समकाल : आपदा में उत्तराखंड

Posted by arun dev on अगस्त 08, 2013


























पत्रकार – लेखक वेद विलास इस त्रासदी के बीच गांव – गाँव की पैदल यात्रा पर थे. उनकी डायरी के कुछ पन्ने जो इस भयावह त्रासदी के मर्म और मन्तव्य को दर्ज़ करते हैं. और एक बड़ा सवाल बार-बार पूछते हैं – आख़िरकार इस आपदा के पीछे प्रकृति है कि मानव जो खुद प्रकृति के लिए खतरा बन चुका है.


आपदा में उत्तराखंड : वेद विलास उनियाल                                 
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उधर पानी का सैलाब, इधर पानी में छप-छप 

उस दिन रात को अखबार ले जाने वाली गाड़ी से ही उत्तराकाशी जाना ठीक समझा था. तेज बारिश हो रही थी. रास्ते में एक समय तो ड्राइवर ने वापस देहरादून जाने का निर्णय कर लिया था. मैंने उससे कहा, जब निकल पड़े हैं, तो लौटो मत. धीरे-धीरे उत्तरकाशी पहुंच ही जाएंगे.  लेकिन रात चार बजे के आसपास चिन्यालीसौढ़ से करीब पच्चीस किमी पहले एक जगह सड़क पर इतना गड्ढा भर गया था कि आगे जाना मुश्किल था. हम सब वहीं रुक गए. और कुछ समय बाद हमें नींद ने आ घेरा. सुबह जागे तो पीछे गाड़ियों का लंबा काफिला था. काफी टूटी थी सड़क. लगभग पूरे दिन भर का काम था. तभी मैंने देखा कि एक कार के पास दो बच्चे बरसाती बहते पानी में हाथ डालकर छप- छप करते हुए खेल रहे थे. उनकी मां भी उनके पास ही थी, और शायद गांव की उनकी कोई परिचित महिला भी. उनके साथ आए लोग बच्चों को कभी चिप्स खाने को देते, कभी बिस्किट. फिर कुछ दूर में एकजुट होकर कुछ बातें करने लगते. फिर बच्चों के पास आते. उनके सिर पर हाथ फेरते. फिर कुछ न कुछ खाने को देते. मुझे वह सब अलग लग रहा था. वे लोग गुमसुम से थे. मुझे उसमें कुछ अनहोनी -सी लगी. उनमें एक व्यक्ति को मैने अपने पास बुलाया और कहा, आप कहां से आए हैं. उसने जो बताया, उसे सुन कर मैं सिहर गया. बहुत दर्दनाक हादसा था. पानी में खेलते उन दोनों बच्चों को यह पता नहीं था कि केदारनाथ की तबाही में उन्होंने अपने पिता को खो दिया है. उन्हें क्या पता होता कि जिस पानी में खेल रहे हैं, उसी पानी की प्रचंड धाराओं ने उनके पिता को लील लिया.

चिन्यालीसौढ़ कामदा का रहने वाला निहाल सिंह टैक्सी चलाता था. स्वयं पढ़ा लिखा नहीं थालेकिन बच्चों को  दिल्ली के एक अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा रहा था. अमित और ललित दोनों बच्चे दिल्ली में पढ़ते थे. उस रोज निहाल यात्रियों को केदारनाथ तक लाया था और नीचे गौरीकुंड में टैक्सी में ही सो गया था. पानी की लहरों में उसकी टैक्सी बह गई. वह भी नहीं बचा. गांव के लोगों को पता था कि वह अपनी टैक्सी से केदारनाथ के यात्रियों को लाया करता था. जब केदारनाथ में बाढ़ आने की बात सुनी गई तो गांव वालों ने खोज खबर करनी चाही. उन्हें यह भी पता लगा कि कुछ लाशें हरिद्वार -लक्सर में बह कर आई हैं. उन्होंने  निहाल के शव को पहचान लिया. वहीं उसका अंतिम संस्कार किया गया.

इन बच्चों और उनकी मां को अब गांव लाया जा रहा था.  लेकिन उन्हें कुछ भी नहीं बताया गया था. बच्चों को तो लग रहा था कि वह छुट्टियों में अपने गांव जा रहे हैं. मेरे लिए इस त्रासदी का यह पहला सीधा अनुभव था. मैं उन बच्चों की ओर देखने लगा. अभी कितने मस्त हैं ये बच्चे. मगर जब शाम को घर पहुंचेगे तो सब-कुछ इनके सामने होगा. क्या होगा इनके जीवन का. गांव वाले भी कितने दिन साथ देंगे. उनकी इनकी जिस मां को अभी यह बताया गया है कि पति को कुछ चोट लगी है, उन्हें घर पर तो पता लगेगा ही. यह सब जान लेने के बाद मेरे लिए बच्चों से बात करना मुश्किल हो रहा था. क्या कहता उनसे. मैं महसूस कर रहा था त्रासदी में अपनो को खोने वालों के घर-घर में मातम होगा. हर घर बिलख रहा होगा. शाम के सात बजे के आसपास सड़क ठीक हुई. गाड़ियां चलने लगीं. वह कार भी तेजी से आगे निकल गई जिसमें दोनों बच्चे बैठे थे. उनके मुस्कराते चेहरे में मैं आने वाले समय की पीड़ा को महसूस कर रहा था.

बछेंद्री पाल ने कहा, हिमालय को न समझने की भूल     

यहीं पर कुछ ऊंची पहाड़ी में मेरी मुलाकात बछेंद्री पाल और प्रेमलता अग्रवाल से  हुई.  उन्होंने रास्ता खराब होने की वजह से रुकना ठीक नहीं समझा. उन्होंने इरादा किया कि पहाड़ों से होते हुए दूसरी ओर निकलेंगी. वहीं से चिन्यालीसौढ़ पहुंच जाएंगे. उनकी गाड़ी आती रहेगी. जब वह पहाड़ी पर चढ़ने लगी, तो मुझे उनका चेहरा जाना पहचाना सा लगा. पर संकोच से सीधे नहीं पूछा. मैंने किसी से कहा, ये पहाड़ी पर इस तरह कहां जा रही हैं. उसने कहा, ये बेछेंद्री पाल हैं, इनके लिए क्या पहाड़, क्या सड़क. अभी कुछ देर में पहाड़ों को लांघते हुए चिन्यालीसौढ़ पहुंच जाएंगी. मेरा अनुमान ठीक निकला. ये बछेंद्री पाल ही थीं. लेकिन इतनी देर में वह काफी आगे निकल चुकीं थीं. पर मुझे तो बात करनी थी. मैं  पहाड़ों की शैली में कुछ तेजी से चला, और नीचे से आवाज लगाई. उन्होंने सुन लिया. मैंने इशारे से उन्हें रुकने के लिए कहा, वह रुक गई.  मैं उनके पास गया. मैंने उन्हें अपना परिचय दिया. और उनसे आपदा और इससे जुड़े प्रसंगों पर बात करने की इच्छा जताई. उन्होंने बताया कि वह अपने टाटा इंस्टिट्यूट की तरफ से मदद के लिए उत्तरकाशी के पिलंग, जौड़ावव, डिडसारी जैसे कुछ गांवों में जा रही है.

उनसे कई प्रसंगों पर बात हो सकती थी. लेकिन इस समय मैं बात को केवल पहाड़ों की आपदा और जीवन से ही जोडकर रखना चाहता था.  उनकी चिंता इस बात पर थी कि   हर बार आपदाओं में भारी तबाही के बावजूद लोग हिमालय को समझने को राजी नहीं हैं. जल, जंगल, जमीन, पहाड़, प्रकृति से पारंपरिक आत्मीय रिश्ते कायम रखकर ही आपदाओं में होने वाले नुकसान से बचते हुए विकास की ओर बढ़ा जा सकता है. उन्हें इस बात में  औचित्य नहीं दिखा कि पर्यावरणविद् प्राकृतिक बदलावों के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए पर्वतारोहण पर रोक लगाने की मांग करते हैं. बल्कि उनका कहना था कि पर्वतारोहण पहाड़ व प्रकृति को नजदीक से समझ कर विपरीत स्थितियों से जूझने की ताकत देता है . होना तो यह चाहिए कि स्कूल में बचपन से ही पर्वतारोहण की शिक्षा देनी चाहिए. तभी बच्चे यहां की परिस्थितियों के मुताबिक ढल सकेंगे.

एवरेस्ट पर सफल आरोहण करने वाली प्रथम भारतीय महिला सुश्री बछेंद्री पाल को हम महसूस करते आए हैं. श्रीनगर से उत्तरकाशी जाते हुए जब कभी भी नाकुरी गांव पड़ा तो मैने हमेशा श्रद्दा से सिर झुकाया. पर कभी उनसे मिलना नहीं हुआ था. और मिल भी रहे थे तो ऐसे समय कि जब बातें मायूसी से भरी हुई थी. 

बछेंद्री पाल अपने गृह जनपद उत्तरकाशी में प्राकृतिक आपदा में हुई तबाही के पीछे छिपे कारणों को जानने निकली थीं. हिमालयी क्षेत्र की परिस्थितियों पर वह कहने लगीं आपदाएं तो पहले भी आती थीं, लेकिन इस कदर तबाही नहीं मचाती थीं. बीते कुछ सालों में हर बार आपदा के बाद एक जैसा ही मंजर देखने को मिल रहा है, लेकिन फिर भी कोई सबक लेने को राजी नहीं. पहाड़ से पहाड़वासियों की पहले जैसी आत्मीयता व समझ नहीं रह गई है.  वह महसूस करती हैं कि पहाड़ एवं पहाड़वासियों के हितों को देखते हुए अलग उत्तराखंड तो बना, लेकिन अभी तक यहां की स्थितियों के अनुरूप विकास का खाका तैयार नहीं हो पाया है. मैं चाहता था कि हमारे अमर उजाला डाट. काम में भी बछेंद्रीजी की कही बातें आ जाए. इससे उनकी बातें और दूर तक जाती. खासकर उन देश प्रदेशों में जो उत्तराखंड की तरह पहाड़ी क्षेत्र हैं. जहां पहाड़ों के सवाल एक जैसे हैं. मैंने इसलिए उनसे अमर उजाला डाट. काम के प्रमुख विनोद वर्मा की फोन पर ही बातें कराई.  बछेंद्री पाल को जल्दी जाना था, लेकिन वह बातचीत के लिए तैयार हो गईं.  पहाड़ों से जुड़े कई पहलुओं पर उन्होंने बातें की. फिर जाते जाते कहने लगीं देखो, हमें अंग्रेजों से भी सीखने की जरूरत हैं.

अपनी बचपन को याद करते हुए बोलींउनके पिता कहा करते थे कि
हमें अंग्रेजों से भी सीख लेनी चाहिए. अंग्रेज हर मामले में गलत नहीं थे, उनके पास विकास की एक सोच थी. तब जंगलों में आग लगने पर वे हर घर से एक-एक व्यक्ति को साथ लेकर इस पर काबू पाते थे. पहाड़ सब जगह एक जैसे हैं, लेकिन यूरोप, लेटिन अमेरिकी आदि देशों के पहाड़ ऐसी आफत नहीं बरसाते. इसका अध्ययन कर विकास का ढांचा तैयार करने की जरूरत है. वह पहाड़ों की ओर कदम बढ़ाने लगीं. मैं देर तक उन्हें देखता रहा, महसूस करता रहा कि कभी इसी तरह उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट के लिए कदम बढ़ाए होंगे.

भारतीय सेना को  रुसी महिला का सलाम

यही मेरी मुलाकात रूस से भारत यात्रा पर आए एक दल से हुई. ये लोग भी गंगोत्री गए थे. इनमें वह रूसी महिला भी थी. भारतीय दर्शन से प्रभावित  उस महिला ने अपना नाम ओम प्रिया बताया. उसने अपना नाम बदल लिया था. गीता और भाषा योग वशिष्ठ जैसी किताबों को पढ़ चुकी ओम प्रिया जब भारत के धामों को देखने निकली तो ऊंचे पहाड़ों में उन्हें अपने सामने कई खौफनाक मंजर देखने पड़े. पहले तो बात करने से हिचकती रही. लेकिन फिर उसने बताना शुरू किया. रात में जहां वो सोई हुई थीं वहां उसे एकाएक लोगों की डरावनी चीखें सुनाई दी. अपने बगल की दो बड़ी इमारतों उन्होंने पानी के तेज बहाव में ढहते देखा. चिन्यालीसौड़ हवाई पट्टी के राहत शिविर में मनेरी से पहुंची.  भारतीय सेना की दिलेरी और विपरीत परिस्थितियों से जूझने की क्षमता पर कायल हो गई. उसने बहुत सम्मान से कहा, आई हैव ओनली वन वडर्स् - थैंक्स फॉर इंडियन आर्मी.

उत्तरकाशी की आपदा से डरी ओम प्रिया की मुसीबतें इतनी ही नहीं थी.  अभी उन्हें केदारनाथ त्रासदी में फंसे अपने दो साथियों का पता भी लगाना था. उसे भगवान और भारतीय सेना दोनों पर यकीन था कि उनका पूरा दल फिर मिल जाएगा. अभी चिन्यालीसौड़ में वह अपने तीन साथियों के साथ पहुंची थी. ओम प्रिया शिविर में भी माला जप कर अपने साथियों की कुशलता की कामना भगवान से कर रही थी.  उसके शब्दों में ...  16 जून की वह रात बहुत डरावनी थी. मैं मनेरी में एक आश्रम में सोई थी. तभी  बाहर शोर सुनाई दिया. बच्चे और महिलाओं की चीखें सुनाई दे रही थी, नदी में भी अजीब सा शोर था. मैं  घबरा कर एकदम से बाहर आई. बिना सोचे समझे एक तरफ भागी, कुछ ही देर में मैंने देखा कि सामने की रिहायशी इमारत ढह रही हैं. फिर एकाएक इतना शोर हुआ कि मुझे समझते देर न लगी सामने सब कुछ बर्बाद हो गया है. इस घटना ने मुझे भीतर तक दहलाया जरूर है पर फिर भी मैं इन धामों में आना चाहती है. मेरा विश्वास है कि सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाएगा. लोग एकजुटता और आपसी सामन्जस्य से इस मुसीबत से पार पा जाएंगे.


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वेद उनियाल की  राजनीति, पत्रकारिता, खेल, गीत- संगीत,  नृत्य और फिल्मों से जुडी चर्चित हस्तिओं पर सुन मेरे बन्धु शीर्षक से एक किताब  इसी वर्ष प्रकाशित हुई है.  

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