मंगलाचार : विजया सिंह

Posted by arun dev on दिसंबर 21, 2013




























विजया सिंह अंग्रेजी में कविताएँ लिखती हैं, उनका पहला संग्रह First Instinct साहित्य अकादेमी से प्रकाशित होने वाला है. ये कविताएँ हिंदी में ही लिखी गयी हैं. 


१.
ईरानी गलीचा  

यह गलीचा जो फारस के किसी सुन्दर बाग़ की कल्पना है 
जिसमें मनमोहक बहु रंगी पक्षी कोई मीठा फल खा रहें हैं 
उनकी खुरदरी जीभ और तीखी चोंच पीठ में चुभते हैं. 

आप घबरा कर उठ बैठते हैं कि कोई धारदार चीज़ आपकी पीठ को छील रही है.
इस तोते का मालिक, वो नफ़ीस कालीन बुनकर अपनी बूढी उँगलियों से अब भी तेहरान की किसी संकरी गली में बैठा एक बाज़ की आंख में सितारा जड़ रहा है.

वो नहीं जनता कि उसके कालीन दुनिया भर में तैर रहे हैं 
दीवारों पर या की फर्श पर 
उसके रंगीन पक्षी लोगों की पीठ और यादों में चुभते हैं.

उसका वो बाज़ लगता है बस अब उड़ने ही वाला है 
उसकी आँख की चमक बताती है
उसका शिकार बच नहीं पाएगा उसके तीखे पंजों की गिरफ्त से. 

उसके कालीन, कालीन नहीं तिलिस्म हैं 
जिसमें कैद हैं हम सब अपने मीठे और जहरीले फलों के साथ 
ऐसा कोई शनाख्ती लफ्ज़ नहीं जो हमारे बाहर जाने  का रास्ता खोले. 




२.
रात में अपना शहर 

रात में अपना ही शहर कितना अज़नबी और रहस्यमयी लगता है. 
इसके रास्ते किसी बेबाक़ कवि की हाज़िरजवाब  ज़ुबान. 
जिसके पास हर उत्तर के लिए प्रश्न 
और हर सवाल पर प्रतिसवाल है.                               
इसकी जगमगाती दुकानें कितनी थकी और बेज़ान नज़र आती हैं. 
टहल सिंह का लाल और नीला जलता बुझता कुक्कड़ 
KFC के सफ़ेद दाढ़ी वाले अमरीकी अंकल को ठेंगा बता रहा है. 
और सोनी के शोरूम की फीकी नीली रौशनी फूटपाथ पर सोये लोगों पर मुर्दनी बिखेर रही है. 
सकी घायल झील चाँद के टेढ़े मुँह को डुबोने की नाकाम कोशिश में अब तक जुटी है. 
सके किसी चौराहे पर फिरोज़ी कमीज़ पहने एक साइकिल सवार 
एक लड़की को देख कर मुस्कुरा रहा है. 
वो लड़की यह जानते हुए कि दिन के उजाले में यह नौजावान उसे कभी नहीं पहचान पायेगा 
अपनी कार की खिड़की से बाहर झांकते हुए उसकी और देख कर मुस्कुरा दी है   
बस यही उसकी आज़ादी की सीमा है. 
सड़क के दोनों और लगे अमलतास के पेड़ों पर लटके पीले नखरीले  झूमर
हवा में हिल-हिल कर आने जाने वालों का अभिनन्दन कर रहे .   
पर लोगों का ध्यान फूलों पर कम पुलिस को चकमा दे कर निकल जाने में ज्यादा है.  
अमलतास की नर्म  पंखुडियां सुबह सैर पर आने वालों के लिये स्वर्णिम गलीचा  बिछा रही हैं.
पर यह कृतघ्न शहर उनकी इस उदार और दयावान भेंट को
सिर्फ चलती गाडी के रियर मिरर में देखेगा.
बच्चे जो सड़क के उस पार भीख मांग रहे हैं, इस मुक्त वसन्त के वारिस 
उन्हें यहाँ, इस ‘जनपथ’ पर आना मना है . 



एक रेलगाड़ी धडधडाती हुई शहर से गुज़रती है
और रात को आपके सपनों में  लौटती है
छूटती जाती ट्रेन बन कर
आप जो हर वक्त सफ़र में हैं, सोते जागते
चौंक कर उठ बैठते हैं और पाते हैं
प्लेटफार्म की पिघली हुई गोल घडी
आपके क़दमों के पास पड़ी है
और समय के अंक रेल की पटरियों की और बढ़ रहे हैं.

यह ट्रेन जो छूट गई है पीछे, बहुत पीछे
आप इससे आगे निकल आये हैं
पर धरती के गोल होने के बावजूद
इस छूटी हुई ट्रेन के सिरे को फिर से पकड़ने में नाकाम रहे
खिडकियों से बाहर झांकते हुए इसके मुसाफिर
कितने जाने पहचाने हैं
और हाथ हिला कर विदा ले रहे हैं आपसे

फिर न मिलने के लिये.
इनके प्लेटफार्म छूट गए हैं
ये यात्रा पर हैं उन ट्रेनों को पकड़ने के लिये
जो दूसरों के सपनों से गुज़र कर
२/३ स्टेशन पर सिटी बजाती, धुआं छोडती
गार्ड की हरी झंडी के इंतजार में उस पुल के पार जाने को तैयार हैं 
वहाँ कुहासे के उस पार जहाँ रद्द यात्रायें बहाल होती हैं.


ठीक ९ बज कर ५ मिनट पर
या ऐसे ही कुछ ...बज कर कुछ मिनट पर
ट्रेनें चल पड़ती हैं और कभी नहीं रुकतीं
उस मुसाफिर के लिये
जो थोड़ी देर से घर से चला था
और समय का हिसाब नहीं रख पाया
बावज़ूद इसके कि ऑटो वाले को सख्त ताकीद की थी
समय से पहुँचाने की
हलकी आवाज़ में धमकी भी दी थी
किराया वापस लेने की अगर ट्रेन न मिली तो
पर ट्रेनें कब इंसानी कमजोरियों को मानती हैं
वे तो कुछ बज कर कुछ मिनट पर चलती हैं
और सिर्फ लाल और हरे के बाइनरी कोड को पहचानती हैं
और पीछे मुड कर नहीं देखतीं
उस मुसाफिर को जो हांफता हुआ, सूटकेस थामे
बेतहाशा दौड़ा जा रहा है इस कोशिश में कि किसी तरह
समय के सिरे को फिर से पकड़ ले.



तीन दिनों बाद 

तीन दिनों बाद आप घर लौटते हैं तो पाते हैं 
इधर ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ विशेष रूप से सक्रिय रहीं आपके पीछे. 
छिपकली ने एक तितली के पर कुतर दिए हैं 
और शेष शरीर छोड़ दिया है चींटियों के लिए. 
पता चला किस  छदम युद्ध से छिपकलियाँ आकश तत्व को पाती हैं 
और इस उम्मीद में हैं कि एक दिन उड़ जायेंगीं 
हज़म किये हुए परों के सहारे.  
चींटियाँ लाइन लगा कर तितली के अणु- अणु को दीवार के भीतर से गुज़र कर
नीचे पाताल में पर्सिफ़ोनी के कोष में संग्रहित कर रही  हैं. 

यूँ वे निशचित कर रही हैं उसकी वापसी वसंत में अपनी माँ के पास .
यह उनकी जंग है डिमीटर के अवसाद से धरती को बचाने की. 
क्या मालूम था तितलियों के परों की इतनी अभियाचना है
धरती के ऊपर और उसके नीचे. 
वहां रसोई घर में 
आम के हींगवाले अचार में फफूंद उग आई है.  
न हल्दी, न नमक, न आम का तीखा अम्ल ही परिरक्षक साबित हुए 
अँधेरे के रसायन के विरुद्ध.  
अचार को भी दरकार है सूर्य नमस्कार की
उसकी भी याचना है सूर्य से मैत्री की, उसके १०८ नाम जानने की.
उधर शयनकक्ष की खिड़की में एक गिलहरी ने घोंसला बना लिया है 
टूटे कांच और लोहे की जाली के बीच.
मेरा नीला रबर बैंड शायद उसके बच्चों के तकिये का काम करेगा 
और मेरी कुर्सी की कुतरी हुई सूत कम्बल का. 
मेरे पीछे मेरा घर कितनी व्यस्त जिंदगी जीता है 
बेहिचक शिकमी देता है बेघर जन्तुओं को. 
भाड़े में मुझे चिन्ह मिलते हैं उसके चेतन होने के 
और इस बात के कि वो कितना लापरवाह है मेरे मालकिन होने के दावों के प्रति. 

छिपकलियाँ 

सच तो यह है कि छिपकलियाँ कला के बारे में हमसे ज्यादा जानती हैं 
वे उच्च कोटि की कला प्रेमी हैं 
आश्चर्य नहीं कि उनका निवास अक्सर चित्रों की दीवार से सटी पीठ पर होता है 
उन्हें सच्चे कलाकारों की तरह इस बात से फर्क नहीं पड़ता 
कि दीवार और तस्वीर के बीच की जगह कितनी असुविधाजनक है 
कि वहां रोशनी कम है 
यूँ प्रकाश के बारे उन्हें कोई भ्रम भी नहीं है 
अलबत्ता यह ज़रूर है कि यहाँ से अनजान और लापरवाह कीट पतंगों 
को छोटी चमकदार आँखों से ताका जा सकता है 
और लपक कर हज़म किया सकता है 
परवाने जो शमा के इर्द गिर्द सूफियों सा चक्कर काटते हैं 
उनकी मासूमियत पर दिल खोल कर हँसा जा सकता है 
और मौक़ा मिलते ही उनके सुन्दर, मुलायम परों वाले शरीर को 
लपलपाती जीभ से दुलारा जा सकता है 
यही नहीं कीमती पेंटिंग्स पर इत्मिनान से रेंगा जा सकता है 
उनकी बनावट को अपने पेट और टूटी दुम से महसूस करते हुए 
एक कलाकृति से दूसरी कलाकृति की और जोरदार दौड़ लगाई जा सकती है 
उनके बीच की दुरी को इस तरह से नापा जा सकता है 
और जो पेंटिंग पसंद आ जाये 
उसके आगे पीछे घूमते हुए उस पर एक सटीक पर टेड़ी समीक्षा दी जा सकती है 
और जो नापसंद हो 
उसे जैसी है वैसे ही छोड़ा जा सकता है 
बिना कोई टिप्पणी दिए 
जैसा समझदार आलोचक अक्सर किया करते हैं. 
  
मच्छर 

मच्छर सुन्दर संगीत का वाहक है.  
एक उड़ता हुआ गवैया
जो अपने पंखों से मधुर संगीत उत्पन्न करता है. 
जब वो आपके कान में गुनगुनाता है 
तो दरअसल वो आपके और नज़दीक आने की गुज़ारिश कर रहा होता है. 
वो आपके इतना क़रीब आना चाहता है 
कि अपनी शहनाई सी चोंच से आपके खून तक में संगीत भर दे. 
अपने खून से आपके खून में वो Plasmodium Vivax
का धारदार percussion प्रवाहित करता है 
जो आपके हीमोग्लोबिन को तबले सा थपकाता है.  
तभी तो आपके शरीर का तापमान गिरता और उठता है 
आप थिरकते हैं, कंपकंपाते हैं, पसीने से सराबोर हो जाते हैं 
मच्छर दरअसल आपके खून के आदिम संगीत का ग्राहक है 
आपका ताली बज़ा कर उसका स्वागत करना 
उसकी प्रतिभा का सम्मान ही तो है. 

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पर्सिफ़ोनी:  यूनानी पौराणिक कथा में पर्सिफ़ोनी, डिमीटर और ज़ीउस की बेटी मानी जाती है. पाताल का राजा हेड्स उसका अपहरण कर लेता है. बेटी के गम में डिमीटर धरती को बंजर कर देती है. देवताओं के आग्रह पर हेड्स पर्सिफ़ोनी को वापस धरती पर जाने देता है. पर चूंकि वो नीचे पाताल में अनार के दाने चख चुकी है उसकी वापसी हमेशा के लिये नहीं हो सकती. उसकी वापसी धरती पर बसंत का सबब होता है.



विजया सिंह
२९ जनवरी १९७३, कोटा (राजस्थान)
राजस्थान विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम-फिल, पी.एचडी
अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, लेख प्रकाशित  
अंग्रेजी कविता-संग्रह, फर्स्ट इंस्टिंक्ट (First Instinct) (प्रेस में, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली)
सम्प्रति : अंग्रेजी विभाग, रीजनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंग्लिश, चंडीगढ़