परख : शब्द और देशकाल (कुंवर नारायण) : ज्योतिष जोशी

Posted by arun dev on जून 18, 2014








कुंवर नारायण हिंदी के शीर्ष कवि ही नहीं बहुपठित वैचारिकता से समृद्ध गद्यकार भी हैं. राजकमल से प्रकाशित उनकी कृति, ‘शब्द और देशकाल’ पर आलोचक-समीक्षक ज्योतिष जोशी की समीक्षा इस कृति को समझने में जहाँ मदद करती है वहीँ इसे  पढने की उत्कंठा भी जगाती है.






स ह ज चिन्तनशीलता का आ लो क 

ज्योतिष जोशी 



कुँवर नारायण हिन्दी के शीर्षस्थ कवियों में शुमार हैं जिनकी प्रतिष्ठा एक ऐसे भारतीय कवि के रूप में है जिनके अवदान में सृजन के साथ-साथ चिन्तन का भी कम महत्व नहीं है. अभी हाल ही आई उनकी पुस्तक शब्द और देशकालचिन्तनपरक पुस्तकों की श्रृंखला में उल्लेखनीय है जिसमें कुँवर नारायण ने साहित्य-संस्कृति के अनेक जटिल पक्षों पर विचार किया है. छोटे-बड़े तेईस निबन्धों के इस संकलन में सबसे पहले साहित्य अकादेमी में उनके द्वारा दिये गये 14वें संवत्सर व्याख्यान को देखना उचित होगा जिसे फरवरी 2008 में दिया गया था.

साहित्य के कुछ अन्तर्विषयक सन्दर्भ शीर्षक इस निबन्ध में कुंवर नारायण साहित्यालोचन के उन अनिवार्य तत्वों पर विचार करते हैं जिसकी आवश्यकता महसूस की जाती है. साहित्य और नई आर्थिंक समालोचना पर विचार करते हुए वे मार्था वुडमैन्सी और मार्क ओस्टीन द्वारा सम्पादित पुस्तक नई आर्थिक समीक्षाकी पड़ताल करते हैं जिसमें साहित्य के पाठ और व्याख्या आर्थिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं. इस पुस्तक के बहाने आलोचना में आर्थिक पक्षों पर विचार करते हुए वे पाल डेलनी के निबन्ध हू पेड फार माडर्निज्म (आधुनिकतावाद पर किसका पैसा लगा?) को उठाते हैं और दो महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने रखते हैं- उसमें पहला यह है कि बीसवीं सदी के आरम्भ में इंग्लैंड के साहित्यिक बाजार में आया बड़ा बदलाव तथा दूसरा-वहाँ रेण्टियर कल्चर  यानी लेखकों-पाठकों के एक ऐसे वर्ग का उभरना, जिसके पास हर तरह से सम्पन्नता आई. कुंवर नारायण इसकी तह में जाते हुए रेखांकित करते हैं कि इंग्लैंड में रेण्टियर कल्चरने लेखकों और पाठकों को एलीट वर्गमें तब्दील कर दिया. इस परिवर्तन से सम्पन्न लेखकों का साहित्य, सम्पन्न पाठकों को सन्तुष्ट करना रह गया. आर्नल्ड बेनेट और वाल्टर बेसेन्ट जैसे लेखक यही कर रहे थे जबकि फ्लोबेयर,  एलियट,  जायस और लारेन्स जैसे लेखक अपने समाज की बदली वास्तविकताओं के साथ चलते हुए भी साहित्य की मूलभूत धारणाओं का निर्वाह कर रहे थे. अपने विवेचन में वे मीशेल फूको की इस मान्यता से सहमत दिखते हैं जिसमें फूको कहते हैं कि समीक्षा का एक खुले सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ना आवश्यक है, वर्ना वह अपनी ही शब्दावली और मुहावरों का गढ़ बनाकर उसमें सीमित हो जायेगी.

अपने विवेचन को साहित्य, इतिहास और संस्कृतिके तहत स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं-‘‘समीक्षा ने बहुधा मनुष्य के आर्थिक-सामाजिक यथार्थ को कुछ इस सीमित तरह से परिभाषित किया कि एक बृहत्तर जीवन-यथार्थ की परिकल्पना मानों गौण हो. समीक्षा कुछ मुद्दों पर ठहर गई और ठहरी रही. ये मुद्दे आज भी गैर जरूरी नहीं हो गये हैं लेकिन इनको सोचने के तरीकों और भाषा में बदलाव जरूरी है जिनके जरिये हम अपनी बात कहना चाहते हैं लेकिन ज्यादा प्रभावी तरीके से नहीं कह पा रहे.

कुंवर नारायण भाषा को प्रभावी और खुले सम्वाद पर बल देते हुए कहते हैं- ‘‘.यानी किन्हीं कारणों से जिन समीक्षा-पदोंऔर भाषा की पहुँच संकुचित और कमजोर हो गई है उनमें नई जान डालने के लिए यह जरुरी है कि हमारी साहित्यिक सम्वेदनाओं की हमारे समय की विशिष्ट जानकारियों के साथ ज्यादा उदार, खुले और व्यापक सम्वाद की स्थिति बने. स्वयं अर्थशास्त्र जैसा अर्द्ध-वैज्ञानिक विषय भी जब अपने को अधिक विस्तृत और मानवीय बनाने के लिए साहित्य जैसी विधाओं की ओर देख रहा है, ऐसे में साहित्य-समीक्षा का प्रायः कुछ विमर्शों से आगे न बढ़ना विडम्बनापूर्ण है. कई बार समीक्षा-पदों के संकुचित और एकतरफा होने के पीछे वैचारिक धुर्वीकरण का  भी एक बड़ा कारण रहा है.’’ (पृ.16)

इसी अध्याय में साहित्य और नैतिकता नामक अनुच्छेद में वे विषय का विस्तृत विवेचन करते हुए दो उल्लेखनीय आवश्यकताओं पर बल देते हैं जिनमें एक है- विलुप्त साहित्य की खोज से अधिक महत्वपूर्ण है उपलब्ध क्लैसिक्स के विलुप्त आशयों की खोजतथा दूसरा है-पाठक के साथ साहित्य के जीवन्त सम्वाद की स्थिति का न बन पाना मानवीय स्तर पर दोनों की शक्ति को विपरीत ढंग से प्रभावित करना है. इसी तरह हिन्दी साहित्य में यूरेशियाई अनुभवों की झलक में यूरोप और एशिया के साहित्यिक अनुभवों के माध्यम से श्री नारायण हिन्दी भाषा और उसके लेखन की दुरभिसन्धियों पर विचार करते हुए अंग्रेजी और हिन्दी के शक्ति-सन्दर्भ को खोजते हैं- यदि अंग्रेजी की शक्ति इसके वैश्विक, आधुनिक और व्यावसायिक सन्दर्भों में निहित है तो हिन्दी अपनी शक्ति जन-भाषा के रूप में अपनी गहरी जड़ों से प्राप्त करती है.’’(पृ.33)

अपनी इस स्थापना पर जब वे आज के लेखन को तौलते हैं तो पाते हैं कि ‘‘आज का हिन्दी लेखन इस स्थिति में एक विभक्त निष्ठा का अनुभव करता है-औपनिवेशिक अतीत में जमे उच्चताबोध और परिवर्द्धन आकांक्षी साधारणता के बीच तनाव.’ (पृ.33)
जाहिर है इस परस्पर तनाव की स्थिति में हिन्दी का लेखन उस प्रभाव को नहीं पा रहा है जिसका वह अधिकारी हो सकता है. लेकिन दूसरी तरफ यह भी कह सकते हैं कि यह तनाव और दुष्कर स्थितियों का सामना करने की शक्ति ही शायद हिन्दी को इतना प्रतिरोधक और सहिष्णु बनाने के साथ-साथ इतनी सामर्थ्य देती है कि वह प्रत्येक विलोम को आत्मसात् कर नयी चेतना के साथ बार-बार प्रगट होती है. इसी अनुच्छेद में कविता से अपने सम्बन्ध के बारे में लिखते हुए वे कहते हैं- मैं कविता केवल इसलिए लिखता हूँ कि इससे मुझे सुख मिलता है, जब यह सहज भाव से मेरे पास आती है, मुझे विवश करती है. यह बात कि मनुष्य के सर्वोत्तम सृजन में से कुछ अ-मूल्य हैं और उन पर मूल्य की कोई चिप्पी नही है, मुझे धुँधला सा विश्वास देता है कि कविता का जीवन न तो बाजारों पर निर्भर है, न किसी प्रकार के संरक्षण पर, बल्कि स्वयं कविता के जीवन-इच्छा पर है. राजनैतिक विवशताओं तथा मनोरंजन उद्योग से परिचालित इस विश्व में आज इस उम्मीद और सन्देश के साथ मैं यहाँ आया हूँ कि कविता वस्तु नहीं है बल्कि मानव स्वभाव का अनिवार्य अंश है, जो सौन्दर्यात्मक, नैतिक तथा आध्यात्मिक सम्वेदों में अपने को व्यक्त करता है.’’(पृ.38)

वे कलाओं में एकता और एकता में विविधता का जीवन-दर्शन देखते हैं और श्वोताश्वतरोपनिषद् के एक श्लोक का सन्दर्भ देते हैं-

‘‘नित्यो नित्यानां चेतन श्चेतनानामेको बहूनां यों विद्धाति कामान्.’’

कलाओं के अन्तर्सम्बन्ध पर उनका विश्लेषण बेहद सधा हुआ है जिसमें कलाओं की पारस्परिकता के बीच उनकी आन्तरिकता को भी समझने की चेष्टा है- ‘‘कलाओं के अन्तर्सम्बन्ध कभी सीधे और कभी-कभी जटिल या प्रच्छन्न होते हैं. बहुधा कोई कलाकार जब एक से अधिक माध्यमों में काम करता है तो उसकी रचनाओं में एक सीधे रिश्ते को पहचानना आसाना होता है, जैसे विलियम ब्लेक की कविताओं और चित्रों में रहस्यमूलक रोमैन्टिसिज्म की मौजूदगी, या रोजेट्टी की कविताओं और चित्रों में प्री-रफेलाइटप्रभाव या महादेवी वर्मा के चित्रों और कविताओं में छायावादी रोमैन्टिसिज्म. माध्यमों की विभिन्नताओं के बावजूद एक समान ढंग की सम्वेदना और सोचने के ढंग की एकाग्रता उनकी शाब्दिक और चाक्षुष, दोनों तरह की रचनाओं में स्पष्ट देखी जा सकती है.’’ (पृ.46)

जीवन में साहित्य की जगहपर विचार करते हुए वे जीवनेच्छा और साहित्य-रचना के बीच निकट सादृश्यतादेखते हैं तो महाकाव्यों का अतीत और वर्तमानमें वे स्पष्ट कहते हैं कि भारतीय आधुनिकतामें महाभारत और रामायण दो विशद् सन्दर्भ-ग्रन्थों की तरह रहे हैं. उतना ही भारतीय जीवन में व्याप्त जितना भारतीय जीवन, जन-जीवन और भाषाओं में. इन्हें नकारकर भारतीयता के न तो गहरे ही, न ही उथले आशयों को समझा जा सकता है. वे कल्पना की उड़ानें नहीं, भारतीय यथार्थ का हिस्सा हैं.’’ (पृ.55) इसी अनुच्छेद में वे अपने विश्लेषणों से सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं कि.....गीता मूलतः एक धर्मग्रन्थ नहीं है. उत्कृष्ट कोटि के मनोवैज्ञानिक उपचार का एक विरल उदाहरण है. इसका स्पष्ट तर्क यही है कि उसमें दिया गया उपदेश आपदा में, संकट में फँसे अर्जुन का शब्दोपचार है-ज्ञान के अनेक स्त्रोतों से लिए गये अंशों को मिला-जुलाकर किया गया एक ज्ञानोपचार.

इतिहास और मिथकपर विचार करते हुए कुंवर नारायण का यह कहना बहुत प्रासंगिक है कि ‘‘रामायण के राम और महाभारत के कृष्ण मिलकर भारतीय मानस की वह वृहत् भावभूमि बनाते हैं जिनके पीछे हजारों साल का मिथकीय इतिहास है-जिसे घटनात्मक इतिहास से अलग करके समझना जरूरी है. इतिहास मरता है, पर मिथक कभी नहीं मरता. मिथक बार-बार जन्मता है और हर बार पहले से कहीं अधिक सशक्त और प्रभावी होकर हमारे समय में उपस्थित रहता है. उनका तथ्यपरक इतिहास खोजना उतना ही खतरनाक और घातक हो सकता है जितना तथ्यपरक इतिहास को मिथक बनाना.’ (पृ. 65)

इसी तरह कुँवर नारायण विभिन्न अध्यायों में अनेक ऐसे प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार करते हैं जिनको लेकर हमारे मानस में अब भी विभ्रम बना हुआ है. साहित्य के सामाजिक सरोकार के मानेमें कुंवर नारायण साहित्य के सरोकार को सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक तथा पठनीय तक विस्तृत मानते हैं तो एक अन्य स्थल पर वे साहित्य का दायित्व जीवन-चेतना से जुड़ना स्वीकार करते हैं. शब्द चिन्तन के तहत विचार करते हुए वे एक जगह लिखते हैं कि एक कवि के लिए भाषा-दर्शन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका जीवन-दर्शन. इसी तरह आगे के अनुच्छेदों में वे युद्ध और कविता’, ‘साहित्य, मीडिया और फिल्म’, ‘साहित्यिक पत्रकारिता’, ‘अनुवादकों की ऐतिहासिक देनतथा भाषा के रूप में हिन्दी के भविष्यपर बहुत गम्भीरता के साथ विचार करते हैं.

पूरी पुस्तक में कुँवर नारायण एक ऐसे सजग बौद्धिक और चिन्तक के रूप में सामने आते हैं जिनकी सोच से उस प्रत्येक व्यक्ति की सोच मिल सकती है जिसमें दुराग्रह न हो. पुस्तक में शायद ही कोई विचार ऐसा हो जिसके पक्ष में कुँवर नारायण ने स्पष्ट तर्क और विश्लेषण न दिया हो. पुस्तक में रचना, आलोचना, साहित्य की सामाजिकता, इतिहास और मिथक से लेकर भाषा और संस्कृति के उन सभी जटिल पक्षों पर विमर्श दिखाई देता है जिनसे या तो हम टकराने से बचते हैं या जिन्हें शब्दों के गुंजलक में उलझाने के अभ्यस्त हो गये हैं. जाहिर है, देशकाल में शब्द की महत्ता को विचारणीय प्रश्नों और विश्लेषणों के साथ रखती पुस्तक शब्द और देशकालवर्तमान सांस्कृतिक और सामाजिक चुनौतियों से लड़ सकने की एक कारगर समझ देती है जिनसे एक रचनाकार हर क्षण जूझने को अभिशप्त है. कहना न होगा कि कवि कुँवर नारायण ने अपनी कविताओं की ही तरह अपने विपुल अध्ययन-मनन से इस पुस्तक में जैसी सहज चिन्तनशीलता का परिचय दिया है, वह अनुकरणीय तो है ही, प्रेरक भी है. 
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हिंदी अकादेमी के पूर्व सचिव रहे चुके जोशी जी इन दिनों केन्द्रीय ललित कला अकादेमी, नई दिल्ली में  हिंदी संपादक हैं, 
डी-4/37, एम.आई.जी.फ्लैट, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली-110089