सहजि सहजि गुन रमैं : स्वप्निल श्रीवास्तव

Posted by arun dev on अप्रैल 13, 2013



स्‍वप्निल श्रीवास्‍तव

जन्‍म ५ अक्‍टूबर १९५४ को पूर्वी उ.प्र. के जनपद सिद्धार्थनगर के सुदूर गांव मेंहनौना में.
शिक्षा और जीवन की दीक्षा गोरखुपर में.
पूर्व में उ.प्र. सरकार में जिला मनोरंजन कर अधिकारी के पद पर सूबे के अनेक शहरों में चाकरी.

ईश्‍वर एक लाठी है(1982), ताख पर दियासलाई(1992), मुझे दूसरी पृथ्‍वी चाहिए(2004) एवं जिन्‍दगी का मुकदमा(2010) कविता पुस्‍तक प्रकाशित

1986 में कविता का भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार एवं 2005 में फिराक सम्‍मान.
फुटकर समीक्षायें, अनुवाद एवं कुछ कहानियां भी लिखी हैं
कविताओं के अनुवाद भारतीय भाषाओं में प्रकाशित

510, अवधपुरी कालोनी, अमानीगंज, फैजाबाद-224001
मोबाइल 09415332326

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स्वप्निल श्रीवास्तव कवि को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखते हैं,उनका खुद का कवि कर्म भी इसी तरह का है. स्वप्निल की कविताएँ सीधी सच्ची लगती हैं. कथाकार प्रेमचंद की  तरह उनके काव्य संसार में जमीनी हकीकत है, श्रृंगार-पटार न है, न उसकी जरूरत महसूस होती है. यह विषपायी कवि अपने नर्क में खुश है उसे न तो इन्द्रासन चाहिए न उसकी दिलचस्पी हूरों में है. वह तो बस लेटरबाक्स होने में ही खुश हो जाना चाहता है, जिसको चिट्टियों का घर होना था. इसी तरह के कई विस्मृत होते सुख और दुःख के स्मरण से भरी हैं ये कविताएँ.  


  

लेटर बाक्‍स
वे चमकते हुए लेटर बाक्‍स कहां गये
जिन्‍हें देखकर पत्र लिखने की इच्‍छा होती थी
वे सार्वजनिक जगहों अथवा चौराहों पर
टंगे हुए रहते थे
जिसपर चिट्ठियां निकालने का समय
मुकर्रर रहता था
एक आदमी थैला लेकर आता था
उसमें चिट्ठियां भरकर चला जाता था
हर शहर में रहते थे लेटरबाक्‍स
वे घर से बहुत दूर नहीं रहते थे
बच्‍चे तक उस दूरी को आसानी से
तय कर लेते थे
शहर लेटरबाक्‍सविहीन हो गये हैं
इक्‍का दुक्‍का बचे हुए लेटरबाक्‍सों का रंग
धूसर हो गया है
वे धूल से अटे पड़े हैं
उनकी तरफ कोई नहीं देखता
वे उपयोगी नहीं रह गये हैं
बाजार का नियम है जो चीजें हमारे काम
की नहीं, व्‍यर्थ में घेरती हैं जगह
उन्‍हें नष्‍ट कर दिया जाता है
शायद इसी तर्क से माता पिता को
घर से बाहर कर दिया जाता है
संवाद के नये तरीके चलन में हैं
चिट्ठियों के लिए किसी के पास वक्‍त
नहीं है
प्रेमपत्र लिखने की आदत कम हुई है
सबकुछ मोबाइल के जरिए तय
हो जाता है
मेरा बच्‍चा लेटरबाक्‍स को चिडियों का
घोसला कहता था
उसे चिट्ठियां परिंदों की तरह लगती थीं
जो पाने वाले के पास जल्‍दी से
उड़कर पहुंच जाना चाहती थीं
मैं खाली-खाली लेटरबाक्‍स की तरह हूं
कोई मेरे भीतर चिट्ठी डालकर
पुनर्जीवित कर दे, तो कितना अच्‍छा हो.




मुफ्त में
हमें तो मुफ्त में नहीं मिलते दुख
न जाने कैसे लोग मुफ्त में
हासिल कर लेते हैं खुशी
जो चीजें बाजार में मुफ्त मिलती हैं
वह भी मुझे खरीदनी पड़ती हैं
कुछ लोगों के पास घुटनों के बल
चलकर आती हैं चीजें
और सीधे उनके हरम में दाखिल
हो जाती हैं
न चेहरा न मोहरा बरबस उनपर
फिदा हो जाती हैं सुन्दरियां
यह जेब को देख कर प्रेम करने का
वक्‍त है
जो सचमुच में प्रेम करना चाहते हैं
बेरोजगारी में उनकी जेब खाली है
गरीबों के पास नहीं आते अन्‍न
उन्‍हें अमीरों के कोठार पसन्‍द हैं
अजीब अजीब खेल हैं दुनियां में
यहां जादूगरों की कमी नहीं है




संसद में कवि सम्‍मेलन
एक दिन संसद में कवि सम्‍मेलन हुआ
सबसे पहले प्रधानमंत्री ने कविता पढ़ी
विपक्षी नेता ने उसका जवाब कविता में दिया
बाकी लोगों ने तालियां बजायीं
कुछ लोग हंसे कुछ लोगों को हंसना नहीं आया
आलोचकों को अपनी प्रतिभा प्रकट
करने का सुनहला अवसर मिला
टी.वी. कैमरों की आंखें चमकीं
एंकर निहाल हो गये
खूब बढ़ी टीआरपी
टी.वी. चैनलों पर हत्‍या और भ्रष्‍टाचार से
ज्‍यादा मार्मिक खबर मिली
इस लाफ्टरशो को विदूषक देखकर प्रसन्‍न हुए
एक विदूषक ने कैमरे के सामने ही तुकबंदी शुरू कर दी
आधा पेट खाये और सोये हुए लोग हैरान थे
यह संसद है या हंसीघर
हमारी हालत पर रोने के बजाय हंसती है




विषपायी
हम भी विषपायी हैं
हमने जिंदा रहने के लिए जहर पिया है
लेकिन हमारे कंठ पर जहर का
नीला निशान नहीं है
हम नीलकण्‍ठ नहीं कहलाना चाहते
हमें पसन्‍द नहीं है ढोंग
जीवन के मंथन में जो अमृत मिला था
उसे देवताओं ने हमसे छीन लिया
वे हमारा अमृत पीकर अमर हो गये हैं
हम अमृत और विष के विवाद में नहीं पड़ना चाहते
भरपूर जीना चाहते हैं जीवन
हमें इन्‍द्रासन नहीं चाहिए
हमें अप्‍सराओं के नृत्‍य में नहीं है दिलचस्‍पी
उधार का सोमरस पीकर हम डगमगाना नहीं चाहते
तुम्‍हें तुम्‍हारा स्‍वर्ग मुबारक
हम अपने नर्क में खुश हैं
परवरदिगार





अमृतफल
तुम्‍हारे अमृतफल पर दुष्‍टों की नजर है
कौवे अपने ठोढ़ से इसे घायल कर देना चाहते हैं
बाज पहट रहे हैं अपनी चोंच
कुछ लोग दरख्‍त पर चढ़कर ऊधम मचाना चाहते हैं
तोड़ लेना चाहते हैं अमृतफल
तुम्‍हारे अमृतफल की तरफ बढ़ रहे हैं
दरिंदों के हाथ
कोमल और निष्‍पाप अमृतफल इन दिनों
सुरक्षित नहीं रह गये हैं
इनके पीछे हिंसक लोगों की भीड़ लगी हुई है
कुछ लोगों के हाथ में पत्‍थर हैं
जो तुम्‍हारे अमृतफल की सुरक्षा में
लगे हुए हैं, उनके भीतर अमृतफल
पाने की बलवती इच्‍छा है



गहरे पानी की मछलियां
गहरे पानी मछलियां जल्‍दी पकड़ में नहीं आतीं
पकड़ भी लो तो हाथ से फिसल जाती हैं
वे बंसी में नहीं फंसतीं
चारे खा जाती हैं
हमारे सामने अठखेलियां करती हुई
पानी में गुम हो जाती हैं
मछलियों के बारे में सोचते हुए
कवि देवेन्‍द्र कुमार की पंक्ति याद आती है
क्‍या मछ‍ली का सीना पाया है इस औरत ने
मैं उनसे उस मछली का नाम नहीं पूछ पाया
जिसके लिए वे जिन्‍दगी भर परेशान थे
ये गोताखोर मछलियां कब दिखायी दें
कब गुम हो जायें कोई नहीं जानता
मछलियां नदियों, झीलों, तालाबों में रहती हैं
खूब लम्‍बा-लम्‍बा सफर तय करती हैं
किसी न किसी दिन उन्‍हें पकड़ते हैं मछेरे
उन्‍हें बाजार में बेचते हैं
बाजार से वे शयनकक्ष होकर हमारे रसोईघर में
पहुंचती हैं
और हमारी अदम्‍य भूख मिटाती हैं





बंदरगाह

सात समुंदर पारकर मैं पहुंचता हूं तुम्‍हारे पास
तुम मेरे लिए बंदरगाह की तरह हो
जहां मेरे मन को मिलता है विश्राम
तुम्‍हारे पनाहगाह में ठहरकर
मैं आगामी यात्रा के लिए रवाना होता हूं
मैं अपनी दुनिया का कोलम्‍बस हूं
भटकता रहता हूं समंदर दर समंदर
खेलता रहता हूं तूफानों से
सारी जहाजें डूब जाने के बाद
मुझे उम्‍मीद है कि मुझे
तुम्‍हारे बंदरगाह में मिलेगी शरण


प्रस्‍ताव
मेरा प्रस्‍ताव है कि हत्‍यारों और भ्रष्‍टाचारियों के लिए
सम्‍मानसूचक वाक्‍यों का प्रयोग
न किया जाये
उनके चेहरों का नफरत से तब तक
घूरा जाये जबतक वे अपना गुनाह
न कुबूल कर लें
उन्‍हें सार्वजनिक स्‍थल पर ले जाकर
कहा जाये कि यह आदमी नहीं
आदमखोर है
इसके दांत कई लोगों के खून से
रंगे हुए हैं
उनके मकान पर एक बोर्ड लगा
दिया जाये, जिसपर लिखा हो कि
यहां एक हत्‍यारा अथवा भ्रष्‍टाचारी
रहता है, जिसके मुंह में बत्‍तीस दांत की
जगह चौंसठ दांत हैं
वह दूसरे के खून से अपना मुंह साफ करता है
मेरे भीतर बहुत गुस्‍सा इकट्ठा हो गया है
मुझे अपना क्रोध प्रकट करने की
अनुमति दी जाये

  


निष्‍ठायें
निष्‍ठायें स्थिर वस्‍तु नहीं होतीं
वे समय और सुविधा के साथ
बदलती रहती हैं
बाज निष्‍ठायें इतनी छिनाल होती हैं कि
वे अपने जन्‍मदाता को बदलकर
दूसरे धर्मपिता की खोजकर लेती हैं
निष्‍ठायें अंधी नहीं होतीं
उन्‍हें साफ-साफ दिखायी देता है
वे जानती हैं, उन्‍हें बायें चलना है या दायें
वे दिन गये जब पतिव्रता होती थीं निष्‍ठायें
यह अदलाबदली का जमाना है जहां
नैतिकता के नियम लागू नहीं होते
उनके लिए कई पुरुष दिल खोलकर
बैठे हैं
उनके पास किसी के गोद में बैठने का
विकल्‍प खुला है
यह लिव-इन रिलेशनशिप का जमाना है
जब तक मन किया रहे फिर पीठ फेर कर
चल दिये
ग्‍लोबल हो चुकी हैं निष्‍ठायें
उन्‍हें कहीं भी जाने के लिए पासपोर्ट
अथवा चरित्र प्रमाणपत्र की जरूरत
नहीं है
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चित्र  : Viola Loreti