अन्यत्र : लद्दाख : रामजी तिवारी

Posted by arun dev on मई 01, 2013


रामजी तिवारी का यह संस्मरण मात्र यात्रा नहीं है, यह एक तरह से लद्दाख की संस्कृतिक, सामाजिक राजनीतिक यात्रा है. इस तरह की सचेत यात्राएं हिंदी में कम हैं. यह संस्मरण  पाठक को अपने साथ लद्दाख के पर्यावरण में तो ले ही जाता है, उन्हें सावधान भी करता चलता है. पठनीय और विचारणीय.

लद्दाख में कोई रैन्चो नहीं रहता             
रामजी तिवारी

दिल्ली से लद्दाख की यात्रा सड़क और हवाई मार्ग दोनों से की जा सकती है. लेकिन दोनों में लगने वाले समय का अनुपात भयावह है. सड़क मार्ग से जहाँ आपको चार दिन का समय चाहिए होता है, वहीँ हवाई मार्ग से एक घंटे का समय ही पर्याप्त होता है. अनुपात के विपरीत छोरों पर होते हुए भी लद्दाख जाने वाला व्यक्ति आपको यही सलाह देगा कि ‘बीच का कोई रास्ता नहीं होता’. आपको दोनों किनारों पर चलना ही होगा, तभी आप इसका वास्तविक लुत्फ़ उठा पायेंगे. एक तरफ से सड़क मार्ग और दूसरी तरफ से हवाई मार्ग. हम अपनी तरह आपको भी उन दुर्भाग्यशालियों की सूची में नहीं डालना चाहेंगे, जिन्होंने समय बचाने के नाम पर दोनों तरफ से हवाई रास्ता ही चुना.      

दिल्ली से उड़ान भरने के आधे घंटे बाद ही हिमालय पर्वत की श्रृंखलाएं आरम्भ हो जाती हैं. ये श्रृंखलाए चार भागों में बटी हुई हैं. सबसे निचले हिस्से पर, जहाँ से इनमे हमारा प्रवेश आरम्भ होता है, महान हिमालय श्रृंखलाएं आती हैं. उसके बाद क्रमशः जांस्कर और लद्दाख श्रृंखलाओं का नंबर आता है, जिनके मध्य लद्दाख क्षेत्र की पूरी आबादी निवास करती है. सबसे उत्तर में कराकोरम पर्वत श्रृंखलाए आती हैं, जहाँ पर दुनिया के सबसे ठंढे माने जाने वाले स्थानों में से एक सियाचिन का इलाका आता है, और यहीं पर भारतीय राज्य की सीमा भी समाप्त हो जाती है. महान हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के खत्म होते ही पहाड़ों का हरापन भी खत्म होने लगता है और थोड़ी ही देर बाद हिम आच्छादित चोटियां आपके भीतर दबे पौराणिक मिथकों को उभारने लगती हैं. अपनी तमाम असहमतियों के बावजूद आपका मन स्वर्ग जैसी परिकल्पना के होने – न होने के बीच झूलने लगता है और तमाम पौराणिक - मिथकीय कहानियां आपके भीतर कुलांचे मारने लगती हैं. इसके पहले कि इन कहानियों के मध्य आपका तर्क और विवेक पीसने लगे, पायलट कक्ष से यह घोषणा होती है कि हमारा विमान कुछ ही देर बाद लेह के हवाई अड्डे पर उतरने वाला है. खिड़की पर सांस रोके हमारे जैसे लोग, जो पहली बार लद्दाख की यात्रा कर रहे हैं, इस बात को सोचकर परेशान होने लगते हैं, कि पहाड़ों की इन श्रृंखलाओं के मध्य इतनी समतल जमीन कहाँ से आती होगी, जिस पर यह विमान प्रतिदिन उतरता और उड़ान भरता है. विमान जैसे जैसे नीचे आने लगता है, हमारी उत्कण्ठा उसी अनुपात में बढ़ने लगती है. फिर वह अवसर भी आता है, जब कलाबाजियां खाता हुआ हमारा विमान दो पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बनी खाली सुरंग सी जगह में प्रवेश करने लगता है. जान में जान आने लगती है कि अब इसे समतल जमीन नसीब हो जायेगी. और तभी परिचायिका द्वारा यह घोषणा की जाती है कि अक्टूबर की इस दस तारीख को सुबह दस बजे चार डिग्री सेल्सियस के तापमान में लेह हवाई अड्डे पर हमारा विमान उतरने वाला है.

लेह हवाई अड्डा मुख्यतः सेना के लिए बनाया गया हवाई अड्डा है, जहाँ दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू और श्रीनगर से यात्री तथा मालवाहक विमान आवाजाही किया करते हैं. हमारे मेजबान गाड़ी के साथ बाहर तैयार हैं. हम होटल पहुंचते हैं. हवाई यात्रा के बाद लेह पहुँचकर परिस्थितियों को जानते हुए भी हम वही गलती कर बैठते हैं, जिससे बचने की हर कोई सलाह देता है. मेजबान के द्वारा दी गई चेतावनी के बावजूद हम लोग थोड़ी ही देर बाद लेह शहर के मुख्य आकर्षण ‘लेह पैलेस’ को देखने के लिए निकल पड़ते हैं. मेरे साथी मित्र कहते हैं “ केवल लेह में ही इसे पैलेस कहा जा सकता है”. हालाकि उसमे उस पैलेस की गलती कम ही है, और हमारे भीतर उड़ रही हवाईयों की अधिक. यदि उस जगह पर मैसूर का महाराजा पैलेस भी होता, तब भी शायद हम यही प्रतिक्रिया देते. हमारी ठंढी प्रतिक्रिया मेजबान के माथे पर शिकन पैदा करने वाली साबित होती हैं. वे अपनी निराशा को छिपाते हुए हमें लेह के एक और खूबसूरत नगीनें ‘स्तोक पैलेस’ और उसकी विश्व प्रसिद्द मोनेस्ट्री को दिखाने का प्रस्ताव करते हैं. और तभी दो परिवारों के सात लोगों वाले हमारे ग्रुप की सबसे नन्ही जान ‘जेनिफर’ अपनी उल्टियों से हमे उबार लेती है. सबकी जुबान पर होटल वापस चलने की बात एक साथ समूह गान के रूप में आती है. ओह ! मात्र यह संयोग ही है कि ‘जेनिफर’ इस काम को हमसे पहले अंजाम दे देती है , अन्यथा ....? पूछिए मत .....

वापसी में होटल की सीढियां चढ़ते समय मेरे जेहन में बचपन की स्मृतियां कौंधती हैं. मुझे अपना बचपन याद आने लगता है, जब हम कुत्तों के साथ हांफने की प्रतियोगिता किया करते थे. हमारे लाख प्रयास के बावजूद जल्दी-जल्दी सांस लेने की वह बाजी कुत्तों के ही हाथ लगती थी. हमारा दम इतना फूलने लगता कि दो चार मिनट के भीतर ही हम कुत्तों को वहाँ से भगाकर स्वयं द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में अपनी हार की खीज को मिटाया करते. लेकिन आज उस प्रतियोगिता के लिए मैं बिलकुल तैयार हूँ. किसी ने ठीक ही कहा है कि “ हर आदमी का एक न एक दिन समय जरुर आता है.”  

हमें लेह जाते समय बतायी गयी सारी सावधानियां याद आने लगती हैं. यदि आप हवाई यात्रा के द्वारा लेह पहुँच रहे हैं और अगले चौबीस घंटे का समय वहाँ की परिस्थितियों के साथ अनुकूलन के लिए नहीं देते, तो समझ लीजिए कि अगला पूरा सप्ताह आपको अपने होटल के कमरे में दवाओं के साथ ही बिताना पड़ेगा. आपकी तबियत आपको इस लायक नहीं छोड़ेगी, कि आप सामने वाली सड़क पर बने एस.टी.डी. बूथ तक जाकर अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को अपना कुशल क्षेम भी बतला सकें. जाहिर है पूर्वोत्तर राज्यों जैसे ही, जम्मू कश्मीर में भी आपका प्री-पेड मोबाईल एक ऐसे डिब्बे के रूप में बदल गया रहेगा, जिसमे कुछ रखा भी नहीं जा सकता .......यहाँ तक कि बात भी नहीं .....


साँस उखड़ने की यह कमी लेह में उतरने के आधे घंटे बाद इतनी शिद्दत से महसूस होने लगती है कि पहली बार आपको अपने स्वस्थ जीवन में यह एहसास भी हो पाता है कि सांस लेना भी एक जरुरी काम है. क्या आपको याद है कि स्वस्थ रहते हुए आपने पिछली बार कब इस पर विचार किया था ? शायद ही याद होगा ....यहाँ आक्सीजन की कमी इतनी अधिक है, कि हर बार इसे अपने फेफड़ों में भरने के लिए आपको आसपास की हवा से मांगना पड़ता है. मजा तो तब आता है, जब हर 100 कदम के बाद आपकी यह मांग ‘चिरौरी-विनती’ के स्तर पर उतर आती है. पेड़ों का यहाँ कोई नामों-निशान नहीं. आदमियों के साथ साथ उन्हें भी आसानी से गिना जा सकता है. पहाड़ों ने तो जैसे यह तय ही कर रखा है कि हमारे नाम पर अब तक आपने जिन पेड़-पौधों और वनस्पतियों को देखा है, यदि उन्हें हटा दिया जाय, तब कैसा रहेगा. पहाड़ का मतलब सिर्फ पहाड़ नहीं हो सकता है क्या ...? अपनी देह पर किसी पेड़-पौधे और घास-वनस्पति को फटकने नहीं देने की कसम को सफलता पूर्वक निभाने वाले इन पहाड़ों को उनकी इस उपलब्द्धि के लिए धन्यवाद देने की ईच्छा होती है . उन्होंने पेड़ पौधों को नुमाईश के तौर पर घाटियों में समेट रखा है. फिर ऐसे में आक्सीजन आएगा कहाँ से ..? . लेकिन धन्यवाद के बाद मन में उठने वाले इस एक सवाल का क्या किया जाय, जो हर मोड़ पर हमारा रास्ता काटकर सामने खड़ा हो जाता है कि “ठीक है कि आप हमसे कोई दुराव छिपाव नहीं रखना चाहते, लेकिन बिना आक्सीजन के जब हम जिन्दा ही नहीं रहेंगे, तब आपको निहारेगा कौन ..?” मेरी राय में  लेह जैसी जगहों पर शहरों की कुलांचे भरती बदहवास दुनिया को भी जरुर आना चाहिए, कि वह इस तथ्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर सके कि पृथ्वी की छाती पर मूंग दलते हुए वह अपनी भौतिकता की खातिर जो खेल खेल रही है, आने वाले समय में उसका क्या हश्र हो सकता है. लेह में तो यह काम प्रकृति ने किया है, लेकिन शेष दुनिया में ...?

लेह में आक्सीजन की कमी का एक बड़ा कारण ऊँचाई की अधिकता है, जिसे पेड़ों की कमी और सघन कर देती है. महान हिमालय पर्वत श्रृंखलाएं नमी वाले बादलों का प्रवेश लद्दाख में होने ही नहीं देती और एक तरह से वे ‘rain shadow’ का कार्य करने लगती हैं. ऐसे में भारतीय मानसून लद्दाख में प्रवेश ही नहीं कर पाता, फिर बारिश का यहाँ पहुचते – पहुचते हांफ जाना बिलकुल स्वाभाविक ही दिखाई देता है. अब नाम मात्र की बरसात और ऊपर से पथरीली मिटटी , ऐसे में हांफने की यह स्वभाविकता पेड़ों पर भी लागू हो जाती है. और जब पेड़ नहीं, तो फिर बारिश भी नहीं. और यही चक्र लद्दाख को एक पहाड़ी रेगिस्तान बनाकर छोड़ता है. ऊँचाई पर सर्दियों की बर्फ़बारी ही वह श्रोत है, जिसके सहारे सिंधु और जांस्कर जैसे नदिया सालों साल जीवंत बनी रहती हैं, और लद्दाख के होठों पर पड़ने वाली फेफरी को गीला करती रहती हैं .

बहुत हिम्मत के बाद शाम को छत पर जाता हूँ. आसपास के सारे होटल बंद पड़े हैं. ओह ..! ‘आफ सीजन’ का मतलब ‘एकदम आफ’ ही होता है, पहली बार पता चलता है. भारत के दूसरे पर्यटक स्थलों जैसा नहीं , जहाँ ‘आफ’ का मतलब उपलब्द्ध विकल्पों का आसान और सस्ता हो जाना होता है. यहाँ का कठिन जीवन सामान्य दिनों में भी बाहर से आये सैलानियों पर भारी पड़ता है. फिर सितम्बर के बाद, जब तापमान शून्य को चूमने की बेकरारी में रहता है, यहाँ का जीवन भी कठिनतर से कठिनतम हो जाता है. पानी नालियों में जमने लगता है और यहाँ पहुचने वाले सारे रास्ते बर्फ की मोटी चादर ओढ़कर लम्बी और गहरी नींद में सो जाते हैं. ऐसे में सेना और कुछ हिम्मती विदेशी सैलानियों के अलावा यहाँ कोई नहीं फटकता. लद्दाख में पर्यटन के लिए जुलाई और अगस्त के दो महीने ही निर्धारित हैं, जिसे दोनों तरफ एक-एक माह खीचकर जून से सितम्बर कर दिया जाता है. अब ऐसे में मौसम की तनी हुई रस्सी को एक और माह आगे –अक्टूबर- के लिए खींचना जोखिम भरा तो होगा ही.

रात को लगता है कि होटल के कमरे से ही लेह को देखना पड़ेगा. अब मुश्किल यह है कि सांस को खीचने वाला काम किया जाए या घूमने वाला काम. जाहिर है विकल्प एक ही है. लेकिन वह सुबह ही क्या, जो आपको ठोक-पीटकर खड़ा न कर दे. आपको हाथों में जिम्मेदारियों की सूची न थमा दे. यहाँ भी वह अपने अर्थों को उसी तरह से साकार करती है, जिसके लिए वह प्रसिद्द है. हमारे मेजबान कहते हैं ‘आज हमें नीचे की तरफ चलना चाहिए’. हमें कुछ नहीं पता कि यह नीचे और ऊपर क्या होता है. और यदि पता भी चल जाए, तब भी हम अपना दिमाग अपने ही पास रखना चाहते हैं. कोई प्रयोग नहीं, कोई सलाह नहीं. कुछ देर में यह समझ में आता है उनका आशय समुद्र तल से ऊँचाई का है. ‘बिलकुल ..! आप जैसा उचित समझें’. बिना देरी किये ही हम यह समूह गान गा उठते हैं. हम लद्दाख की सबसे धनी और सबसे प्रसिद्द ‘हेमिस मोनेस्ट्री’ की तरफ बढते हैं .यह लेह शहर से 50 किलोमीटर दूर पूरब दिशा में स्थित है. रास्ता सिंधु नदी के किनारे-किनारे जाता है. इस मोनेस्ट्री की नींव लद्दाख के तत्कालीन राजा सिंजे नामंग्याल के आमंत्रण पर आये ‘रासचीन’ नामक बौद्ध भिक्षु ने सत्रहवीं सदी में रखी थी.

रास्ते में हम उत्सुकताओं की अपनी पोटली मेजबान ‘अंकल’ के सामने खोलते हैं. ‘अंकल’ मेरे साथ गए मित्र के रिश्तेदार हैं. 65 वर्ष की उम्र में भी उनका हौसला देखते ही बनता है. शुरुआत लेह के विस्तृत इतिहास से होती है. अब यह अलग बात है कि इस विस्तृत में से हमारे पल्ले इतना ही पड़ता है. वे बताते है कि लद्दाख परंपरागत रूप से 9 वीं शताब्दी तक तिब्बती साम्राज्य का ही अंग था. फिर इस साम्राज्य का पतन हुआ, और लद्दाखी नामंग्याल राजवंश का अस्तित्व सामने आया. 19 वीं शताब्दी के मध्य तक, जब कश्मीर के डोगरा राजा गुलाब सिंह ने इस पर आक्रमण कर इसे अपने राज्य में मिला लिया, यह एक स्वतंत्र राज्य बना रहा . यहाँ तक कि मुग़लों के शासनकाल में भी लद्दाख पर नाममात्र की अधीनता ही हो पायी थी , जबकि कश्मीर और बाल्टिस्तान उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण में आ गए थे. कहते है कि डोगरा राजा के उस आक्रमण में लद्दाख की एक तिहाई पुरुष आबादी का सफाया हो गया था. आसन्न पराजय को देखते हुए ‘नामंग्याल’ राजा तिब्बत भाग गया, और 1842 के सितम्बर माह में लद्दाख कश्मीर के डोगरा शासन के अधीन आ गया. लगभग 100 साल बाद इतिहास ने डोगरा राजा के साथ भी कुछ–कुछ वैसा ही सुलूक किया, जब 1948 में कबाईलियों का कश्मीर पर आक्रमण हुआ, और कश्मीर का डोगरा शासन इतिहास में डूब गया. शासन के डूबने के बाद जो धरती बची, उसका कुछ हिस्सा पकिस्तान में और बाकी हिस्सा भारत में विलीन हो गया.

लेकिन लद्दाख पर हमले का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ. 1962 का भारत–चीन युद्ध भी मुख्यतया इसी भूमि पर लड़ा गया. उस युद्ध में लदाख का बड़ा पूर्वी हिस्सा चीन के पास चला गया. भारत का यह नक्शा, जिसे आज हम देखते पढ़ते हैं, दरअसल हमारे देश की वास्तविक भौगोलिक परिस्थिति को बयान नहीं करता है. कश्मीर के दोनों मस्तक आज हमारे नियंत्रण में नहीं हैं. बायां ‘आजाद कश्मीर’ के रूप में पाकिस्तान के पास और दाहिना ‘अक्साई चीन’ के रूप में चीन के पास चला गया है. दुःख की बात यह है कि भारत की अधिकांश जनता आज अपने देश की वास्तवीक सीमा रेखा से नितांत अपरिचित है.

‘अंकल’ का दुःख लद्दाख की कहानी कहते-कहते सतह पर आ जाता है. वे थोड़ी देर के लिए चुप हो जाते हैं. मुझे लगता है कि इस बातचीत को हल्का करना अब जरुरी है. मैं अनुरोध करता हूँ कि “ टेप में कोई लद्दाखी गीत बजाईए ” . ‘लेकिन क्या वह आपके समझ में आएगा ..?’ वे उत्साह से पूछते हैं  “ हां क्यों नहीं ....” मैं मन ही मन सोचता हूँ  “जब बालीवुड की पूरी फिल्म इंडस्ट्री ही बोलों को बिना समझे ही चल सकती है ( याद कीजिये ---कोलावेरी डी ) और बिना समझे ही उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी किया जा सकता है ( याद कीजिये –जय हो ), फिर मैं लद्दाखी गीत क्यों नहीं समझ सकता. और यदि नहीं भी समझ सकता, तब भी इन गीतों में इतनी रवानी तो है ही, कि मुझ जैसे अनाड़ी को भी अपनी धारा में बहा ले जाए. ” माहौल सचमुच कुछ हल्का होता दिखाई देता है. पहाड़ी रास्ते पर चलते हुए पहाड़ी गीतों को सुनने का अलग ही आनंद होता है. कुमायूंनी हो या गढ़वाली, हिमाचली हो या डोगरी, या फिर लद्दाखी, सभी पहाड़ी लोक धुनों में एक खास किस्म की मस्ती, उल्लास, उमंग और रवानी पायी ही जाती है.

एक ढाबे पर चाय पीने के बाद ‘अंकल’ फिर लद्दाख के इतिहास की तरफ लौटते हैं. स्वतंत्र भारत में लद्दाख कश्मीर का पिछलग्गू बन जाता है. और फिर आगे चलकर 1979 में लद्दाख का विभाजन लेह और कारगिल नामक दो जिलों में हो जाता है. दोनों जिलों की आबादी कमोबेश एक ही जितनी है. डेढ़ लाख के आसपास. फर्क यह है कि कारगिल की आबादी में मुस्लिमो का प्रतिशत 80 के ऊपर है और लेह की आबादी में बौद्धों का. क्षेत्रफल की दृष्टि से लेह अभी भी भारत का दूसरा सबसे बड़ा जिला है.

“तो फिर वर्तमान लद्दाख का स्वरुप कब उभरता है” ? मेरे इस सवाल के जबाब में अंकल बताते हैं कि आज के लद्दाख में जो कुछ सहुलियते मिली हुई हैं, वह 1989 के आंदोलन के कारण ही संभव हो पायी हैं. जिस समय कश्मीर में पृथकतावादी आंदोलन प्रारंभ हुआ, लगभग उसी समय लद्दाख में भी कश्मीरी हुकूमत से स्वायत्ता की माँग करने वाला आंदोलन भी आरम्भ होता है. हमारे लिए भारतीय मीडिया द्वारा अपनाया गया रवैया बेहद सालने वाला है. वह कश्मीरी पृथकतावादी आंदोलन को तो सुर्ख़ियों में रखती है, लेकिन उसे लद्दाखी स्वायत्तता आंदोलन की भनक तक नहीं लग पाती. जो भी हो, लद्दाख को उस आंदोलन से काफी कुछ हासिल हुआ है. आंदोलन के बाद लगभग सारा लद्दाख जनजातीय क्षेत्र घोषित हो गया और आज उसकी 90 प्रतिशत आबादी इसमें समाहित हो गयी है. ‘लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन’ नामक संगठन द्वारा छेड़ी गयी इस मुहिम की बदौलत 1995 में ‘लद्दाख पर्वतीय क्षेत्रीय परिषद’ का गठन हुआ था. आज इस परिषद के पास ‘कानून, व्यवस्था, न्याय, संचार और उच्च शिक्षा’ को छोड़कर राज्य के लगभग सारे अधिकार हासिल हैं.

‘लेकिन इसके साथ ही सब कुछ ठीक हो गया, सोचना उचित नहीं है. यह कश्मीर ही रहा है, जिसने लद्दाख को गुलामों और पिछलग्गुओं वाली यह जिंदगी रसीद की है. लद्दाखी लोग कश्मीरियों से अनायास ही घृणा नहीं करते. कश्मीर से लद्दाख को दिया जाने वाला बजट वर्षान्त में कुछ इस प्रकार से जारी किया जाता है, कि वह अनुप्रयुक्त ही रह जाए . भारत सरकार से हम बार-बार यह माँग करते हैं कि वह हमें केंद्र शासित क्षेत्र का दर्जा दे दे, लेकिन उसमे इतनी सवेदनशीलता कहाँ कि वह बिना अलगाववाद की माँग किये जाने वाले आंदोलनों को भी गंभीरता से ले. इस राज्य में ईच्छा तो सिर्फ कश्मीरियों की होती है, बाकि तो केवल सिर गिनने के काम आते हैं. और हम सिर्फ कश्मीर को ही दोष क्यों दें, भारत में भी तो हमारी पहचान अपने होने की नहीं है.’ अंकल जिस खूबसूरती से गाड़ी चलाते हैं  उसी खूबसूरती से अपनी बात भी रखते हैं. ‘दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई और लखनऊ जैसे शहरों में हमें नेपाली और चीनी समझा जाता है. पूर्वोत्तर भारत के लोगों जैसा ही हमारे साथ भी सम्पूर्ण भारत में किया जाने वाला यह तिरस्कृत व्यवहार हमें भीतर तक सालता है. आखिर भारतीय हमारे बारे में ऐसा क्यों सोचते हैं ..? तब तो रंग, रूप, नाक-नक्श और लम्बाई-चौड़ाई के आधार पर असम से जापान तक के सारे लोग चीनी और नेपाली ही समझे जायेंगे. हम तो किसी दिल्ली वाले से नहीं पूछते कि आप बंगलादेशी हैं या पाकिस्तानी. या हमने तो किसी चेन्नई वाले से यह कभी नहीं पूछा कि आप श्रीलंकाई तो नहीं.’

ओह ..! भीतर दफ़न लावे इसी प्रकार निकलते हैं. बाहर के किसी भी सर्द मौसम की क्या बिसात, कि उन्हें निकलने से वह रोक दे. चाहे वे पृथ्वी के गर्भ से निकले हुए लावे हों, या मनुष्य के मन की गहराईयों से हम हेमिस की मोनेस्ट्री देखते हैं. सिंधु नदी के किनारे-किनारे चलते हुए मेरे मित्र बार बार गाड़ी को रोकते हैं. उनका डिजिटल कैमरा लगातार चालू रहता है. अब तक हमने पहाड़ों का यह रूप नहीं देखा था. मुंडन किये हुए पहाड़ बौद्ध भिक्षुओं जैसे कतारबद्ध और सलीके से खड़े लगते हैं. वापसी में हम ‘3 इडियट्स’ फिल्म के स्कूल को देखने के लिए रुकते हैं. यह स्कूल 2010 में बादल फटने वाली घटना में पूरी तरह से तबाह हो गया था. और यही स्कूल क्यों, तबाह तो सारा लेह ही हुआ था, लेकिन सारे लोग इतने खुशनसीब नहीं ठहरे कि उन्हें आमिर खान या सेना का सहयोग नसीब होता. हालाकि लेह शहर उस तबाही से उबर गया लगता है, और उसके निशान उस शहर में इक्का दुक्का ही दिखाई देते हैं, लेकिन देहाती क्षेत्रों में तबाही का मंजर अभी भी सँजोकर रखा गया है.

बहरहाल हम रैन्चों के स्कूल में प्रवेश करते हैं. यह इस समय खाली पड़ा हुआ है . पीछे एक ‘रैन्चो काफी शाप’ है. क्या बात है ..? आमिर खान का काफी शाप. ‘ नहीं ..कोई सम्बन्ध नहीं’ उसमे काम करने वाली महिला बताती है. लेकिन उसके काम करने को देखकर यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि कोई न कोई सम्बन्ध जरुर होगा.धीरे धीरे और जिस सलीके से वह काफी बनाती है , उसे परोसती है और हमें वह पसंद आती है, सब कुछ तो आमिर खान से ही मिलता जुलता है. वह भी दो साल में एक फिल्म बनाता है, कायदे से हमारे सामने रखता है और हम उसे चाव से देखते है. क्या अब भी आप कहेंगे कि ‘नहीं ..कोई सम्बन्ध नहीं’.

हम वापस लौटते हैं. घर से संपर्क कटा हुआ है. डिब्बे के रूप में परिवर्तित मोबाइल बैग में नीचे रख दिया गया है. 100 मीटर की दूरी पर एस.टी.डी. बूथ है और उसी के बगल में इंटरनेट कैफे भी. मन में फेसबुक की तड़प उठती है . कुछ बातें और चित्र मित्रों के साथ भी शेयर का दिया जाए . बहुत हिम्मत जुटाकर कैफे तक पहुँचता हूँ ,कि 10 मिनट के भीतर ही पीछे से झगडने की आवाज उठती है . “ आधे घंटे का 50 रूपया कौन सा रेट है .” एक आदमी कैफे वाले पर चीखता है . “ यही रेट है यहाँ . 90 रुपया घंटा और 50 रूपया प्रति आधा घंटा .” कैफे वाला ‘लामाओं’ की मुद्रा में शांति का पाठ पढाता है. “ बाप रे बाप ...! उसने तो मुझे उबार ही लिया .” 15 मिनट के 25 रुपये चुकाकर मैं उसको सलामी ठोकता हूँ.

लेह ने अब हमें स्वीकार कर लिया है, लेकिन इतना नहीं कि आप कबड्डी खेलने लगें. हाँ, जहाँ चलना फिरना दूभर हो रहा था , वहाँ इतनी स्वीकार्यता भी बहुत है. अगले दिन हम कारगिल के रास्ते पर निकलते हैं. यह रास्ता सेना, वायु सेना और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की उपस्थिति से अटा पड़ा है. रंग – रंग के नाम वाली बटालियनें और गुजरता हुआ उनका लंबा – लंबा काफिला. शुक्र है कि यह इलाका सामरिक दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण है, अन्यथा यहाँ आदमी देखने के लिए मन तरस जाता. कारगिल के रास्ते पर 10 किलोमीटर निकलते ही जैसलमेर जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है. ठीक उसी तरह, जैसे जैसलमेर शहर से ‘रेत के टीलों’ की तरफ बढते हुए हम महसूस करते हैं . वैसी ही समतल जमीन, जहाँ रिहायशी बस्तियों का नामोनिशान तक नहीं है. पेड़- पौधे और झाडियाँ दूर जोजिला के पार चढाई का रास्ता तलाश रहे हैं. सीधी जाती हुई सड़क पर 5 – 7 किलोमीटर दूर से आती हुई इक्का दुक्का गाड़ियों को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है. सड़क के किनारे की मिटटी रेत तो नहीं है, लेकिन उसे खाली मिट्टी जैसा संबोधन भी नहीं दिया जा सकता. ये सारे तथ्य उसी जैसलमेर के रास्ते की गवाही देते हैं, बस एक काम हमें और करना होता है. वह यह कि नेपथ्य में चल रहे पहाड़ों को नजर की फ्रेम से ओझल कर देने का काम. यदि आपने यह काम कर लिया तो फिर दूरी की साम्यता को भी इसमें जोड़कर, इस जुड़ाव को और मजबूत किया जा सकता है. वहाँ की तरह यहाँ भी यह दृश्य लगभग 30 किलोमीटर तक चलता है.

यहीं पर नीमों गांव के पास सिंधु और जांस्कर नदियों का संगम है. अपने ही नाम की पर्वत श्रृंखला से
निकलने के बाद 370 किलोमीटर की यात्रा तय करती हुई जांस्कर नदी यहाँ पर दक्षिण दिशा से आती है और सिंधु में मिल जाती है. जबकि सिंधु नदी कैलाश पर्वत के उत्तर से निकलती है और भारतीय क्षेत्र में लगभग 450 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद बटालिक के पास पकिस्तान में प्रवेश कर जाती है. जांस्कर का रंग नीला, जबकि सिंधु का दुधिया और सफ़ेद है . उन्हें देखकर उत्तराखंड मेंरुद्रप्रयाग के पास अलकनंदा और मन्दाकिनी नदियों का संगम याद आता है. यहाँ भी केदार नाथ की तरफ से आती हुई मंदाकिनी नदी का रंग नीला और कुछ कुछ हरा है, जबकि बदरीनाथ की तरफ से आने वाली भागीरथी का रंग दुधिया और सफ़ेद है . नदियों के रंग में दिखाई देने वाला यह परिवर्तन उनके रास्ते से निर्धारित होता है . जो नदियाँ अपेक्षाकृत हरे भरे रास्तों और खास तरह की मिट्टी से होकर गुजरती हैं, वे नीली या हरी दिखाई देती हैं , जबकि ग्लेशियरों से निकलने के बाद पत्थरों के सहारे यात्रा करने वाली नदियों का रंग दुधिया और सफ़ेद ही रह जाता है. बिलकुल उन ग्लेशियरों की ही तरह, जहाँ से वे निकलती हैं . जांस्कर तो सिंधु में मिलने के बाद यहीं पर विलीन हो जाती है , लेकिन सिंधु नदी पाकिस्तान में प्रवेश करने के बाद लगभग 2500 किलोमीटर की यात्रा करती हुई कराची के पास अरब सागर तक जाती है . पाकिस्तान में आगे चलकर इसी सिंधु नदी में चेनाब, रावी, सतलुज, झेलम ,व्यास और उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रान्त से आने वाली दो और नदिया मिलती हैं, जिनसे सप्त सिंधु डेल्टा का निर्माण होता है.

30 किलोमीटर बाद छोटे-छोटे गाँव आने लगते हैं. नीमों ,बास्गो,अलची और ससपोल होते हुए हम लामायुरु तक जाते हैं . यह लेह से 125 किमी दूर लेह-श्रीनगर हाइवे पर स्थित है . कारगिल यहाँ से और 100 किमी रह जाता है . ड्राईवर ‘रामचोस’ कहता है ‘ आपने अभी तक जिस रास्ते को तय किया है, वही दृश्य कारगिल होते हुए जोजिला पास तक जाता है. एक बार जब आप उस ‘पास’ को पार करते हैं, इस रास्ते का मंजर तभी जाकर बदलता है. मतलब लद्दाख और कश्मीर में अंतर केवल धर्म, भाषा, रंग -रूप , संस्कृति और समाज का ही नहीं है, वरन इसे प्रकृति ने भी साफ़ साफ़ तरीके से अलगाया हुआ है . ‘लामायुरु’ से कुछ ही पहले हमें रुकना पड़ता है . पता चलता है कि आगे पहाड़ों में बारूद भरकर उन्हें सड़क बनाने के लिए तोडा जा रहा है. मेरे मित्र गाड़ी से उतरकर सड़क बनाने में जुटे एक मजदूर के पास जाते हैं और जल्दी ही उसका हाथ पकड़कर हंसी-ठिठोली करते हुए हमारी तरफ लौटते हैं. “ इहो बिहारे के हउवन . छपरा जिला इनकर घर बा ” . (ये भी बिहार के ही रहने वाले हैं . इनका घर छपरा जिला में है ). वह काम करने वाला मजदूर बड़ी आत्मीयता के साथ हमसे मिलता है. वह बताता है कि हमारे जैसे सैकड़ो- हजारों लोग गर्मियों में यहाँ काम करने के लिए आते हैं. बाते और भी होती है, जिसमे सुख का हिस्सा केवल हमारे मिलने तक का ही होता है, बाकि तो उसके पास दुखों की लम्बी फेहरिश्त ही होती है, जिसे वह जल्दी जल्दी बांच देना चाहता है. इतने में रास्ता  साफ़ हो जाता है. हमारी गाड़ी तो आगे ‘लामायुरु’ की तरफ बढ़ जाती है, लेकिन मन उसके द्वारा उठाये गए सवालों में ही अटक सा जाता है. हम यू.पी, बिहार , झारखण्ड और उडीसा वाले लोग कब तक दूसरों के पहनने के लिए अपनी पीठ पर ऊन की फसल ढोते रहेंगे . (बकौल धूमिल). क्या हम अपने लिए भी उनसे कभी ‘शाल’ या ‘स्वेटर’ बुन सकेंगे ...?

हम लामायुरु की प्रसिद्द मोनेस्ट्री देखते हैं और वहीँ से हमें पहाड़ों का वह बहुरंगी दृश्य भी दिखाई देता है , जिस पर सूरज की रोशनी पड़ रही है. नजर की एक ही फ्रेम में सात-आठ रंगों वाले दृश्यों का अंट जाना एकदम विस्मयकारी लगता है. जिन अलग-अलग पदार्थो से ये पहाड़ बने हुए हैं, सूरज की पड़ने वाली रोशनी उनकी वही अलग-अलग छटा वापस बिखेर देती है . हमारा रात्रि विश्राम अलची में है. अपने रिश्तेदार अंकल के घर.

कहते हैं कि घूमने के लिहाज से यह आवश्यक होता है, कि आप उस क्षेत्र के गाँवों और दूर दराज के इलाकों से परिचित हों. विविधताएं और खासपने की तलाश आपकी वहीँ पूरी होती है . वहीँ उस समाज का लोक भी बचा होता है, और संस्कृति भी. अन्यथा आप दिल्ली में हों या बैंकाक में , टोक्यो में हों या लन्दन में, न्यूयार्क में हों या मेलबोर्न में, सारे जगहों के पांच-सात सितारा होटल एक ही जैसी विशेषताओं से सुसज्जित मिलेंगे. उनमे बैठकर आप यह नहीं बता सकते कि यह दुनिया का कौन सा हिस्सा है . और यही स्थिति कमोबेश देशों की राजधानियों और बड़े महानगरों की भी हो गयी है. भूमंडलीकरण के दौर में वे नीरसता की हद तक एकरूप होते चले जा रहे हैं . कनाट प्लेस के भीतरी घेरे में घूमते हुए आप कभी भी यह अंदाजा नहीं लगा पायेंगे, कि इन चमचमाते शो रूमों में सजे एक कुर्ते, एक पैंट या कि एक जोड़ी जूते के मूल्य के बराबर की पगार को हासिल करने के लिए दूर जौनपुर, अररिया, कोडरमा और कालाहांडी से लाखों-लाख लोग किन परिस्थितियों से गुजरते हुए और क्या कुछ छोड़ते हुए इसी दिल्ली में घिसटते हैं. किसी भी हिसाब से आप अंदाजा लगा लीजिए, लोक संस्कृति को समझने के लिए आपको गाँवों और कस्बों तक का सफर करना ही पड़ेगा.

अलची में जब तक हम अपने मेजबान के घर पहुंचते हैं, तब तक अँधेरा बहुत गहरा गया रहता है . लाद्दखी मेहमान नवाजी की उस अदभुत और बेहतरीन परंपरा में बस एक ही चीज खटकती है . उनके द्वारा किया जाने वाला आग्रह. यह आग्रह शराब पीने वालों के लिए भी किसी आफत से कम नहीं . भौगोलिक परिस्थितियों और सेना के लिए की जाने वाली आपूर्ति ने यहाँ शराब को घरों के भीतर भी स्वीकार्यता दिला दी है. यहाँ की स्थानीय शराब ‘छांग’ अब हासिये पर पड़ी है, और उसकी जगह पर विदेशी शराब की कई प्रचलित किस्में बाजार पर हावी हैं. इसका सेवन नहीं करने वाले सफाई देते-देते लेटने लगते हैं और इसका सेवन करने वाले पी-पी कर .

हमारे मेजबान रात को जम्मू और कश्मीर का भूगोल समझते हैं.यह प्रदेश वर्तमान में तीन हिस्सों में बंटा है .जम्मू, कश्मीर और लद्दाख. जम्मू का क्षेत्रफल इस राज्य के क्षेत्रफल का कुल 19 प्रतिशत है और इसमें छ जिले आते हैं ,जहाँ राज्य की कुल 45 प्रतिशत जनता निवास करती है. कश्मीर में भी छ ही जिले हैं . इसका क्षेत्रफल 11 प्रतिशत है और आबादी लगभग 52 प्रतिशत . लद्दाख में दो जिले हैं . लेह और कारगिल . इसका क्षेत्रफल राज्य के भूभाग का 70 प्रतिशत है , लेकिन राज्य की कुल जनसंख्या की मात्र 2.2 प्रतिशत आबादी ही यहाँ निवास करती है. यह तथ्य यहाँ की जनसंख्या की विरलता का अनुमान लगाने के लिए काफी है.

लद्दाख के उत्तर में सियाचीन, चीन और पाकिस्तान की सीमा है. उत्तर पूर्व में अक्साई चीन, पूरब में तिब्बत, उत्तर पश्चिम में बाल्टिस्तान, पश्चिम में कश्मीर, दक्षिण पश्चिम में डोडा और जम्मू  तथा दक्षिण में यह हिमाचल प्रदेश की सीमा से घिरा हुआ है .  उत्तर में लद्दाख पर्वत श्रृंखलाएं और दक्षिण में जांस्कर श्रृंखलाओं के मध्य स्थित लद्दाख का अर्थ होता है –बहुत सारे रास्ते . ला- मतलब- रास्ते और दाख -मतलब – बहुत सारे. मैंने मन ही मन सोचा “हम मैदानी लोगों के दिमाग में पहाड़ों को लेकर कितना भ्रम रहता है . हम सोचते हैं कि पहाड़, रास्ते के हिसाब से बंद जगहें होती हैं. लेकिन यहाँ तो इस जगह का अर्थ ‘बहुत सारे रास्ते’ के रूप में खुलता है.”

इस ‘बहुत सारे रास्ते’ के मुख्यालय लेह से तीन मुख्य रास्ते खुलते हैं. एक अलची, लामायुरु , कारगिल, द्रास और सोनमर्ग होते हुए श्रीनगर को जाता है . इस रास्ते पर नामकी ला, फातु ला और प्रसिद्द जोजी ला (पास) रास्ते पड़ते हैं. यह रास्ता 1999 की गर्मियों में उस समय सुर्ख़ियों में आया था, जब पाकिस्तानी घुसपैठिय सेना ( इसके प्रमाण लेह के संग्रहालय में भी रखे हैं ) ने भारतीय सीमा रेखा में प्रवेश कर अपने बंकर और चौकियां स्थापित कर ली थीं. महीनों चले उस कारगिल युद्ध में भारत को सफलता तो मिली, लेकिन धन-जन की भारी क्षति के बाद. दूसरा महत्वपूर्ण रास्ता रुमसी, तोसकार, सारचू, दारचा और केलांग होते हुए हिमाचल में मनाली तक आता है. इस रास्ते को 1991 में सार्वजनिक परिवहन के लिए पहली बार खोला गया था. इससे पहले 480 किमी लंबे इस रास्ते का उपयोग केवल सेना द्वारा ही किया जाता था. कश्मीरी पृथकतावादी आंदोलन के बाद से इस रास्ते का सैनिक और सार्वजनिक प्रयोग इतना बढ़ गया है , कि अपनी तमाम उबड़ खाबड़ बनावटों और प्राकृतिक खतरों के बावजूद यह लेह को शेष भारत से जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग बन गया है. जो भी विदेशी सैलानी सड़क मार्ग से लद्दाख की यात्रा करते हैं , वे सब इसी रास्ते का चुनाव करते हैं. इस रास्ते पर तांगलांग ला, बारलाचा ला और रोहतांग ला जैसे प्रसिद्द रास्ते (पासेस) आते हैं. तीसरा महत्वपूर्ण रास्ता उत्तर दिशा में सियाचीन ग्लेशियर की तरफ जाता है. इसी रास्ते पर लेह से पचास किमी दूर ‘खारदुंगला टाप’ है, जिसे दुनिया में सबसे ऊँची मोटर प्रयुक्त सड़क होने का दर्जा हासिल है. 18400 फीट की ऊँचाई पर स्थित इस टाप से सियाचीन ग्लेशियर के आधार शिविर की दूरी 184 किमी ही बचती है.

लद्दाख अपने पहाड़ों और रास्तो के अलावा अपनी घाटियों और मोनेस्ट्रीयों के लिए भी जाना जाता है. लेह, रुपसू, साल्ट,पदुम, स्योक, सुर ,नुब्रा और जांस्कर जैसी खूबसूरत घाटियों से सुसज्जित इस भूमि पर अलची, लामायुरु, लेकिर, थिकसे, हेमिस और स्तोक जैसी विश्व प्रसिद्द मोनेस्ट्रीयां चार चाँद लगाती हैं. इन मोनेस्ट्रीयों में 1000 साल पहले के इतिहास और संस्कृति की धरोहर सिमटी हुई है.

सुबह हम अलची की प्रसिद्द मोनेस्ट्री को देखने के लिए जाते है. सिंधु नदी के ठीक किनारे पर स्थित यह मोनेस्ट्री लद्दाख में सबसे पुरानी और सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस मोनेस्ट्री की कला और पेंटिंग्स पर लद्दाखी कम और आरंभिक बुद्धिस्ट तथा कश्मीरी परम्परा का प्रभाव अधिक दिखाई देता है. अलची गाँव में ही लद्दाख की बहुप्रतिक्षित जल विद्युत परियोजना का निर्माण कार्य चल रहा है. 45 मेगावाट की प्रस्तावित इस परियोजना को 2010 में ही तैयार हो जाना था, लेकिन उस समय सीमा के दो वर्ष गुजर जाने के बाद भी यह  निर्माण के दौर में ही है . पूरे लद्दाख में बिजली की समस्या बहुत गंभीर है . माँग 50 मेगावाट की और उत्पादन 5 मेगावाट का . काम कैसे चलेगा. अधिकतर होटलों, सैन्य मुख्यालयों और सरकारी प्रतिष्ठानों में बिजली की आवश्यकता जेनरेटरों के द्वारा पूरी की जाती है. मेजबान अंकल के चेहरे की नसें पुनः लद्दाख की उपेक्षा की ओर मुड़ती हुई तनने लगती हैं. “ क्या श्रीनगर और दिल्ली में बैठे लोग इस बात को नहीं जानते कि लद्दाखी लोगों के जीवन में भी उजाले की आवश्यकता है.”

अलची से लेह लौटते समय हम पुनः जैसलमेर सरीखी उस खुली जगह से गुजरते हैं, जहाँ लामाओं की मुद्रा में मुंडन कराये कतारबद्ध उन पहाड़ों ने आसमान को तम्बू जैसा अपने मस्तकों पर टांग रखा है. 30 किमी लंबे इस तम्बू की वजह से ही इस पहाड़ में इतनी समतल जगह बन पाई है . आगे लेह में प्रवेश करते हुए हम ‘हाल आफ फेम’ देखने के लिए रुकते हैं. इसे देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि, शान्ति और सहिष्णुता की इस भूमि ने अपने आपको सुरक्षित रखने के लिये स्वातंत्रोत्तर इतिहास में भी काफी कुर्बानियां दी हैं.

शाम को लद्दाखी संस्कृति पर बात छिड़ जाती है. अंकल कहते हैं कि हमारी संस्कृति भारतीय और कश्मीरी संस्कृति से कम और तिब्बती संस्कृति से अधिक मेल खाती है भूगोल, पर्यावरण, जीवन, मृत्यु, धर्म, विवाह, संगीत, साहित्य, भाषा और लिपि आप जिस भी विधा में तुलना करें, इसकी  साम्यता तिब्बती संस्कृति से ही मिलती है. यहाँ फसलों का मौसम चार –पांच महीनों का ही होता है, जिसमे मुख्यतया गेंहू और जौ की फसलें उगाई जाती हैं. अर्थव्यस्था का आधार सेना, पर्यटन और सरकारी सब्सिडी पर ही टिका हुआ है. खेती और पशुपालन का आधार इसे थोडा मजबूत बनाता है, लेकिन इतना नहीं कि लद्दाख दुनिया के साथ कदम मिला सके.

लद्दाख के पिछडेपन में उसके भूगोल से अधिक उसकी उपेक्षा का योगदान है. आप शिक्षा को ही लीजिए. इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद की शिक्षा पलायन से ही संभव है . पूरे लद्दाख में केवल एक ही कालेज है , अब आप स्वयं तय कीजिये कि इतने बड़े क्षेत्रफल को वह कैसे उच्च शिक्षा प्रदान कर सकता है. हाल ही में की गयी विश्वविद्यालय की घोषणा भी कारगिल के खाते में चली गयी है. यहाँ न तो कोई इंजीनियरिंग कालेज है, और न ही मेडिकल कालेज . व्यावसायिक शिक्षा के नाम पर भी लद्दाख में नील बटा सन्नाटा ही है. ओह....! अंकल जब भी बोलते हैं, बात लद्दाख की बदहाली और उसके प्रति बरते गए भेदभाव की तरफ ही क्यों बढ़ जाती है ? उन्हें देखकर यह तय करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि वे अपने हाथों को किसलिए मल रहे हैं ? क्या यह सर्दी का एहसास है या लद्दाखी समाज की उपेक्षा का प्रतिबिम्ब ...?

वे पूछते है  “ऐसी स्थिति में चंडीगढ़ , जम्मू और दिल्ली भेजकर अपने बच्चे- बच्चियों को उच्च शिक्षा दिला सकने की क्षमता कितने लोगों के पास हो सकती है ?’ भला हो लद्दाख को जनजातीय दर्जा देने वाले दो दशक पुराने उस कानून का , जिसने पोलियो से ग्रसित हमारी पीढ़ियों को एक बैशाखी तो मुहैया करा दी .” क्या बात है ...? तो उन्होंने बच्चों को पढाने की संभावित कल्पना में भी श्रीनगर का नाम नहीं लिया .

अगली सुबह हम पैंगोंग झील की यात्रा के लिए निकलते हैं. 150 किमी की दूरी पर लेह से पूरब दिशा की ओर स्थित इस यात्रा का रास्ता एक घंटे तक आनंद लेने की इजाजत देता है, जब तक यह मनाली जाने वाली मुख्य सड़क के रूप में चलता है. लेकिन 30-40 किमी बाद जैसे ही मनाली का रास्ता हमें पूरब दिशा की ओर धकेलता हुआ दक्षिण की ओर निकल जाता है, हमारे पास उस पर आगे बढते हुए दम साध लेने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता है. एक बार जब चढाई शुरू होती है, तो फिर रुकने का नाम नहीं लेती . हम मैदानी लोगों के लिए पहाड़ी चढाई वैसे ही आफत बनकर आती है, लेकिन यह चढ़ाई तो किसी दु:स्वप्न से कम नहीं. गाड़ी में खाई की तरफ बैठा हुआ आदमी यह अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि यहाँ से फिसलने के बाद वह कहाँ जाकर टिकेगा . चढाई के साथ ही पहाड़ों का गंजापन दूर होने लगता है और उनके माथे पर दुधिया बर्फ की शक्ल में जुल्फें दिखाई देने लगती हैं.

इस रास्ते का सबसे ऊँचा ‘पास’ चांग-ला 17000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है. भारतीय सेना के कुछ छोटे-छोटे डब्बे नुमा घरों के अलावा यहाँ एक काफी शाप भी है. ड्राइवर राम्चोस यहाँ उतरने के पहले कुछ हिदायतें भी देता है. “ बहुत धीरे चलियेगा , साँस यहाँ बहुत उखडती है.” लद्दाख में चार दिन बिताने के बाद हम सांस उखडने का मतलब जानने लगे हैं. हम पूरी सावधानी बरतते हैं, लेकिन शून्य से पांच डिग्री नीचे के तापमान में 17000 फीट की ऊँचाई पर फेफड़ों में भरने लायक आक्सीजन जुटा पाना मुश्किल ही नहीं, वरन असंभव दिखाई जान पड़ता है. बर्फीली हवाए हमारे गरम कपड़ों का मजाक उड़ाती हुई लगातार आजू-बाजू से निकलती रहती हैं. काफी पीने का मजा इतना भी आ सकता है, पहली बार महसूस होता है. बस अखरता है तो यहाँ का रेट चार्ट. मेरे हिसाब से इसके रेट-चार्ट को कैफे-डे की कनाट-प्लेस स्थित दूकान से बदल देना चाहिए.

दूर, जितनी दूर निगाह जाती है , बर्फ की चादर ही दिखाई देती है. पेड़, पौधे, घास , झाड़ियाँ , जीव-जंतु किसी का भी अता-पता नहीं . इस दुधिया धरातल पर सड़क की शक्ल में कई किलोमीटर लंबा , काला सा सांप पड़ा है, जिसकी पीठ पर रेंगती हुई हमारी गाड़ी अक्साई चीन की तरफ बढ़ रही है. एक घंटे रेंगने के बाद वह सांप चौड़ा होकर घाटी में बदल जाता है, और तब पता चलता है कि लेह में रह रहे सैन्य बलों के जवान फिर भी भाग्यशाली हैं. हर दस पन्द्रह किलोमीटर बाद पड़ने वाली उन सैन्य चौकियों के मुकाबले तो काफी भाग्यशाली, जहाँ आदमियों को देखने के लिए उनकी आँखे तरसती रहती हैं . लगभग दो दशक पहले आम जनता के लिए खोली गयी इन जगहों पर जाने के लिए आज भी परमिट की आवश्यकता पड़ती है.

झील की झलक 10 किमी पहले से ही मिलने लगती है. हम उसके किनारे पहुचते है . और तब उत्साह में यह भूल ही जाते हैं, कि समतल दिखने वाले इन किनारों की ऊँचाई भी समुद्र तल से 13000 फीट की है. खैर लद्दाख में इस समझने के लिए किसी विशेषज्ञ का साथ होना जरुरी नहीं है. ठीक 100 मीटर की चहलकदमी आपको औकात में रहना सिखा देती है. दुर्गापूजा से कालीपूजा के बीच का समय होने के बावजूद सैलानी यहाँ बहुत कम हैं. भारतीय पर्यटन मानचित्र पर इस समय को बंगाली सीजन के नाम से जाना जाता है. असम से लेकर गुजरात तक और श्रीनगर से कन्याकुमारी –अंडमान तक लगभग हर साल इनसे हमारा सामना होता है. बंगालियों के लिए प्रसिद्द इस सीजन में घूमने के कई फायदे हैं. बच्चो की पढ़ाई अपने मध्यांतर में होती है, लगभग पूरे देश का मौसम खुशनुमा होता है और उससे बढ़कर एक दशक पुराना मेरा अनुभव यह बताता है, कि यह मौसम कम बजट वाले पर्यटकों के लिए सर्वाधिक मुफीद और उपयुक्त है. बंगाली भद्र जन मूल्यों को रियायत की निम्न संभव सीमा तक घटा चुका होता है, जिसमे आपको अतिरिक्त मेहनत की आवशयकता नहीं पड़ती.

हम झील के किनारे-किनारे टहलते हैं ,जहाँ के पहाड़ थोड़े शर्मीले हैं. उन्होंने पानी के इस विपुल भण्डार के लिए 150 किमी लम्बी और 2 से 8 किमी चौड़ी जगह छोड़ रखी है. अब यह अलग बात है कि खारे पानी की सर्वथा अनुपयुक्त उस झील पर भी हमने देश की लकीरें खींच दी हैं. लकीर के 45 किमी तक पश्चिम में भारत और उसके 100 किमी पूरब तक चीन का हिस्सा पड़ता है. दूर पहाड़ों को दिखाते हुए वहाँ गश्त में तैनात सेना के जवान चीन की सीमा के आरम्भ होने की बात बताते हैं . सवाल तुरत ही मन में कौंधता है “ जब यहाँ के बाद रास्ता समाप्त हो जाता है, तब सीमा रेखा की देखभाल कैसे होती है ..?” वे बताते हैं “ हमारी और उनकी छोटी छोटी टुकडियां हफ्ते-दो हफ्ते की पैदल चढाई के बाद अपनी सीमाओं को जांचती परखती रहती हैं .” मतलब कि रास्ते की सैन्य चौकियां इनके मुकाबले काफी भाग्यशाली हैं ....क्या बात है ..? तो जीवन की तरह भाग्य भी कुल मिलाकर आनुपातिक ही होती है.

झील का रंग पहाड़ों के अनुसार बदलता रहता है. सूरज की किरणें किनारों पर पड़ने वाले पहाड़ों के रंग को पानी के ऊपर चढ़ा देती हैं. और जब किरणें बादलों की ओट में सो रही होती हैं , तब पहाड़ भी अपने रंगों पर नींद की चादर डाल देते हैं. “ लेकिन रैन्चों ( फिल्म -3 इडीयट का नायक ) कहाँ खड़ा हुआ था ? और किस जगह पर खड़े होकर उसने यह व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था कि ‘चुम्बन’ करने के दौरान नाक बीच में नहीं आती ?” हमारी उत्कण्ठा का ख्याल रखते हुए हमारा ड्राईवर रामचोस गाड़ी को झील के किनारे-किनारे 8 किमी और आगे ले जाता है . वों हमें उस लम्बी, पतली सी जगह की तरह इशारा करते हुए उतार देता है . हर कोई आमिर और करीना की स्टाइल में अपना पोज देता है , कि तभी दूसरे दल के ड्राइवर की झल्लाहट हमारे कानों में गूंजती हैं.“ तंग आ गया हूँ इस सवाल को सुनते सुनते कि रैन्चों कहाँ खड़ा हुआ था. यह लद्दाख है, कोई दिल्ली- बम्बई नहीं, जहाँ खड़े होने की जगह भी इतनी महत्वपूर्ण होती है. रैन्चों खुद भी नहीं बता सकता कि वह कहाँ खड़ा हुआ था.” वह अपनी बात को समझा देने पर उतारू है . टूटी-फूटी हिंदी में उसका गुस्सा आखिर फूट ही पड़ता है “ लद्दाख में कोई रैन्चों नहीं रहता.” और फिर लद्दाखी में एक कहावत कहता है, जिसका अर्थ हमारा ड्राईवर बाद में हमें समझाता है. “ यह भूमि आदिकाल से पवित्र रही है, किसी के आने जाने से इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता.”

माहौल थोडा गंभीर हो जाता है. वापसी में हमारा ड्राईवर इस बात का खुलासा करता है कि “ यहाँ के स्थानीय लोगों का गुस्सा इस बात के कारण बढ़ जाता है, जिसमे किसी के आने-जाने से इस जगह की प्रसिद्धि को जोड़ा जाता है. हमारी हजारों साल की सभ्यता पर यह एक सवालिया निशान जैसा है, जिसमे हमारी कोई गलती नहीं. अब यदि शेष भारत हमें नेपाली और चीनी समझता है, याँ रैन्चो के कारण लेह को जानता पहचानता है, तो यह उसकी समझ-सीमा हो सकती है, जिसे हम क्यों सहन करें  

रात को लगता है कि हमने अगली सुबह ‘खारदुंग-ला’ टॉप पर जाने के लिए परमिट बनवाकर गलती ही
की है. इतनी थकान के बाद कल 18000 फीट की चढाई कैसे चढ़ी जा सकती है. लेकिन सुबह अपनी भूमिका को चरितार्थ करती हुई हमें ठोक पीटकर पुनः खड़ा कर देती है. हम लेह से निकलने वाले तीसरे सबसे महत्वपूर्ण रास्ते पर, जो कि उत्तर दिशा में जाता है, आगे बढते हैं. इसी सड़क पर दुनिया की सबसे ऊँची मोटर प्रयुक्त सड़क है. यह सड़क लद्दाख की प्रसिद्द नुव्रा घाटी होते हुए सियाचीन के आधार शिविर तक जाती है . हम जैसे ही लेह से 10 किमी आगे निकलते हैं , चढाई का दौर आरम्भ हो जाता है. और एक बार जब यह दौर आरम्भ हो जाता है, तो ऐसा लगता है कि ‘पैंगोंग झील’ जाते समय की चढाई फिर भी गनीमत वाली है. तीखे मोड़ और संकरे रास्तो के किनारे की खाईयां आपको जीवन से निर्लिप्त बना देती है. उन पर गुजरते हुए यह एहसास होने लगता है कि कल और उसके बाद की योजनाओं पर यहाँ से उतरने के बाद ही सोचना ठीक रहेगा . इस वक्त केवल और केवल वर्तमान ही हमारे साथ चल रहा होता है. भविष्य का महीन धागा तो किसी भी मोड़ पर हमसे छूट सकता है .

हम दिन के एक बजे खारदुंग-ला टॉप पर पहुचते हैं . हिदायते हमारे पास पड़ी हुई हैं. आधे घंटे से अधिक वहाँ नहीं रुकना है , हल्का गुनगुना पानी पीना है , केवल चहलकदमी करना है . बिलकुल...अब हिदायतों के बिना भी हम लोग यही करते रहते हैं  . इस भरी दोपहरी में भी सूरज पर ग्रहण लगा हुआ है . हम सेना के शिविर में पहुचते हैं . बर्फीली हवाएं अपने शबाब पर हैं. यहाँ लगा मापक यन्त्र तापमान को शून्य से 6 डिग्री नीचे बताता है. सेना के अधिकारी कहते हैं “यहाँ हर दूसरे व्यक्ति को आक्सीजन लेने की आवश्यकता पड़ती है. और वह भी तब , जब उसे आधे घंटे से कम ही रुकने की इजाजत है.”  ओह ... ! तो लोग खारदुंग-ला टॉप पर केवल आक्सीजन लेने के लिए ही आते हैं ..?  बाद में ऐसा लगता है कि वहाँ आधे घंटे रुकने की हिदायत लिखकर निरर्थक श्रम ही किया गया है. इससे अधिक रुकने की हिम्मत आखिर है भी कितने लोगों में ?

सियाचीन का आधार शिविर यहाँ से 184 किमी है. सेना के अधिकारी महोदय, जो कि एक डाक्टर हैं, बताते हैं कि, सियाचीन पर तैनाती से पहले प्रत्येक सैनिक को महीनों की अनुकूलन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. बिना उसके शून्य से सदा नीचे रहने वाले उस तापक्रम पर जीवन को दो-चार दिन भी नहीं चलाया जा सकता, चाहें उन्हें पहनने और ओढ़ने के लिए कितनी ही बेहतर सुविधाएँ क्यों न प्रदान की गयी हों. 18400 फीट की ऊँचाई वाला यह रास्ता अपनी दुर्गमता के लिए तो कुख्यात है ही, दिल और रक्तचाप के मरीजों के लिए किसी शामत से कम नहीं. अक्टूबर में पड़ी ताजा बर्फ इस बात की गवाही देती है कि आने वाली सर्दियों में यहाँ क्या होने वाला है. हाँ.....यहाँ आने वाला कोई भी ड्राईवर अपने यात्रियों को नहीं खोजता, वरन यात्री ही उस ड्राइवर को खोजते और कोसते हैं, कि इसे यहाँ इसे चाय पीने की तलब क्यों पड़ी है. उन्हें लगता है कि पांच मिनट और रुकने के लिए फेफड़े में कम से 100 सांसे और भरनी होंगी, और इधर ठीक अगली सांस के लाले पड़े हुए हैं.

जैसे – जैसे हमारी गाड़ी वापस नीचे उतरने लगती है , भविष्य की योजनाओं को भी हमारे भीतर उतरने के लिए सीढ़ी मिलती जाती है . उन योजनाओं को , जो अभी तक हमारी साँसों के साथ ‘खारदुंग-ला’ टॉप पर अटकी हुई थी . हम होटल में लौटते हैं , जहाँ संकेतों की भाषा में एक दूसरे से बात होती है कि यदि नींद खुली तो रात का खाना खायेंगे , अन्यथा सुबह इसके बारे में सोचेंगे , कि खाना खाने की जीवन में कितनी भूमिका होती है . बिस्तर पर पड़ते ही कम्बल, शरीर के लिए स्वीच की भूमिका निभाता है , कि जिसको ओढते ही हमारी सारी हलचलें बंद हो जाती हैं. सिवाय धडकनों के .

अगली दिन लेह शहर को देखने का इरादा मन में आता है . इस आराम वाली सुबह के बाद दोपहर में  उसके मुख्य बाजार में पहुचता हूँ . सिहरन भरी ठण्ड के बीच की गुनगुनी धूप में भी बाजार खाली पड़ा हुआ है. यहाँ जैसे-जैसे सूरज घाटियों में उतरता जाता है , खालीपन भी सूनेपन में बदलता जाता है . ‘ तो आखिर यह भरता कब है ..?’  ओह ...!  इस प्रश्न का उत्तर प्रश्नकर्ता के मन मिजाज पर निर्भर करता है. यदि उसके पास दरियागंज, कनाट प्लेस , चौपाटी और धर्मतल्ला वाला मापक यन्त्र है, तब तो यह उन जगहों की मध्य रात्रि जैसा भी कभी नहीं भरता. इस शहर के भरने का अपना अलग ही पैमाना है. जुलाई और अगस्त के महीनों में जब यहाँ पर्यटक आते हैं , तब यह थोडा भरा दिखाई देता है, अन्यथा अक्टूबर के इस महीने में बाजार के इस मुख्य मुहाने पर बैठकर आप अपने छोटे बेटे-बेटी के साथ वही खेल खेल सकते हैं , जिसे बचपन में हम अपने गाँव कस्बे की सड़क के किनारे बैठकर खेला करते थे . बाएं से आने वाली गाड़ी हमारी और दायें से आने वाली तुम्हारी . हाँ....लेह के इस मुख्य बाजार में गाड़ियों के साथ-साथ आप आदमियों को भी जोड़ सकते हैं .

सबके चलने का अंदाज यहाँ जाना पहचाना है. आप बिना चेहरे को देखे दूर से ही यह जान सकते हैं, कि यह आदमी लद्दाखी है, या बाहर से आया हुआ कोई पर्यटक . लद्दाखी व्यक्ति अपनी धीमी रफ़्तार में आगे की तरफ झुका हुआ लगातार बढ़ता दिखाई देता है, जबकि बाहरी पर्यटक आदमी दस तेज कदम चलने के बाद कमर पर दोनों हाथ रखकर कुत्तों से प्रतियोगिता करता हुआ नजर आता है. पूरे लेह शहर को एक घंटे में पैदल घूमा जा सकता है, बशर्ते आपके पीठ पर आक्सीजन का सिलिंडर बंधा हुआ हो. अन्यथा लेह देखने का वह तरीका तो सबको पता है, जिसमे उसके पैलेस तक गाड़ी के सहारे पहुंचकर शहर का नजारा लिया जा सकता है. इस पैलेस को लेह की छत भी कहा जाता है, जहाँ से यह पूरा शहर उसके आँगन में दिखाई देता है.

बाजार के मुख्य मुहाने पर फैयाज की दही की दूकान है. उन्हें देखकर ही बताया जा सकता है, कि वे  कश्मीरी हैं. इतनी स्वादिष्ट दही, याद नहीं आता कि पिछली दफा हमने कब खाई थी. हमारा पूरा दल उसे खाकर मुग्ध है, कि तभी हमारे मित्र के दिमाग में यह ख्याल कौंधता है. ‘यह दही किसकी है ..?’ ‘बस’ ..मैं बोलता हूँ ...’भगवान के लिए शुभ-शुभ बोलो’ ....

हमारे मेजबान से रात में यह सूचना मिलती है कि कल सुबह 11 बजे जाने वाली किंगफिशर की हमारी उड़ान रद्द हो गयी है. इसकी एक और सेवा,जो सुबह 6 बजे दिल्ली के लिए जाती है, को अब हमें पकड़ना पड़ेगा. तो देश में फंसा हुआ ‘विजय माल्या’ का पेंच, हमारी यात्रा में अभी बाक़ी ही है. हमें चार बजे होटल से निकलना होगा. मेरे दोस्त कहते हैं कि चूकि दिल्ली में काफी गर्मी होगी, इसलिए उनी इनर और लोअर को बैग में रख लेना ठीक होगा. एक स्वेटर या जैकेट के सहारे हम एअरपोर्ट तक पहुच जायेंगे, और एक बार विमान में बैठ जाने के बाद तो फिर इस ठण्ड को आसानी से मुँह चिढा सकेंगे. लेकिन सुबह पता चलता है कि  लेह को पहचानने में हमसे फिर गलती हो गयी. सुबह के चार बजे शून्य से 4 डिग्री नीचे के तापमान में होटल से एअरपोर्ट तक पहुचने में लगी ठण्ड, हमारे यहाँ के जाड़े के पूरे मौसम में लगी ठण्ड पर इक्कीस ही बैठेगी. अब यह दिल्ली में उतरकर तय किया जाएगा, कि कहीं हमने अधिक कपडा तो नहीं पहन लिया था.

जमीन से उठने के बाद विमान कुछ देर तक हवा में कलाबाजिया खाता है. करीब 15 मिनट बाद हम यह महसूस करते हैं, कि पिछले 10 दिनों से हम किसी आसमान में नहीं, वरन जमीन के एक टुकड़े पर ही विचरण कर रहे थे. तो लद्दाख भी आसमान से धरती जैसा ही दिखाई देता है. पीछे हिम आच्छादित चोटियां  मन में हूक पैदा करती रहती हैं , कि जीवन में इन्हें दोबारा देखने का अवसर मिलेगा या नहीं . अलविदा लद्दाख ..... ....यदि जीवन ने अवसर दिया तो फिर मिलेंगे ....
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रामजी तिवारी
02-05-1971,बलिया , .प्र.
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख , कहानियां ,कवितायें , संस्मरण और समीक्षाएं प्रकाशित
पुस्तक प्रकाशन - आस्कर अवार्ड्स – ‘यह कठपुतली कौन नचावे
सिताब-दियारानामक ब्लाग का सञ्चालन
भारतीय जीवन बीमा निगम में कार्यरत
मो.. – 09450546312