परख : चिन्ह (पीयूष दईया) : अनिरुद्ध उमट

Posted by arun dev on फ़रवरी 09, 2014















अनुभूति माया है, हम गल्प  
अनिरुद्ध उमट



कुछ कविताएँ अपने प्रवेश द्वार यूँ खुला रखती है कि वे दूर से बन्द नजर आते हैं. अधिक पास जाओ तो वे आपको द्वार बना देती है. इन कविताओं के पास पूरा कहने को कुछ नहीं होता बल्कि उनका आधा हिस्सा आपमें कहीं बैठा होता है, ये आपको भी पता नहीं होता. दोनों इस भाव को एक दूजे को सौंपने के लिए विकल मन से संयुक्त होते हैं. यहाँ जितना अपने लिए अवकाश और अन्धेरा बचाया, बटोरा जाता है उतने की ही कामना अन्य के प्रति भी रखी जाती है. यहाँ अन्य को उसके अपने स्व के प्रति जाग्रत होने की समृति प्रदान की जाती है.
      
यहाँ संवाद के लिए मौन का असीम चुना जाता है. आवागमन में कोई चिन्ह रह न जाए, कोई चिन्ह दृश्यमान न हो जाए.
      
पीयूष दईया इस काव्यप्रदेश में अपनी शब्द साधना करते हैं. उनके कविता संग्रह चिन्हमें लगभग वे स्मरण-संवाद हैं जो सिर्फ उनके यहीं जनमते हैं. यदि हर व्यक्ति अपने आप में संपूर्ण का अंश है और उस अंश होने में सम्पूर्ण है तो कवि होना इस प्रक्रिया में एक अलौकिक अनुभव है. उसका अनुभव संसार और उसकी अभिव्यक्ति तब विधा के लिए नितान्त प्रथमऔर अन्तिमके ओर-छोर पर आवागमन की चरम गोपन प्रक्रिया होती है. काव्य में वह उस दुर्गम और अभेद्य के पार झांकने को विकल रहता है. यह उसकी नियति है. इससे पार पाना या इससे छिटक कुछ अन्य हो जाना उसके लिए संभव भी नहीं. और पीयूष दईया ऐसी कोई छूट लेते भी नहीं है. न ही वे अपने पाठक को किसी सहानुभूति से देखते कोई रियायत देते हैं. वे हिन्दी के कुछेक उन कवियों में हैं जो पाठक को अपनी शर्त पर पढ़ने का आवाहन करते हैं-

आले में खोपड़ी
भरी है गंदे पानी से
देख लें उसमें
अवसान होता
अगोतर की किसी दिनांक का
     
पीयूष की कविताएं अपने होने में विगत में हुए को बिसारना चाहती है. वे नितान्त होती हैं. अर्थ के दृश्यमान होने की संभावनाओं के समक्ष नितान्त अकेली और दृढ़. अर्थ का सतही नकार यहां मंशा नहीं होती बल्कि उसके परे, उससे इतर भी कुछ होने को तलाशना, स्वीकारना है. अधिकांशतः अन्धेरे में अंगुलियां धंसाना है. जो भी अदृश्य है, मौन है, उसे उसकी सहजता प्रदान की जाए. उसे चैंकाया न जाए बल्कि उसके साथ रहने-बस जाने की आकुलता हो. अर्थ से इतर होने का मतलब अर्थहीन होना भी नहीं किन्तु मात्र अर्थ होने की जकड़ से मुक्त होने, करने की मंशा भी है.
      
यहाँ प्रश्न उठता है अर्थ क्या है. क्या जो दीख रहा है, क्या जो स्मृति में है, क्या जो रूप में है, वह है. क्या जो स्पर्श की अनुभूति में समाहित हो जाता है वह है. या हमारे अब तक के अनुभव में एक ढाँचा है जिसमें हम अपना होना देख पाते हैं यानी वह हम नहीं मुख्यतः ढाँचा हम है. यानी हम नहीं मुख्यतः अर्थ हम है. यहाँ कविता कहती है मुख्यतः हम अर्थ है.  मुख्यतः हम अर्थहीन हैं मुख्यतः हम रूप में रूपहीन हैं.
      
कविता जब हर कुछ का बखान हो बिखर जाती है तब यह अनिवार्य हो जाता है कि उस बिखराव को पुनः उसकी मूल अवस्था में लौटाया, समेटा जाए. यह केवल कवि पर निर्भर है कि वह किस तरफ खुद को खड़ा पाता है. और किस तरफ कविता को खड़ी रहने में खुद को खिदमतगार बना पाता है. आप जहाँ हैं वहाँ से आप चीजों को उनके जहाँ भी होने हैं’ होने में खुद को देखते पाने की नियति को स्वीकार कर सकते हैं. और उसी समय चीजें भी जहाँ है वहाँ से खुद को अन्यत्र भी ले जाने में स्वतंत्र होती है. यहाँ दो स्वायत्तताएँ हैं- जो बेहद सधाव की जरूरत चाहती है. स्वायत्त रहने में, होने में भी संतुलन का अनुशासन स्वयं सिद्ध होता है.

ऐसा है वह, यह जाना.
       अपनी बात में
       रहता.

पीयूष का कवि उस उपक्रम, उस स्वायत्तता का वासी है जहाँ यह जाना जाता है कि ऐसा है वह. और इसमें यह आग्रह निहित है कि वह अपनी बात में रहता है. अपनी बात के आवास में वास करता है. यहाँ बात को प्रमुखता दी गयी है किन्तु खुद बात होने की स्वायत्तता  के साथ. उस पर कवि की इच्छा की बात होने का दबाव उतना नहीं है केवल यह मंशा रही है कि खुद बात अपना होना न भूले. अन्य में समाहित होने के निरन्तर दबाव में वह खुद न हो अन्य अधिक हो जाती रही है. जिस वजह से वह और अन्य दोनों ही अक्सर लापता पाए जाते हैं.
      
पीयूष की कविता लापता, अनुपस्थित को निवेदित कर्म है. इसके लिए वे एक ऐसी भाषा रचने को विवश है जो खुद लापता या अनुपस्थित रहने को शापित रही है. उनका यह संग्रह चिन्हउन चिन्हों को छूने, उन्हें पढ़ने-सुनने को प्रस्तुत है जो अपनी संकोची प्रकृति के कारण कभी मुखर हो आग्रह नही करते बल्कि केवल प्रतीक्षा में रहते हैं. पीयूष उस प्रतीक्षा में स्वयं उतरते हैं खुद एक प्रतीक्षा का रूप लिए. उनके कवि के इस रूप को कोई चिन्हित करता है वह कोईकौन है? वह स्वयं कविता है.
      
पीयूष की कविता हिन्दी में मौन को खोदती उसमें धधकने की श्मसानी लपटों और धुँए में उठती गिरती है. वहाँ पाठक आ तो सकता है मगर जाने के सारे मार्ग बन्द होते हैं. वह फिर कहीं और नहीं जा सकता. अपने पाठ में वह इतना धंस जाता है कि उसे अपने अब तक के सारे जाने गए अर्थ और सत्य निहायत व्यर्थ लगने लगते हैं. वह हर बार चाकू की नोक को अपनी शिराओं पर छुआता है- वहाँ सिहरन या आतंक नहीं होता बल्कि अकेलेपन का बीहड़ फड़फड़ाने लगता है.

देखना
जब मैं कविताएँ पढूँ
तब सभागृह में कोई न हो
जैसे भाषा या जीवन में.

पढने वाला
तो कतई नहीं
और सुनने वाला कल्पना तक से बाहर.

और दर्शक भी
न रहे.

आत्मा
जब मैं कविताएँ पढूँ

लिखता हुआ मिलूँ

   
यह कविता इस संग्रह के अपनी भाषा में कवि कहाँ स्थित है का जिस तरह नंगे तार सा पता देती है वह सामान्य अभ्यासी को विचलित कर सकती है. भाषा की निस्पन्द खाल पर यह चाकू सीधा धंसता है. कवि की दुनिया के जटिल, अदृश्य चिन्ह खोजने के लिए जो अन्धेरा चाहिए उसे पीयूष की कविता ने पूरी हठ से अर्जित किया है. जीवन की रहस्यमयता, कौतुक, सार, मर्म यहाँ छुअन से बार-बार फिसल सकते हैं. सिर्फ आपके हाथ में अन्धेरे की लिसलिसी देह होती है. आत्मा यहाँ इतनी व्याप्त है कि उसके होने के कोई चिन्ह कभी प्रकट नहीं होते. यह अतल में जा जीभ काट लेता काव्य है. यहाँ पाठक को अपनी आँखों को अपने सुनने को सबसे पहले व्यर्थ मान त्याग दिया जाना है.
      
अपने आदिम रूप में सिर्फ एक का दूजे के द्वारा भक्षण किया जाना है. सतही लोलुप उड़ान का सर्वथा निषेध करना यहाँ नियति है. यह पाठ की धज्जियाँ उड़ाता कलाकार कुछ ऐसे सूत्रों को प्रकट होने का अवसर देता है जो अन्यत्र पैदा ही न हो पाते. यह कवि प्रथम पाठ में हठी लग सकता है मगर ज्यूँ-ज्यूँ हम पाठ की अवधि व प्रक्रिया बढ़ाते हैं तो पता चलता है उसने उस सुलभता को प्रकट कर दिया है जो दरअसल कभी लक्षित ही नहीं हुई.
      
कवि इस कृति के बहाने हमारे जीवन की विडंबनाओं को चीन्हता है. नियति को उसके नग्न रूप में देखने के लिए जिस साहस की जरूरत होती है, अदृश्य रहने की जो माँग कला करती है उसे पीयूष भरसक पूरी करते हैं. वे अपना विध्वंस तक करने में नहीं चूकते. उनके कलाकार के यहाँ किसी भी तरह की छूट लेने की कोई आकांक्षा प्रथमतः ही निषेध करती है. ऐसा उनके भीतर कौनसा तत्व है जो उन्हें डिगने नहीं देता. जो उनकी कला को हर सुलभता से परे ले जाता है. वह किसी का विकल्प बनने को बेकल नहीं है, न उसके यहाँ किसी अन्य का उस तरह उपयोग है जैसा सामान्यतः कला में स्वीकार लिया गया है. यह तभी संभव है जब कवि अपने कर्म के प्रति अन्तिम सीमा तक विध्वंस के तमाम मार्ग अंगीकार कर लेता है.
      
पीयूष का कवि अपने कर्म को उस रूप तक पहुंचाता है जो साधना के स्तर पर हर कुछ
को देखता हर कुछ से परे रहे- तटस्थ और निर्मम. वे हर कुछ को उसकी प्राकृतिक अवस्था में अपनी कविता में आने का मार्ग देते हैं, जो नग्न है और बीहड़ भी. यहाँ वे ध्वनियाँ वे दृश्य साँस ले पाते हैं जो बेहद गोपन हैं, जो अपने होने के संकोच और जीवट में अकेले हैं. वे सिर्फ हैं. अपने अनगढ़ में वे क्षणभंगुर भी हैं और कल्पनातीत भी है. उस सब का होना जीवन की हमारी समझ का अतिक्रमण भी है. संसार में रहता यह कवि संसार को अहसास कराता है कि उसकी समस्त सर्वव्यापकता कवि के यहाँ आते-आते कितनी बदल सकती है, किस तरह वह एकायामी प्रसंगों को नकार का मुंह दिखा सकता है.
      
जब जीवन को देखने की विधियाँ स्वयं हमारे द्वारा ही सीमित की जा रही हो तब यह उसके प्रतिपक्ष में खड़ा होना बिना अपने कर्म के प्रति निष्ठा के संभव ही नहीं. जो हर बाहरी दबाव को अपने पर लेने से इनकार करता है. कवि को यह दृढ़ता उसके कर्म के प्रति अति-आग्रही हुए बगैर नहीं मिल सकती. पीयूष को यह अहसास उसी शिद्दत से है जितनी शिद्दत से अन्यत्र यह अहसास भी पैठा पाया जाता है कि जो उपलब्ध है वही सत्य और अंतिम है.
      
संग्रह के दूसरे खंड पीठ कोरे पितामें पिता की स्मृति में लिखी गयी कविताएँ शोक, अनुपस्थिति के पाटों के असीमित विस्तार पर तपती है. यहाँ उनका कवि पिता की मृत्यु के बाद के खालीपन में एक मरण जीता है. जिसमें पिता की मृत्यु जीवन प्राप्त करती है

अब आवाज से डरने लगा हूँ
साँस में सिक्का उछालने जैसे

स्वयं को बरजता हुआ
माथे में रुई धुनते हुए-

विदा का शब्द नहीं है.

     
कवि चिता के समक्ष स्वयं एक शव है. उसका संवाद पिता से उसी तरह से है जिस तरह चिता की लपटें अपनी छाया में राख होती है. जो जीवित रह गया है दरअसल कविता में वही मर गया है. और मृतक कितना पार जा सकता है यह एक कलाकार के अपने स्वभाव और प्रकृति पर निर्भर करता है. पीयूष ने अपने कवि कर्म में वह श्मसान घटित होने देने का अवकाश हासिल किया है. कवि शब्दों को उसी ममत्व और निर्ममता से बरतता है जिस तरह धधकती चिता को बरता जाता है. उसके यहाँ असल में जो शेष रह गया है वह मृत्यु है. वह कहीं बाहर विलाप नहीं करता बल्कि अपने भीतर के सन्नाटे में चटखती पसलियों में बिखरता है.
      
कवि पुत्र का पिता से यह संवाद हिन्दी में, जीवन में संभवतः अपने होने में, हर पाठ में अकेला है. अपनी भाषा को शोक और मौन देती ये कविताएँ वह कंधा है जो अरसे से विस्मृत था. यह कितना अजीब है कि कई पीढि़याँ यह जान भी न पाए कि उन्हें कंधे की जरूरत थी और वह वहीं नहीं था.
      
पिता का यह स्मरण कविता को श्मसान के बाहर होने या उसके भीतर होने के भेद को मिटाता है. इसी तरह एक कलाकार अपने पूर्वजों और अपनी कला में श्राद्ध करता है, अपनी विधा की एक एक नस पर उसके चाकू की तीखी छुअन फिसलती है. पिता का स्मरण, शोक यहाँ कला कर्म की पराकाष्ठा है. पीयूष की कविता अपनी भाषा में शोक का स्मरण है जो विस्मरण में हमारे बहुत बड़े हिस्से को खा चुका था. यह वह संसार है जो दरअसल अ-सार है. इसे कला में ही प्रगट होना और विलोपित होना होता है. पीयूष का यह संग्रह अपनी तरह से अपनी भाषा में यह पहली बार करता है. शोक को अपनी आँखे अपने शब्द देना वांछनीय शोकाकुल कर्म है. कवि की मुक्ति की कोई अन्य युक्ति नहीं होती सिवा इसके कि वह अनुपस्थित से अनुपस्थित हो बात करे.

पेड़ से झड़ गया है पत्ता
जगह में
उसकी नजर आता है

दाग

यह समझ लिये जाते हुए
कि पत्ता लगा हुआ था वहाँ

कभी, अनुपस्थिति का आकार मात्र

चिन्ह, उपस्थित रहा.

      
ये कविताएँ संप्रेषण के प्रचलित चैखटों को धत्ता बताती अपनी भाषा को उसके गूंगे हाहाकार से रूबरू कराती है. चीजों का यहाँ होना मात्र ही स्वयं संप्रेषण की देह का सार पा जाना है . एक कवि के तौर पर कौन इससे मुठभेड़ करता है और कौन किनारा कर बच निकलता है यह अदेखा नहीं रह पाता. यहाँ मुक्तावस्था में हर कुछ की विराटता और क्षणभंगुरता का पाठ पनपता है. इस रूप में इस तरह की कलाकृति हर तरह के ज्ञापन-विज्ञापन की पकड़ और जकड़ से बची रह पाती है.  जिसका आदि और अन्त कोई अन्य तय नहीं कर सकता. यह अवज्ञा नहीं बल्कि विनयपूर्वक हठ से हासिल कला का जादुई प्रदेश है जिसे पीयूष की कविता चिन्हकहती है. और खुद अपने लिए दुर्गम-दुरूह का संसार चुनती बुनती है. लोकप्रियता और सार्वजनिकता के शोर में अपनी विधा और अपनी वाणी के प्रति इस कदर हठी न हो तो वह कैसा कवि!


कविता संग्रह- चिन्ह
कवि- पीयूष दईया
संस्करण-2013, मूल्य-150/-
वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली
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अनिरुद्ध उमट
माजी सा की बाड़ी, राजकीय मुद्रणालय के समीप, बीकानेर-334001