मंगलाचार : नूतन डिमरी गैरोला

Posted by arun dev on जून 17, 2014












केदारनाथ की आपदा की पृष्ठभूमि में लिखी इन कविताओं में अभी भी वह अनुत्तरित प्रश्न मौजूद है कि इस विपदा के पीछे कितना मनुष्य है कितनी प्रकृति.   






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एक जंगल काफल का

वहाँ हवाएं खिलखिलाती थी 
बच्चों की हँसी के साथ
हरे हरे पत्तों के बीच
हाथ में डोल लिए
एक गाँव की एक पीढ़ी
काफल बीनते बच्चे,
लाल लाल रस से भरे काफल
झरझरा रहे थे
पेड़ से गिर कर जड़ के पास ..

यकायक पूरा जंगल ही गिर गया
जड़ें उखड गयी आसमान की
और पत्ते, जंगल, बच्चे
हाहाकार में हो गए दफ़न
सदा के लिए हो गए मौन..

गाँव से आने वाली हवाओं में
गूंज रहा अविरल विलाप

एक पीढ़ी की कहानी
जंगल से तब्दील हो चुकी है

पहाड़ के बीच उभरे बेहद नुकीले पथरीले
बंजर रेगिस्तान में.



और तलाश जारी है

टूट गया पहाड़ धरधरा कर
सैलाब बन गयी 
मंदाकनी, असिगंगा, अलकनंदा
चेहरे गुम गए

तस्वीरे हाथ में थाम
नाउम्मीदी का पहाड़
पार करते हैं लोग......
थक जाते है कदम
उम्मीदें हैं कि थकती नहीं.




उस काले दिन

उस दिन
खच्चर और उनके मालिक
शामिल न थे
जिनको होना था शामिल
यात्रियों की आवाजाही में .....

असहयोग से भरा उनका आन्दोलन था
हवाई यात्रा के खिलाफ .....
लोगों की बदहवास नजरें ढूंढ रही थी
खच्चर वालों को
घनघोर बरसात में

भीड़ से पट गया केदारधाम ......
हेलीकाप्टर की उड़ान के खिलाफ
बुलंद आवाजों में हो रही नारेबाजी को
अनसुना करती
प्रलय की सुनामी,
स्थान और स्थानीय लोगो के साथ
यात्रियों को, खच्चर और खच्चर वालों को,
लपेट ले गयी अपने साथ ........

जबकि आन्दोलन का मुख्यनेता
जो था हवाई उड़ान के खिलाफ
हेलिकोप्टर में हो कर सवार
जान बचाता हुआ हो गया 
उड़न छू.



नवेली

वह सजीधजी
नए वस्त्रों को पहनें
मुस्कुरा रही थी
हिमनद को निहारते हुए
पति के साथ
मंदिर के किनारे

चार दिन बाद
टी वी में देखा था लोगो ने
अभिशप्त पहाड़ के दलदल में
छितरी लाशों के बीच
एक लगभग अनावृत लाश

उसकी पतली कोमल उँगलियों को
औजारों से क़तर रहे थे
कुछ सक्रिय कातिलाना  हाथ

वह वही नवविवाहिता थी
जिसने पहनी थी
वेडिंग रिंग


कही और


शायद मैं अपना सब कुछ बचा जाना चाहती थी
तुमसे दूर कूच कर जाना चाहती थी
पेड़, पहाड़, झरने, गाँव
खेत, खलिहान, रहट, छाँव
सबसे दूर कहीं दूर

मेहराब वाली घनी आबादियों में
प्रकृति से छिटक आधुनिक वादियों में 
इसलिए मैंने सांकलों में
जड़ दिए थे ताले

तुम देते रहे थे दस्तक
कि कभी तो दस्तक की आवाज पहुँच सके मुझ तक .

मैंने  कान कर लिए थे बंद
नजरे फेर ली थी.

आकाश मे जब भी उमड़ते है बादल
बित्ता भर खुशी के पीछे हजारों आंसुओं का गम लिए
मैं व्याकुल हो जाती हूँ
कि अबके न कोई सैलाब मचले
अबके न किसी का दिल दहले.
मैं अपनी जड़ों तक पहुँच जाती हूँ
समझने लगती हूँ कि
इन जड़ों के बचे रहने का मतलब
कितना जरूरी है मेरे लिए,
जैसे बनाए रखना पहचान को
बनाए रखना अपने होने के भान को....
नहीं तो सूखा दरख़्त हो जाउंगी
हल्की सी आंधी में
धरधरा के गिर मिट जाउंगी
ढहते पहाड़ों की तरह.
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डॉ नूतन गैरोलाचिकित्सक (स्त्री रोग विशेषज्ञ), समाजसेवी और लेखिका हैं.   गायन और नृत्य से भी लगावपति के साथ मिल कर पहाड़ों में दूरस्थ क्षेत्रों में निशुल्क स्वास्थ शिविर लगाती रही व अब सामाजिक संस्था धाद के साथ जुड़ कर पहाड़ ( उत्तराखंड ) से जुड़े कई मुद्दों पर परोक्ष अपरोक्ष रूप से काम करती हैं. पत्र पत्रिकाओं में कुछ रचनाओं का प्रकाशन.
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