कथा - गाथा : रिजवानुल हक

Posted by arun dev on फ़रवरी 01, 2013


रिज़वानुल हक़ उर्दू के चर्चित कथाकार हैं. उनकी कहानियाँ देश – विदेश की पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर मकबूल हुई है. यह कहानी दंगों की पृष्ठभूमि पर है. अपने ही घर में  एक दम्पति अपने डर से कैसे जूझता है, और दंगे में घिरे एक आदमी का डर क्या होता है, इसे यहाँ महसूस किया जा सकता है.   
  
कोई है                                                           
रिज़वानुल हक़


तालिब और उसकी बीवी सालिहा घर में सहमे हुए बैठे थे. जैसे जैसे अंधेरा बढ़ता जा रहा था उनका ख़ौफ़ भी बढ़ता जा रहा था. दिन तो किसी तरह कट गया था लेकिन अब ये जंगल सी रात कैसे कटेगी? यह सोच सोच कर उनकी हालत ख़राब होती जा रही थी. उन्होंने घर को उजाड़ और वीरान दिखाने के लिए घर की एक भी बत्ती नहीं जलाई थी, यहां तक कि शाम से माचिस की एक तीली से भी रोशनी करने का जोखि़म नहीं लिया था. दोपहर तक वह टी. वी. पर ख़बरें देखते रहे थे लेकिन जब उनसे वह मंज़र न देखे गए थे तो टी. वी. भी बन्द कर दिया था.


किसी भी तरह के मुमकिन हमले से बचने के लिए वह सुबह से ही कई मन्सूबे बना चुके थे. लेकिन थोड़ी ही देर बाद वह सारे मन्सूबे गै़र महफ़ूज़ महसूस होने लगते थे. पहले उन्होंने सोचा था कि घर को बिलकुल खुला छोड़ दिया जाए और सारा ऊपरी मामूली सामान तोड़ फोड़ कर इधर उधर फेंक दिया जाए और ख़ुद किसी महफ़ूज जगह पर छिप जाया जाए. इस तरह अगर कोई यहां आएगा भी तो यही समझेगा कि यह घर निपट चुका है. लेकिन थोड़ी देर बाद जब तालिब को ख़्याल आया कि इस तरह मुहल्ले का कोई भी शख़्स यह सोच कर आ सकता है कि चलो देखें मुमकिन है अभी कुछ सामान बच गया हो उसे क्यों छोड़ा जाए? और यहां आकर वह एक-एक कोना तलाश करने लगे, ऐसे में अगर हम लोग मिल गए फिर तो वह हमको मार ही ......

फिर उन दोनों ने एक मन्सूबा यह भी बनाया कि घर के किसी एक हिस्से में आग लगा दी जाए....लेकिन इससे पहले वाले मन्सूबे में जो ख़ामियां थीं वह इसमें भी मौजूद थीं, साथ ही एक ख़तरा और भी था कि इससे लोगों का ध्यान ख़्वाहमख़्वाह उनके घर की तरफ़ जाएगा. इस तरह यह मन्सूबा भी ख़ारिज हो गया.

जब अंधेरा पूरी तरह से छा गया तो अगले मन्सूबे पर अमल करते हुए तालिब सदर दरवाज़े पर जाकर बाहर से ताला बन्द करके पीछे के एक हिस्से से छत पर चढ़ कर अपने ही घर में चोरों की तरह दाखि़ल हुआ फिर अंधेरे में सालिहा के साथ बेचैनी से इधर उधर घूमने और सामने की सड़क से आने जाने वाले हर शख़्स की आहट सुनने लगा. इतने में उसे बहुत से लोगों की आवाज़ें सुनाई पड़ीं, उसने दरवाज़े से झांक कर देखा...वही लोग थे जिन का ख़ौफ़ था. वह लोग बहुत चीख़ चीख़ कर नारे लगा रहे थे, बिलकुल दीवाने हो रहे थे. यह मंज़र देख कर तालिब ने जल्दी से अपना पिस्तौल लोड करके संभाल लिया लेकिन वह जानता था कि ऐसे हालात में पिस्तौल से कुछ ख़ास मदद नहीं मिल सकती. सालिहा को बिलकुल ख़ामोश रहने का इशारा करके उसने सोचा अब कहां जाऊं? क्या करूं? जब कोई रास्ता नज़र न आया तो वह दोनों दीवान के अन्दर रज़ाई गद्दों के दरम्यान जाकर छुप गए और सांस रोक कर जुलूस के निकलने का इन्तज़ार करने लगे.
लेकिन जुलूस उनके घर के सामने आकर रुक गया वह लोग अब और भी ज़ोर ज़ोर से नारे लगा रहे थे. जिससे उन दोनों पर और भी ख़ौफ़ तारी हो गया उन्हें अपनी मौत बहुत क़रीब नज़र आने लगी. उनके जे़हनों पर जहां एक तरफ़ मौत का ख़ौफ़ छाया हुआ था तो दूसरी तरफ़ उन लोगों के गन्दे गन्दे नारे सुन कर ग़ुस्सा भी आ रहा था और तालिब बार बार लड़ते हुए मर मिटने को तैयार हो जा रहा था. लेकिन सालिहा उसे रोक लेती थी. इतने में उन लोगों ने एक घर में आग लगा दी और आगे बढ़ गए. उनके गुज़र जाने के कुछ देर बाद जब तालिब और सालिहा का ख़ौफ़ कुछ कम हुआ और उनके होश-ओ-हवास दुरूस्त हुए तो उन्हें लगा जैसे पड़ोसी के घर की क़ुरबानी से उन्हें नई ज़िन्दगी मिली हो सालिहा तालिब से लिपट कर सिसकने लगी.

आज कर पूरा दिन ख़ौफ़ की इसी कैफ़ियत में गुज़रा था और अब सामने एक तवील क़यामतखे़ज़ रात खड़ी थी कि जाने का नाम ही नहीं ले रही थी. ये ख़्याल उसे परेशान कर देता था कि ऐसे दिन रात का सिलसिला न जाने कितना तवील हो. बाहर से ताला डालने के बावजूद वह अपने आप को अभी भी महफ़ूज़ नहीं महसूस कर रहा थे. दिन में टी. वी. ख़बरों में उन्होंने देखा था कि कई जगह वह लोग ट्रक लेकर गए और किसी घर या दुकान का ताला तोड़ कर पूरा सामान ट्रक में भर लिया और जाते जाते उसमें आग लगा दी. इसीलिए दीवान में भी वह अपने आपको महफ़ूज़ नहीं महसूस कर रहे थे. बहुत सोचने के बाद आखि़रकार उन दोनों ने तय किया कि ज़ीने के पहले मोड़ और छत के दरम्यान जो दोछती है, जिसमें घर का सारा टूटा फूटा फ़र्नीचर और दूसरे सामान पड़े रहते हैं वही सबसे महफ़ूज़ जगह है इसलिए वहीं चलना चाहिए.

बड़ी मुश्किल से दोछती में पहुंच कर उन्होंने धुंधलके में चारों तरफ़ का जायज़ा लिया. इस घुटन भरे हिस्से में ज़ीने की तरफ़ से जाने वाले रास्ते के अलावा एक रास्ता पीछे भी निकलता था जो आगे जाकर घर की सबसे अंधेरी कोठरी में पहुंचता था. उस कोठरी तक पहुंचने का एक रास्ता और भी था. इस दोछती की बाईं दीवार घर की बाहरी दीवार थी, उसमें एक खिड़की थी जो मुद्दतों से बन्द थी. उस खिड़की में एक दराज़ भी थी जिससे बाहर की सरगरर्मियों का जायज़ा लिया जा सकता था, जब कि दाईं तरफ़ की दीवार में कोई भी खिड़की या दरवाज़ा न था. उन्होंने तय किया कि अगर कोई ज़ीने की तरफ़ से आएगा तो अंधेरी कोठरी की तरफ़ भाग कर जान बचाने की कोशिश की जाएगी और अगर इत्तेफ़ाक़न कोई उस कोठरी की तरफ़ से आ गया तो ज़ीने की तरफ़ भाग कर जान बचाने की कोशिश की जाएगी, तभी तालिब के ज़ेहन में एक सवाल और गूंजा, अगर दोनों तरफ़.....? इस सवाल से उसका सर चकरा गया क्यों कि इस सवाल का उसके पास उम्मीद और दुआ के सिवा कोई जवाब न था. लेकिन उसने ये सोच कर अपने आप को तसल्ली दे ली कि एक तरफ़ से आने पर भी कौन ज़मानत दे सकता है कि बच ही जाएंगे?

अब उसने बचाव के दूसरे इमकानात पर भी ग़ौर करना शुरू किया उसे अचानक सामने की खिड़की का ख़्याल आया और सोचा कि इससे बाहर कूदने पर मुमकिन है जान बच जाए, ये सोच कर उसने खिड़की के बाहर का जायज़ा लिया तो उसने देखा कि बाहर तो बिजली के हाई वोल्टेज तारों का जाल बिछा हुआ है. बाहर कूदने पर तो और भी जल्दी मौत आ जाएगी. बिजली के शाक की मौत तो बड़ी ही तकलीफ़देह ........
 
उसने फिर से दूसरी जगहों पर छुपने के इमकानात पर ग़ौर करना शुरू किया लेकिन काफ़ी ग़ौर-ओ-फ़िक्र के बाद उसे घर की सबसे महफ़ूज़ जगह वही महसूस हुई और दोनों उसी दोछती में एक ऐसे कोने में बैठ गए जहां से बाहर का हर मंज़र देखा जा सके और घर की भी आहटें सुनी जा सकें. उन दोनों ने कुछ देर तक बड़े गौर से उस माहौल को देखने और समझने की कोशिश की और छोटी से छोटी आहट पर कान लगाए रहे. पुराने फर्नीचर में दीमक लगी हुई थीं, जो अन्दर ही अन्दर सब कुछ काट काट ख़त्म किए दे रही थीं. उन आवाज़ों ने शुरू में तो उन दोनों को काफ़ी ख़ौफ़ज़दा किया लेकिन आहिस्ता आहिस्ता उन आवाज़ों का ख़ौफ़ जाता रहा. कुछ देर तक जब उन आवाज़ों के सिवा कोई दूसरी आवाज़ न सुनाई दी तो उन्होंने कुछ इतमीनान की सांस ली. सालिहा ने तालिब के कन्धे पर अपना सर रख कर अपने आपको महफ़ूज़ समझ लिया और कुछ देर बाद उस पर ग़ुनूदगी तारी होने लगी. तालिब ने उसे ग़ौर से देखा, फिर उसकी पीठ को इस तरह थपथपाने लगा जैसे बच्चे को सुलाने के लिए थपथपाते हैं. तालिब ने जैसे ही सालिहा की पीठ पर हाथ रखा वह घबरा कर उठ गयी और सरगोशी के अन्दाज़ में बोली.

‘‘क्या हुआ?....क्या हुआ? क्या कोई है?’’
यह कह कर वह जल्दी से तालिब से लिपट गयी, तालिब ने उसे ख़ामोश करते हुए कहा.
‘‘कुछ नहीं....कुछ नहीं, तुम आराम से सो जाओ.’’
कुछ देर बाद सालिहा पर फिर ग़ुनूदगी तारी हो गयी. तालिब को कुछ देर तक जब कोई हलचल न सुनाई पड़ी तो वह माज़ी के कुछ वाक्यात के बारे में सोचने लगा, और सोचते सोचते कई बरस पीछे पहुंच गया.

(दो)                    

तालिब के पापा की तबीयत आज सुबह से ही कुछ ख़राब थी लेकिन फिर भी वह दवाई लेकर अपनी दुकान चले गए थे. शाम से तालिब की भी तबीयत ख़राब होने लगी थी और रात के खाने के बाद से उसकी मम्मी की भी. रात के ग्यारह बजते बजते तीनों तेज़ बुख़ार में जल रहे थे, लेकिन पापा की तबीयत कुछ ज़्यादा ही ख़राब थी. जाने कैसा बुख़ार था? सबसे पहले बुख़ार आया, फिर कमज़ोरी महसूस हुई, फिर मुँह का ज़ायक़ा बहुत ख़राब हो गया था और उसके बाद पूरे बदन में इतना दर्द और इतनी कमज़ोरी महसूस हुई कि किसी भी तरह चैन न आ रहा था. वह जो कुछ खा रहे थे फ़ौरन उल्टी हो जा रही थी. बस ऐसी हालत थी कि जैसे जिस्म से रूह पहले ही निकल चुकी हो लेकिन किसी वजह से सांसें फंसी हुई हों. तक़रीबन यही कैफ़ियत तीनों की थी, लेकिन तालिब के पापा की तबीयत कुछ ज़्यादा ही ख़राब थी. उनके मुँह से अपने आप कुछ अ़जीब अ़जीब आवाज़ें निकल रही थीं, अभी तक वह लोग उसे बुख़ार ही समझ रहे थे. लेकिन ये कैफ़ियत देखकर वह लोग घबरा गए, आज तक उन लोगों ने कोई ऐसी बीमारी नहीं देखी या सुनी थी. आखि़रकार अपनी बीमारी के बावजूद तालिब पापा की मदद के लिए घर से बाहर निकला, अभी वह अपने दरवाज़े से थोड़ी ही दूर आगे निकला था कि वह चक्कर खा कर गिर पड़ा. .....अब उसे होश तो था लेकिन पूरी तरह से नहीं, अ़जब ग़ुनूदगी सी तारी थी, उसने ज़ोर से पुकारा.
‘‘कोई है?....कोई है?’’

लेकिन कोई आवाज़ नहीं आई. हर तरफ़ दूर दूर तक सन्नाटा छाया हुआ था. बीच बीच में कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें सन्नाटे को तोड़ देती थीं. लेकिन उनके रुकते ही फिर वही दिल दहला देने वाला सन्नाटा छा जाता. कभी कभी बहुत दूर से किसी के चीख़ने की आवाज़ भी आ जाती थी. तालिब यूं ही तने-तनहा बे यार-ओ-मददगार बाहर पड़ा रहा, कुछ देर बाद उसे क़रीब में कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ, वह सोचने लगा ये क्या बला है? जब वह उसके क़रीब से गुज़र गया, तब उसकी बदबू से महसूस हुआ कि यह तो चूहा था. रात जैसे जैसे गुज़रती जा रही थी वैसे वैसे उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी और उसके जिस्म की गर्मी भी कम होती जा रही थी. नीम बेहोशी और ग़ुनूदगी के साथ साथ अब उसे कुछ दुःस्वप्न भी बार बार अपनी गिरिफ़्त में ले लेते थे.

उसने देखा कि इन्सानों का एक हुजूम बेतरतीबी से दौड़ रहा है, और सब एक दूसरे से टकरा रहे हैं और बार-बार रास्ता भटक रहे हैं, आखि़रकार कुछ चूहे आकर उनकी रहनुमाई करते हैं, वह आगे-आगे चलते हैं और आदमी पीछे-पीछे, कुछ दूर चलने के बाद वह किसी चीज़ को सूंघते हैं और कुछ देर तड़पने के बाद मर जाते हैं और इन्सान भी उन की नक़्ल करते हैं.

इसके बाद तालिब की आँखें खुल जाती हैं और वह माहौल की हर आहट को सुनने की कोशिश करता है कहीं से किसी पत्ते के टूटने की, या हवा के चलने की भी आवाज़ आती, तो वह चीख़ने लगता है, ‘‘कोई है?...कोई है?....’’ थाड़ी देर बाद चीख़ने की आवाज़ धीमी पड़ने लगती और धीरे धीरे ख़त्म हो जाती. और कुछ देर में वह फिर एक दुःस्वप्न में मुबतला हो जाता.

इस बार उसने देखा कुछ इन्सान किसी लम्बे सफ़र पर निकले हुए हैं, बहुत दुशवार रास्ते आते हैं, तेज़ धूप आती है, बारिश होती है, बर्फ़ बारी होती है, लेकिन वह लोग किसी तरह संभलते हुए आगे बढ़ते रहते हैं, लेकिन आखि़रकार एक तेज़ तूफ़ान आता है और उन्हें गिरा जाता है. बस इतने में तालिब की आँखें खुल जाती हैं, थोड़ी देर में जब उसके होश-ओ-हवास थोड़ा दुरुस्त होते हैं तो तालिब एक बार फिर वही आवाज़ फ़ज़ा में बुलन्द करने लगता है.

‘‘कोई है?.....अरे कोई है? भई बोलते क्यों नहीं ......कोई ...इ....है....?’’
इतने में एक एम्बुलेन्स आकर रुकती है उसमें से तक़रीबन अठारह बीस साल का एक लड़का उतरता है, वह लड़का उसके मुहल्ले में रहने वाला मुकेश था. तालिब को देखते ही उसने कहा.
‘‘क्या हुआ? तालिब भाई आप यहां कैसे पड़े हुए हैं?’’
उसे देखते ही तालिब उसके पैरों से लिपट जाता है और कहता है.
‘‘मुकेश मेरे पापा बहुत बीमार हैं, उन्हें किसी तरह बचा लो, उन्हें अस्पताल पहुँचा दो, मैं उम्र भर तुम्हारा एहसान मानूंगा.’’
‘‘इसमें एहसान मानने की क्या बात है यह तो मेरा फ़र्ज़ है.’’

एम्बुलेन्स से एक डाक्टर और कुछ दूसरे लोग भी उतरते हैं वह लोग जल्दी से तालिब और उसके मम्मी पापा को एम्बुलेन्स में बिठाकर हस्पताल पहुँचा देते हैं. कई दिनों की जद-ओ-जहद के बाद तालिब और उसकी मम्मी तो बच जाती हैं लेकिन उसके पापा का इन्तक़ाल हो जाता है.

(तीन)               

कहीं बहुत दूर से किसी के चीख़ने की आवाज़ आई तो तालिब की यादों का सिलसिला एक बार फिर टूट गया और वह हाल के दहशतनाक माहौल में आ गया. सालिहा की भी ग़ुनूदगी अब तक ख़त्म हो चुकी थी. दोनों ने उस आवाज़ को ग़ौर से सुनने की कोशिश की लेकिन दोबारा कोई आवाज़ न सुनाई दी, तालिब ने सोचा ज़ालिमों ने न जाने किस औज़ार से मारा होगा कि दोबारा आवाज़ तक न निकल सकी, थोड़ी देर तक वह हर आहट पर कान धरे सुनते रहे, कुछ देर तक जब कोई आवाज़ न सुनाई दी तो सालिहा ने चुपके से कहा.

‘‘चलो आपा के यहां फ़ोन करके देखते हैं मुमकिन है अब उनका फोन ठीक हो गया हो.’’
‘‘तुम यहीं रहो मैं फ़ोन करके अभी आता हूँ.’’
‘‘नहीं, मैं भी चलूंगी, मुझे यहाँ अकेले डर लगेगा.’’
तालिब ने पिस्तौल हाथ में संभालते हुए कहा.
‘‘अच्छा ठीक है, तुम भी चलो.’’
इस बार उनका अपना फ़ोन भी डेड था, तालिब ने झुंझला कर कहा.
‘‘अब तो अन्डर ग्राउन्ड लाइनें हैं, फिर भी न जाने कैसे दंगा शुरू होते ही फ़ोन डेड हो जाते हैं, ऐसे हालात में बाहर कैसे जाया जाए? न जाने आपा और उनके घर वाले किस हालत में हों, उस मोहल्ले की हालात तो परसों से ही काफ़ी ख़राब चल रहे हैं.’’

इस तरह एक बार फिर वह दोनों चुपक-चुपके पैर रखते हुए उसी कबाड़ खाने में वापस आ गए और एक बार फिर दोनों बेचैनी से हालात का जायज़ा लेने लगे. एक जगह बहुत दूर किसी मकान के जलने की रोशनी और धुआं नज़र आ रहा था, लेकिन वह इतनी दूर था कि कोई आवाज़ उन तक न पहुँच सकी, दोनों बिलकुल ख़ामोश हो गए, अब वह साँसों की आवाज़ों के अलावा कोई भी आवाज़ नहीं कर रहे थे, यहाँ तक कि जब जब कोई आहट सुनाई पड़ती तो वह कुछ देर के लिए सांस लेना भी बन्द कर देते थे.

तालिब का दिमाग़ इस वक़्त बहुत तेज़ी से काम कर रहा था, किसी हल्की सी भी आहट पर वह न जाने क्या क्या सोच जाता था. न जाने कौन सा लम्हा ज़िन्दगी का आख़िरी लम्हा ठहरे, इसलिए वह बार बार अपनी पिछली ज़िन्दगी का हिसाब किताब करने लगता . . . . जे़हन में न जाने कौन से मन्ज़र बनने बिगड़ने लगते. न जाने कैसी कैसी शख़्सियतों के चेहरे जे़हन के परदे पर उभरने और मिटने लगते, लेकिन जब बाहर थोड़ी के देर के लिए ख़ामोशी छा गई तो उसका जे़हन एक बार फिर माज़ी के एक मक़ाम पर जाकर ठहर गया.

(चार)                   

वह 26 जनवरी की क़यामत ख़ेज़ सुबह थी, दुकान बन्द होने की वजह से आज वह देर से उठा था. सुबह के मामूलात से फ़ारिग़ होकर वह बावर्ची ख़ाने में खड़े खड़े ही नाश्ता कर रहा था. अम्मी उसे नाश्ता देकर किसी काम से दूसरे कमरे में चली गई थीं. अभी उसने चन्द निवाले ही खाए थे कि अचानक ज़मीन हिलने लगी. किसी ने पूरे बावर्ची ख़ाने को इतना टेढ़ा कर दिया कि उसे लगा कि वह उल्टा हो गया है. वह लड़खड़ा कर लिंटर के नीचे गिर गया. ये क्या हो रहा है? समझने के लिए उसका दिमाग़ एक ही लम्हे में न जाने कहाँ कहाँ भटक आया. किसी चीज़ से टकराने की वजह से उसका सर भी चकरा रहा था.

सबसे पहले उसने सोचा कि कहीं ये कोई जिन्न या भूत तो नहीं है? भूत में उसका ज़्यादा यक़ीन तो नहीं था लेकिन उसी वक़्त उसे ख़्याल आया कि जिन्नों का ज़िक्र तो कु़रान में भी है इसलिए ज़रूर होते होंगे, कु़रान का ख़्याल आते ही उसे चन्द रोज़ पहले की एक बात याद आ गई. उस रोज़ मौलाना ने अपनी तक़रीर में कहा था.
‘‘अल्लाह ताला ने क़यामत की जो निशानियाँ बताई हैं, वह सारे आसार अब साफ़ नज़र आ रहे हैं, लोगो सुनो और देखो और तौबा करो बहुत जल्द क़यामत आने वाली है.’’

तो क्या क़यामत आ गई? सारे घर में अजब तरह की ग़ुर्राहट और घड़घड़ाहट दौड़ती फिर रही थी लेकिन उसने बहुत जल्दी में अपनी ज़िन्दगी का मुख़्तसर सा हिसाब लगाया इस सरसरी हिसाब से ही उसे इतना तो अन्दाज़ा हो गया कि मैं ने क़यामत की मुनासिब तैयारी नहीं की है. अभी वह यह सब सोच ही रहा था कि सारे घर में बहुत तेज़ घड़घड़ाहट और शोर बरपा हो गया, ज़मीन और तेज़ हिलने लगी, चारों तरफ़ घुप अन्धेरा छा गया. उसके मुँह से तेज़ चीख़ निकली और ऊपर से ढेर सारा मलबा आकर गिरा उसकी चीख़ भी दब कर रह गई. उसका हलक़ मिट्टी से भर गया, थोड़ी देर में किसी तरह उसने आवाज़ लगानी शुरू की.

‘‘कोई है  . . . ? अरे बचाओ. निकालो  . . . कोई है?’’
लेकिन उसकी आवाज़ मलबे और शोर में दब कर रह गई.

काफ़ी देर तक तो वह कुछ समझ ही न सका कि आख़िर हुआ क्या है? लेकिन आहिस्ता आहिस्ता वह सब समझ गया. अब वह ईंटों, लोहे की छड़ों और सीमेन्ट चूने के ढेर में दबा पड़ा था, चारों तरफ़ मलबा ही मलबा फैला पड़ा था, दूर तक अन्धेरा छाया हुआ था, बीच बीच में कहीं कहीं से हलकी हलकी रोशनी की किरनें आ रही थीं. चारों तरफ़ से मकानों के ढहने और लोगों की चीख़ पुकार की आवाज़ें आ रही थीं. उसे महसूस हुआ कि कमर का हिस्सा सुन्न होने लगा है तो उसने सोचा क्या मेरी कमर टूट गई है? उसने घबरा कर अपने पैरों को हिलाने की कोशिश की लेकिन उन पर तो मनों ईंटें पड़ी हुई थीं, एक पैर तो थोड़ा सा हिला डुला लेकिन एक महदूद दायरे से ज़्यादा इधर उधर न जा सका और दूसरा पैर तो ज़रा भी टस से मस न हुआ. अब उसे अपनी मां का ख़्याल आया तो उसने चारों तरफ़ की बेशुमार आवाज़ों में से अपनी अम्मी की आवाज़ को पहचानने की कोशिश की. कुछ देर में उसे लगा कि वह उनकी आवाज़ को पहचान गया है. आवाज़ साफ़ न थी लेकिन उसे लग रहा था कि वह कह रही हैं.

‘‘तालिब, बेटा तालिब, तुम कहाँ हो?’’
तालिब ने ख़ुश होकर अम्मी को जवाब देने की कोशिश की.
‘‘मैं यहां हूँ ! अम्मी! अम्मी! मैं यहां हूं, बावर्चीख़ाने में.........’’
‘‘बेटा मैं तुम्हें कैसे बाहर निकालूं , बावर्चीख़ाना तो नज़र ही नहीं  . . .’’
उनकी आवाज़ जो हल्की तो थी ही अन्धेरे और शोर में डूब गयी.
‘‘अम्मी  अम्मी  . . .’’
‘‘ता  . .लि  . . ब  . . ता  . . लि ’’
‘‘अम्मी  . . . अम्मी  . . .’’

कुछ देर तक वह एक दूसरे की आवाज़ सुनते रहे, लेकिन धीरे धीरे अम्मी की आवाज़ कम से कमतर होती चली गई. लोगों के चीख़ने की आवाज़ें तो अभी भी उसी तरह आ रही थीं, लेकिन मकानों के गिरने की आवाज़ें अब कम हो गई थीं. उसके सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह था कि यहाँ से कैसे निकलूं? और अम्मी को किस तरह बचाऊं? कहीं वह ख़त्म  . . .

अब उसके सामने दो ही रास्ते थे. मदद का इन्तज़ार करना और साथ ही साथ मलबा हटा कर रास्ता बनाने की कोशिश करना. लेकिन मदद? भला इसकी उम्मीद ही कितनी है? इसके बाद वह ख़ुद से रास्ता निकालने की कोशिश करने लगा. लेकिन टांगें तो दबी हुई थीं अगर वह सही सलामत हैं तो भी कई घन्टे की मेहनत दरकार थी. उसने जान तोड़ कर ज़ोर लगा दिया लेकिन उसकी टांगें टस से मस न हुयीं. बल्कि हर कोशिश पर जो ख़ून जमने लगता था फिर से बहने लगता था. अब कोई मदद को आए तो ही बच सकूंगा. लेकिन भला कौन आएगा? सबको अपनी अपनी फ़िक्र लगी होगी. वह इस तरह से फंसा हुआ था कि उसकी घंटों की मेहनत भी आखि़रकार बेकार ही साबित हुई. आखि़र कार वह एक ऐसी मदद का इन्तज़ार करने लगा जिसका न कोई वादा था न उम्मीद. अम्मी और आपा के बारे में सोच सोच कर उसकी हालत और भी बिगड़ती जा रही थी.

न जाने कितना वक़्त इसी तरह गुज़र गया. जब रोशनी बिलकुल ख़त्म हो गई और चारों तरफ़ बेतहाशा अन्धेरा छा गया तो उसे लगा कि शायद अब रात हो गई है, अब भला रिहाई कहाँ मुमकिन होगी? इस तरह सूरज से साथ साथ उसकी उम्मीद की सभी किरनें भी डूब गयीं. उसके बाद हर लम्हे उसकी मायूसी बढ़ती गयी और वह मलबा उसे मलेकुल मौत की तरह नज़र आने लगा. मलबे के ढेर अभी भी थोड़े थोड़े वक़्फ़े पर लुढ़कने लगते थे, जिससे ईंट गुम्मे और गर्द ओ ग़ुबार उसके ऊपर आती रहती थी. कभी कभी किसी के चीख़ने की आवाज़ें भी सुनाई पड़ जाती थीं. तालिब हर आहट पर किसी आदमी के होने की उम्मीद से चीख़ उठता था.
‘‘कोई है? अरे भाई कोई है? मैं यहाँ हूँ, अम्मी भी यहीं कहीं हैं, अरे कोई सुन रहा है? .कोई है? कोई है?’’

लेकिन इस बार भी कोई जवाब न मिला. मलबे से निकलने की कोशिश में वह अपने नाख़ून, उंगलियों और दातों को लहूलुहान कर चुका था. पुराने ज़ख़्म जिनका ख़ून जमने लगता था ज़ोर लगाने से एक बार फिर उनसे ख़ून बहने लगता था. और शयद अन्दर भी कहीं ख़ून न बह रहा हो, कोई अन्दरूनी चोट भी न हो, रात ठण्डी होती जा रही थी ओर धीरे धीरे उसका बदन भी ठण्डा होता जा रहा था. कहीं दूर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आई, जिसे सुन कर तालिब एक बार फिर पुकारने लगा.

‘‘कोई है? अरे भाई कोई है? बचाओ  . . .बचाओ  . . कोई है? कोई है?

कुत्ते भौंकते और आपस में लड़ते रहे, फिर लड़ते-लड़ते कहीं दूर निकल गए. वह लोग, अगर वाक़ई कोई थे तो कहीं दूर निकल गए. उम्मीद की जो हलकी सी किरन चमकी थी एक बार फिर वह ख़त्म हो गयी. ज़ख़्मों से पुर और भूखे प्यासे तालिब में धीरे धीरे पुकारने की भी ताक़त ख़त्म होती जा रही थी. हाथ पैर मुर्दों की तरह ढीले होते जा रहे थे.

आखि़रकार उसने आँखें बन्द कर लीं और मौत को याद करने लगा उसने उन तमाम मज़हबी किताबों को याद करने की कोशिश की जिनमें मौत और मौत के बाद के हालात की तफ़सील लिखी थी. उसने अपनी ज़िन्दगी के तमाम आमाल याद किये और हिसाब लगा कर अपने गुनाहों और नेकियों को तौलने की कोशिश की किसी तरह शायद नेकियों का पलड़ा भारी हो जाए. लेकिन इसका कोई इमकान नज़र नहीं आया. ये सब सोचते सोचते वह बेहोश हो जाता और उसे ख़बर ही न होती कि न जाने कितनी देर तक बेहोश पड़े रहने के बाद उसे होश आया है और कब दोबारा बेहोश हो गया.

इस बार जब उसकी आँख खुली तो उसे हल्की हल्की रोशनी नज़र आई और रात के ख़त्म होने का एहसास हुआ. अभी वह सही सूरते हाल का अन्दाज़ा कर ही रहा था कि इतने में उसे कुछ लोगों की आवाज़ें सुनाई दीं. तालिब फिर चीख़ा.

‘‘कोई है? बचाओ, मुझे बचा लो, अल्लाह, अरे कोई तो है! कोई है?’’

इस बार वाक़ई जान बचाने वाले लोग थे जिन्होंने तालिब की घुटी घुटी सी आवाज़ सुन ली, और फ़ौरन उसे निकालने का काम शुरू कर दिया. इस बार होश आने पर तालिब ने देखा कि उन लोगों में मुकेश भी मौजूद है. तो उसे और भी इत्मीनान हो गया कि ये लोग लूट मार करने वाले नहीं हैं, उनके साथ एम्बुलेन्स और डाक्टर भी थे. तालिब ने होश में आते ही अपनी अम्मी के बारे में बताया तो उन लोगों ने फ़ौरन ढूंढ़ना शुरू कर दिया. तालिब जब एम्बुलेन्स में दाख़िल हुआ तो उसमें मुकेश की मम्मी भी ज़ख़्मी हालत में पड़ी हुई थीं. एम्बुलेन्स को रोके रखा गया कि अगर तालिब की अम्मी ज़िन्दा निकलीं तो सबको एक साथ अस्पताल पहुंचा दिया जाएगा. लेकिन उनका बदन तो बहुत पहले बिलकुल ठण्डा हो चुका था, उनकी लाश बहुत बुरी तरह से कुचली हुई थी.

तालिब उन्हें देख कर ताब न ला सका और बेहोश हो गया. उनके बदन पर कई चोटें थीं और रूह ख़ुदा जाने कब जिस्म के पिंजरे से उड़ चुकी थी.

(पांच)                 

उसी वक़्त एक बार फिर एक भीड़ उसके घर से कुछ दूरी से गुज़री, वह लोग वही पुराने नारे लगा रहे थे. आवाज़ सुनते ही सालिहा तालिब से लिपट गई जैसे तालिब की बाहों में छुप जाएगी तो कोई उसे देख न पाएगा. लेकिन उन लोगों ने तालिब के घर की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ गए. शोर और क़दमों की धमक के गुज़र जाने के बाद तालिब ने सालिहा की तरफ़ ग़ौर से देखा. वह सात महीने की हामला थी. यह सोचते ही उसे दिन का वह वाक़्या याद आ गया, वह औरत भी तो सात महीने की हामला थी. जिसे याद करके उसका जिस्म ही नहीं रूह तक काँप उठी.

वह सात महीने के पेट से थी ... उसका पेट काट कर  . . . . बच्चे को निकाल कर  . . . . गला काट कर  . . . उफ़ ! !   . . . उसने जल्दी से अपने दिमाग़ से उस मन्ज़र को ख़ारिज किया और सालिहा को अपनी बाहों मे जकड़ लिया.

उनका जिस्म किसी चीज़ से टकराया और वह चीज़ बहुत तेज़ आवाज़ के साथ दूर तक लुढ़कती चली गई, दोनों घबरा गए. तालिब पिस्तौल संभाल कर बड़ी ख़ामोशी से चारों तरफ़ का जायज़ा लेने लगा. क्या चीज़ थी? कहीं किसी ने लुढ़कने की आवाज़ सुन तो नहीं ली? और वह दोनों पत्ता खड़कने तक की आवाज़ को ग़ौर से सुनने लगे.

सालिहा ने खिड़की से बाहर की तरफ़ इशारा किया, गहरे अन्धेरे में किसी साए का एहसास हुआ कि वह आहिस्ता आहिस्ता घर की तरफ़ आ रहा है. तालिब ने सोचा अब यहाँ ठहरना ख़तरे से ख़ाली नहीं है यहाँ से थोड़ा खिसक जाना ही बेहतर है. वह शख़्स अगर आवाज़ का निशाना लगाकर गोली चलाएगा तो हम उसकी ज़द से बाहर हो जाएंगे. तालिब ने हाथ से टटोलते हुए आगे बढ़ना शुरू किया कि कोई ऐसा सामान न हो जिसके टकराने से फिर आवाज़ उभरे इसलिए वह तक़रीबन रेंगते हुए उस जगह से काफ़ी दूर तक खिसक गए. तालिब ने खिड़की की दराज़ से झाँक कर देखा वह साया उसी बेफ़िकरी के उनके घर की तरफ़ बढ़ता चला आ रहा था. उसके क़दमों की धमक काफ़ी तेज़ थी. जब वह कुछ और क़रीब आया तो लगा कि वह एक नहीं तीन चार लोग हैं. उनकी चाल की बेफ़िकरी को देख कर तालिब ने आसानी से अन्दाज़ा लगा लिया कि यक़ीनन वही लोग हैं वरना ऐसे माहौल में इतनी बेफ़िकरी से और कौन घूम सकता है  . . .?
अचानक एक बहुत तेज़ आवाज़ आई और दोनों घबरा कर एक दूसरे से लिपट गए.
‘‘भौं  . . .भो   . . . ’’

यह एक गाय की आवाज़ थी, इस तरह दोनों ने कुछ इत्मीनान की साँस ली, लेकिन दूसरे ही लम्हे फिर किसी के क़दमों की आवाज़ सुनाई दी, फिर कुछ देर तक ख़ामोशी रही  . . . फिर हलकी हलकी खट खट  . . . फिर वही ख़ामोशी. ये कैसी आवाज़ है? कहाँ से आती है और फिर ग़ायब कहाँ हो जाती है?

कहीं से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई, उसने खिड़की की दराज़ से ज़रा झांक कर देखा, आवाज़ मुकेश के घर की तरफ़ से आई थी लेकिन इतनी अंधेरी रात में यक़ीन के साथ नहीं कहा जा सकता था कि आवाज़ वहीं से आई थी या कहीं और से. जब उसने बहुत आंखें गड़ा कर देखा तो ऐसा महसूस हुआ कि उस घर से दो तीन साए बाहर निकले हैं. वह उन्हे ग़ौर से देखता रहा लेकिन कुछ ही लम्हों में वह सब कहीं अंधेरे में गुम हो गए. अंधेरे और साए में फ़र्क़ ही क्या है? तालिब ने सोचा कोई बात नहीं मुकेश तो अपना दोस्त है, उससे कोई ख़तरा नहीं है. लेकिन उसी वक़्त टी. वी. ख़बरों का वह मन्ज़र उसे याद आया जिसमें एक छोटे से बच्चे ने, जो पलंग के नीचे छुप जाने से बच गया था, अम्मी को गोली किसने मारी? पूछने पर बताया था ‘‘मोहन भैय्याने.’’

तालिब की बनती बिगड़ती यादें, टी. वी. ख़बरों में देखे गए दिल दोज़ मन्ज़र और उसके ज़ेहन के बनाए हुए भ्रमों ने उसे एक अजीब कैफ़ियत में मुबतला कर दिया था. उसे कुछ भी देख या सुनकर ये तय कर पाना मुश्किल हो गया कि वह आवाज़ वाक़ई आ रही है या वह मन्ज़र वाक़ई देख रहा है, या किसी याद का साया है या ख़ुद का रचा हुआ भ्रम.

तालिब को अचानक महसूस हुआ कि क़रीब में कहीं कुछ लोग बातें कर रहे हैं, तालिब ने सालिहा से सरग़ोशी की ‘‘ये लोग क्या कह रहे हैं? ज़रा कान लगाओ!’’ दोनों ने उन आवाज़ों को ग़ौर से सुनने की कोशिश की लेकिन वह उनकी अवाज़ न सुन सके. कुछ देर बाद उन लोगों के चलने की आवाज़ें सुनाई पड़ीं, वह सांस रोक कर उन आवाज़ों को सुनने लगे कि वह आवाजे़ं घर के क़रीब आती जा रही हैं या दूर होती जा रही हैं?

थोड़ी देर बाद सालिहा ने महसूस किया कि कोई सामने से आ रहा है, ठीक उसी वक़्त तालिब ने महसूस किया कि कोई घर के पिछवाड़े से आ रहा है, सालिहा ने तालिब के कान में कहा.
‘‘कोई है.’’
तलिब ने सालिहा के कान में सरगोशी की
‘‘लगता है कई आदमी हैं और दोनों तरफ़ से आ रहे हैं!’’
सालिहा ने कहा, ‘‘मुझे लग रहा है आदमी नहीं वहशी जानवर हैं.’’

दोनों ने ग़ौर से देखा कभी वह दो पैरों पर चल रहे थे और कभी चार पैरों पर. यह मन्ज़र देखकर वह डर से काँप उठे. जब ख़तरे से निपटने का कोई रास्ता नज़र न आया तो उन्होंने एक लम्हे के लिए आँखें बन्द कर लीं, लेकिन फ़ौरन फिर खोल दीं. इस बार बहुत क़रीब से कोई आवाज़ आती हुई महसूस हुई.

तालिब के हाथ में पिस्तौल अब भी था, लेकिन ऐसे दहशत नाक और रहस्यमय माहौल में पिस्तौल क्या करता? उसे तो हाथ में पिस्तौल होने का ख़्याल तक न आया. दोनों ने बहुत ग़ौर से बाहर देखा अब वह पूरी तरह से घिर चुके थे. हड़बड़ाहट में खिड़की खोली और बाहर छलांग लगा दी और गिरते गिरते उन दोनों ने सरगोशी की.
‘‘कोई है’’
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अँधेरे  का रिपोर्टर
चवन्नी