रंग - राग : हैदर : सारंग उपाध्याय

Posted by arun dev on अक्तूबर 19, 2014








सिनेमा के दर्शक सार्थक फिल्मों की हिंदी की  मुख्य धारा के फ़िल्म-उद्योग से उम्मीद रखते हैं. कभी-कभी कुछ फिल्में ऐसी बनती हैं जो प्रबुद्ध दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान अपनी और खीचने में कामयाब रहती हैं. हैदर ऐसी ही फ़िल्म है- शेक्सपियर के नाटक हैमलेट और कश्मीर के अपने संघर्ष के मेल मिलाप से बनी विशाल भारद्वाज की यह फिल्म  दोनो के साथ कितना न्याय करती है यह तो आप फिल्म देख कर ही जान सकते हैं. बहरहाल सारंग उपाध्याय ने इस फ़िल्म को देख कर इसे देखने की सिफारिश की है. प्रस्तुत समीक्षा हैदर के प्रति रूचि पैदा करती है. 

यथार्थ के छद्म में संवेदनाओं के साथ चुत्‍सपा                 
सारंग उपाध्‍याय

यथार्थ आधा सच होता है और आधा झूठ. आधे सच और आधे झूठ का टुकडा मिलकर छद्म रचते हैं. वस्‍तु स्‍थिति अपाहिज होती है और उलझनों की बैसाखी से अफवाहों पर रेंगती है. निराकरण यथार्थ के भीतर तिलस्‍म रचते हैं. यथार्थ आंख होती है आंख की किरकिरी नहीं. फिल्‍म हैदर निर्देशक विशाल भारद्वाज की आंखों का यही यथार्थ है. जहां कश्‍मीर हैम्‍लेट की तश्‍तरी में परोसा हुआ छद्म है. कैमरे खूबसूरत जगहों से प्‍यार करते हैं और अक्‍सर अच्‍छा काम करते हैं.

बतौर फिल्‍म निर्देशक विशाल भारद्वाज कालक्रम में बह रहे यथार्थ के अनोखे बुनकर हैं. वे अक्‍सर अतीत को वर्तमान में खूबसूरती के साथ बुनते हैं. मैकबेथ (मकबूल), ओथेलो (ओमकारा) के बाद शेक्‍सपियर की महान और कालजयी रचना हैम्‍लेट के जरिये वे इस बार हैदर लेकर आए हैं. एक ऐसी फिल्‍म जिसमें मानवीय मन के भीतरी कोनों से झांकता हुआ कश्‍मीर अपनी उलझन भरी वादियों में कलात्‍मक सौंदर्य रचता है.

विशाल के कैमरे में 1995 का कश्‍मीर कैद है, जो डॉ. हिलाल मीर, पत्‍नी गजाला, बेटे हैदर और उनके समय को बुनता है. डॉ हिलाल मीर पेशे के ईमान को दुनिया में सबसे बडा मानते हैं. इस बात को भूलकर कि राजनीति से बडा और उसके बाहर कुछ नहीं होता. वे घायल उग्रवादी का इलाज करते हैं और उन्‍हें पनाह देते हैं. (विशाल को यह तय करना था कि यह उग्रवादी हैं, अलगाववादी हैं, आतंकवादी हैं या फिर इंतकामी) भारतीय सेना को उन पर देशद्रोहियों से मिले होने का शक होता है. शक यकीन की केंचुली होता है. सेनाएं मानवता की रक्षा करती है, लेकिन मानवता पर उनका यकीन एक शक ही है.

फौज की नजर में डॉ हिलाल मीर (नरेंद्र झा) का धर्म एक अपराध माना जाता है और वे सेना के शिकंजे में होते हैं. लाख समझाइश के बाद भी भीड के बीच अपने पति की हिरासत, पत्‍नी गजाला मीर (तब्‍बू) के जीवन में भयावह त्रासदी की तरह घटती है. एक हंसता खेलता घर एक झटके में लॉन्चर से उड जाता है. यह दृश्य विश्‍व संवेदना का पत्‍थर हो जाना है.

बशरत पीर और विशाल स्‍क्रीन प्‍ले के चितेरे हैं. शक की परतों से यकीन को ढूंढने की फौजी कसरत के दृश्यों में वे एक बेहतरीन कविता का शीर्षक रचते हैं. बाकी की पूरी फिल्‍म दृश्य के जरिये अपने समय के विरोधाभासों की कविता रचती है.

हिलाल मीर का बेटा हैदर (शाहिद कपूर) अलीगढ मुस्‍लिम विवि का छात्र है. कश्‍मीर में उसका आना और सेना द्वारा उससे पूछताछ का पहला दृश्य कश्‍मीरियों के जमीर की अंतहीन तलाशी के अभियान की शुरुआत है. अर्शिया के रूप में श्रद्धा कपूर के पत्रकार का किरदार बंद कमरे में खुली खिडकी की तरह है. तलाशी के दौरान हैदर की मदद को पहुंची अर्शिया से अनंतनाग को इस्‍लामाबाद कहलवा कर विशाल फिल्‍म की संवेदनशीलता के तार छूते हैं. विशाल ने फिल्‍म के संवाद लिखे हैं जो गंभीर हैं.

हैदर को सेना द्वारा गिरफ्तार अपने अबू जी की (पिता हिलाल मीर) तलाश है. तलाश लॉन्‍चर के धमाके में बिखर कर खंडहर हो चुके अपने घर से होती है. घर बाहर नहीं होते बल्‍कि अंदर होते हैं. उनका टूटना मन को मरघट बना देता है. जबकि घर की चीजें आदतों के टुकडे होते हैं जिसमें स्‍मतियां घोसलें बनाया करती हैं और मन को हरा भरा रखती हैं. हैदर धूल धुसरित और जलकर राख हुए घर से स्‍मतियां अवेरता है. निर्देशक ने इस दश्‍य से मनुष्‍य सभ्‍यता को हिंसा के खिलाफ ज्ञापन सौंपा है. यह दृश्य कैमरे को धीरज के साथ काम करने की आजादी देने का संकेत देता है. दश्‍यों से कहानी महकना शुरु करती है.

सुरक्षा की छाया कश्‍मीर के लिए घुटन बन चुकी है. इस घुटन में तानाशाही की दुर्भावनाएं गंधा रही हैं. जबकि जन भावनाएं निराकरण के तिलस्‍म में फंसी हैं. यथार्थ का छद्म हैदर का शिकार करता है. कश्‍मीर पर अब तक बनी फिल्‍मों में यह पहली फिल्‍म है, जिसमें सेना के अमानवीय पक्ष, उसके भीतर के भ्रष्‍टाचार, स्‍थानीय प्रशासन और पुलिसिया घुसखोरी को बेहद सलीके से छुआ गया है. लेकिन बावजूद इसके विशाल के साहस के हाथ यथार्थ की छाया भर आई है, जिसमें झूठ और सच दोनों ही रहे. उनके हिस्‍से का यथार्थ कई सतही प्रयोग के बीच हैम्‍लेट निगल गया.

अबू जी की तलाश में हैदर का सामना अपनी मौजी (मां तब्‍बू) से चाचा खुर्रम के बीच पक रहे प्रेम की छाया में होता है. विशाल पष्‍ठभूमि के संगीत के माहिर आदमी हैं. यहां कश्‍मीरी लोक संगीत के स्‍वर पर्दे के उस पार खडे हैदर के खून में चाचा का फरेब और मां की बेवफाई घोलते हैं. यहां हैदर का संवाद संगीत के सन्‍नाटे को चीर देता है. ये छुप छुप के नाच गाना पहले भी होता था कि अभी अभी शुरु हुआ है, अबू जी के बाद. विशाल यहां हैदर के मन में हैम्‍लेट रचना शुरू करते हैं जबकि बाहर कश्‍मीर ठंड, सर्द हवाओं से उसके मरघट मन को पत्‍थर करना शुरू करता है.

स्‍थानीय पुलिस, आर्मी ऑफिस, और कई जेलों में भटकने के बाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के दफ्तर के बाहर अपनों की तलाश कर रहे लोगों की कतार में हैदर की तख्‍ती भी लटकती है. यह दृश्य फिल्‍म में कश्‍मीर की सबसे कोमल मानवीय संवेदना है, जो बरसों से लहुलुहान है. यह दृश्य दुनिया में हुकूमतों के अर्थ पर सवाल है.

फिल्‍म दृश्य की आंच पर पकती हुई चलती है. हैदर का अपनी मौजी से संबंध, चाचा खुर्रम का मौजी की आंखों में फरेब डालना और इन सबके बीच बंदूकों के साये में बैचेन होता कश्‍मीर, यह सबकुछ फ्लेशबैक में बुना गया है. संपादन अच्‍छा है, लेकिन फिल्‍म की गति को धीमा करता है. कई मायनों में यह एक धीमी फिल्‍म है. दृश्यों के साथ न्‍याय करती हुई. हालांकि इंटरवल के बाद फिल्‍म एक लय में बहती है.

रूहदार के रूप में इरफान की एंट्री आपको वादियों के कोनों में छिपी दुनिया में ले जाती है. ऐसी दुनिया जहां इंतकाम बंदूक थामे है और दिलों में भारत से अलगाव की आग है. फिल्‍म में रुहदार कश्‍मीरियों की रूह है, जो कभी मरती नहीं. यह चरित्र हैदर और कश्‍मीर के मन को जोडने वाले पुल की तरह काम करता है. रुहदार फिल्‍म का बेहद गहरा चरित्र है. इरफान किरदार में बहते नजर आए. उनकी एंट्री पूरी फिल्म में नाटकीयता पैदा करती है. उनका लंगडाकर चलना और आर्शिया से दोहराकर सवाल पूछना उन्हें रहस्यमयी बनाता है. वे किरदार को रूह की तरह जीते हैं. यह आत्‍माओं को जगाने वाला है. वह हैदर के पिता हिलाल मीर के साथ गुजारे गए यातनादायक समय का साक्षी है और छद्मम में भटक रहे हैदर को हकीकत में लाता है. वह हैदर को बताता है कि चाचा खुर्रम सेना की मुखबिरी और पुलिसिया गठजोड करने वाला पैसे का लालची सांप है. आस्‍तिन का सांप जिसने हैदर के अब्‍बू जी को निगल लिया और मौजी की आखों में फरेब उंडेल दिया. रुहदार हैदर के भीतर कश्‍मीर की सिलाइयों से पिता का इंतकाम बुनता है. ‘उन आंखों में गोली दाग देना जिसने तेरी मां की आंखों में फरेब डाला और मां को बख्‍श देना, उसका इंसाफ खुदा करेगा.

‘सच विरोध करना सिखाता और विद्रोही बनाता है, लोग अक्‍सर इंतकामी होना पसंद करते हैं. लेकिन हैदर का सच इंतकामी और विद्रोही होने के बीच का तिलस्‍म है. सच में झूठ और झूठ में सच का भ्रम रचने वाला. यह हैदर का चुत्‍सपा है, जिसे विशाल ने रचा है.

प्रेमिका अर्शिया के साथ कई सुंदर प्रतीकों के बीच हैदर की जिंदगी कश्‍मीर के भूगोल पर आवारा बन जाती है. यहां हैदर का खुदसे बहुत ही खूबसूरत मानीखेज संवाद है. दिल की अगर सुनता हूं तो- तू है, दिमाग की सुनता हूं तो- तू है नहीं, जान लूं कि जान दूं, मैं रहूं कि मैं नहीं.

एक चौराहे पर रेडियो के साथ इकबाल के गीत सारे जहां से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍तां हमारा गुनगुनाकर सोलो प्‍ले करता हैदर, दरअसल हुकूमतों से ठग कर पागल हुआ कश्‍मीर है. वह कश्‍मीर जो बंदूक की नाल में अटका है और अपनी ही झल्‍लाहट में घुटकर मनोरोगी बन रहा है. कुल मिलाकर यह 1995 से आज तक का कश्‍मीर है, जिसके साथ चुत्‍सपा हो गया. ठगे हुए शाहिद की प्रतिभा इसी दृश्य में खिलती है. फिल्‍म में विशाल भारद्वाज के निर्देशन कौशल का यह सबसे दर्शनीय स्‍थल है. इस स्‍थल की खूबसूरती तब निखरती है जब मां नये पति के साथ पुराने बेटे को देखती है और बेटा नये पिता के साथ पुरानी मां को. हैम्‍लेट और कश्‍मीर यहां एकाकार होते हैं.
कश्‍मीर की राजनीति परिवारों को बिखेरती रही है. परिवार के भीतर, बाहर का कश्‍मीर रिश्‍तों में धोखे और फरेब की चिंगारी घोलता है. यह चिंगारी कश्‍मीर में सामूहिक अलगाव पैदा करती है.

मां और चाचा के निकाह का दृश्य बेहद नाटकीय है. भाई की श्रद्धांजलि सभा में भाभी के साथ भाई के विवाह की घोषणा. बेटे के सामने नई शादी के रोमांच में छुईमुई की तरह शर्माती लजाती और सजती हुई मां. नये प्रेमी के इश्‍क में रंगा, पुराने शौहर की स्‍मतियों से पश्‍चाताप में डूबा एक स्‍त्री का मन. बेटे को देख कर कच्‍चे मातत्‍व और शर्मिंदगी में डूबे वात्सल्‍य भर जाने वाला एक मां का मन. अपने ही अंतस में उलझा मौजी हैम्‍लेट का मन है.

निकाह के जश्‍न में हैदर मां को पिता के हत्‍यारे की शक्‍ल बताता है. सुंदर, नत्‍य, कश्‍मीरी लोकधुन पर रमा गीत और रचा संगीत, नाटकीयता से भरा, प्रतीकों के बेजोड प्रयोग से फिल्‍माया गया यह संगीत दृश्य विशाल को दूसरे तमाम निर्देशकों से अलग करता है. वे एक बेहतरीन संगीतकार भी हैं.

फिल्‍म में कई स्‍तर पर उदघाटित होते छोटे-छोटे सच फिल्‍मी होने के संकेतों के बीच फिल्‍मी नहीं हुए हैं. यही निर्देशन की ब्‍यूटी है. अलगाववादियों से हैदर का लौटना, फिर उलझे हुए सच को अपनी आत्‍मा में रख कर उसे निगलने और उगलने के लिए बेचैन होना, प्रेमिका से मिलन, प्रेमिका के पिता का हैदर के पीछे मुखबिरों को लगाना, प्रेमी के खिलाफ पिता का बेटी को भरोसे में लेना, मां का बेटे के साथ टूटता हुआ रिश्‍ता, चाचा का भतीजे को सच बताने के लिए एक झूठे सच को गढना और चाचा और मां के निकाह के दौरान हैदर का बंदूक छिपाना, हैदर के सपने में पिता का आना और चाचा से इंतकाम के लिए कहना, हैदर की दुआ में बैठकर पश्‍चाताप में डूबे चाचा पर पीछे से बंदूक चलाने की नाकाम कोशिश करना फिर अंत में चाचा के कहने पर ही भतीजे को पुलिस दारा पकड कर एंनकांउटर के लिए मुखबिरों संग भेजना सब कुछ विशाल ने शानदार तरीके से संपादित किया है. किसी भी नये निर्देशक के लिए दश्‍यों के माध्‍यम से फिल्‍मों को पूरी जुगुत्‍सा के साथ आगे बढाने की यह सबसे बेहतरीन बानगी है. फिल्‍म के रूप में यह हैदर की जीत है.

पिता का सपना हैदर को उसके आसपस रचे गए तमाम तरह के छद्मों से बाहर ले आता है. दरअसल, यह उसके भीतर की आवाज है. वह आवाज जो पिता के साथ आत्‍मीय प्रेम से उपजी है.

मुखबिरों को मार कर सीमा पार जा रहा हैदर अपनी मौजी से आखिरी बार मिलता है. मां और बेटे की यह मुलाकात दोनों के बीच जमी कई झूठी परतों को तोडती है. संवाद भीतर के अवसाद और गलतफहमियों को पिघला देते हैं. दो हत्‍याएं कर चुका हैदर तीसरी हत्‍या अपनी प्रेमिका के पिता की करता है. वह उसकी अबू जी की यातना का एक गुनहगार है. हैदर अब बर्फीली पहाडियों पर पिघलता हुआ बहता है. तिलस्‍म और छदम से पत्‍थर हो चुकी उसकी आत्‍मा अब हल्‍की हो चुकी है. जो दुनिया के लिए फरार है, लेकिन खुदके लिए आजाद हो रही है. तब्बू के पास अभिनय के लिए बहुत कुछ था. उनके किरदार की भावनात्मक उलझन चेहरे पर अक्सर एक खालीपन के साथ दिखाई पड़ीं. वे एक मंझी हुई अदाकारा हैं. सलमान की जय हो के बाद उनका यह रूप बेहद अलग है.

यहां फिल्‍म में विशाल ने अपनी ही कब्र को खोद कर आराम करना चाह रहे तीन बूढे किरदार खूबसूरत प्रतीक के तौर पर खडे किए हैं. धोखे, नफरत, लूट, खसोट, भय, यातना, हिंसा, खून खराबे और वैमनस्‍य से हांफती समूची मनुष्‍य सभ्‍यता को मत्‍यु की पनाह में आराम का संकेत देते. यह दृश्य हैम्‍लेट और कश्‍मीर के बीच एक ठहराव है. और संपूर्ण मनुष्‍य सभ्‍यता को सोचने पर विवश करता है.

अपने प्रेमी द्वारा पिता की हत्‍या से अर्शिया खामोशी में डूब रही है और प्रेम की अनगिनत और कभी न सुलझने वाली उलझनों में उलझी है. विशाल ने यह दृश्य एक बुने हुए स्‍वेटर को उसी के हाथों उधेडकर उसकी देह पर उलझाते हुए बताया है. दरअसल, यह उसकी आत्‍मा की उलझन है, जो उसके ईद गिर्द रचे समय में उलझ गई है. वह अब मुक्‍ति पाना चाहती है. यह प्रतीकात्मक दश्‍य एक स्‍त्री के सपनों का विडंबनाओं और नियती के आगे मौन आत्‍मसमर्पण है.

अपने अंतिम दौर में फिल्‍म टूटे सपनों, मरती इच्‍छाओं, लालसाओं में फंसे, फरेब से पिटे और सियासत से ठगे कश्‍मीर का प्रतीकात्‍मक चित्र खींचती है. हैदर अब अलगाव की पनाह में है और असलाहों की छाया में सुस्‍ता रहा है. उसी छाया से वह सपनों के जहर बनने पर मत्‍यु का आलिंगन कर कब्र मे दफन हो रही प्रेमिका को देखता है. यह हैदर की रोशनी पर आखिरी नजर है. उसके जीवन के बंद गलियारों में रोशनी और हवा बहाने वाली उसकी खिडकी बंद हो चुकी है. वह भागता हुआ कब्र तक पहुंचता है. यह दृश्य हिंसा और नफरत के अंधेरे में प्रेम की रोशनी का दृश्य है. कफन में लिपटी प्रेमिका की लाश को गले से चिपटाए वह अलगाव के बीहड में प्रेम की बसाहट तलाश रहा है.

झूठ, फरेब, लालसा, नफरत और वासना का, अंत बिखराव होता है. सबकुछ आत्‍मा पर घात है. देह और मन को कुचलना है. भतीजे की मौत में ही चाचा खुर्रम की जिंदगी को पनाह है. लेकिन बेटे पर मां की वात्सल्य की छाया है. मौजी हथियारबंद दस्तों के साथ खड़े पति खुर्रम से कहती है “यदि जिंदगी में मुझसे कभी मोहब्बत की हो तो एक मौका उससे मिलने का दो.‘ लहुलुहान हुआ, भीतर से टूट कर बिखर चुका हैदर बंदूक की गोली की जगह दूर से अपनी मां को आता देख अपने संपूर्ण अस्‍तित्‍व को वात्‍सल्‍य में पाता है. बेटे और मां के बीच रचा गया यह अंतिम दृश्य मां और बेटे का सदियों बाद मिलन संवाद है. दोनों के बीच बहुत कुछ घुलता है और घटता है, सिवाय उस जिद को छोड़, जिसमें हैदर हमेशा हारता रहा, लेकिन वह आज जीतना चाहता है क्योंकि उसे अपने पिता के दुश्मन की आंखों में गोली दागना है, जिसने उसकी मां की आंखों में फरेब डाला. मां उसे लेने आई है. लेकिन वह अपनी जीत में भी, फिर मां से हारता है.

ममत्‍व का कोई अंतिम छोर नहीं होता वहां विस्‍तार अपार है और गहराई अतल. मौजी फिदायीन बन गई. उसके भीतर की आत्‍मा पति के हत्यारे से इंतकाम और बेटे की सलामती चाहती है. वह पश्‍चाताप से मैली हो चुकी आत्मा का घात करती है.

धुएं के गुबार, मांस के लोथडों, लाशों के टुकडों और आधी जिंदगी और आधी मौत के बीच तडप रहे खुर्रम की दुआ कबूल हो जाती है. मत्‍यु के विध्‍वंस के बाद चीखता चित्‍कार करता हुआ हैदर अपनी मां के टुकडे ढूंढता है. वह इस बार ठगा नहीं गया. बल्‍कि वह मौजी को समझने में खुदसे ही ठगा गया. मां ने उसे कभी नहीं छला, छलता उसे कश्‍मीर रहा. मां उसे छल कर भी महफूज करती रही. अफसोस की हैदर मौजी के सच की थाह नहीं ले पाया. इंतकाम की आग हैदर के चेहरे पर है, जिसकी रोशनी में उसे बेबस, लाचार और मौत मांगते चाचा की आंखों में फरेब दिखाई देता है. वह उन आंखों में गोली दागना चाहता है, जिसने मौजी की आंखों में फरेब डाला और अबू जी और उससे धोखा किया. लेकिन वह इंतकाम नहीं लेता. त्रासदी से उजडी उसकी आत्‍मा में मनुष्‍यता की चिंगारी बची है. लाशों के टुकडों, जलते मांस के लोथडों की गंध और घायल आत्‍मा की चीखों का यह दृश्य विभत्‍स और मनुष्‍य सभ्‍यता पर हिंसा के तांडव का है. वासना, छलना, धोखे, नफरत के बीच रचे गए छद्म में आत्‍मा देह से अक्‍सर ऐसे ही मुक्‍त हुआ करती है. कभी कभी मर्जी के खिलाफ आत्‍मा का घात ऐसे ही दृश्य रचता है.

हैदर अश्‍वत्‍थामा है, पता नहीं? क्‍या विशाल ने उसे भटकने के लिए छोड दिया? पता नहीं, यदि हां तो कहां? वह कौन है? क्‍या करेगा? कहां जाएगा? इंतकाम को उसकी आत्‍मा ने धिक्‍कार दिया है और अलगाव ने उसे तबाह कर दिया. इन सबके बीच क्‍या वह कश्‍मीर का प्रतीक है? या प्रतीक की छाया भर या चिहन या फिर संकेत?

दरअसल हम सब भी कश्‍मीर को लेकर एक छदम भरे यथार्थ में जी रहे लगते हैं. कश्‍मीर की नियति भटकाव की है? हिंसा भरे अंत के साथ हैदर फिल्‍म खत्‍म हो जाती है, लेकिन सवालों को छोड जाती है. जो बेहद अनसुलझे हैं. कश्‍मीर की भारत से आजादी को पहली बार इस हिम्‍मत के साथ पर्दे पर दिखाया गया. इस दौर में किताबों की पहुंच सिनेमा जितनी नहीं. विवादों के बीच फिल्‍म का रिलीज होना और कई सिनेमा घरों पर नहीं दिखाने के लिए दबाव बनाया जाना और बावजूद इसके फिल्‍म का चलना, चर्चा में आना और कश्‍मीर पर फिर से सवालों को मथने की प्रक्रिया को शुरु करना. यह कामयाबी से कम नहीं. निश्‍चित यह फिल्‍म कश्‍मीर को लंबे समय तक जिंदा रखेगी. और हिम्‍मत के साथ आगे बढकर और फिल्‍म बनाने के लिए भी. संभव हो पैसा कमाने के लिए, कलात्‍मकता दर्शाने के लिए. उस सच और यथार्थ को बताने के लिए जिसका एक हिस्‍सा हमारे हाथ लगा ही नहीं. क्‍या हमारी कश्‍मीर पर प्रयोग की इच्‍छा है? कश्‍मीरियों की आजादी दूसरे मुल्‍क की गुलामी भी हो सकती है या फिर एक नृशंस हत्‍याकांड मचा रहे आतंकी समूह आईएस की हुकूमत की, जिसके झंडे वहां फहराए जा रहे हैं और जिसके दीवाने दुनिया भर के युवा हो रहे हैं. लडकियां अपनी कोख से बर्बरता, नशंसता और जंगली कबाइलियों से भी पिछडे, कुंद, मंद समाज को बनाने के लिए लडाके पैदा करने जा रही हैं, उसे अपना सौभाग्‍य मान रही हैं.

दीवानगी में डूबे नशे की परिणिति बिखराव के साथ भयावह तबाही लाती हैं. कई सल्‍तनतें इसका उदाहरण हैं. घटनाओं की खबर आधा सच होती है, लेकिन पूरा नहीं, यही सबसे बडा खतरा है. आधा और अधूरा अक्‍सर यथार्थ ही होता है. सच और झूठ दोनों की उपस्‍थिति के साथ मौजूद. कश्‍मीर भारती के अंधे युद्ध का प्रतीक तो नहीं?

विवादित, ज्‍वलंत और जनभावनाओं के उछाल को सुनामी में बदलने वाले मसलों और विवादों के राजनीतिक हल उन्‍हें होल्‍ड पर डालने से बेहतर कभी नहीं रहे हैं.  हैदर हैम्‍लेट के ढांचे में कश्‍मीर की अधूरी, हल्‍की सी छाया से गुजरती हुई फिल्‍म है जो निर्देशन के तौर पर गंभीर, संजीदा, साहसी और प्रशंसनीय है. यह फिल्‍म हमेशा याद की जाएगी. जो चरित्र छूटे हैं उनकी अदाकारी को इस फिल्‍म का हिस्‍सा बनने के लिए बधाई. बधाई विशाल और उनकी पूरी टीम को एक और अच्‍छी फिल्‍म बनाने के लिए.
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सारंग उपाध्याय (January 9, 1984, मध्यमप्रदेश के हरदा जिले से)
विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में संपादन का अनुभव 
कविताएँकहानी और लेख प्रकाशित
फिल्‍मों में गहरी रूचि और विभिन्‍न वेबसाइट्स और पोर्टल्‍स  पर फिल्‍मों पर लगातार लेखन.
फिलहाल इन दिनों मुंबई से निकलेन वाले हिंदी अखबार एब्सल्यूट इंडिया में कार्यरत है