सहजि सहजि गुन रमैं : अनिरुद्ध उमट

Posted by arun dev on जून 10, 2013


Death-and-Life-gustav-klimt

अनिरुद्ध उमट की कुछ कविताएँ



(ये कविताए उन मित्रो के लिये जिन्हे मैने बहुत दुख दिया...जो अब मुझे सोने नही देते)




१. वह कोई चट्टान नही

वह कोई चट्टान नही
जमीन से हवा मे
लटकती

अपने चेहरे से
छिटकी

जीभ है शायद

उसकी सीली अँधेरी
छाया मे
अंतिम यात्रा के
उकेरे चित्र
मृतक ने

या उस दुनिया के

वह कोई चट्टान नही
हथेली है किसी की
करती छाया

सोया है
थक अभी
चित्रकार

छाती लगा इसे
सपने मे वह
रोयेगा
दहाड मार.


२.धब्बा

दूर तक जाओ तो
सभी घाव
रेत से घर बदलते

बहुत पास देखे तो

अपना आईना
चेहरा से
धब्बे मे बदल
होता चकनाचूर्.


३.क़ितना-कितना

मेरी देह पर कितने शाप
कितने अधूरे स्वप्नो लकी थिगलियाँ
कितने रूदन
कितने मरण की छाया

मुझे ईश्वर चाहता बहुत
उस पर की हर काली छाया
मुझमे जगह पाती
इसीलिये मेरी प्रार्थना मे देहराग
इसीलिये मौन मे मेरे
मृत मुसकान

ईश्वर के चेहरे पर की आभा
मेरी चाकरी का हुनर.




४.

दरवाजे से गुजरता
आदमी
गुजर गया

छाया मगर
दहलीज पर
मृत देह सी
जमी रही

रात आहिस्ता से
दरवाजा
छाया हो गया

दोनो आलिंगनबद्ध
सुबकने लगे
मुस्कुराते

काँपता रहा
चले गये का सूना धब्बा.






५..
आँगन मे बैठा आदमी
लेटा हुआ आँगन हो गया

उसकी नीद मे मृत्यु
बस गयी निर्वसना

मै आया
उसकी बगल मे लेट गया
नही बदली
करवट किसी ने
रात भर

सुबह लेटा आदमी उठा
और राख हो गया
उस राख मे मै
ठँडे अँगारे सा
धधकता-काँपता रहा.





.
लोटा डाला
जिसमें मटकी मे तुमने
प्यास ठीक वहाँ
जल नही

भार से जिसके
लोटा और मटकी
पृथ्वी पर
संतुलन खोने लगे.

दूर सूखे पेड पर से
एक कौव्वा आया
चौंच डालने लगा मटकी मे

पुकारा हो जैसे किसी ने
वह आकाश छोड
भीतर उतर गया.






७.
मेरी छाया
विलाप मे अपने
अदृश्य इतनी

जैसे देह मे मृत्यु

रात टपकता आँसू
लाल आँख से

हड्डियो के ढेर से कामना उठती
और गरदन नीची किये
फिरकी सी
घूमने लगती

तब पृथ्वी थम जाती.






.
कागज पर किसी की हथेली
जिस पर गिलहरी की भागती
साँसो का कारवाँ

लिखने से हर बार छूट छूट जाता
लिखा जाना था जो
अनिवार्यत:

किसी रात कागज पर हथेली नही
पाया जाता चाँद
ढूँढूता लुप्त होती इबारत.





९.
शफ्फाफ नीली आकाश मे
धँसा दिया
चेहरा

उधर भी था चेहरा एक
अन्तहीन प्रतीक्षा मे
उसने भी
देखा होगा तभी कोई
ऐसा ही आकाश

अब दोनो चेहरे
डूबते
धँसते
फफकने लगे.

१०.किस्से

एक औरत के मरने पर
रो रही
बाकी रह गई औरते

इस रोने से ऊबी उनकी बेटियाँ
हँस रही रंगीन किस्सो के
दुखांत पर

किस्से इतने पसर गये
उनमे न मृत्यु न दुख
बैठ
कर पा रहे थे
हिसाब किताब एक दूसरे से.




११.
रक्त कणो मे
आवाज वह
सन्ध्या के नीलेपन सी घुली.

बहुत तप्त...उफनती

आवाज मे मेरी
फूट रहा
नीला लहराता

सफेद पक्षियो की उडान मे
वह गान बन
सूक्ष्म होता
अक्षुण्ण हो गया

कोई छल था
ईश्वर को जो
उकसा रहा था धरती पर आने को




१२..
औचक पकडा गया

हवा मे
छूटे पँख सा
गूँगे कँठ मे
पुकार सा
धडकनो के टूटे
तार सा-

मेरी कैद रिहाई मे
घोल दी गयी

काल कोठरी मे
उजास सा
धकियाया गया
जहाँ घट्टी के पाट
गले मे ताबीज बन
बुदबुदाने लगे

मेरी सेहत मे एक कीडा

डरा रहा था

बर्फ बन

लापता हो रहा था
एक दोस्त बाहर मुलाकात के लिये.
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अनिरुद्ध उमट की कुछ कविताएँ यहाँ भी पढ़ी जा सकती हैं.