सबद भेद : सविता सिंह का काव्य - संसार : अशोक कुमार पाण्डेय

Posted by arun dev on जुलाई 31, 2014

सविता सिंह अपनी कविताओं में सचेत विचार तत्व के लिए अलग से जानी जाती हैं, उनकी कविताओं में ऐसा बहुत कुछ है  जो पाठ और भाष्य के बाद भी अनावृत ही रहता है जो कि कविता का अपना गुण भी है. इस बहुस्तरीय शब्द-अर्थ सरोकार पर युवा कवि – आलोचक अशोक कुमार पाण्डेय का यह आलेख.

सपनीली आँखों से देखे नुकीले यथार्थ की कविताएँ
(सविता सिंह  का काव्य संसार ) 

अशोक कुमार पाण्डेय

(एक)

सविता सिंह का काव्यलोक और काव्यालोक दोनों हिंदी कविता के परिचित लोक से अलग है. शायद इसीलिए यह अक्सर अदेखा रह गया है. या देख कर भी अदेखा. सुन कर भी अनसुना. वह न उस स्त्री विमर्श के खाँचें में अंटता है जहाँ आह-कराह विषय से लेकर भाषा और शिल्प में अपने सम्पूर्ण नक़लीपन तक पहुँच गया है न राजनैतिक कविता के उस खाँचें में जहाँ राजनीतिक होने का अर्थ क्रूड यथार्थवादी और कलाहीन होना बना दिया गया है. सविता सिंह के यहाँ जो आह है, जो दुःख है और जो राजनीतिक पक्षधरता है वह एक ख़ास तरह के रूमान की शक्ल में सामने आता है. वह रूमान जो सच को काव्यात्मक बनाते हुए उसकी ताक़त  को विरल नहीं घनीभूत कर देता है. जो कविता की सीमा का अतिक्रमण करता है अक्सर और एक पेंटिंग का सा विस्तार ले लेता है. यों ही नहीं काहै कि उनकी कविताओं में ‘स्वप्न’ लगातार उपस्थित है और नीला रंग भी. नीला रंग यानि वह रंग जो आकाश का है और समुद्र का भी. विस्तार का भी और गहराई का भी...शिव प्रसाद सिंह का नीला चाँद! उम्मीद और स्वप्न का रंग- नीला. उनके संकलनों के नाम देखिये ज़रा गौर से, “अपने जैसा जीवन”, “नींद थी और रात थी” और “स्वप्न समय.” इनमें एक निरन्तरता भी दिखती है और द्वंद्वात्मकता भी. स्वप्न समय.  क्या है इन दोनों के बीच का रिश्ता? क्या दोनों एक दूसरे से मुक्त होते हैं? संभव ही नहीं. स्वप्न अपने समय की उपज होते हैं तो समय उन स्वप्नों का जिन्हें समाज देखता है. एक तरह से कहें और आदर्श और यथार्थ का द्वंद्व. यूटोपिया और यथार्थ का द्वंद्व. सामूहिक स्वप्न और निजी स्वप्न का द्वंद्व. सामूहिक समय और निजी समय का द्वंद्व. आख़िर कविता इसी रास्ते पर चलते हुए जागती आँखों या कभी कभी अधमुंदी आँखों से देखा स्वप्न ही तो है? कृष्ण के स्वप्न देखती मीरा से लेकर क्रान्ति का स्वप्न देखते कवियों तक कविता की यही यात्रा तो है. स्वप्न पाथेय भी है कविता का तो पथ भी है. यह अपने जैसे जीवन की तलाश है. यह नींद से रात के होने का एहसास है. सविता सिंह की कविताएँ इसी द्वंद्वात्मकता की कविताएँ हैं.
उनके पहले संकलन में एक कविता है –  “बर्फ़ का इंतज़ार.” इसकी अंतिम पंक्तियाँ देखिये – “अन्यमनस्क बार-बार क्‍यों चाहती हूं वही/जो मुझे उदास करे/ढंक ले.” यहाँ अंत में एक विपर्यय है. चाहना उसकी जो उदास करे. और सिर्फ इस “चाहना” को देखने से काम नहीं चलने वाला. इस चाहना से पहले की जो मानसिक स्थिति है वह है अन्यमनस्कता की और बाद की जो चाहत है वह है ढँक लेने की! जब इन दोनों को ध्यान में रखते हैं तब कविता का अर्थ खुलता है. यह द्वंद्व बिना स्त्री निगाह से दुनिया को समझने की कोशिश के खुलेगा ही नहीं. यह केवल अर्थ विपर्यय से चमत्कृत करने के लिए रचा गया शिल्प नहीं है बल्कि एक स्त्री के जीवन के सतत द्वंद्व की अभिव्यक्ति के लिए चुना गया कला माध्यम है. और यह प्रयोग उनके यहाँ लगातार आता है. “स्त्री होने का संकट” उनके यहाँ लगातार है. इस शीर्षक की अपनी कविता में वह कहती हैं – ..“ अब न जीतने की कोई इच्छा है/ न हारने का भय/ बस ख़ुद को पाने की उत्कंठा है/ यह सब कर लेने का संकट ही मगर/स्त्री होने का संकट है/जो हर सपने का हो गया है.”  ज़ाहिर है इन सपनों को उस नज़रिए के बिना न समझा जा सकता है न ही व्याख्यायित किया जा सकता है.

(दो)

असल में सविता सिंह की दिक्कत यह है कि कवि होते हुए भी वह सिर्फ कवि नहीं हैं. वह राजनैतिक दर्शनों की अध्येता हैं, आधुनिकता पर तो उनका शोध कार्य ही है, स्त्रीवाद की गहरी जानकार हैं और बिहार के एक सामंती परिवार से वाया दिल्ली विश्विद्यालय कनाडा के मैकगिल विश्विद्यालय तक के सफ़र में उन्होंने दुनिया और समाज की तमाम परतों को देखा-जाना-समझा है. इसीलिए उनके लिए यह संभव भी नहीं कि स्त्री की बात करते हुए विगलित सी गलदश्रु भावुकता में बह जाएँ, किन्हीं पुराने प्रतीकों में अवलम्ब तलाशें या फिर देह की आज़ादी के सवाल को बेहद हलके तौर पर लेते हुए एक पापुलिस्ट सा शोर रच दें. “बोध” हर बुद्ध की सुविधा होता है तो संकट भी. जान लेना मुश्किलात दूर करता है तो उन्हें बढ़ा भी देता है. ये मुश्किलात उन्हें कविता की दुनिया में नए प्रयोगों की सहूलियत देती हैं तो उनकी सीमाएँ भी गढ़ती हैं. हिंदी में अक्सर उनकी कविताओं पर पश्चिमी कविता के प्रभाव की बात की जाती है. मुझसे निजी बातचीत में एकाधिक लोगों ने यह कहा है. क्या है यह “पश्चिमी प्रभाव”?
पहली चीज़ तो यह कि उनकी कविताएँ भदेस रोने धोने से मुक्त हैं. क्या यह कविता का गुण है? पता नहीं, पर दोष तो कम से कम नहीं है. दूसरा उनके यहाँ जो भाषा है वह ठस और ठोस गद्य की भाषा नहीं. वहाँ देसज मुहाविरों और शब्दों की कमी है. वह प्रांजल हिंदी की बेहद प्रवाहमान और गतिशील भाषा है जहाँ बिम्ब और रूप विधान बहुत सहज तरीक़े से अपनी जगह बनाते हैं. एक ख़ास लय है उनके यहाँ जो अक्सर ऊपर से देखने पर रूमानी लगती है और भीतर जाने पर यथार्थ के साथ गहराई से विन्यस्त. अब अगर कथ्य के स्तर पर देखें तो इस आरोप की वजूहात और साफ़ दिखाई देती हैं – उनकी कविताएँ आधुनिक स्त्री की कविताएँ हैं जहाँ देश विदेश में चल रही बहसों और सक्रिय आन्दोलनों की स्पष्ट छायाएँ हैं. और यह हिंदी कविता में लगभग दुर्लभ है! यहाँ स्त्री की पक्षधरता केवल भावनात्मक स्तर पर नहीं है बल्कि एक समष्टिगत नवीन दृष्टि के साथ है. यहाँ औरतों के लिए सहानुभूति या फिर श्रद्धातिरेक या स्मृतियों के सहारे कविता नहीं रची गयी है बल्कि दुनिया को औरत के नज़रिए से देखने के उपक्रम के रूप में कविता का एक टूल की तरह इस्तेमाल किया गया है. इसीलिए यहाँ सांद्रता अधिक है और विगलन अनुपस्थित. ज़ाहिर है कि यह आवाज़ हिंदी के स्त्री विमर्श की परिचित आवाजों से अलग है और इसीलिए कई बार अपरिचित लगती है. इसका सम के सुर हिंदी में अब तक उपस्थित कविता से बाहर पश्चिम की उन कवयित्रियों के क़रीब मिलते हैं जिन्होंने वह दृष्टि अर्जित की है तो इसे एक प्रभाव की तरह कहना सुविधाजनक लगता है. लेकिन इन कविताओं में जब आप भीतर उतरते हैं तो इनकी “भारतीयता” का पता मिलता है. मार्क्स जब दुनिया के कामगारों को एक होने को कहता है तो वह सिर्फ पुरुष कामगारों का ही आह्वान नहीं कर रहा था. दुनिया भर की औरतों की दिक्कतें अपने मूल रूप में एक जैसी हैं या कहें कि उनके बीच एक समानता का तंतु उपस्थित है और स्पष्ट है. तो नज़रिए एक जैसे होंगे. लेकिन उस नज़र को हासिल करने के बाद सविता सिंह अपने समाज के भीतर पैठती हैं और यहाँ की औरतों से बोलती बतियाती हुई जो कविता रचती हैं वह पूरी तरह से एक देसज लेकिन आधुनिक कविता संसार है.
उदाहरण के लिए पहले मैं उनकी बहुचर्चित कविता “मैं किसकी औरत हूँ” का ज़िक्र करना चाहूँगा. कविता की शुरूआती पंक्तियाँ हैं –
मैं किसकी औरत हूँ/कौन है मेरा परमेश्‍वर/किसके पांव दबाती हूँ/किसका दिया खाती हूँ/किसकी मार सहती हूँ/ऐसे ही थे सवाल उसके/बैठी थी जो मेरे सामने वाली सीट पर रेलगाड़ी में/मेरे साथ सफ़र करती 
इन पंक्तियों को पढ़ते हुए कैसा दृश्य बनता है आपके सामने? क्या पश्चिम के किसी उन्नत देश की ट्रेन तक पहुँच पायेंगे आप इनके सहारे? सवाल ही नहीं उठता. हिंदी का कोई भी पाठक इन पंक्तियों के साथ किसी क़स्बे से शहर की ओर जाती हिन्दुस्तानी ट्रेन के आरक्षित डब्बे में पहुँचेगा जहाँ सवाल पूछने वाली कोई उम्रदराज़ या युवा शादीशुदा/विधवा/परित्यक्ता का किसी आधुनिक और आत्मनिर्भर दिखती महिला से पूछा गया यह सहज सवाल होगा. (हालांकि कविता में आगे पूछने वाली की उम्र साफ़ कर दी गयी है) लेकिन रुकिए. सिर्फ दृश्य नहीं. सवाल भी गौर से सुनिए “परमेश्वर”, “दिया खाती हूँ”, “पाँव दबाती हूँ”, “मार सहती हूँ”...ये सवाल पूछे नहीं गए हैं, बल्कि देखकर ही मन में उपज गए हैं. और कविता इन अपूछे सवालों में ही है. भारतीयता भी. पति के साथ खड़े होते ये सहज से सवाल कविता को आरम्भ में ही उठान तो देते ही हैं, साथ में उसका पूरा लोकेल साफ़ कर देते हैं. आगे देखिये, जवाब 
सोचकर बहुत मैंने कहा उससे/'मैं किसी की और नहीं हूँ/अपना खाती हूँ/जब जी चाहता है तब खाती हूँ/मैं किसी की मार नहीं सहती/ मेरा कोई परमेश्‍वर नहीं'
और फिर इस जवाब से आश्वस्ति नहीं चिंता का उभरना – “उसकी आँखों में भर आई एक असहज ख़ामोशी/ आह ! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन! यह आशंका और उसके बाद कवि का उसकी आँखों को “अकेलेपन के गर्व से भरने” का प्रयास. यह हिंदी कविता में नया है. अपरिचित है और आलोचक इसका सामना करने में अनभ्यस्त. विवरणों और विस्तार में गए बगैर सविता सिंह यहाँ न तो उसकी आँखों की आशंका और अश्रु को देखकर किसी स्मृति की कन्दरा में जाती हैं न ही उस जैसा होकर किसी भावुक प्रलाप की नदी में बहती हैं और न ही उसके दुखों का कोई सेलीब्रेशन करती हैं. यहाँ उस जैसा हो जाने की जगह एक निर्णायक विच्छेद है नए और पुराने का जो नए को पुराने से काटता नहीं लेकिन पुराने के आगे एक नई राह खोलता है. यह एक लम्बी यात्रा के दो पडावों के बीच का पुल निर्मित करना है. यह “जान गए” का “अनजाने” को स्नेह और अपनापे से अपनी राह पर ले जाने का उपक्रम है. अस्मिता के सन्दर्भ में यह कविता जिस मोड़ पर जाकर ख़त्म होती है वहाँ से सौ राहें फूटती नज़र आती हैं. फटकारों की खाइयों, दुःख के समुद्रों और यातनाओं के पठारों को पार कर आने वाली भविष्य की स्त्री का स्वागत गीत सा रचा जाता है जैसे जो किसी की हो जाने की उत्कट इच्छा से संचालित बलिदान की पुरुष रचित देवी नहीं बल्कि “पूर्वजों के श्राप और अभिलाषाओं” से मुक्त “पूर्णतया अपनी” है. तो अपरिचय का संकट आलोचना का है. कविता का नहीं. कविता तो दुनिया भर के अध्ययन से हासिल की गयी समझ से अपने मुल्क और समाज से बोल बतिया रही है और उसे आगे ले जाने की जद्दोजेहद भी कर रही है. हाँ जैसा कि पहल में विष्णु नागर ने लिखा था, “यह एक आधुनिक, अकुंठित, आत्मनिर्भर स्त्री की कविता है..यह एक स्वाधीन स्त्री की कविता है.” तो उस औरत को अभी तक देश और समाज के साथ साहित्य में भी “विदेशी” समझा जाय तो किमाश्चर्यम?
इसी के साथ हम सविता सिंह की बलात्कार पर लिखी कुछ कविताओं को देख सकते हैं. बलात्कार जैसा विषय अभी हाल तक हमारी सार्वजनिक बातचीत ही नहीं साहित्यिक परिवेश से भी बहिष्कृत रहा है, हालांकि वह जीवन से अनुपस्थित कभी नहीं रहा. मानवता के प्रति इस सबसे क्रूर अपराध को गोपन रखना ही सिखाया गया उन्हें भी जो इस भयावह अनुभव से गुज़र जीवन भर घायल बने रहने को अभिशप्त हुईं. अजीब विडम्बना है कि इस पितृसत्तात्मक समाज ने पीड़ित को अपराधी और अपराधी को गर्वोन्मत्त में तब्दील कर दिया. सविता सिंह की 'ख़ून और ख़ामोशी' तथा  'शिल्पी ने कहा' जैसी कवितायें इस वर्जित विषय पर छायी ख़ामोशी को तोड़ती तो हैं ही साथ में प्रतिरोध का एक स्वर भी बुलंद करती हैं. 'क्यों होती हो उदास सुमन' जैसी कविता नैराश्य के गहन अन्धकार में ख़ुशी की राह ही नहीं दिखाती बल्कि 'प्रेम एक बार होता है' या 'प्रेमी या पति द्वारा परित्यक्त महिला के जीवन में ख़ुशी की कोई जगह नहीं' जैसे मिथक को भी ध्वस्त करती है और 'याद रखना नीता' जैसी पितृसत्ता के जाल को काटती कविता के साथ मिलकर बलात्कार जैसे इस क्रूर अनुभव के दर्द से लेकर उसके प्रतिकार और उसके बाद भी जीवन में तमाम रौशन सुरंगों के शेष रह जाने का एक ऐसा आख्यान बनाती है जो मुझे स्त्रियों के लिए यातनागृह बने देश के इस अन्धकार से भरे  माहौल में उम्मीद के कुछ उजले कतरों से भरे धूसर आसमान की तरह लगता है. इस नष्ट कर देने वाले अनुभव के बरक्स वह उम्मीद के मद्धम रास्ते दिखाती हैं – “ख़ुशी के लौटने के भी हैं कई नए रास्ते/ जैसे दुःख की होती हैं अनगिनत सुरंगे.” ये कविताएँ पितृसत्ता के जाल में फंसे किसी भी समाज की कविताएँ हो सकती हैं. इनकी संवेदना किसी देश की सीमाओं में नहीं बंधती. नीता किसी भी मुल्क की औरत हो सकती है, सुमन की उदासी किसी भी देश की लड़की की उदासी हो सकती है. यह लोकल होते हुए भी ग्लोबल संवेदना की कविताएँ हैं. 
लेकिन इन्हीं के बरक्स यह भी कि उनकी तमाम कविताओं में गैर भारतीय सन्दर्भ आते हैं. “शैटगे : जहाँ ज़िन्दगी रिसती है” जैसी कविताओं में भी नहीं अपितु उन कविताओं में भी जिनका लोकेल भारत के भीतर है उनके यहाँ किसी अन्य देश के बिम्ब और सन्दर्भ प्रचुरता से आते हैं. लेकिन क्या यह कविता की दुनिया में पहली बार है और क्या यह कविता के देसज होने को बाधित करता है?  मुझे ऐसा नहीं लगता. ज्ञान वह पहला परिक्षेत्र है जो तमाम वस्तुओं के पहले भूमंडलीकृत हुआ. मुक्तिबोध जैसा कवि जब अँधेरे में जैसी अद्भुत फैंटसी रचता है तो वह गांधी से भी संवाद करता है, मार्क्स से भी और ताल्स्ताय से भी. वहां तो यह शुद्ध ज्ञानात्मक संवेदना के तहत होता है. सविता सिंह के साथ उन बिम्बों का परिचय भौतिक भी है. तो वहां यह संवेदनात्मक ज्ञान के स्तर पर भी घटित होता है. शैटगे जैसी कविता में तो दरअसल यह एकदम दूसरे स्तर पर घटित होता है. शहर के बाहर के इस टापू पर मिली “सूजी आँखों वाली सुन्दर एलेना” जब बताती है कि “दुःख आ अपना आह्लाद है” और फिर वह बौद्ध भिक्षुणी तथा उसका जीवन जिस तरह इस अपेक्षाकृत लम्बी कविता में आता है वह दूर देश की उस अपरिचित महिला को जैसे हमारे बीच ला कर खड़ा ही नहीं कर देता बल्कि दुनिया भर की औरतों की भावनाओं, दुखों और पीड़ाओं में जो साम्य है उसे बिना कहे प्रकट कर देता है.

(तीन)

असल में सविता सिंह की कविताएँ अक्सर निष्कर्षों नहीं प्रक्रियाओं की कविताएँ हैं.  वहां भाषा एक मुक्तिकारी भूमिका भी निभाती है और संवेदना के साथ एक द्वंद्वात्मक संबध भी स्थापित करती है. यहाँ देह जिस तरह से एक रूपक में तब्दील हो जाती है वह हिंदी कविता में एकदम अनूठा है. देह, नींद, रात और स्वप्न सविता सिंह की कविताओं के सबसे प्रमुख अवलम्ब हैं और ज़ाहिर है मृत्यु भी. अपने ताज़ा संकलन “स्वप्न समय” की पहली ही कविता में वह लिखती हैं – “ वैसे यह जानना कितना दिलचस्प होगा/किसकी नींद है यह/किसका स्वप्न है यह संसार.”  यहाँ “जीवन जैसे अपना ही हाथ है किसी पत्थर के नीचे उल्टा पड़ा हुआ और इसे सीधा करने का यत्न ही सारा जीवन.” यह बिम्बविधान हमारी भाषा के लिए नया है. स्वप्न का यह रूपक पलायन के सन्दर्भ में नहीं, न ही किसी उत्कट आशावाद के. यह जीवन यथार्थ की तमाम परतों के बीच सतत चल रहे जीवन और उसके द्वंद्वों के रूपक की तरह आता है. उस स्वप्न में अपने ही हाथ को सीधा करने की जद्दोजेहद है, इसके खुद ब खुद सीधा हो जाने की फैंटसी नहीं.
ऐसे ही देह उनके यहाँ लगातार उपस्थित है. अपनी कामनाओं के साथ और अपनी अतृप्तियों के साथ भी. परिचित भी अपरिचित भी. मुग्ध भी सशंकित भी. उदात्त भी और सावधान भी. घटित और अघटित के आतंक के बीच भी वह अपने ही भीतर किसी अजानी कामना से गिरती है. उनके यहाँ अन्धकार का रंग नीला है. विस्तार और गहराइयों का रंग. यह किसका अन्धकार है? स्वप्न की आंख का? रात के विस्तार का? नहीं, यह स्वप्न के भीगे चुम्बन से रंग बदलती देह का नीला विस्तार है. लेकिन रुकिए नीला रंग सिर्फ उदात्त ही नहीं. मार से पड़े नीले दाग...आँसुओं के खारेपन से आँखों के नीचे उभरते धब्बे! स्वप्न का चुम्बन कहीं उन्हें थोड़ा और सह्य तो नहीं बना रहा! आखिर नीला रंग भी तो इकहरा नहीं होता. अपनी ही एक और कविता में वह पूछती हैं कि “नीले रंग में होते हैं और कौन कौन से रंग”. “स्वप्न और प्यास” शीर्षक जिस कविता में अंतिम पंक्तियाँ पहले कोट की हैं मैंने उसका आरम्भिक पैरा बहुत गौर से पढ़े जाने की मांग करता है. “किसी ने सुनी है वह साँस हवा की/ जिसमें चलती रहती है यह प्यास जीवन की.” जीवन ... जीवन की गति और प्यास की सततता. और यह प्यास “सूनसान में पैदल चलती हुई लड़की” जैसी है. सूनसान...इतनी भीड़भाड़ भरे जीवन में सुनसान!  साँस का चलना उम्मीद का चलना है लेकिन किसी अवश प्रक्रिया का अपनेआप चलता रहना है और जीवन की प्यास भी उस अवशता से मुक्त कहाँ है? भीड़भाड़ के बीच यह प्यास अकेला करती है तो भटकाती भी है. स्वप्न...उस प्यास को उपजाते हैं तो उनसे उपजते भी हैं. मुक्ति की कामना के स्वप्न? लेकिन फिर मुक्ति क्या है? देह और मुक्ति. स्वप्न और मुक्ति. जीवन की मुक्ति क्या मृत्यु है? स्वप्न की मुक्ति क्या उसका सच हो जाना है? उस पैदल चली जाती लड़की की मुक्ति कहाँ है? तो इतनी सरल सी दिखने वाली कविता कितना उलझाती है. किस क़दर सवालों के झंझावत में ले जाकर खड़ा कर देती है. यही सविता सिंह की ताक़त है. संश्लिष्टता. भाषा को बरतने का कौशल और विचारों के साथ संगुफित संवेदनाओं का विस्तृत संसार रचने की कला उन्हें अलगाती है समकालीन कविता परिदृश्य से तो उसमें एक नया आयाम भी जोड़ती है. यहाँ अंत में जो अक्सर विपर्यय है, वह इसलिए कि यह सवालों का कोई बंधा बंधाया हल देकर या चमत्कार का कोई दृश्य पैदा कर इन सवालों को छोटा नहीं करती बल्कि पाठक को इन सवालों के साथ छोड़ उसकी संवेदना का विस्तार करती है, उस प्रक्रिया में उसे शामिल करती है. इनका अर्थ जान लेने की ख़ुशी और संतोष पाठक को आसानी से नहीं मिलता...हाँ अपना पाठ सुरक्षित रख लेने की एक असुविधा ज़रूर मिलती है.
और यह जो आशंका है कविता में, दूसरों को लेकर जो झिझक है, जो द्वंद्व है वह उससे अनजान नहीं. वह जानती हैं कि “यह जो झिझक है/थोड़ी बहुत दूसरों को लेकर/वह कविता की ही है” और यह झिझक इस समाज में मिट भी नहीं सकती जहाँ स्त्री अन्या है, जहाँ उसे अपनी अस्मिता को लेकर आश्वस्ति नहीं भय है. यहाँ अपनी भाषा के भीतर तो वह जंगल में बहती नदी सी बेफ़िक्र है लेकिन बाहर स्वाभाविक रूप से आशंकित है. इस झिझक को वह “ख़ुद झाड़ लेगी/ जब वह नया समाज बना लेगी.” इस तरह भाषा उसका सुरक्षित घर बन जाता है, कविता और उसके भीतर के सपने उसका वह शरण्य जिसमें वह अपनी तलाश भी करती है, खिलती-मुदित भी होती है, विस्मित-चमत्कृत भी, उत्तेजित-उन्मादित भी, शांत-सहज भी और इस तरह बाहर की लड़ाई के लिए ताक़त भी हासिल करती है.
तो ये स्वप्न, यह अमूर्तता, यह गोपन, यह अनेकांत, यह एकांत, यह प्रतिसंसार सविता सिंह की कविताओं में एक सुचिंतित कला रूप की तरह आता है और उनकी कविताओं को एक संश्लिस्ट अर्थबाहुल्य प्रदान करता है. यह उन्हें स्वामिनाथन की चिड़िया को देखकर अपने जीवों के उदगार और संताप के बीच अपना एकान्तिक वैशिष्ट्य देख पाने की दृष्टि देता है तो उस सामूहिक संघर्ष का हिस्सा होने का एहसास भी जिससे नई दुनिया का निर्माण होना है. यहाँ उनकी एक लम्बी कविता “चाँद तीर और अनश्वर स्त्री” पर थोड़ी बात कर लेना ज़रूरी है. यहाँ उस दुस्स्वप्न से सीधी भिडंत है. इतिहास की गहन कंदराओं, वन प्रान्तरों में भटकती यह कविता स्त्री के इवाल्व होने की कथा है. जहाँ कभी उसके पूर्वज, कभी प्रेमी और कभी आखेटक के रूप में पितृसत्ता उसके रास्तों को अवरुद्ध करती सामने आती है. यह सफ़र जितना यथार्थ में है उतना ही स्वप्न में भी. इस लम्बी और दुर्घर्ष यात्रा में वह घायल भी होती है, छली भी जाती है, संकल्पबद्ध भी होती है, टूटती भी है और तीर चलाना भी सीखती है. वह उस अन्धकार को अपना बना लेती है जिससे उसके लिए भय की सृष्टि की जाती रही. वह जान जाती है कि अगर खेल में रहना है तो आखेटक से डरना नहीं है. डर और आशंका से मुक्त चाँद की रौशनी और तीर की शक्ति के साहस से उद्दीप्त्त वह हिरणों के झुण्ड में उन्मुक्त कुलांचे भरती है और यह मुश्किल सफ़र उसमें अपनी नश्वरता के साथ स्वयं काम, स्वयं रति होने का एहसास और अनश्वर होने का संकल्प भर पाता है.  

(चार)

लेकिन सविता सिंह सिर्फ स्त्री भर भी नहीं हैं. उनकी कविताओं का बड़ा हिस्सा स्त्रियों की दुनिया से बनता है लेकिन एक बेहद ज़रूरी हिस्सा उन कविताओं का भी है जिनमें विषय के रूप में केंद्र में स्त्री नहीं है बल्कि स्त्री की निगाह से देखी गयीं दुनिया की दूसरी विडंबनायें हैं. समाज और राजनीति को प्रभावित करने वाली साम्प्रदायिकता जैसे पुरोगामी प्रवृत्तियाँ हैं. देश है. दुनिया है. यह स्वाभाविक भी है और ज़रूरी भी. कोई भी संघर्ष इकहरा नहीं हो सकता. अस्मिता विमर्श के नाम पर यह समझ खोखली भी है और अनैतिहासिक भी कि एक स्त्री होने या दलित होने के नाते इन मुद्दों से अलग किसी मुद्दे पर बोलना ज़रूरी नहीं. यह दुनिया की एक ऐसी समझ है जो चीजों को उनके अन्योन्याश्रित रूप में देखने की जगह अलग अलग करके देखती है. जबकि एक समाज वैज्ञानिक हमेशा चीजों को उनके समेकित रूप में ही देखेगा. स्त्रीवाद भी अपने आधुनिक संस्करणों में समाज और राजनीति के बरक्स ही औरत के हालात को देखता है. यह दुनिया को औरत के नज़रिए से देखने का मामला है, सिर्फ दुनिया की औरतों भर को नहीं. उनकी निद्रा में अगर स्वप्न समय बनता है तो अनिद्रा में तैयार हो रहे देश की चिंताओं से भी वह गाफिल नहीं.  
सुदीप बैनर्जी को समर्पित उनकी एक लम्बी कविता है “स्वप्न के ये राग.” अपनी अद्भुत लयात्मकता और अर्थ बहुलता के साथ यह कविता हिंदी की समकालीन कविता की एक अनूठी उपलब्धि है- “मैं जानती थी/ मेरे जानने में बहुत कुछ और था/ जिसे कहने के लिए एक जागी हुई रात चाहिए थी”..जागी हुई रात. जहाँ स्वप्न खुली आँखों के हैं और दुस्वप्न भी. यहाँ जंगल है, जंगलों में रहते हुए भी विस्थापित कर दिए गए लोग हैं, उनके सामूहिक स्वप्न और आकांक्षाएं, उनके जीवन राग...पेड़ों के साथ कटती जिनकी संस्कृतियों की घायल देह है, जिन्हें दिकू कभी नहीं समझ सकता.  उनके संघर्षों और उनकी पीड़ाओं की बेकल ध्वनि है और उनके ढोलों के साथ बजते हुए मुक्ति पथ पर चलने का संकल्प. यहाँ वह एक नई भाषा और नए तेवर के साथ हैं.
ऐसे ही साम्प्रदायिकता पर उनकी कई कविताएँ हैं. “देश के मानचित्र पर” कविता में यातना शिविरों की वेदना है तो “नया अन्धेरा” में अन्धकार की नई ताक़तों की शिनाख्त. इसी क्रम में “मुश्ताक मियाँ की दौड़” जैसी कविता है. यह आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य है कि ऐसी कविताओं में न केवल उनकी भाषा अलग है बल्कि शिल्प भी एकदम अलग. यथार्थ की खुरदुरी और नुकीली ज़मीन पर मज़बूती से खड़ी हो सकने वाली सख्त भाषा और उसके लिए ज़रूरी आदमकद साहस इन कविताओं को रचता है.
इसके अलावा भी मानवीय जीवन की सहज चिंताएँ और सामाजिक-राजनीतिक विडम्बनाओं के चित्र उनके यहाँ बिखरे पड़े हैं. वह इन सब के साथ स्त्री की मुकम्मल मुक्ति के सवाल को जोड़कर देखती हुई आगे बढती हैं बिना किसी अतिरिक्त शोर शराबे को, भाषा को एक कुशल कलाकार की तरह बरतती हुई और विचार को एक दार्शनिक की तरह अंतर्गुम्फित करती हुई.

(पांच)

और यह यात्रा रुकी नहीं है. अपने लम्बे रचनाकाल के बरअक्स वह कविताओं की संख्या बढ़ाने के मामले में कृपण रही हैं. इसका एक कारण गद्य और विचार की दुनिया में उनकी व्यस्तता हो सकता है तो दूसरा जानने के साथ साथ लिखने का मुश्किल होता जाना. फिर भी जितना उन्होंने रचा है वह एक मुकम्मल सी तस्वीर बनाने के लिए काफी है. मेरी कोशिश उसी के सहारे उनकी काव्य प्रवृतियों पर एक टिप्पणी करने की है जिसमें कामयाब होना इतना आसान नहीं, ख़ासतौर पर आलोचना के अनभ्यास के चलते. यह एक पाठक की टिप्पणी अधिक है. एक सहयात्री पाठक की. और इस रूप में ये कविताएँ मुझे दुनिया को एक वैकल्पिक नज़रिए से देखने में मदद करती हैं, राह दिखाती हैं और उस साझे संघर्ष का हिस्सा बनाती हैं. उनकी की हाल में संवेद में छपी एक कविता का सहारा लूं तो विपरीत दिशा में जाती हवा को अनुकूल बनाने, नीड़ तक पक्षियों के लौट आने को सहज करने, नदी के जल के सुरक्षित रहने, लकड़ी सी देह को टूटने से बचाने और धीरज के आँखों में रौशनी की तरह बसने की यह जद्दोजेहद उन्हें जिन रास्तों पर चला रही है वही हिंदी और विश्व कविता का अभीष्ट रास्ता है.  
___________________________ ______________________________
अशोक कुमार पाण्डेय की कविताएँ और आलेख यहाँ पढ़ें.