कथा - गाथा : शायक आलोक - ९ किस्सें

Posted by arun dev on अगस्त 02, 2013

























शायक अपनी रचनाधर्मिता से विस्मित करते रहते हैं. ये किस्सें लोककथा शैली में हैं और इनका देश-काल वैश्विक है, ये हमारे अपने समय में भी गहरे धंस कर लिखे गयें हैं. लोकथाओं का जादुई यथार्थ जहाँ सम्मोहक प्रभाव डालता है वहीं समकालीन विमर्शों की समझ से इन कथाओं की परिणति शायक के एक सचेत कथाकार होने  का पता देती हैं. इन सभी कथाओं के केंद्र में स्त्रियाँ हैं अपनी सम्पूर्णता के साथ.     

शायक आलोक : ९ किस्से                          
1.
मोम्बी अकाहारा

मोम्बी अकाहारा उस छोटे से गाँव में रहती थी जहाँ बारिश बहुत कम होती थी. बचपन से पानी बचाने में हुनरमंद मोम्बी एक एक बूँद सोचकर खर्च करती. जब उसे खूब प्यास लगती वह अपना मन उस बड़े से पानी के जहाज पर भेज देती जहाँ उसका प्रेमी उसे याद करते हुए बारिशों के गीत गाया करता था. एक बार उस गाँव में खूब बारिश हुई. पानी से सभी तालाब-गड्ढे- कुएं पूरी तरह भर गए. मोम्बी बहुत खुश हुई. उसने इतना पानी कभी नहीं देखा था. मोम्बी पानी के साथ अपने सपने धोने-पोंछने-साफ़ करने लगी. मोम्बी ने प्रेमी को ख़त लिखा- ''लौट आओ कि अब खूब पानी है अपने गाँव में, लौट आओ कि पानी से तुम्हारा इश्क यहाँ भी परवान पायेगा, लौट लाओ कि अंजुरी में पानी लिए मैं इन्तजार करती हूँ तुम्हारा सुबह-शाम. '' .... ख़त पाकर उसका प्रेमी बहुत खुश हुआ और लौटने की राह तकने लगा . उस बड़े पानी के जहाज के लौटने में थोड़ा वक़्त लगा. बारिश का मौसम गुजर गया और उस छोटे से गाँव में फिर पानी की कमी हो गयी. गाँव लौटे उसके प्रेमी ने पानी नहीं पाकर मोम्बी पर नाराजगी दिखाई. मोम्बी ने आसमान को देखकर खूब आंसू बहाए फिर भी बारिश नहीं हुई. थोडा वक़्त गुजरकर मोम्बी का प्रेमी फिर अपने जहाज पर लौट गया. बचपन से पानी बचाने में हुनरमंद मोम्बी ने उस रोज इतने आंसू बहाए कि उसकी आँखों की आखिरी बूँद भी ख़त्म हो गयी. उस दिन से मोम्बी ने पानी की परवाह छोड़ दी. उस दिन से मोम्बी ने प्रेमी की परवाह छोड़ दी. और उसी दिन पानी बचाने में हुनरमंद मोम्बी आंसू बचाना सीख गई.

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2.
वोल्गा
वोल्गा के किनारे के उस छोटे गाँव से जब वह लडकी भागी तब उसके जन्म पर उसके कसाई पिता द्वारा रोपा गया तिकोने पत्ते वाला पेड़ सत्रह साल का था. कहते हैं उस रात खूब बर्फ पड़ी थी और घर से बाहर को जाते उसके पैरों के निशान क्षण में मिट गए. उसके पिता ने उसकी प्लास्टिक की गुडिया को उसी तिकोने पत्ते वाले पेड़ की एक डाल से नायलोन की रस्सी से जोर से बाँध दिया और उसे भुला दिया. फिर बरस बीत गए. सत्रह साल की वह लड़की सात साल की अपनी बेटी के साथ वापस लौटी. पिता का घर अब भी वहीं था पर पिता नहीं थे. पिता को याद कर उसने खूब आंसू बहाए. पिता का वह तिकोने पत्ते वाला पेड़ भी अपनी जगह नहीं था. उसने उस पेड़ के लिए भी आंसू बहाए. उसके आंसूओं से बर्फमें सूराख बन गया जहाँ उसे अपनी प्लास्टिक की गुडिया मिली. गुडिया की पीठ प्लास्टिक के धागों से सिली थी. पीठ खोलने पर उसे एक पत्र मिला. '' इरीना स्लालोवा, मेरी प्यारी बेटी.. उस रोज तुम्हें पेड़ से बाँध कर मैंने सजा दी थी और फिर तुम्हें माफ़ कर दिया. तुम्हारा घर में नही होना ऐसा ही है जैसे रसोई में सुबह शाम तुम्हारे लिए गोश्त पकाते रसोई की खिड़की से मेरे प्यारे तिकोने पत्ते वाले पेड़ का न दिखना. यह पीड़ा मुझे यहाँ रहने नही देगी. अपना प्यारा पेड़ लिए जा रहा हूँ, तुम्हारी प्यारी गुडिया यहाँ रख छोड़ी है. '' ... कहते हैं उस रात फिर खूब बर्फ पड़ी और घर को लौटे उसके पैरों के निशान क्षण में मिट गए."
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3.
राख
प्रेम के कुछेक साल बाद दोनों ने शादी कर ली और फिर शादी के भी कुछेक साल गुजर गए .. प्रेमिका के जिन शब्दों पर प्रेमी मर मर जाता था उन्ही शब्दों पर पति को चिढ़ होती .. रिश्ते की तासीर पर उब की ठंडी राख जमने लगी थी .. गहरी और गहरी .. रोज ब रोज ..
उन्ही दिनों वह पत्नी गाँव के मूर्तिकार के पास पहुंची और उसे कहा कि उसके उन प्रेम के शब्दों को तराश दे ताकि पुराने पड़े शब्दों से उसके पति की वह उब समाप्त हो जाय .. वह अक्सर मूर्तिकार के पास जाने लगी और अपने शब्द तराशने लगी ..
एक दोपहर उसके पति ने यह जान लिया .. उस दोपहर पत्नी घर लौटी तो उसके उन्ही प्रेम के शब्दों पर पति मर मर गया .. जमी राख के बीच फिर कुछ सुलगने लगा था ..

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पेंटिग : Jumaldi Alfi

4.
लागुन्या
रेत वाले पहाड़ी गाँव की लागुन्या नामक ब्याहता स्त्री ने अपने मन में एक प्रेमी को चुना और उसे खूब प्रेम करने लगी .. वह उसे खूब प्रेम करती .. इतना प्रेम जितना प्रेम वह अपने पति से चाहती थी पर बरस दर बरस इन्तजार पर भी पति ने नहीं दिया .. तो उसने अपने मन में एक प्रेयस चुना और उसे खूब प्रेम करने लगी .. लागुन्या ने उसे इतना मन का प्रेम दिया कि एक दिन वह मन का प्रेयस मन से बाहर आ उसके सामने खड़ा हो गया .. उसने पहले तो लागुन्या को उसके अगाध प्रेम के लिए शुक्रिया कहा और फिर उससे बदले के अगाध प्रेम का वादा किया .. लागुन्या रोज छुपकर उससे मिलने जाती और उसे मन का खूब प्रेम देती .. मन के इन्हीं प्रेम के दिनों में एक दिन प्रेयस ने तन के प्रेम की इच्छा प्रकट की .. लागुन्या का स्त्रीबोध इस तन के प्रेम को तैयार नहीं हुआ ..लागुन्या ने उसे बहुत समझाया पर प्रेयस नहीं माना .. तन के प्रेम के सवाल पर प्रायः गुस्सा होने वाला पुरुष इस प्रेयस में जग आया था .. उसने लागुन्या को बुरे शब्द कहे .. लागुन्या घर लौटी तो खूब रोई .. लागुन्या के आंसुओं में उसका मन का प्रेम भी बह गया .. जैसे जैसे लागुन्या के मन का प्रेम बहता गया उस प्रेयस की सांसें घुटती गयीं .. वह मर गया .. मन के प्रेम से जिंदा हुआ प्रेयस मन के प्रेम के ख़त्म होने पर मर गया .. इस अपराधबोध में धीरे धीरे घुलकर लागुन्या भी मर गयी ..
लागुन्या के बाद की दुनिया की बाकी स्त्रियों ने उस दिन से अपने मन में किसी प्रेयस को इतना प्रेम नहीं किया कि वह जिंदा हो जाय ..
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5.
पंख
एक बार पोलैंड के एक किसी गाँव में एक ऐसी लड़की पैदा हुई जिसकी पीठ पर परियों की तरह दो पंख थे. वह लड़की जबतक जवान हुई तब तक रोज उसके घर के आगे उसे देखने के लिए मेला लगा रहता. जब लड़की ब्याह लायक हुई तो पिता को चिंता हुई. उस लड़की के पंख को देख कोई लड़का उससे ब्याह को राजी न होता. परियों वाले पंख उस लड़की के लिए अभिशाप हो गए. तो एक रोज उसके पिता ने उसके पंख काट दिए और जैसे तैसे उसका ब्याह करा दिया. उसका पति उसे खूब प्रताड़ित करता. वह छुपकर खूब रोती. वह रोज पिता को एक चिट्ठी लिखती. चिट्ठी में बस एक ही बात लिखती. ''पिता, पंख भिजवा दो. ''..पिता ने वे पंख तो जाने कहाँ फेंक दिए थे. लड़की रोज ख़त लिखती, पिता कभी जवाब नहीं देते. कहते हैं बीस बरस बाद जब तक वह दो बच्चों की माँ बन गयी थी, उसके कटे पंख फिर पूरी तरह से उग आये. एक रोज वह उड़ गयी. वह कहीं दूर उड़ गयी. उसे उड़ते किसी ने नहीं देखा पर वह दोनों बच्चो को साथ लेकर उड़ गयी. एक औरत के आज़ाद होकर उड़ जाने की वह पहली घटना थी.

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6.
सिनात्रा रोजवरी

वह हरे जंगल वाला गाँव उस समुद्र-द्वीप के तीन गाँवों में से एक था जो दक्षिण सागर के उत्तरी किनारे पर बसे थे . इसी गाँव में सिनात्रा रोजवरी नाम की वह ब्याहता स्त्री रहती थी जो सुन्दर ख़त लिखती थी . रोज देर शाम सिनात्रा का शिकारी पति जब थका हारा मछलियाँ -गिलहरियाँ- खरगोश लिए घर लौटता तो सिनात्रा अपनी मधुर आवाज़ में उसे एक पत्र पढ़कर सुनाती और वह अपनी सारी थकान भूल प्रेम से भर जाता . इन खतों में बारिशों की बात होती ... मछलियों के गंध की कहानी होती .. भुने जाने से ठीक पहले खरगोश ने सिनात्रा से क्या कहा उसका किस्सा होता .. कभी किसी ख़त में सिनात्रा के भीतर बसे प्रेयसी की प्रेम पाने की आकुलता इतने सुन्दर शब्दों में व्यक्त होती कि उसके पति का गला रुंध जाता तो कभी सिनात्रा का पति के लिए प्रकट प्रेम उसके पति को इतना व्याकुल कर जाता कि वह सिनात्रा को बेतहाशा चूमने लगता .. दो तीन चार बरस बीत गए और सिनात्रा यूँही रोज एक ख़त लिखती रही ..
वह एक बारिश का दिन था जब शिकारी जंगल की ख़ाक छानता रहा पर उसे एक भी शिकार नहीं मिला .. समंदर में मछलियाँ खुद को बारिश से बचाने कहीं दूर गहराई में जाकर छुप गयीं .. इधर उधर फिरते थके हारे शिकारी ने एक क्षण आराम करने की सोची और वहीं समंदर किनारे नारियल के ऊँचे पेड़ों तले एक बड़े पत्थर की टेक लिए पीठ सटा बैठ गया और बारिश के थमने का इंतजार करने लगा .. किसी ख़ुर्र-पूर्र ध्वनि पर शिकारी ने उस बड़े पत्थर के नीचे झाँक कर देखा तो उसे एक कपडे की पोटली नजर आई .. असंख्य चीटियाँ इस पोटली के ऊपर घात लगाए जैसे किसी मीठास को चख रहीं थीं .. शिकारी ने पोटली बाहर निकाल जब उसे खोला तो उसे ढेर सारे ख़त मिले .. ये सिनात्रा के ख़त थे जो किसी काल्पनिक प्रेयस को लिखे गए थे .. इन खतों में इतना प्रेम था जो शिकारी को सिनात्रा से कभी नहीं मिला .. उसे बहुत निराशा हुई .. उसने खतों को पानी में बहा दिया और खाली हाथ घर लौट आया .. घर लौटे पति को प्रेम से सिनात्रा ने उस दिन भी उस दिन की चिट्ठी पढ़ कर सुनाई ... थके हारे शिकारी ने सिनात्रा को टूट कर प्रेम किया और फिर सो गया ..
अगली शाम तीनों गाँवों में शोर रहा कि पति द्वारा सिनात्रा के ख़त पानी में बहा दिए जाने से उदास हुई सिनात्रा ने समंदर किनारे के बड़े पत्थर के पास अपनी जान दे दी ... शोर रहा कि सिनात्रा के बरसों बरस के ख़त सीने से लगाए शिकारी को समंदर में बहते हुए देखा गया .. शोर हुआ कि दक्षिण सागर के उत्तरी तट पर पहली बार वे रंग बिरंगी मछलियों पाई गयीं जो कागज खाने आईं थीं ..
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7.
मंदिरा / मल्हार

मंदिरा ने प्रेमी को ख़त लिखा- '' मैं छोटी बहु हूँ यहाँ की. मेरी सास मेरी माँ से ज्यादा प्यार करती है मुझसे. मेरे जेठ मुझे करते हैं मेरे बड़े भाई से ज्यादा प्रेम. मेरी ननद मेरी सगी बहन सी चाहती है मुझे. पर मेरे पति नहीं कर पाते मुकाबला तुमसे.. कि अब भी तुम रहते हो जेहन में. कि तुम्हें करती हूँ याद 'मल्हार' अपनी हथेलियों में पानी भर हमेशा मेरे उबासी चेहरे को भिंगोते हुए. '' ... मल्हार ने चिट्ठी पढ़ी. बार बार. चौथी बार पढने के बाद चिट्ठी को फाड़ कर फटी चिट्ठियों के लिए निर्धारित डब्बे में रख दिया. एक मुट्ठी मिट्टी रख दिया उसके ऊपर. कोई जवाबी ख़त न लिखा. डेढ़ साल बीत गए. मंदिरा ने फिर प्रेमी को ख़त लिखा- '' एक छोटी परी की माँ बन गयी हूँ मल्हार. उसकी रंगत मेरे जैसी है. उसकी बरौनियाँ तुम पर गयी हैं. मुस्कुराती है तुम्हारी तरह.. याद करती हूँ तुम्हें. कि अब भी तुम रहते हो जेहन में. '' ... मल्हार ने चिट्ठी पढ़ी. बार बार बस पढता रहा. चिट्ठी फाड़ी और उसी निर्धारित डब्बे में रख दिया. एक मुट्ठी मिट्टी फिर रख दी उसके ऊपर. फिर कोई जवाबी चिट्ठी नहीं लिखी. पांच साल बाद मंदिरा मायके लौटी. शिकायतें लिए मल्हार के घर पहुंची. दरवाजा एक सुन्दर स्त्री ने खोला. मंदिरा को मल्हार के पास छोड़ आँगन में चली गयी. मल्हार को देखते मंदिरा बिफर पड़ी - '' एक ख़त तक न लिखा तुमने मल्हार..एक आवाज़ तक न दी मुझे.. कि अब भी तुम रहते हो जेहन में .''... मल्हार कुछ देर अपलक मंदिरा को देखता रहा. आँगन में गेहूं सुखा रही सुन्दर स्त्री की और इशारा कर कहा- ''नंदिनी से मेरा विवाह हुआ तुम्हारे विवाह के कुछ ही हफ़्तों बाद. नंदिनी का प्रेमी ख़त लिखता है उसे . उसे पुकारता है. उसके लौट आने की प्रार्थनाएं करता है. नंदिनी एक डब्बे में उसकी चिट्ठियां फाड़ कर रख देती है और उसपर एक मुट्ठी रेत डाल देती है. कभी जवाब नहीं लिखती. कभी उदास नहीं दिखती. मैं भी तुम्हारी चिट्ठियां फाड़ के एक डब्बे में रख देता हूँ और उसपर एक मुट्ठी मिट्टी डाल देता हूँ. ''... मंदिरा सिसक पड़ी -'' और यह रेत और मिट्टी मल्हार ? ''.... '' मंदिरा, विवाह के बाद स्त्री अपने विवाह पूर्व प्रेम पर रेत ही तो डालती है और पुरुष उसपर मिट्टी डाले पनपने की संभावना को बनाये रख अपने विवाह की भी रक्षा कर लेता है और अपने पुरुष अहम् को भी बचाए रखता है. '' .... मंदिरा मायके से ससुराल लौटी तो उसने मल्हार के लिए अपने प्रेम पर रेत डाल दिया था, पति के प्रेम की मिट्टी में उसने एक बिरवा रोप दिया.

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8.
इरीना किजुक 

इरीना किजुक तब नौ साल की थी जब एक रोज उसके पिता इस गाँव से दूसरे गाँव को गए तो फिर वापस नहीं लौटे. हमेशा चुप रहने वाली अपनी माँ और रेंग कर चलने वाले अपने भाई के लिए इरिना वक़्त से पहले बड़ी हो गयी और घर के वे सारे काम करने लगी जो काम पिता किया करते. १२ साल की इरिना जब बर्फ में आधी धंसी लकड़ी काट रही होती तो पिता की तरह भारी आवाज़ में वही लोक गीत गाती जो पिता गाते थे - '' लौट आऊंगा एक दिन बर्फ की नदी से..रोज सुनता हूँ तुम बुलाती हो मुझे ''.. इरिना जब खूब उदास होती तो ऊपरी मंजिल पर के पिता की बैठक में चली जाती.. खिड़कियाँ खोल बर्फ को अन्दर आने देती .. चिल्ला चिल्ला के हवाओं से कहती - ''कहो पिता से कि लौट आयें'' .. इरिना तब सत्रह साल की थी जब हमेशा चुप रहने वाली उसकी माँ चल बसी. इरिना और उसका अपाहिज भाई अकेले रह गए. उन्ही अकेले दिनों की बात है जब एक रोज उसे पिता की चिट्ठी मिली- '' प्यारी बेटी इरिना, बहुत कुछ अनुत्तरित है पर जब पाओगी यह ख़त तब तक मैं फिर जा चुका होऊंगा. ख़त पर पता लिखा है. इरिना तुम्हारे इन्तजार में होगी. '' ठीक ठीक कहा नहीं जा सकता कि ख़त पढ़कर इरिना खुश हुई थी या उदास हुई थी. हाँ, पर उसकी आँखों में आंसू थे. ख़त के पते पर इरिना को एक हमउम्र सुन्दर लड़की मिली. उसकी आँखें बिल्कुल पिता की आँखों सी थी. उसका भी नाम इरिना किजुक था. तेज बर्फ गिरने के उस दिन दोनों लडकियां देर तक ठंडी गर्म होती लकडियाँ तापती रहीं. इरिना किजुक के पिता जिस दिन घर छोड़ कर गए थे उसी दिन इरिना किजुक के पिता घर लौटे थे. नौ साल की एक लड़की ने उस दिन के बाद कभी अपने पिता को नहीं देखा तो नौ साल की एक दूसरी लड़की ने पहली बार अपने पिता को देखा. उस इरिना के पिता नौ साल बाद तब लौटे थे जब उसकी माँ चल बसी थी.
तेज बर्फ गिरने के अगले दिन जब दोनों लडकियां साथ चलती उस अपाहिज भाई के पास लौट रहीं थीं तो इरिना ने पिता बन इरिना का हाथ थाम रखा था और इरिना ने माँ बन इरिना का. आँखों में आंसू भरे दोनों हुमक कर गा रहीं थीं- '' लौट आऊंगा एक दिन बर्फ की नदी से..रोज सुनता हूँ तुम बुलाती हो मुझे ''

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9.
अकिहितो/रोम्पुई
पूर्वी समंदर के किनारे बसे उस बंदरगाह शहर में रोम्पुई नाम की एक लड़की एक रोज पानी में बहकर आई. पहले तो उसे समंदर का ईनाम समझा गया और उस बंदरगाह शहर के सबसे बहादुर जहाजी अकिहितो ने उसपर दावा भी ठोंक दिया. लेकिन जल्द ही तय यह भी हो गया कि रोम्पुई की सुन्दरता और अकिहितो की बहादुरी में जीत रोम्पुई की होनी है. रोम्पुई की भाषा उस द्वीप की भाषा थी जिसके किस्से तो सुने थे अकिहितो ने पर उस द्वीप के अनुसंधान का साहस नहीं था उसमे. रोम्पुई को उस शहर के व्यापारी शासक की पनाह में रखा गया. रोम्पुई अक्सर चुप ही रहती और हाथ के इशारे से ही संवाद कर पाती. राजा के पनाहगाह में दो बरस बसर के बाद रोम्पुई के विवाह के लिए स्वयंवर का विचार किया गया. शर्त यह रखी गयी कि जो व्यक्ति रोम्पुई से उसकी भाषा में बात करेगा वही रोम्पुई का वरण करेगा. बहुत से जहाजी आये जिन्होंने कई अज्ञात भाषाओं के इस्तेमाल से रोम्पुई से संवाद की कोशिश की किन्तु रोम्पुई जवाब न दे सकी. इन दो वर्षों में भी रोम्पुई का ख्याल अपने मन से नहीं निकाल सके अकिहितो की जब बारी आई तो पहले तो अकिहितो रोम्पुई की आँखों में झांकता रहा और फिर उसने तीन शब्द कहे - '' सेमतु है मप्रे'' .. रोम्पुई चुप ही थी तब तक अकिहितो की आँखों में झांकती हुई. अकिहितो ने फिर दुहराया - '' सेमतु है मप्रे'' .. रोम्पुई अब भी चुप रही. अकिहितो हार गया. राजा के सैनिक उसे खींचकर हटाने लगे. आंसू भरी आँखों वाला अकिहितो फिर जोर से चिल्लाया - '' सेमतु है मप्रे''.. और लौट कर जाने लगा. रोम्पुई अचानक अकिहितो के शब्द दुहराने लगी.. बार बार लगातार.. लोगों में उत्तेजना फ़ैल गयी. फिर तो बस रोम्पुई की आँखों में झांकता अकिहितो बस वह अनजानी भाषा बोलता ही चला और अकिहितो की आँखों में उतरती रोम्पुई उसका जवाब देती चली गयी. अकिहितो जीत गया और उसका रोम्पुई से विवाह हो गया. यह जीत आँखों की भाषा की जीत थी वरना अकिहितो ने तो बस अपनी ही भाषा के शब्द के अक्षर उल्टे कर दिए थे. कहते हैं कि आज भी उस शहर में आँखों के रास्ते होने वाले प्रेम के पहले संवाद को 'अकिहितो' और प्रेयसी द्वारा प्रेम निवेदन की स्वीकारोक्ति को 'रोम्पुई' कहा जाता है.
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