सहजि सहजि गुन रमैं : नीलोत्पल

Posted by arun dev on अक्तूबर 06, 2013


































युवा कवि नीलोत्पल को उनके कवि-कर्म के लिए २००८ का विनय दुबे स्मृति सम्मान प्राप्त है. उनका एक संग्रह अनाज पकने का समय भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है. उनकी कविताओं में कहन के कई स्तर हैं. कविता की एक तैयारी यहाँ मिलती है. कवि अतिपरिचय को अपरिचय में बदलकर दृश्य को पुनर्जीवन देता है. यह जीवन खुद की जिंदगी के लिए भी जरूरी है. नीलोत्पल की  कविताएँ अनछुएपन को छूती हैं इसलिए वह देख पाते हैं नन्हें फूलों के उतरते हुए पोशाक. एक हिंसक समय में कवि देख रहा है –
युद्ध ने चारों ओर से घेर लिया/शांति प्रेतों का पाठ लगती है.

नीलोत्पल की कविताएँ                                                                    

 

ओ पृथ्वी, ओ नन्ही फरिश्ता बच्ची
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पृथ्वी मेरी कविता का पाठ करती है

जड़ें सुनती हैं दरारों से तुम्हें
शीशों पर जमी परछाईयां हिलती हैं अकेले में
कुर्सियां पेड़ की ख़ामोश मुद्रा में
भरती हैं हुंकार
लैम्प-पोस्ट की सफेद रोशनी में नाचते हैं कीड़े

संगीत, मृत्यु की खामोश विदाई तलक बजता है
नन्हें फूल उतारते हैं पोशाकें

आहिस्ता से भीतर हो रही बारिश
दे देता हूं नन्हें हाथ फैलाए
उस शरमाई बच्ची को
वह अरुणाभ जानती है
संगीत हाथों में नहीं बहा दिए जाने में है
वह रुककर रंग उडेंलती है
खाली केनवास पर

मधुमक्खियां रखती है अपने अंडे़
विद्युत की रोशनियों से छिपाकर
सूखे कंड़ों में
वहां कोई स्पर्श नहीं
तुम छूती हो एक अनछुआपन
ओ नन्हीं फरिश्ता बच्ची


 .

अंधेरे की ओट से
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कहीं जाना नहीं चाहता
बैठा हूं रात में बजती सीटियों से
घबराए सन्नाटे की सिहर देखते
एक किताब की खुलती, बंद होती खिड़की पर

युद्ध ने चारों ओर से घेर लिया
शांति प्रेतों का पाठ लगती है

किताबें हिंसक समय से आजाद नहीं करा पाती
लेकिन सिर्फ़ यहीं एक रास्ता है

डबडबाए अंधेरे में
पूल नहीं, रोशनियां बरसती हैं
रोशनी में नहाया बेसुध
भागता हूं रेलिंग की ओर
उफ कितनी खामोशी है
लोगों की आंखों में
किसी आंख को सच का पता नहीं
सभी चीजों के फेर में है

मैं तन्हां पंक्तियों से गुजरता हूं
पंक्तियां इंसानों के भीतर आधे से कम असर छोड़ती है
या नहीं भी उस वक़्त जब
मछली की आंखे ज्यादा खुली है, हमारी आंखों से

कोई निशाना नहीं है
सब जानते हैं
फिर भी किताबें भरी रहती है
जैसे पानी खेतों की ओर छोड़ा जाता है
धीरे-धीरे गच्च होती मिट्टी
उतार लेती कड़ापन अपनी देह के भीतर

अंधेरे की ओट से
मैं किताबों का कड़ापन छोड़ता हूं
मिट्टी होता हूं




अंतिम कार्यवाही
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जंगल में हवा बिना बताएं
गुम हो जाती हैं

एक तितली जिसने पंख नहीं झटके
सुबह की प्रतीक्षा में है

कोयले जंगल के गर्भ में
पत्तियों की सांसे हैं
धूप में ठहरी मचलती तितलियां

नदी से थोड़ा नज़दीक
टहनियों के झुरमुट में
गश्त जारी है बया की

कुतरी पत्तियां अधूरी तस्वीर है
रोज डण्ठलों पर ख़ालीपन आवाज़ लगाता है
गिरता सच कितना बेआवाज़ है कि
कुछ दिनों तक जंगल चुपचाप गुज़र जाता है
हमारे घरों से

रात पारदर्शी परदा गिराती है
सभी निमिलित जड़ों पर
देखते-देखते छोटे हिरण अदृश्य होने लगते हैं

पूरी रात कीड़ों का शोर
महादृश्य का विलाप करता है

रात प्रेम के निशान छोड़ जाती है
स्निग्ध रोशनियों पर

धातु और लपटें
जंगल की अंतिम कार्यवाही है




मैं एक खिड़की हूँ
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हो सकता है

मेरे दावे तुम्हें सही न लगें
मेरी इच्छाएं अधूरी और अवास्तविक-सी दिखें
पर यह नामुमकिन नहीं कि मैं ही हूँ वह जो देर रात तलक
आसमान में तुम्हारी अनुपस्थिति को देखता है
और कल्पनाओं से घिरा रहता है

मैं जानता हूँ कि प्रेम एक ठोस चीज़ नहीं
वह गैरव्यवहारिक और अनियंत्रण से भरी है
यह शब्दों की उद्दात्तता है कि वे शब्दहीन नहीं रहने देते
अप्राकृत और उद्दाम को

हवाएं जानती हैं बंद दरवाजों के भीतर प्रतीक्षाएं हैं
मैं एक खिड़की हूँ जिसमें कई बंद दरवाजें हैं
हो सकता है तुम्हें दिखाई न दे
फिर भी इंतज़ार करना
पक्षी इन्हीं अदृश्य खिड़कियों से लौटते हैं

सब अनियति से घिरे रहते हैं.
हर कोई एक दूरी है अपनी ही सीमित दौड की.
छूता नहीं कुछ भी, यह बनाया संगीत, उडते पन्ने,
आसमान की उदास भंगिमाएं
और कई सारी सड़कें जिनमें सिर्फ द्वंद होता है आवास नहीं  (

हम बह जाते हैं एक पुल के नीचे से
मैं वह नदी हूँ जो बह आयी है
हो सकता है यह तुम्हें अप्राकृतिक लगे




संगति
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पानी में घोलने के लिए
कुछ चीज़ें हमेशा से कारगर थी
जैसे तुम्हारी परछाई और यादें
जिन्हें मैं हमेशा से एक तट देना चाहता रहा हूं

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मेरी अवस्था एक खोए नाविक की है
जो समुद्र के बीचों बीच याद करता है तुम्हें

अंत में
मैं भूल जाता हूं कि
नावें तुम्हारे और मेरे बीच
डूब जाती हैं
समुद्र हमारी कब्र का नाम है

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यथासंभव एक ही दिशा है चलने के लिए

मैं उन रास्तों पर भी हूं
जहां आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं
अज्ञात चीज़ें ख़ुशबुओं से भरी हैं
तुम कहीं नहीं हो
वायलीन से बह रहे उदास संगीत की तरह
बहता हुआ
मैं सभी जगह

दिशाएं जानती हैं तुम नहीं
तुम अज्ञात चीज़ों की ख़ुशबुओं से भरी हो
मैं पहुंचता हूं, तुम तक नहीं
उन अज्ञात ख़ुशबुओं के करीब

तुम दिशाओं की अनंतता हो
और मेरा चरम भटकाव

आह, हमारे होने की यही संगति है





निरर्थकता भी अशाब्दिक पाठ है
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जगह-जगह गड्डे भरे हैं खालीपन के
रात, सुबह की रोशनी में बिला जाती है
याद करने से नहीं भरता अशक्त मन

पटरियों का ठंडा लोहा छूता है
स्मृतियों की निखालिस परछाई

यादें सिहरती हैं
पड़े-पड़े कथिर की तरह जमते हैं हमारे नन्हें आशय

धूल हमारे समय का पछतावा है

सभी के चेहरे थके हुए हैं लंबी यात्रा से

एक गोल घेरा है चारों ओर
कोई बाहर नहीं
मासूम पत्तियां बाहर गिरती है तो
खींचता है पृथ्वी का तनाव

सिर्फ आदर्श जिंदगी का फलसफा नहीं हो सकता
निरर्थकता भी अशाब्दिक पाठ है



उन क्षणों में
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समुद्र ख़ाली था
जाल हटा लिए गए
लहरें किनारों पर रेत में सुस्ताती रहीं
सारी मछलियां उड़ गईं आसमान की ओर
तारों में चमक बरकरार थी

घोंघे और आक्टोपस
पृथ्वी का एंटीना थे
एक चुप जिसने समुद्र को घेर लिया

आवाज़ें रिक्त, समुद्र ख़ामोश

कुछ इस तरह जीवन को जाना

समुद्र और जीवन से ज़्यादा मौन
तुममें खो जाने में था

उन क्षणों में था
जब तुम्हें छू रहा था

आह, समय ईथर है
तुम्हारे बंद होठों की तरह
           सबसे चुप और थरथराता
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नीलोत्पल
जन्म: 23 जून, 1975, रतलाम, मध्यप्रदेश.
पहला कविता संकलन अनाज पकने का समय भारतीय ज्ञानपीठ से वर्ष 2009 में प्रकाशित.
नया ज्ञानोदय, वसुधा, समकालीन भारतीय साहित्य, सर्वनाम, बया,साक्षात्कार, अक्षरा, काव्यम, समकालीन कविता, दोआब, इंद्रप्रस्थ भारती,आकंठ, उन्नयन, दस्तावेज़, सेतु, कथा समवेत सदानीरा आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं  प्रकाशित
पत्रिका समावर्तन के युवा द्वादशमें कविताएं संकलित
वर्ष 2009 का  विनय दुबे स्मृति सम्मान

सम्प्रति: मेडिकल रिप्रेज़ेंटेटिव
सम्पर्क: 173/1, अलखधाम नगर/उज्जैन, 456 010, मध्यप्रदेश
मो.: 0-98267-32121/ 0-94248-50594