सबद - भेद : समकालीन फ्रेंच कविता : मदन पाल सिंह

Posted by arun dev on मार्च 07, 2014

























पेंटिग : Jean Metzinger

मदन पाल सिंह फ्रेंच से सीधे हिंदी में अनुवाद कार्य कर रहे हैं. फ्रांस विचार और कलाओं का केंद्र रहा है, यह लेख समकालीन फ्रेंच कविता की दशा और दिशा पर जिज्ञासा से प्रारम्भ होता है- इसमें विस्तार से फ्रेंच साहित्य के आंदोलनों और प्रवृतियों पर प्रकाश डाला गया है.  हिंदी के लिए समकालीन फ्रेंच कविता परिदृश्य को जानना न केवल रोचक बल्कि ज्ञानवर्धक भी होगा ऐसा मै समझता हूँ. मदन जी को इस उद्यम के लिए बधाई दी जानी चाहिए.



समकालीन फ्रेंच कविता और उसका विधान             
मदन पाल सिंह

जब हम 'समकालीन फ्रेंच कविता' की बात करते हैं तब  एक समग्र कविता-काल के सन्दर्भ में इसकी व्याख्या करते हैं, क्योकि कविता के काल-विशेष को किसी स्पष्ट लकीर के द्वारा विभाजित नहीं किया जा सकता. यह सही हैं क़ि किसी भाव विशेष की सांद्रता किसी काल में अधिक होती हैं और किसी काल में  विरल, समकालीन फ्रेंच कविता को हम रूमानी (जिसमें ह्यूगो का बार - बार लौटने वाला दर्द) और प्रतीकवादी कविता (रैम्बो का चर्चित गद्य -गीत 'सैलाब के बाद' या मलार्मे के दुर्बोध प्रतीको की दुनिया के सन्दर्भ में  उनका मतव्य  की कविता जनप्रिय उपस्कर नहीं अपितु कला बिम्ब का समुच्य हैं) से अलग करके नहीं देख सकते, और न हीं हम इसे अतियथार्थवादी कविता  (पॉल एलुआर द्वारा पिकासो की विश्वविख्यात पेंटिंग 'गुएर्निका' पर लिखी एक कविता के दो रूप या कवि का  दिनप्रतिदिन की घटनाओं को कविता का रूप देने का तरीका) से निरपेक्ष मान सकते हैं. 

संक्षेप में कहें तो समकालीन फ्रेंच कविता किसी न किसी तरह अपने इतिहास का ही अंग हैं. इसके साथ समकालीन कविता 'निर्वात की सहिंता' न होकर समकालीन घटनाओं, द्वंद्व और विकास का भी अक्स है. इनमें से कुछ घटनाएँ  जिनका मनोदशा पर तत्काल और दूरगामी असर हुआ, यहाँ चिन्हित की जा सकती हैं, जैसे  दादा-वाद (स्थापित मापदंडों की अस्वीकार्यता और नये प्रयोगों के प्रति रुझान), औपनिवेशिक युद्ध (कोरिया, अल्जीरिया, इंडोचीन जिनमे फ्रांस के अपने औपनिवेशिक हित थे, उन्हें सभ्य रखना या करने का मत एक ढकोसला था), और फ्रांस में हुई सेक्स क्रांति (१९६० और १९८० के बीच तन और मन के पार देखने की इच्छा अर्थात शरीर और आत्मा को सौपने की स्वतन्त्रता). इसके  साथ ही समकालीन फ्रेंच कविता, विश्व -युद्ध की उस  विभीषिका से भी पोषित हुई है जिसमे रक्त ही नहीं बहा बल्कि  कलम की स्याही की दिशा और दशा भी बदली.

यहाँ यह निवेदन करना जरुरी लगता है कि हम समकालीन फ्रेंच कविता की बात कर रहे  हैं, अतः आधुनिक फ्रेंच कविता का यहाँ विस्तार न किया जाए, जिसके कवि बाद्लेयर, रैम्बो, वरलेन, मलार्मे,पॉल वालेरी, जूल सुपरवेई और ऐरी मिशू आदि हैं. इसके साथ ही किसी काव्य-काल पर की गयी टिप्पणी और उससे जुड़े रचनाकारों की सूची अपने आप में पूर्णता का दावा नहीं करती क्योंकि कला पर लिखा गया लेख, इन्द्रियो की सीमा का भी दर्पण होता है  और जितना विस्तार हम महसूस करते हैं गहराई अक्सर उससे कही अधिक होती हैं.

फिर भी अनेक सामाजिक - रजनीतिक- सांस्कृतिक उद्देलन जिनका उल्लेख पीछे  किया जा चुका है के समान्तर  समकालीन फ्रेंच कविता का आरम्भ  सामान्यत: १९५० के इर्द- गिर्द  माना जा सकता हैं-जहाँ अनेक पूर्वर्ती कवियों जैसे पॉल एलुआर, लुई आर्गो, रेने शार, पॉल क्लॉदेल और सें-जॉ पर्स ने कविता की शक्ति और समरसता में अपना विश्वास व्यक्त किया,  वहीं जॉर्ज बताई, ऐरी मिशू, अन्तोनि आर्तो आदि  कविता के इस संस्कार से असहमति व्यक्त करते हैं. और इससे भी आगे समकालीन कविता के एक बड़े पैरोकार एमानुएल हॅकार 'नकारात्मक आधुनिकता' की व्याख्या समकालीन कविता के सन्दर्भ में  कुछ इस तरह से करते हैं क़ि समकालीन कविता, काव्यशास्त्र से निसृत काव्य- कला के सिद्धांत, भावनाओं, रूप , करुणा आदि से ऊपर  होनी  चाहिए. वहीं क्लॉद जुर्नो इसे 'अज्ञानता के शिल्प' का  नाम देते हैं जिसे  अज्ञात को ज्ञात करने के लिए लिखा जाता हैं यानि इन कवियों और विचारकों के अनुसार कविता, मोक्ष, सांत्वना और भावना से ऊपर हैं और अच्छे -बुरे की पड़ताल या पड़ताल करने का जरिया हैं.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब अतियथार्थवाद (surealism ) का प्रभाव कुछ फीका पड़ना शुरू हुआ, तब १९२० के आसपास जन्मे अनेक कवियों की कविताओ का प्रकाशन १९५० के आसपास हुआ. इन कविताओ को जां तारतेल ने अतियथार्थवाद के 'पटाखे और फुलझड़ियों' के फूटने के बाद की कविता कहा था. समकालीन फ्रेंच कविता के प्रारंभिक कवि थे-  इव बोनफ़ुआ, आंद्रे दू  बूसे, फ़िलिप जाकोत, जॉक दुपै और लोरा गास्पा. इन कवियों की कविता अपने आप में  एक नयी भाषा और शिल्प लिए थी जिनमे विषय को बिना सन्दर्भ और पूर्वाग्रह  के देखने की दृष्टि मिलती हैं. यानि इनकी कविताओं की जिम्मेदारी बिना लाग-लपेट के सीधे दृश्य और व्यवहार को पकड़ने की थी. यहीं फ़िलिप जाकोत एक नयी पारदर्शी भाषा की इच्छा जताते है जिससे आदमी अपने आपको लैस कर दुनिया की कुरूपता और वास्तविकता को देखे. अर्थात ऐसी  कविता जो संसार की वास्तविकताओ से सम्बन्ध तो बनाये पर पूर्वर्ती संदर्भो से मुक्त होकर कविता को एक 'क्लासिक पेंटिंग' की तरह  प्रकट न करे.

यहाँ  कविता में शब्दों का अपना एक खास मतलब है जिसे उनकी चंचलता और सहभागिता के सन्दर्भ में  इव बोनफ़ुआ अपनी एक कविता में इस तरह चिन्हित करते हैं:

'हमारे शब्द, दूसरे शब्दों को बिलकुल भी नहीं खोजते
वे तो सहभागी होते हैं
एक दूसरे के साथ घुले मिले,समान्तर
यदि एक शब्द भी फिसल जाता है
एक दूसरे का साथ वे देते हैं
और ऐसा नहीं भी होगा तो कुछ तो हुआ
हमारी शब्द रचना छितरी-बिखरी
कह सकेंगे शब्दों का उदेश्य पूर्ण हुआ
उनका सन्देश तो पहुँचा'

इन्ही कवियों में एक जॉक दुपै अपनी कविता में निराशा और कविता की भौतिक बनावट को उच्च  शिखर पर ले जाते हैं जहाँ सरसता लगभग विलुप्त  है और नीरव एकांत का द्वंद्व अपने चरम पर प्रकट होता है. अपनी कविता 'तेज हवा' में कवि कहता है:

धूप के नीचे बल खाती
सेल्विआ और लाइकेन पौधों के बीच
पहाड़ी पगडंडी ही हमारी नियति हैं
अनंत रात में, नक्षत्रों  से अभिसार करती
उर्वर जमीन पर
जहाँ सारे दल एक दूसरे से मिलते हैं
फिर बीज हमारी मुट्ठियों में फटते हैं
और शोले हमारी हड्डियों में...

इनसे इतर 'रोसफोर स्कूल' का भी अपना महत्व  हैं जिसकी स्थापना १९४१ में हुई थी. इसके प्रमुख कवि जॉ बूइये, रेने कादू, मिशैल मनोल, फर्ना मार्क, जॉ रुसलो आदि थे. इन कवियों ने अपनी कविताओ में काव्य – शास्त्र को साधने की  सामान्यतः परवाह न करके, संवेदनाओं को सीधे अपनी शैली में अभिव्यक्त करने का रास्ता चुना. इनकी कविताएं भी शिल्प के सन्दर्भ में अतियथार्थवाद के आगे के विकास को प्रदशित करती हैं.

इस तरहकी  भाव - अभिव्यक्ति के बाद करीब १९६० के दसक में  अनेक  संरचनात्मक  प्रयोग (OULIPO :Ouvroir de littérature potentielle ) कविता में दिखाई दिए जैसे  फ्रेंच गणितज्ञ फ्रांस्वा द लियोनू  और लेखक रेमो केंसो के प्रयोग.  रेमो केंसो  ने १० सॉनेट की एक कविता पुस्तिका तैयार की थी. प्रत्येक पेज १४ पट्टियों में विभाजित था और प्रत्येक पट्टी एक कविता पक्ति के रूप में  चुनी जा सकती थी. यद्यपि हम कविता की बात कर रहे है पर यहाँ फ्रेंच लेखक जॉर्ज पेरे के  उपन्यास का भी उल्लेख किया जा सकता है जिसमे प्रयुक्त  किसी भी सब्द में 'E' स्वर का इस्तेमाल नहीं हुआ था. इस संरचनात्मक आंदोलन में जॉक रुबॉ और बेर्ना नोएल  का कार्य भी याद  किया जाता हैं. बेर्ना जापानी कविता 'तनका' की संरचना  से प्रभावित थे. कहने का तात्पर्य हैं कि कविता में अनेक ऐसी  संरचनात्मक  तकनीकों का इस्तेमाल किया गया था जिनमें अलग-अलग प्रतिबद्धताओं का पालन करना था. इस तरह अभिव्यक्ति  की आजादी के प्रयास तो हुए लेकिन कविता अब भी बंधित थी.

यहाँ कला के अवा- गार्द आंदोलन का उल्लेख करना भी जरुरी हैं जिसने समूचे यूरोप को ही नहीं अपितु इससे इतर अनेक संस्कृतियों को भी प्रभावित किया था. इस शाखा के प्रमुख नाम हैं मिशैल देगी, दानी रोश, मारसलेन प्लेने, पियर गारनिये, बर्नार एदसीएक, फ्रांस्वा दुफरेन और ऐरी शोपे.

यहाँ दानी रोश के अनुसार कविता एक ऐसे फ़ोटो की तरह हैं जिसपर फोकस किया जाता हैं और उसका एक फ्रेम भी होता हैं जिससे उसे बाकी दृश्यों से काटा जाता हैं. वहीं जॉक रुबॉ  के लिए कविता संख्या  का  समीकरण हैं. इस आंदोलन के तहत, कविता के साथ अनेक प्रयोग हुए जैसे कविता को चित्र, आकर, संख्या-समीकरण आदि माध्यमों के रूप में व्यक्त किया गया. इसे गियम अपोलिनेर (१८८०-१९१८) की  'चित्र - कविता ' में पहले ही  देखा लिया गया था. लब्बोलुबाव यह है कि  कवियों ने  कविता को फार्मूला के माध्यम से प्रेषित किया. चूकि कविता का प्रस्तुत या अप्रस्तुत विधान मूलतः भावना से जुड़ा है, ऐसी स्थिति में लोगो को यह तकनीकी पक्ष देखकर आश्चर्य तो हुआ लकिन वे इससे गहरे से जुड़ पाए, इसमें संदेह है.  समकालीन कविता में पिएर गारनिये की अवा- गार्द के प्रभाव में रची कविता Drapeau  (झंडा) नीचे दी गयी है जिसमे अनेक कोणों से अर्थ खोजा जा सकता है,
यहाँ:
Drapeau =झंडा
Drape = अस्तर / कपडा / पर्दा / लपेटना
Drap =चादर
Eau = जल




शिल्प की विविधता, भाषा-तकनीक और वाद (जैसे मानुएल हॅकार द्वारा सुझाया गया 'उदासीन और निरपेक्ष भाषा' का वाद ) के सन्दर्भ में जां देव, आन मारी अलबियाक, क्लॉद जुर्नो के मत  से यह स्पष्ट  हो गया कि कविता स्वतः सुखांत स्तुतिगान न होकर एक सक्रियता हैं, एक कार्य हैं जिसमे लॉजिक और व्यावहारिकता हो. लेकिन ये कवि भी मानते थे कि सत्य या वास्तविकता की खोज, शब्दों में या शब्दों के माध्यम से पूरी तरह  सम्भव नहीं है. यानि शब्द, चिन्ह या प्रतीको की प्रतिछाया हैं न कि सत्य  के उद्घाटक. फिर भी इसे व्यवहार के साथ जोड़ने की कोशिश क्लॉद जुर्नो के  इस रोचक  कथन  से भी समझी  जा सकता हैं, जिसमे वह कहते हैं क़ि 'उन्हें यह कहना ज्यादा बेहतर लगता हैं कि भुजा रक्त और मांस से बनी हैं, बनिस्पत इसके क़ि पृथ्वी संतरे की तरह नीली हैं'.

१९७० की कविता के इस तकनीकी रूप की शुष्कता के समान्तर और  उसके बाद १९८० के दशक में, १९५० के आसपास पैदा हुए अनेक कवि सामने आऎ जो अवा- गार्द  के समय व्यस्क हो रहे थे तथा तमाम तरह के सामाजिक परिवर्तन को कौतहूल से देख रहे थे. ये कवि जहाँ मार्क्सवाद और मनोविज्ञान को काव्य से जोड़कर अपना शिल्प बुन  रहे थे वहीं पुराने काव्य से भी दूर नहीं थे. लकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं था कि ये कवि, सोफो, पिन्दार या ह्यूगो का अनुशीलन कर रहे थे और भाषा की लय के साथ भावनाओ का साज बजा रहे थे. कहना चाहिए कि ये कवि शुष्क कविता और सरसता के मध्य में थे. उनके काव्य में उतनी रुक्षता न थी जिसे हम पहले के कवियों की कविताओं में  महसूस करते हैं. चूकि इस समय को 'विचारों की नई लहर' से जोड़कर देखा जा रहा था जैसे 'नया इतिहास', 'नया दर्शन', 'नई रसोई और खानपान' तो इस काव्यात्मक लहर को भी 'नये भावगीतका नाम दिया गया. ये कविताएं  अपने लिए होकर भी  दूसरों पर सोचने के मानवीय सरोकारो से लैस थीं. यहाँ  रिल्के  और मिलोजे  की भी इस सन्दर्भ में याद आना स्वाभाविक हैं. इस काल के कवियों की  अपनी पृथक शैली और वैचारिक विविधता थी. इससे पहले विविधता का विस्तार इतना दिखाई नहीं देता. 'नये भावगीतके  प्रमुख कवि हैं- गी गोफेत, जां पियर लेमेर, आंद्रे वेलते, जां-मिशैल मालपुआ, जेम्स साकरे, बेनुआ कोनोर,फ़िलिप देलावो, जां -इव मासों आदि. दूसरी और जॉक रेदा, मारी-क्लेर बान्कार, जॉक दरास आदि ने भी इन कविताओं में महत्वपूर्ण योगदान किया.
जॉक रेदा अपनी कविता में कहते हैं:

मुझे सुनोंमत डरो
मुझे तुम तक कोई बात पहुचानी है
जिसका कोई नाम नहीं, मेरी भाषा में शब्द नहीं
में जानता हू जिस भाषा को
बस कोई बात, न कोई विस्तार, न ही गहराई
और बंधनो से भी दूर(बस धीमी और कमजोर)
मुझे सुनों, डरो मत ,कोशिश  करो समझने की मेरी चिल्लाहट को...

और कवि गी गोफेत का मानवीय  सरोकार उनकी कविता में कुछ इस तरह से प्रकट होता है :

और सबके बाद लगा यही
कि आदमी घर में रहने के लिए बना ही नहीं
वह तो जंगल में बसे
और उस पर भी
गिलहरी या अफ्रीका के बन्दर की तरह नहीं
जो या तो सहमें रहते हैं या धमाचौकड़ी मचाते हैं
लेकिन हाँ, पछियों की तरह
पर  उस पर भी
न  सोन चिरैया की तरह बातूनी
न ही नीलकंठ की तरह आवारा जो करता रहता शैतानी
न हीं, फार्म हाउस का बिगड़ा खूंखार कुत्ता
न एक टूटा दरवाजा जो खड़खड़ करता
लेकिन हाँ, एक पछी कि तरह जो लम्बी उड़न भरे
सुदूर गगन में
और सिर्फ नीचे आए जब वह आराम करे
और सुदूर की वह दे  जानकारी
बदले में वह ताजा रक्त चखे
खुद को झोकने से पहले
आकाश की शान, गुमनाम ख़ामोशी में...

इन दिनों फ्रेंच कविता अनेक फॉर्म में लिखी जा रही है. ज्यादातर कविता मुक्त छंद में है पर भावना के बारीक़ और व्यापक छंद से मुक्त नहीं. लगता हैं जैसे अब कविता, चित्रकला  के अधिक निकट हैं. जहाँ छंद कभी अभिव्यक्ति में बाधा बने थे वहीं अब लगता है कि शब्द भी अभिव्यक्ति को नहीं साध पा रहे हैं. अर्थात अब शब्द कूची के रूप में कथ्य के ऐसे चित्र बना  रहे हैं जो कभी स्पष्ट होते हैं और कभी कहीं बहुत दूर से दिखने वाले धुंधले दृश्य की तरह भी लगते है. लेकिन इस तथ्य को सिर्फ नकारात्मक तौर पर देखने का मतलब, समकालीन कविता के साथ और खासतौर पर आज की कविता के साथ नाइंसाफी करने जैसा होगा. इसे कविता का संक्रमण काल न कहकर, समाज का संक्रमण काल कहना चाहिए. या दूसरे सब्दो में इसे 'संक्रमण काल की कविता' कहना वास्तविकता के ज्यादा निकट लगता है. यही दृश्य जिसे १९८१ में जन्में युवा कवि माथ्यास विनसेनो, २०१३में प्रकाशित अपनी कविता 'गांव में जिंदगी के चेहरे' में दिखाते हैं:

कर्ज, पीले मेजपोश पर रखा टीवी
और भूली- बिसरी पुरानी CD
जो देश और दुनिया की खबरो पर शहीद हो गयीं हैं,
बेरोजगार भत्ता पाने वालों की बढ़ती संख्या
और असंतुष्ट लोगो की शिकायत
ऐसे ही ग्राहकों की चिल्ल- पों से शराबखाना आबाद  है.

गांव का खस्ताहाल कारखाना
कामगारों को निकाल चुका है
अब आंद्रे को अपनी बारी का इंतजार है
पचास साल के जीवन -अनुभव से पका
अवसाद दूर करने की दवा
साहस से जीने में मदद  करती है
और रोने के विरुद्ध भी
तो जीवन पहले से ही ऐसा है.

चौका-बर्तन का काम  करने वाली जॉन बेहाल,
कभी थोडा बहुत काम दिन में और कभी कभार मिल जाता है रात बेरात
आर्थिक मंदी की लहर
अब उसके चौका-बर्तन को ही डुबो रही है...

और यहाँ जां पियर  भी है
काम से निकाला गया मैनेजर
न कि  कम्पनी का मालिक,
उसकी सुनवाई भी होगी
लेकिन प्राथमिकता सूचि से बाहर.

जनाब  जो अपने पुस्तैनी घरेलु व्यापर को बंद करने वाले  हैं
बेहिसाब टैक्स
और अजीबोगरीब कायदे कानून, मीन -मेख से आजिज हैं.

जैसा कि कहा जाता है 'यही जिंदगी है'
शिकायत न करो, सीने में गुबार दबाओ
और परेशानियों को निगल जाओ
फिर शाम के ८ बजे, टीवी पर खबर
लोग फट जाते  हैं
समाज से जुडी योजना, वादे और ढुल्ल-मुल्ल ख़बरो की तफ्सील पर,
सब लोग परेशानियों से बेजार
अब कोई खास फर्क भी नहीं पड़ता...

१९७१ में जन्मी युवा कवयित्री सांदरीन रोतिल तिफेनबाक 'शब्दो में निरुत्तर व्यथा' को  अपनी कविता 'एक रात' में इस तरह शब्द देती हैं:

  मै नहीं जानती कि
 मेरे हाथ मेरी आँखों को पूरा छिपा लेंगे
 जिनके नीम अँधेरे में, मैं दुनिया को फिर खोज लूँगी

 मैं नहीं जानती कि
 मैं कहाँ चकनाचूर करू? घर के भेदी इन दोषी सीसों को
 जिनमें मेरी छायाएं प्रेत -सी लहराती हैं...

जो भी हो कविताएं लगातार लिखी जा रही है और पढ़ी भी जा रही हैं. समकालीन फ्रेंच कविता में अनेक प्रयोग भी हो रहे हैं जैसे ओलिविए कादीओ ने अपनी कविता पुस्तक 'ला आर्त पोएतिकके माध्यम से किया है, जिसमे कविता का एक हिस्सा काटकर उसको नए  रूप में  विकसित किया जाता है. और जब हम कविता के लिए जागरूकता की बात करते  तो उन अनेक संगठनो  का प्रयास याद  आता है जो कविता के त्यौहार और समारोह आयोजित करते हैं, जिनमे स्थानीय प्रतिभागियों  के साथ बहुत से देसी- विदेशी कवियों को काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया जाता है. कविता का संगीतमय मंचन भी होता है और कविता की पुस्तिकाओं से लेकर कविता के भारी संकलनों का प्रकाशन भी. अनेक प्रकाशन गृह कविता के प्रकाशन के विशेषज्ञ हैं. पाठ्यक्रम में भी समकालीन फ्रेंच कविता की उपस्थिति में वृद्धि हुई है.

आज के फ्रांस के कुछ कवि हैं: आंद्रे वेर्दे, जां क्लॉद रेनार, लुई कालाफेरत, जां ब्रेतो, बेर्ना देलवेल, जां-मिशैल मालपुआ, मिशैल ऑल्बेक, एमानुएल मोस, क्रिस्चिया विगिए, फ़िलिप बेक , एमानुएल इरिआ, नथाली किनतेंन,ओलिविए कादीओ, पियर अल्फेरी, एरिक सोतु, वालेरी रुजो, क्रिस्तॉफ दोफै, सांदरीन रोतिल तिफेनबाक, माथ्यास विनसेनो, क्लॉदीन एल्फ आदि .

आज के दौर की कविताएं कभी दूर से और कभी अंदर बिलकुल पास से आवाज देती हैं और यही उनका हस्तक्षेप है जो सतत जारी है. यहाँ फ्रेंच कवि सें-जॉ पर्स के नोबेल पुरस्कार समारोह में दिए  भाषण  के कुछ अंशो को उदृत  किया जा सकता हैं जिससे कवि और काल के आपसी सरोकारों का खुलासा होता है:


"सच तो यह हैं कि मानव मस्तिष्क की किसी भी रचनात्मक प्रक्रिया में सर्वप्रथम काव्य का सवरूप  ही प्रकट होता है...ज्ञान की अपेक्षा काव्य जीवन जीने का एक तरीका है. ...कवि प्राचीन काल में गुफाओं में भी रहे थे और इस परमाणु  शक्ति संपन्न काल में भी उपस्थित हैं...जब मिथक भग्न हो जाते है तब हम उन्हें कविता में खोजते हैं...कवि के लिए इतना ही काफी है क़ि वह अपने समाज और काल का दर्पण होता है"...
_________
मदन पाल सिंह
(01/01/1975, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के एक गाँव में)
कवि और अनुवादक
बी. एस-सी. (जीवविज्ञान) मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ.
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली के रशियन भाषा संस्थान में 2 वर्ष अध्ययन.
फ्रेंच सरकार की छात्रवृत्ति के अन्तर्गत बोर्दो बिज़नेस स्कूल, बोर्दो से अन्तर्राष्ट्रीय बिज़नेस और कल्चरल मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री.
पिछले 4 वर्षों से एक फ्रेंच कम्पनी में कार्यरत.
फ्रेंच कविता के अनुवाद की श्रृंखला   पर कार्यरत
फ्रेंच कविताओं के दो संकलन  वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर से प्रकाशित
शार्ल बादलेयर और ला फान्तेन की चुनी हुई कविताओं का संकलन भी वाणी से  आने वाला है.
madanpalsingh.chauhan@gmail.com______
कुछ फ्रेंच कविताओ के अनुवाद यहाँ पढ़े.