सहजि सहजि गुन रमैं : शिव योगी

Posted by arun dev on फ़रवरी 28, 2013









कविता का ऋतुओं से गहरा नाता है. ऋतुराज वसंत तो कविओं के प्रिय रहे हैं. इधर लिखी जा रही हिंदी कविता में वसंत की सुगंध सुदूर चकेरी गाँव के (सवाई माधोपुर) के लगभग अज्ञात से कवि शिव योगी की कविताओं में मिली. शिव योगी ग्रामीण संवेदना के साथ-साथ सामाजिक विषमता और विद्रूपता के भी विश्वसनीय कवि हैं.
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"एक ऐसे कवि की कविताओं से गुज़रना, जो दुनिया के छल-छद्म और प्रपंचों से दूर रहकर अपनी काव्‍यसाधना में ही रत रहता है, हमेशा अच्‍छा लगता है. शिव योगी एक ऐसे ही प्रखर, चेतनासंपन्‍न, प्रतिबद्ध और सिद्ध कवि हैं. उनकी कविताओं में हमें जीवन का वह राग और आवेग मिलता है, जो हमसे इस भागमभाग वाली दुनिया में कहीं बिसर गया है और लगातार छूटता जा रहा है. लेकिन उसमें अतीत का कोई विशिष्‍ट मोह भी नहीं है, बल्कि यह कहा जाए कि उस बिसराए गये या कि बिसरा दिये गए की ऐसी सघन काव्‍यात्‍मक उपस्थिति है कि आप उसके साथ मानवीय और सामाजिक संबंधों का एक निरंतर क्षरित होता संसार अपनी समूची ताकत के साथ देख सकते हैं. समकालीन काव्‍य परिदृश्‍य में जिस लोक का महिमागान है, वह शिव योगी की कविताओं में इतने सहज रूप में मौजूद है कि आप बारंबार मुग्‍ध होते हैं. कारण यह कि उनकी काव्‍य चेतना में ही वह अंतर्निहित है, उन्‍हें इसके लिए अतिरिक्‍त काव्‍यवैचित्र्य दिखाने-बरतने की आवश्‍यकता ही नहीं पड़ती. ग्रामीण दांपत्‍य और सहजीवन का ऐसा मनोरम और सघन सौंदर्य उनकी कविताओं में है कि त्रिलोचन की पंक्तियां याद आती हैं मिल कर दोनों प्राणी, दे रहे खेत में पानी.’"  
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प्रेमचंद गाँधी


  
फागुन                                                                                        

पकने लगी गेंहूं की बालें
नीम टहनियों में
कोपल फूटे
अमराई ने
गंध बिखेरी
भौंरों के गुंजार अटूटे
पुरवाई की फिसलन से
गिरती गिरती चालें
धूप रूप को छोड़ गई
अमलतास पियराए
फलियां आईं बबूल-बबूल में
ऋतु रसाल गदराए
खलिहानों में नया अन्न है
यह प्रसन्न है, वह प्रसन्न है
यह फागुन का पर्व मनालें
पकने लगी गेहूं की बालें.




वसंत                                                                                                 

हल्दिया
धरती की चादर
अब हो गई है भुरभुरी
सरसों कट रही है
गांव-गांव में
देहात में
ढढूस हो रहा है लाण
महक चहक रही है
देहातिनों की उमंगें
मेहनत करा
उमंग में है
उल्हसित हुए प्राण
लो फिर आये गये सहिजने में
गंदुम गंदुम गुच्छ
भौंरों की गुंजार ने
आम्र मंजरी को सहलाया है
छांग दिये नीम में
फिर प्रस्फुटन हुई
मेरी देह में
न जाने टूटन हुई
गलियारों
चौबारों में
उठने लगी है गंध
गमक रही है यहां
कचनार की कचायंध

मैंने
मेरे गांव में
हॅंसते देखा है
मौसम को
पके बाजरे तिलों को
चूमते झूमते देखा
किशोर- किशोरियों को
खेत खेतार के
भरे वृक्षों पर
छिपते छिपाते
उछल कूद
करते देखा गिलहरियों को

अब मेरे गांव में
नदी में पानी नहीं
नदी के घाटों को
घेरता पलाश पवन नहीं
मेरे गांव के लोगों में
अब वह जोबन नहीं
गांव के कांकड़ पर
हर बार की
माघ बदी पंचमी पर
लगते मेले में
बसंत नहीं
दुर्दिन भी
क्या हुए
मेरे दुखों का
अंत नहीं



कटाई का दिन                                                                        

पके अधपके
कांस काट कर
घास काट कर
भौजाई ने पूड़ा बांधे
खच्च-खच्च चलते हॅंसिया ने
पके बाजरे तिल्ली काटी
थोड़ी थोड़ी लगी उघड़ने
कटे खेत की भूरी माटी
नये आम के नीचे
तनिक दुपहरी काटी
फलियां सेंकी चोले की
गुड़ खाया
बतासा हुआ गन्धियाया
तन सुस्ताया मन बतियाया
बीत गया दोपहर
काटनी अभी आंतरी
कई बरस के बाद
खेत में
फैली फैली दिखी सांतरी



स्वाति                                                                    

नहीं बरसा झमाझम
इस बार.
हीरामन के चौंतरे पर
नहीं बरताई खीरोंडी
मल्लू ने नहीं गाया झोला
कुम्हार पाड़े में इस बार.
नहीं सुने धमाके
पोखर में
कूद कर नहाने के
कोई भी रपट कर नहीं गिरा
इस बार.
पड़े ही रह गये भुजंग बिलों में
फूल नहीं आये तिलों में
प्यासा ही रह गया चातक
कोई भी सीप
मोती नहीं बनी इस बार.
नहीं बरसा झमाझम
इस बार.



कल्याणी                                                                                       

उस बाखर में
अभी भी
उमड़ रहे
तुम्हारे पांव
गुजरे बीसों साल
पचासों मौसम
बीत गए
सचमुच में
आ जाना तुम
सारे बरतन
रीत गए
गलियारे के नीम की
हिलती ही रहती है
हरियाली डालियां
आंगन में
फुदकती है
गिलहरियां गौरेया
तुम
जरूर आना

बसंत आ गया है
सहिजन के फूलों पर
तुम्हारा रंग आ गया है
फगुना गई
अमराइयां यहां
महक कर बिखर गए
धरती पर पराग
घाटियों में
दहकेंगे सुर्खरू पलास
पीली चादर ओढ़ेंगे
जहं तहं अमलतास
तुम
जरूर आना

मैं करती ही रहूंगा
तुम्हारा इंतजार
भले निखालिस हो
ये मेरी निरी कल्पनाएं

कल्याणी
तुम मुझमें रहो
तुम मेरे मन की हो
अलौकिक अल्पनाएं



बचाऊंगा जरूर                                                        

बचाऊॅंगा जरूर
अपने भीतर ही सही
बचाऊंगा पानी
बार-बार पड़ता अकाल
सुखाता ही तो चला गया है
कुओं के स्रोत
पेड़ बचाते हैं अपनी जड़ों में
तालाब और तलाइयों में
जैसे बचाये रहती है घास
पनिहारियां बचाये रहती हैं
जैसे
पनघट और प्यास
रेत के धोरों पर बचे
रहते हैं निशान
राहगीर के पांवों में
बची रहती है थकान
मेरी यात्राएं हैं
कोसों दूर
मैं बचाऊंगा जरूर.



नदी                                                                                                                                           

मैं तुम्हें
आलौकिक आनंद दूंगी
अगर तुम जानते हो
तैरना
मैं तुम्हें
उस पार पहुंचवा दूंगी
जाना होगा तुमने
अगर पतवार थामना
मुझ में बाढ़ आई हो
तब मत ढूंढ़ना
मेरी हदें
उन्हें
अपवित्र कहने दो मुझे
मैं बहती रहूंगी
अपनी ही दुनिया में
जैसे बहती है हवा
उतरती है धूप
खिलते हैं फूल
घिरते हैं बादल
उडती है धूल
तुम अगर जानते हो
मौसम को थामना
उस तह को पहचानते हो
जहां उठती है कामना



तुम्हारी हॅंसी                                                    

महज आलोड़न बिलोड़न नहीं
उम्दां उम्मीद है तुम्हारी हॅंसी
जिन्दगी को हथेली पर
देखने की आर पार
सिन्दूरी हुआ सेमर तुम
खिलता हुआ हरसिंगार
वहां तक देख रहा हूं
मैं
चहकती जब चिड़िया
मल्लाहें खोलते नावें
बहुत लम्बी उम्र है-
समझते हुये
एक दूसरे को
पानी और पतवार की
एक मुद्दत तक प्यार की




घड़ा                                                                                          

मैं ओक लगाकर पीता रहा
इस उम्र तक
एक अरसा बीत रहा
कौन सा घड़ा है तुम्हारे हाथों में
न रीत रहा
न हिल रहा
न मिल रहा
बहुत ढूंढ़ने तक




तृप्त हूं                                                                                                                                      

जैसे बहाव हो
झरने का
बड़ी बड़ी चट्टानों के बीच
घंटी बजी हो पाठशाला में
हुई हो चहल पहल
भोर हुई हो
पंछी लेने लगा हो उड़ान
मैंने तुम्हें कहां-कहां
पाया है खिलखिलाते हुये
उग रहा हूं तुम्हारे भीतर
धरती पर छितर गये
पौधे की तरह
तुम्हारी सांसों में
मैं अमल धवल फूल
गुजर रहा हूं
तुम्हारी कोख से
वह ठौर नहीं भूलूंगा
जहां-जहां तुम मिलीं
जेठ की दुपहरी में
करील की छाया सी
अंगोछे में बॅंधी रोटियों बीच
मिर्च सी लिपटी तुम
मैं बहुत तृप्त हूं
तुम्हारी छागड़ में
पानी बहुत ठंडा है.



वे यात्राएं                                                                                                                                                     


भोर का तारा उगता था
हिरणी पहुंची होती थी छपणी में
तब
हमारी शुरू होती थी यात्राएं
भुरभुरे से आस-पास में
छेकते जाते थे हम
थोड़ी-थोड़ी धरती
कई-कई गांव
अॅंगोछे में बॅंधी होती थी
रात की दो रोटियां
बॅंधे होते थे
मोटे-मोटे प्याज
उन हजार आंखों की नमी
लगने ही कहां देती थी
हमें प्यास
बहते हुए धोरे थे
हमारे रास्तों में
उगता हुआ दिन था
एक खास उजास था
मन में
कृतसंकल्प थे हम
वे जेठ मास की दुपहरियां थीं
और हमारे थे
पांव
मन
शरीर
हमारे हाथों में हैण्डल था
निगाहों में गन्तव्य बोध
हम पहुंचाते रहे थे
हरेक दिन
इस जलते भूखण्ड पर
हजारों को राहत
हमारी यात्राएं
अनवरत थीं
इस धरती का बहुत कुछ
सुखा देने की
खिलाफत करती हुई

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शिव योगी
06 फरवरी 1953 (चकेरी) सवाई माधोपुर, राजस्थान
पपराये होठों का ज्वार गीत संकलन

पांच वर्ष की न्यायिक विभाग में चपरासी की नौकरी,  साहित्यिक अभिरूचियों में प्रवृत्‍त रहने के  कारण नौकरी से निष्कासनकई वर्षो बाद  राजस्थान उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ के निर्णय में दिये निर्देशों पर सेवा में बहाली तथा 2010 में कनिष्ठ लिपिक रहते हुये स्वैच्छिक सेवानिवृति.  
                    
प्रगतिशील लेखक संघ तथा फोकस संस्था सवाई माधोपुर से सम्बद्ध

3/254, तपोभूमिडिफेंस स्कूल के पास मीणा,
कॉलोनी सवाई माधोपुरराजस्थान,
मो. 09460441513