मति का धीर : परमानन्द श्रीवास्तव

Posted by arun dev on नवंबर 05, 2013


:: श्रद्धांजलि :: 









गोरखपुर से आज सुबह साहित्यकार डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव के न रहने की  दुखद सूचना मिली. कवयित्री रंजना जायसवाल ने परमानन्द जी को याद किया है, सहित्य के सीमांत पर रह कर लेखन कर्म कर रहे रचनाकारों के होने का क्या ‘अर्थात’ होता है इसे भी बखूबी यहाँ पढ़ा जा सकता है, उन पर लगते रहे तमाम आरोपों के खिलाफ यहाँ एक स्त्री–रचनाकार का अपना पक्ष भी है.  




गोरखपुर का कोहनूर परमानंद श्रीवास्तव
रंजना जायसवाल

बात उन दिनों की है जब मैं शोध कार्य के लिए पड़रौना कस्बे से गोरखपुर शहर आई थी. डरी हुई थी, विश्वविद्यालय पहुँचकर और भी डर गई. किसी से कोई जान-पहचान न थी. किसी तरह हिंदी विभाग में पहुँची. अपने फोटोग्राफ्स पर दो प्रोफेसरों के हस्ताक्षर लेने थे. हिम्मत करके एक प्रोफेसर को अपनी मंशा बताई, उन्होंने हस्ताक्षर कर दिया, तो मैं दूसरे प्रोफेसर की तलाश करने लगी. शायद सभी अपनी कक्षाओं में थे. विभाग में एक कोने की कुर्सी एक दुबले-पतले,  छोटे कद के महाशय बैठे हुए थेजो साधारण कपड़ों में थे. मैंने समझा ये भी किसी प्राध्यापक या प्रोफेसर से मिलने आए होंगे. वे चुपचाप एक मोटी- सी किताब पढ़ रहे थे शायद इसीलिए उन्होंने मुझ पर ध्यान  नहीं दिया था. मैं जाने को मुडी तो पहले वाले प्रोफेसर ने कहा – ‘वे भी प्रोफेसर हैं, दूसरा हस्ताक्षर उनसे करवा लो. ’मैं आश्चर्य से देखने लगी, तो प्रोफेसर ने हँसते हुए कहा परमानंद को नहीं पहचानती. यह बहुत बड़े साहित्यकार हैं. परमानंद श्रीवास्तव! मैं चौक पड़ी. याद आया कस्बे से चलते समय गुरू केशव बिहारी ने कहा था- वहाँ परमानंद से जरूर मिलना. वे बहुत ही सहयोगी प्रकृति के हैं. तुम्हारी हर संभव सहायता करेंगे. ’अरे..! मैं शर्मिंदा हो गई, अपनी इस सोच पर कि बिना कोट-टाई के प्रोफेसर विश्वविद्यालय नहीं आते. मैं परमानंद जी के पास जा खडी हुई और उन्हें नमस्कार किया. उन्होंने अपनी चमकती आँखों से मुझे देखा और मुस्कुराए. मैने अपना परिचय दिया और फोटो हस्ताक्षर के लिए उनके सामने रख दिया. उन्होंने उस फोटो को उठाया, देखा और हँसते हुए पहले वाले प्रोफेसर साहब से कहा – ‘अरे, अच्छे-खासे चेहरे को खराब कर दिया.’ हुआ यह था कि प्रोफेसर साहब ने फोटो में चेहरे पर ही हस्ताक्षर कर दिया था ... तो यह थी परमानंद जी से मेरी पहली मुलाक़ात. उनकी यह बात मुझे बरसो गुदगुदाती रही. कितनी सहजता से उन्होंने मेरी सुंदरता और प्रोफेसर साहब की लापरवाही को संकेतित कर दिया था.  

उस घटना के बाद परमानंद जी से हिंदी-विभाग में ही यदा-कदा मेरी मुलाक़ात होती
रही. उन दिनों मैं साहित्यिक गोष्ठियों में नहीं आती-जाती थी, इसलिए परमानंद जी के साहित्यिक व्यक्तित्व से लगभग अनजान थी. हाँ, उनके प्राध्यापक रूप से ख़ासा प्रभावित थी. एक तो उनके पास शानदार आवाज थी, दूसरे वे निरंतर अध्ययन करते रहते थे. उनकी साहित्यिक समझ, विषय की वृहद जानकारी, हिंदी-अंग्रेजी दोनों पर समानाधिकार व समकालीन बड़े साहित्यकारों की मित्रता ने उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा जादू पैदा कर दिया था कि कोई भी छात्र उनकी कक्षा को मिस नहीं करना चाहता था. उनकी कक्षाएँ छात्रों से ठसाठस भारी रहती थीं. अपने छात्रों के साथ उनका व्यवहार मित्रवत था, जो उनके साथी प्राध्यापकों को नागवार गुजरता था. वे कभी नहीं बदले. एक प्रगतिशील, उदार,आधुनिक, सहयोगी, संवेदनशील और विद्वान प्राध्यापक के रूप में जाने जाते रहे.
परमानंद जी को ज्यादा जानने का अवसर तब मिला, जब मैं साहित्य में सक्रिय हुई. मैने महसूस किया कि उनकी उपस्थिति मात्र किसी संगोष्टी की सफलता की गारंटी होती है. उनके आगे सारे वक्ता उसी तरह फीके पड़ जाते हैं, जैसे चन्द्रमा के आगे तारे. कारण वही प्रतिभा के साथ कठोर परिश्रम यानी कि निरंतर अध्ययन और लेखन. उस पर जादुई आवाज...सोने में सुहागा !

हम उन्हें गोरखपुर का कोहनूर कहते हैं, पर हीरा तो कठोर होता है, जबकि वे बेहद ही कोमल, सौम्य, सरल, सहृदय, सम्वेदनशील, प्रेमी, मिलनसार व व्यवहारिक जीव रहे.कहीं कोई छल-छद्म नहीं, प्रपंच, आडम्बर, दिखावे से कोसों दूर. मैने उन्हें कभी किसी की बुराई करते नहीं सुना. अपने आलोचकों, विरोधियों, शत्रुओं तक की भी वे निंदा नहीं करते थे. कोई करता भी तो हँसकर बात दूसरी ओर मोड़ देते. (जबकि उनके समकालीनों की बात उनकी बुराई किए बिना गति ही नहीं पाती थी) हाँ, वे स्पष्ट व सत्य वक्ता जरूर थे. सच कहने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता था वे निडर और साहसी थे. तभी तो घोर साम्र्प्रदायिक शहर में वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलते रहे. (जबकि उनकी उम्र के कई लेखक साम्प्रदायिक मंचों पर बैठने को आज भी अपना सौभाग्य, सम्मान व सुरक्षा मानते हैं) रमानंद जी में यह चाटुकारिता, अवसरवादिता नहीं थी. अन्याय-शोषण, भेद-भाव, सामंती और पिछड़ी सोच के खिलाफ कटिबद्ध उनके दुबले-पतले शरीर में प्रकृति ने अद्भुत ऊर्जा, साहस, व प्रतिभा भर दी थी. उनके जैसा व्यक्तित्व बार-बार धरती पर नहीं आता. तभी तो एक समारोह में मैं उनसे कह बैठी सर, आपका कोलोन (प्रतिरूप) बनाकर रख लेने को जी चाहता है क्योंकि संसार में दूसरा परमानंद नहीं हो सकता. वे हँस पड़े थे. पर मेरे मन के सच्चे उदगार थे. जाने क्यों उनके प्रति हमेशा हृदय श्रद्धा भाव से भरा रहा, हालाँकि उनसे कुछ शिकायतें भी रहीं,पर वे उनकी सरलता के कारण उत्पन्न हुई थीं, इसलिए हमेशा ही दबी रहीं.

परमानंद जी की एक प्रमुख विशेषता नए रचनाकारों को प्रोत्साहन देना था. इस विषय
में वे लिंग-भेद नहीं करते थे. जहाँ भी प्रतिभा दिखती, उनकी कलम वहीं जा पहुँचती. नयों पर इतना लिखने वाला शायद ही कोई वरिष्ठ साहित्यकार हो. ज्यादातर तो बरगद ही साबित होते हैं आत्ममुग्ध. जो नयों की रचनाओं को बेदर्दी से कूड़ेदान के हवाले कर देते हैं और उनसे महान रचनालिखकर लाने को कहते हैं. जैसे कि वे तो जन्म से ही महान लेखक के रूप में जन्में हो. वे किसी भी नवोदित की रचना नहीं पढते. अपना ही पढवाते और अपने कसीदे कढवाते मिलते हैं. चूँकि वे उस मुकाम पर होते हैं कि किसी नवोदित को लेखक सिद्ध कर दें, पुरस्कार दिलवा दें या खारिज करवा दें बेचारे कई नए लेखक उनके आगे पीछे घूमते दिख जाते हैं. परमानंद जी ऐसे नहीं थे, इसलिए तथाकथित महान  लेखक उनसे खासे नाराज रहते थे. उनका आरोप होता कि परमानंद सस्ती लोकप्रियता के लिए नयों को प्रोत्साहित करते हैं, विशेषकर स्त्री रचनाकारों को. स्त्री रचनाकारों पर उनकी विशेष कृपा दृष्टि है. हाँ, यह  सच था कि नयी से नयी स्त्री रचना उनकी दृष्टि से नहीं बच पाती थी, पर इसका कारण उनकी चारित्रिक कमजोरी नहीं सदियों से दबाए गए स्त्री-लेखन को उभारना था. यह काम उन्होंने दलित लेखन के लिए भी किया. समाज के कमजोर पक्ष को सामने लाना वे अपना दायित्व मानते थे. पर यह सदाशयता उनकी कमजोरी मान ली गई और हर जगह उनका मजाक बनाया जाने लगा. झूठे-सच्चे किस्से गढे जाने लगे. जहाँ चार साहित्यिक जुड़ते, वहीं उनकी नुक्ताचीनी शुरू हो जाती. लोग उनकी उम्र का भी लिहाज नहीं करते. कहते-उम्र बढ़ने के साथ उनका स्त्री प्रेम मानसिक रोग में बदल चुका है. हमेशा स्त्री रचनाकारों की ही बात करते हैं.’ दरअसल इस कुप्रचार की वजह परमानंद की अतिरिक्त सरलता और पारदर्शिता थी. वे मंच से भी सब कुछ कह देते थे. वे उन चतुर-चालाक लोगों से बिलकुल अलग थे जो स्त्री की तरफ ना देखते हुए भी उसका सर्वांग टटोल लेते हैं. पर्दे की आड़ में स्त्री का शिकार करते हैं. पर फंसने वाला काम नहीं करते. हमारा समाज भी विचित्र है. यहाँ अपराध, पाप गलत कार्य सब जायज है, जब तक सामने ना आए या अपराधी पकड़ा ना जाए. 

गर स्त्री रचनाकारों को प्रोत्साहित करना परमानन्द की कमजोरी थी, तो अनेक स्त्रियों से गुपचुप संबंध रखना तथा उन्हें साहित्यिक ऊँचाई तक पहुँचाने का आश्वासन देकर शोषित तथा पथभ्रष्ट करने वाले साहित्यकारों को क्या कहेंगे ? वैसे भी चरित्र को सिर्फ शारीरिक शुचिता से जोड़कर हम उसे सीमित कर देते हैं. फिर परमानंद तो उस सीमित की सीमामें भी नहीं आते थे. यदि वे रचना के मामले में जाति, धर्म, क्षेत्र, पद, स्तर व लिंग भेद का ध्यान नहीं रखते थे तो यह उनकी विशेषता मानी जानी चाहिए थी. पर ऐसा ना होना दुर्भाग्य रहा. परमानन्द जी ने कभी किसी स्त्री का बेजा लाभ नहीं उठाया. हाँ उनकी सरलता का लाभ कुछ स्त्री रचनाकारों ने जरूर उठाया और बाद में उनका मजाक बनाने लोगों में शामिल हो गईं. उनके सीधेपन पर मुझे कभी-कभी गुस्सा भी आता था, विशेषकर तब , जब वे दूसरों के लिए अत्यधिक मानसिक श्रम करते और बीमार पड़ जाते. वे ७० पार करने के बाद भी घोर मानसिक श्रम कर रहे थे. निरंतर लिख रहे थे. अपने लिए कम, दूसरों के लिए ज्यादा. कई बार मैं कहती भी कि अब थोड़ा विश्राम भी करें. बहुत लिख पढ़ लिया, बड़े से बड़ा पुरस्कार पा लिया. पर वह नहीं मानते थे. इधर पाइल्स ने उनके शरीर को खोखला करना शुरू कर दिया था. यह बीमारी लाइलाज तो ना थी पर उनकी निरंतर  यायावरीव खान-पान में लापरवाही से बढ़ती जा रही थी. आपरेशन भी कराया तो लास्ट स्टेज पर, तब तक वे बेहद कमजोर हो चुके थे. वे एनेमिक हो चुके थे. अक्सर चकरा कर गिर जाते. एक बार गिरे तो कूल्हे की हड्डी ही टूट गई. आपरेशन हुआ पर उतना सफल नहीं हुआ. इस आपरेशन के बाद फिर कभी वे चल फिर नहीं सके थे. वाकर के सहारे उन्हें चलता देख आँखें भर आती थीं.

जाने कैसा रिश्ता था उनसे कि उनकी तकलीफ देखी नहीं जाती थी. उनके खिलाफ गलत सुना नहीं जाता था. उनके विरोधी बहुत थे, जो उनकी बुराई में रस लेते थे. कई लोगों ने तो उनको लेकर मुझसे भी मजाक करना चाहा, पर मैने उन्हें खरी-खोती सुना दी. पिता तुल्य गुरू परमानंद के बारे में घटिया बातें मुझसे सहन नहीं होती थीं. मुझे इस बात पर हैरानी होती कि बड़ी-बड़ी बातें लिखने वाले, जनता की दृष्टि में आदर्श रचनाकार भी एक-दूसरे के व्यकिगत प्रसंग उठा-उछालकर मजा लेते हैं. क्या स्वस्थ हास्य की परम्परा उठ गयी है? क्या रचनाकारों की यह क्रूरता, यह समवेदन-हीनता चिंतनीय नहीं है? किसी से आत्मीय करीबी रिश्ता क्या यूँ ही बन जाता है? क्या स्त्री-पुरूष के बीच महज एक ही रिश्ता होता है? क्या खून के रिश्ते ही करीबी होते हैं ? क्या मन के रिश्ते खून के रिश्तों से ज्यादा मजबूत नहीं होते ?

परमानंद जी पर एक और आरोप लगता रहा कि वे बहुत ज्यादा लिखते हैं. हर पत्र-पत्रिका में छपने की उन्हें भूख है. नयी-पुरानी पत्रिका की भी परवाह नहीं करते. ज्यादा लिखने के कारण उनके लेखन की स्तरीयता घट रही है. पर ये आरोप भी वे ही लगाते रहे जो उम्र व आलस्य वश या यूँ कहें चूक जाने के कारण नहीं लिख पा रहे थे या कम लिख रहे थे और बैठ के पुरानी मेहनत के फल आराम से खा रहे थे. परमानंद जी का ७० पार करने के बाद भी लगातार लिखना सभी की तरह मुझे भी आश्चर्य में डालता था. एक दिन मैने उनसे पूछ लिया सर आप इतना अधिक कैसे लिख लेते हैं ? और उनका उत्तर सुन कर मैं चौंक पड़ी-‘’अकेलापन!’’ उन्होंने कहा  जब तक एक लेख लिख ना लूँ, नींद नहीं आती, नींद की दवा लेने के बाद भी.’ – एक लेख रोज ! यह तो बहुत ज्यादा है और अकेलापन क्यों, जबकि पत्नी साथ हैं. बेहद ही सुलझी हुई, भली और साहित्यिक रूचि वाली महिला. दोनों बेटियाँ यद्यपि पास नहीं हैं, फिर भी हैं तो. उस दिन मैने जाना कोई कैसे परिवार के साथ रहते हुए भी मन से अकेला होता है ? क्या कुदरत ने उनके मन में इसलिए अकेलेपन की भावना भर दी कि वे निरंतर लिखते रहें या फिर उन्हें प्रेम नहीं मिला ? वैसा प्रेम, जिनकी उन्हें हसरत थी और जिसकी तलाश में वे ताउम्र भटकते रहे और सदैव अतृप्त रहे. दरअसल जो प्रेम वे बाहर तलाशते रहे, वह बाहर था ही नहीं, वह तो कस्तूरी की तरह उनके अंदर बसा था. बाहर की स्वार्थी दुनिया में वह मिलता भी कैसे ?


वैसे परमानंद जी से सभी प्रेम करते थे.  छात्र-छात्राएं, पाठक,पत्नी-बेटियाँ, रिश्तेदार, मित्र और पूर्वाग्रह से रहित एक बृहद साहित्यिक समाज, क्षेत्र, राज्य व देश की सीमा से बाहर भी उनसे प्रेम करने वाले लोग हैं. इसका अहसास  शिद्दत से मुझे तब हुआ, जब उनकी अस्वस्थता की खबर मैने फेस बुक पर डाली थी. हजारों लोगों ने उनके स्वास्थ के लिए दुआएं मांगी. अस्पताल में उन्हें देखने के लिए साहित्यकारों की भीड़ लग गयी. इस भीड़ में उनके विरोधी भी थे, जिनकी आँखों में आंसू थे. सभी उनको स्वस्थ देखना चाहते थे. उनकी खनखनाती आवाज सुनना चाहते थे. मृत्यु की आहट ने पूरे जनसमूह को एक कर दिया था. हर तरह के भेद-भाव और मनो-मालिन्य धुल गए थे. प्रेम की वह गंगा बह रही थी, जिसका सपना छोटी काया, चमकती आँखों और जादुई आवाज वाले परमानंद हमेशा देखते रहे थे.   
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परमानन्द श्रीवास्तव : 10/02/1935, बांसगांव, गोरखपुर (उ.प्र.)
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सम्मान
साहित्य भूषण सम्मान- 2003, द्विजदेव सम्मान- 2004, के. के. फाउन्डेशन नई दिल्ली द्वारा व्यास सम्मान- 2006, उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा भारतभारती सम्मान- 2006
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