्षों से भागकर किसी सुरक्षित खोह की तलाश नहीं है. मोहन डहेरिया के यहाँ यह पस्तहिम्मती से संघर्षों की ओर लौटना है, आसमानी उड़ानों से हक़ीक़त की ठोस ज़मीन पर लौटना है, गद्य से बोझिल भाषा का लय की ओर लौटना है, विमर्शों की लफ्फाजी से परिवर्तन के यथार्थ तक लौटना है, विस्थापन के अभिशाप से स्थापन की जिद तक लौटना है.


(तीन)

थाली जितने आसमान में उम्मीद के चाँद

मोहन डहेरिया के काव्य संसार में एक बड़ा हिस्सा स्त्रियों का हैं. तीसरा संकलन तो खैर प्रेम कविताओं का संकलन है ही लेकिन पहले दो संकलनों में भी आधी दुनिया का भरा-पूरा संसार उपस्थित है. पहले संकलन में ‘माँ बनती हुई लड़की’ जैसी कविता है जिसके सौन्दर्य को ‘छल और द्वेष से भरी आँखों से/ पूरा का पूरा देख पाना’ संभव नहीं तो दुसरे संकलन में शीर्षक कविता ‘उनका बोलना’ सहित अनेक कवितायें स्त्री जीवन को एक संवेदनशील पुरुष की आँखों से गहरे खंगालती हैं. यह खंगालना देह को नहीं आत्मा को खंगालना है. वह कहीं भी परकाया प्रवेश का प्रयास नहीं करते. बहुत सचेत तौर पर पूरे स्त्री जीवन, उसके सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और उसे लेकर बने सहजबोध को प्रश्नांकित करते हैं. दुसरे संकलन की एक कविता ‘स्त्री देह’ को पढ़ते हुए समकालीन स्त्री विमर्श ही नहीं बल्कि समाज में स्त्री को लेकर प्रचलित नज़रिए की परतें भी खुलती हुई महसूस की जा सकती हैं. यह उनकी ताक़त है कि वह कह पाते हैं –

स्त्री देहों के बारे में दी गयी हैं जितनी भी उपमाएं
सूक्तियों में कहा गया जो
उनसे उनकी देहों के बारे में कम
पुरुषों की मानसिक बुनावट का ज़्यादा पता चलता है.

या फिर ‘औरत औरत की दुश्मन है’ के प्रचलित जुमले के बरक्स ‘एक स्त्री द्वारा दूसरी स्त्री को जलाए जाने की खबर सुनकर’ लिखी गयी कविता की ये पंक्तियाँ अपनी अभिधा से आगे निकल पूरे वंचित वर्ग के प्रति सामजिक नजरिये पर पर सवाल ही नहीं करतीं बल्कि उस सहजबोध को चिथड़ा-चिथड़ा करके इतिहास का प्रतिआख्यान रचती हैं.

कौन दुःख को करता दुःख के खिलाफ इस्तेमाल
एक साझे स्नाघर्ष के हथियार कैसे तन जाते एक-दूसरे के विरुद्ध
क्या इन सवालों की तह तक जाना
अपनी ही विरासत पर थूकना है
या इतिहास के अंतर्विरोधों की रौशनी में
एक मनुष्य को पूर्ण अस्मिता के साथ देखना है?

‘उसका बोलना’ एक लम्बी कविता है जिसकी विशिष्ट लयात्मकता और प्रवाहमान शिल्प समकालीन कविता में उपलब्धि की तरह दर्ज किया जाना चाहिए. यह ‘बोलना’ रसोईघरों का बडबडाना नहीं है, शादी और मुंडन के गीत भी नहीं और न ही प्रेम का भावुक संलाप. यह सदियों से सिले हुए होठों से उठती आज़ादी की मांग है, छोटी-छोटी जीतों के विजयगान हैं और एकदम विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष की उद्दाम जीजिविषा का उल्लास है. अगर पूर्वोद्धरित ‘गूंगा’ के साथ जोड़ कर देखें तो यह बेआवाज़ को मिली आवाज़ के उत्सवगीत हैं. और यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि मोहन डहेरिया की स्त्रियाँ केवल मध्यवर्ग से नहीं आतीं, उनके यहाँ श्रमजीवी स्त्रियाँ अपने पूरे आत्मसम्मान के साथ उपस्थित हैं.

थाली जितना उनका आसमान
और चम्मच भर इच्छाएँ
यह तो था कल्पना के बाहर
छोड़ आये थे जिन्हें प्रागैतिहासिक गुफाओं में
धकेल दिया था रंगमहलों में
प्रकट हो सकती हैं कभी
इतने विशाल डैनों के साथ
...
देख रही है पूरी धरती गहरी उत्कंठा से
तुम्हारा इस तरह होना.

और इस स्त्री से प्रेम उनकी कविताओं में जीवन के अजस्र स्रोत की तरह बहता है. पहले संकलन में यह ‘बीते हुए समय का/ लुप्त होता एक बेहद कठिन वाद्य है’ जिसे वह ‘बेसुरे होते जीवन में पूरी रागात्मकता के साथ’ बजाना चाहते हैं तो अंतिम संकलन तक आते-आते यह उनके जीवन में एक बैले की तरह शामिल हो गया है जहाँ वह ढेर सारे वाद्यों और स्वरों के साथ उसमें डूबे हुए हैं. और ये किसी वायवीय कल्पना संसार में नहीं बल्कि जैसा कि विजय कुमार ने फ्लैप पर लिखा है “बाहर के संसार के दबावों और मनुष्य की आतंरिक ऊर्जा के मिलन स्थलों पर घटित हुई हैं”. यह अलि कलि ही सो बिंध्यों वाला प्रेम नहीं बल्कि जीवन की ‘दुर्जेय हताशा को रद्दी कागज़ की तरह’ फेंकने का हौसला देने वाला प्रेम है. प्रेम के खिलाफ खड़े इस समाज में जहाँ खाप पंचायतें चाहे सीमित जगहों पर हों लेकिन वह मानसिकता हर घर में बैठी है मोहन डहेरिया ‘मारो, मार सको तो मार डालो’ जैसी कविता में उनकी ओर तलवार लिए दौड़ते चेहरों की शिनाख्त करते हुए उसका विचारधारात्मक प्रतिवाद संभव करते हैं तो अपनी विलक्षण कविता ‘जुलूस के बीच प्रेमी युगल’ में ‘माथे पर लाल चुनरी बांधे उत्तेजक नारे लगाते युवकों के जुलूस में कोलतार पुते चेहरों के साथ भी अपने संकल्पधर्मा मौन के साथ निर्लिप्त युवा युगल के आगे बढ़ने को रेखांकित कर पाते हैं. यह आगे बढना ऐसे कि जैसे कोई ‘फूलों की पंखुरियों से बनी मशाल कर रही थी उनका नेतृत्व’. यह प्रेम और भरोसे की मशाल है, यह मनुष्यता की मशाल है जिसमें मोहन डहेरिया की कविता ईंधन की तरह शामिल होती है. ‘हूँ मैं जहां’ में वह ‘एक ख़ास रंग से पोत दिए गए संस्कृति के साझे स्मारक’ और ‘प्रेम के मशहूर विलक्षण शायर के मकबरे पर रखी जा रही पेशाबघर की बुनियाद’ के बरक्स अपनी आत्मा पर खिले एक नन्हे फूल की गमक से उस जगह को महकाए रखने की जिद के साथ खड़े होते हैं. ये गम-ए-जानां के कुहरे में गम-ए-दौरां को छिपाने की कोशिश करते प्रलाप नहीं स्त्री विमर्श के समकालीन दौर में एक अलग बुर्ज़ बनातीं प्रेम के मेटाफर में विद्रोह की कविताएँ है.

(चार)

गुजारिश हो तो ऐसी हो

मोहन डहेरिया की कविताओं से गुजरते हुए जो ख्याल वर्षों से मेरे जेहन में आते और घर बसाते रहे उन्हें दर्ज करने की इस कोशिश में मुझे यह बखूबी एहसास है कि जितना कुछ सिमटा कहीं उससे अधिक छूट गया है. अगर वह सब एक पंक्ति में समेटने की कोशिश करूँ तो कहूंगा कि ये बिलकुल हमारी जिंदगियों की तरह हैं. अलग-अलग शेड्स की इन कविताओं में थोड़ा सा दुःख है, थोड़ी ख़ुशी, थोड़ा गुस्सा, थोड़ी चाहत, थोड़ी बेबसी, थोड़ा उल्लास और थोड़ी उदासी भी. ये विशिष्टता की मृगमरीचिका के बरक्स साधारण होने की सचेत कोशिशों से उपजी कवितायें हैं. यह यूं ही तो नहीं कि मोहन भाई ने अपनी पूरी काव्ययात्रा में गुजारिश सिर्फ एकबार की है और वह भी यह कि

मेरी तो है इतनी गुजारिश
कब किसका प्रभामंडल
हो जाए अंततः उसका ही मकड़जाल
रहे हर मनुष्य इतना तो सचेत.




[1] मोहन डहेरिया के पहले काव्य संकलन ‘कहाँ होगी हमारी जगह’ की एक कविता का शीर्षक 
(अशोक कुमार पाण्डेय की शीघ्र प्रकाश्य आलोचना पुस्तक 'कविता की देहरी पर' से)
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