परख : लौटती नहीं जो हँसी (तरुण भटनागर) : राकेश बिहारी

Posted by arun dev on अक्तूबर 22, 2014











हँसी का नियोजित अकस्मात             
राकेश बिहारी


" `हमको चूतिया समझे हो. बट्टू की खलिहान वाली हंसी और वो हँसुली के पास पड़ा रुद्राक्ष और उस पर फिर बट्टू की हंसी. शास्त्री की चूंदी की गांठ. स्साला गंठीली चूंदी पर हाथ फेरता रहा. रामा सब समझता है. और एक चीज़ और हुजूर. आज कहता हूँ. माफ की जौ. रामा से अच्छा हंसी का पारखी कोई नहीं. पूरे गाँव में रामा ही जानता है. रामा ही चीन्ह सकता है असली और नकली हंसी को. तुम ऊंची जात के लोग बस हँसना नहीं जानते. हम छोटी जात में, मां अपने बिटवा को हँसना सिखाती है. अंदर की हंसी को कैसे बाहर निकालो. ये इधर का हंसी हुज़ूर, इधर का...'
रामा मुट्ठी से अपनी छाती ठोंक रहा था... .
` ये इधर का हंसी हुजूर... इधर का... .' " 

तरुण भटनागर के उपन्यास- 'लौटती नहीं जो हंसी' के लगभग मध्य में बाबूजी से कही गई रामा की ये बातें बहुत हद तक इस उपन्यास की केंद्रीय चिंता को अभिव्यक्त कर जाती हैं. बाबू जी इस उपन्यास के मुख्य पात्र हैं. स्वभाव से खल होने के बावजूद लगभग पूरा उपन्यास उनके आस पास ही रचा-बुना गया है. रामा उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पात्र है जो बाबू जी के छल का शिकार हो कर भी अपनी चारित्रिक विशेषताओं के कारण किसी भी पाठक के जेहन में अपनी एक मजबूत और सकारात्मक उपस्थिति दर्ज करा लेने की ताकत रखता है. उपन्यास में कई और पात्र हैं लेकिन बाबू जी का बेटा और रामा का दोस्त बट्टू तथा रामा की माँ मिसरी बाई भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और इनकी उपस्थिति कथानक की केन्द्रीयता को प्रभावित करते हुये उसे कदम-दर-कदम थामे रखती है. इन पात्रों के बहाने जिस एक बात को लेखक ने उपन्यास के केंद्र में रखा है, वह है हंसी. यहाँ हंसी सिर्फ अपने पारंपरिक और मूल अर्थ-छवियों को ही ध्वनित नहीं करती बल्कि समय और स्वार्थ के तत्कालीन दवाब से उत्पन्न उसके नए-नए अर्थ-रूपों को भी खोलती-खंगालती चलती है. मौलिक हंसी के गायब होते जाने के बीच विभिन्न प्रकार की नकली हंसी के फलने-फूलने के बहाने दरअसल यह उपन्यास समय और समाज की जड़ों को खोखला करने में लगी समूची व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने का एक सार्थक जतन करता है. इस तरह यह उपन्यास हंसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति के दुहरे संजाल के बीच समकालीन यथार्थ के एक ऐसे विद्रूप से हमारा परिचय कराता है जिसकी निर्मिति में समाज के हर अंग की बराबर की हिस्सेदारी है चाहे वह नेता हो या अधिकारी, समाजसेवी हो या व्यापारी, मीडिया हो या आंदोलनकारी. उन्मुक्त और विद्रूप के दो विपरीत ध्रुवीय छोरों के बीच क्षण-क्षण रूप बदलती हंसी कैसे अपने असली स्वरूप से मुक्त होकर एक बनावटी प्रतिसंसार की पुनर्रचना कर रही है, यह उपन्यास उन दारुण हकीकतों की जटिलताओं को एक बेहद ही पठनीय कथानक के माध्यम से उसकी सूक्ष्मताओं के साथ कदम-दर-कदम दर्ज करता चलता है. लेकिन इस क्रम में जो एक बात खलती है वह है - पूरी व्यवस्था के बीच सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी का ही कर्तव्यपरायण दिखाया जाना. उसकी जो थोड़ी बहुत कमियाँ उपन्यास में दिखाई भी गई हैं वह उसके अभिजात्य व्यवहार से सम्बद्ध है. तरुण पेशे से खुद एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, ऐसे में पूरी व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करते हुये, प्रशासनिक अधिकारी के लिए उदारता बरतने का कारण कहीं  न कहीं उपन्यास में लेखक के व्यक्ति का हस्तक्षेप जान पड़ता है, जिससे बचा जाना चाहिए था.  

वैसे तो रोना हंसी का विपरीतार्थक शब्द है लेकिन जीवन-जगत में उसकी उपस्थिति कई बार हंसी के अनुपूरक का काम भी करती है. असली और नकली हंसी की उपस्थिति-अनुपस्थिति के समानान्तर असली और नकली रुलाई की संवेदन संहिता भी परिदृश्य को एक अलग तरह की पूर्णता प्रदान करती है. या यूं कहें कि एक की चर्चा करते हुये दूसरे की चर्चा खुद ब खुद अपनी अनिवार्यता रेखांकित कर जाती है. विवेच्य उपन्यास के कथानक की अंतर्धारा में कहीं न कहीं यह रुलाई भी एक अदृश्य लेकिन प्रभावी राग की तरह लगातार अपने होने का अहसास बनाए रखती है. यही कारण है कि इस उपन्यास को पढ़ते हुये, कुछ जगह तो खासकर, नया ज्ञानोदय के जुलाई 2013 अंक में प्रकाशित तरुण भटनागर की ही कहानी `रोना' और शुक्रवार साहित्य वार्षिकी 2013 में प्रकाशित दिनेश भट्ट की कहानी `अंतिम बूढ़े का लाफ्टर ड़े' की लगातार या आती है. उल्लेखनीय है कि तरुण भटनागर की कहानी `रोना' जहां दिन प्रतिदिन गुम हो रही असली रुलाई के समानान्तर छोटे-छोटे स्वार्थों से संचालित नकली रुलाई के विविधवर्णी और व्यावसायिक विस्तार की तरफ इशारा करती है वहीं दिनेश भट्ट की कहानी `अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे' हंसने के अवसर के लगातार क्षरित होने के बीच व्यायाम और स्वास्थ्य के नाम पर निकल चले लाफ्टर क्लबों के साये में पल-बढ़ रही उन विडंबनाओं को रेखांकित करती है जहां एक कृत्रिम और मशीनी व्यवस्था संवेदनाओं  के भूगोल का लगातार अतिक्रमण करती चलती है. यहां यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि नकली रुलाई की हकीकतों से दो-चार होती कहानी `रोना' जहां एक विद्रूप हंसी के साथ समाप्त होती है वहीं नकली हंसी में स्वास्थ और जीवन की सार्थकता खोजती कहानी `अंतिम बूढ़े का लाफ्टर ड़े' के अंत में उसका मुख्य पात्र अचानक ज़ोर-ज़ोर से रोने लगता है. रोने और हंसने की विपरीतधर्मी संवेदनात्मकताएं किस तरह एक दूसरे का पूरक होती हैं उन्हें इन दोनों कहानियों के परस्पर विरोधी अंतों से समझा जा सकता है. प्रस्तुत उपन्यास 'लौटती नहीं जो हंसी' हंसी और रुलाई की इन परस्पर अनुपूरकताओं की बारीकियों को अपेक्षाकृत अधिक विस्तार और गहराई से विश्लेषित करता है. तभी तो जीवन भर हंसी को एक क्रूरतम हथियार की तरह सिर्फ और सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओ की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करनेवाले बाबू जी, इस उपन्यास के अंत में छिपकर रोने को मजबूर हो जाते हैं- " लोरमी ने मान ही लिया था कि बाबू जी रोते नहीं हैं- कितना हँसे हैं. पूरे हंसोड़. रो तो सकत ही नहीं. न, बिलकुल नाहीं. पर वो रोये थे. हंसी की दुनिया कमतर ना हो जाये, सो छिपकर रोये थे. वे ये सोचकर रोये थे कि पांचों लड़इय्यों ने किस तरह  रामा और बट्टू को मारा. यह जानकर रोये की बट्टू की मां सब जानकर भी चुप रही. यह महसूस कर रोये कि बिट्टू उनको कितना तो प्यार करता था. किसी को गाली देते, रामचरितमानस पढ़ने का नाटक कर डुलते, लोगों को सलाह बांटते... कई बार उन्हें लगा कि वे रो लें. कई बार तो उन्हें हंसने पर भी रोना आया, लगा ठठाकर हंसने की बजाय रोना ही था, जैसे हंसी छूट-छूट जाएगी और बुल से रोना फूट पड़ेगा, पर हर बार तो संभल गए. उनकी हर उदासी, संताप और चुप्पी पर हंसी की अमरबेल थी और वे लंबे समय तक इंतज़ार करते रहे कि इस अमरबेल को काट फेंकें... क्या आज वे ऐसा कर सकते हैं, अपने हिस्से की उदासी और रोने को जी भरकर जी सकते हैं?" जीवनपर्यंत बनावटी हंसी के क्रूरतम इस्तेमाल से हैवानियात की सारी पराकाष्ठायें पार कर जानेवाले बाबूजी जिस तरह जीवन की संध्या में एक दयनीय व्यर्थताबोध की स्थिति में पहुँचकर जी भरके रो लेना चाहते हैं वह इस पूरे उपन्यास को निश्छल हंसी की सुनियोजित हत्या के बाद के शोकगीत में बदल देता है.

आडंबरी सफलता और मूल्यच्यूत मिथ्या आदर्शों  का उत्सव मनाती  हंसी जब अपनी क्रूर कृत्रिमता के कारण जीवन और जीवंतता की किश्तवार हत्या का पर्याय बन जाये तो रुलाई के सोते का फूटना स्वाभाविक है. यह वही अभिसंधि है जहां रुलाई न सिर्फ हंसी की हत्या से उत्पन्न परिस्थितियों के विरुद्ध आखिरी हथियार के रूप में सामने आती है बल्कि हंसी का पूरक बनते हुये उसकी अनिवार्यता के पर्याय की कारुणिक प्रस्तावना भी बन जाती है. यह रुलाई विवशता से कहीं आगे उस विडम्बना को रूपायित करती है, जिसके मूल में सबकुछ लुटा के होश में आने का व्यर्थताबोधी अवसाद भरा होता है.

पिछले कुछ वर्षों में सामूहिकता के विरुद्ध वैयक्तिक महात्वाकांक्षाओं का जो लगभग सर्वमान्य होता-सा व्यावहारिक स्वरूप हमारे सामने उभर कर आया है, वह ऊपर से जितना चमकीला है भीतर से उतना ही जहरीला. चमकीले और जहरीले के इस प्रायोजित संतुलन को यह उपन्यास बिना किसी अतिरिक्त तामझाम के एक सहज कथात्मकता के जरिये रेखांकित कर जाता है. हमारे समय की इस विशेषता को दर्ज करते हुये लेखक ने खिलंदड़ेपन के भीतर छुपी नृशंसता को इस उपन्यास के कथानक को विकसित करने की प्रविधि के रूप में इस्तेमाल किया है. सतह पर दीखनेवाला सच मूल यथार्थ से कितना अलग है वह उपन्यास के हर मोड़ पर देखा-महसूसा जा सकता है. कथन और प्रविधि के इस विरोधाभासी संयोजन के कारण ही शुरू से आखिर तक हंसी एक सुनियोजित अकस्मात के रूप में सामने आती है. लेकिन हंसी के अकस्मात के नियोजन के समानान्तर उसके शिनाख्त या मूलोच्छेद की भी एक धारा उपन्यास में लगातार चलती है. बाबू जी के साथ-साथ मिसरी बाई और रामा के चारित्रिक विकास में इसे आसानी से पहचाना जा सकता है. शोषण और प्रतिरोध के इस द्वंद्व को बारीकी से उकेरते हुये किसी अव्यावहारिक क्रांतिकारिता का सहारा नहीं लेना भी इस उपन्यास की विशेषता है. लेकिन उपन्यास के आखिरी अध्या`मित्र मान लो कि वे साहित्यकार थे' में लेखक जिस तरह उपन्यास के पूरे कथानक की प्रतीकात्मकता  स्थापित करने के उद्देश्य से हड़बड़ी में उपन्यास की कुंजी जैसा कुछ लिख जाता है वह पाठकों के विवेक पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने जैसा तो है ही, कहीं न कहीं उसमें अपने लिखे के प्रति ठीक-ठीक आश्वस्त न होने का भाव भी छुपा हुआ है.  

उपन्यास के केंद्र में पूर्वी भारत का एक गांव लोरमी है. बाबू जी इसी लोरमी में बाहर से आते हैं और इस तरह पूरे गाँव को अपनी मुट्ठी में कर लेते हैं कि किसी को कुछ पता ही नहीं चलता कि कब उनका गाँव उनका नहीं रहा. पूरे गाँव में बाबू जी अकेले पढे-लिखे हैं. वे शिक्षा के साथ-साथ साम, दाम दंड भेद के भी धनी हैं. और जो इतने संसाधनों से समृद्ध हो भला वह महत्वाकांक्षी क्यों न हो! तो बाबूजी की भी महत्वाकांक्षा है-  सत्ता प्राप्ति. सत्ता- गाँव की, समाज की, क्षेत्र की और अंतत: राज्य की. एक आम या साधारण व्यक्ति से लेकर सत्तासीन होकर खास हो जाने की उनकी कहानी के क्रम में बहुत से लोग आते हैं, उनकी ज़िंदगी आती है, उनके सपने आते हैं और बाबू जी उन सब को कुचलते हुये बड़ी सफाई से अपनी मंजिल तय करते जाते हैं. सफाई ऐसी कि किसी को यह समझ भी नहीं आता कि उनके आस्तीन में साँप बैठा है और वे आस्तीन के उसी साँप को अपना हितैषी समझते रहते हैं. वैसे तो उनका चेहरा एक आम शोषक की तरह ही कुरूप और वीभत्स है लेकिन उन्होने जनसेवा और हंसी का एक ऐसा मुखौटा लगा रखा है जिसके पीछे उनकी सारी कुरूपताएं-विद्रूपतायें छुपी होती हैं. एक सच्ची और निश्छल हंसी जो हमारे आचार-व्यवहार का एक आम हिस्सा होती है, कैसे सत्ता की चालाक कारगुजारियों का हथियार बन जाती है, उसे बाबू जी के व्यवहार और उनकी रणनीतियों में आसानी से देखा जा सकता है. बाबू जी न सिर्फ अपनी मुखियागिरी चमकाए रखना चाहते हैं बल्कि उसी रास्ते एक शातिर ठसक के साथ बढ़ते हुये सत्ता का च्चतम सिंहासन भी हथिया लेना चाहते हैं. सत्ता और व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठने का यह खेल कितना क्रूर और वहशी होता है इसे इस उपन्यास में कदम-दर-कदम देखा जा सकता है. जाति-व्यवस्था, प्रशासन-व्यवस्था, राजनैतिक-सामाजिक नेतृत्व और मीडिया का चतुष्कोणीय गिराव जिस तरह निजी, पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के मूल ताने-बाने को तहस-नहस कर क्रूरता की नई मिसालें कायम कर रहा है उसने एक आम मनुष्य के भीतर की नमी को सोख लिया है. विश्वास और भरोसे के विरुद्ध दहशत और विश्वासघात का यह खेल जब किसी ऐसे व्यक्ति के आगे खुलता है जो भीतर से निरीह और दोषरहित है तो उसके बाद का मंजर कितना त्रासद और अफसोसनाक हो सकता है उसे इस उपन्यास के दो पात्रों रामा और बट्टू के बदलते व्यवहारों में रेखांकित किया जा सकता है.

गौरतलब है कि बाबूजी येन केन प्रकारेण अपने सपनों को पूरा करना चाहते है. किसी भी तरह, किसी भी सूरत में और किसी भी कीमत पर. यह कीमत किसी की जान भी हो सकती है; किसी की यानी किसी की, प्रतिद्वंद्वी और मातहत तो दूर अपने बेटे की भी. सरकारी महकमों में सबसे निचले स्तर पर काम करनेवाले कर्मचारी से लेकर बड़े-बड़े अधिकारियों तक को सेट कर लेने से लेकर जो राह में आ जाए उसकी हत्या तक करवा देने वाले बाबूजी के लिए अपनी महत्वाकांक्षाएं ही सर्वोपरि है. बाबूजी लोरमी को सूखाग्रस्त और विवाद रहित गाँव घोषित करवाना चाहते हैं ताकि उनके गाँव को विकास का सरकारी फंड मिले और समाज सेवा के बहाने आत्मसेवा का उनका कारोबार चमचमाता रहे. अपना दबदबा कायम रखने के लिए हत्या और दमन के समानान्तर सरकारी पंजी में लोरमी को विवाद रहित गाँव के रूप मे दर्ज करवाना एक बेहद ही चुनौती भरा काम है. इस चुनौती का सामना करने के लिए ही बाबू जी ने दो उपकरण विकसित किए हैं- एक लड़ईय्ये का हौवा और दूसरी झूठी हंसी का खेल. अपने द्वारा कराई गई हत्याओं का ठीकरा बाबू जी तथाकथित लडइय्यों के सिर पर फोडते हैं. इसका उन्हें दुहरा फायदा है एक तो यह कि लडइय्यों की आड़ में उनके कुकर्म छुप जाते हैं और दूसरा फायदा यह कि इस नाम पर उन्हें प्रशासन और व्यवस्था की सहानुभूतियाँ भी मिलने लगती हैं. यहाँ इस बात को भी समझा जाना जरूरी है कि लड़ईय्या जहां कथानक में बाबूजी के द्वारा एक हौवा के रूप में खड़ा किया जाता है वहीं लेखक इस लड़इय्यों को रक्तपिपासु व्यवस्था के  प्रतीक के रूप में पेश करता है. मतलब यह कि लेखक इस कथानक में निहित गहरे अर्थ-संदभों को खोलने-खँगालने के लिए लड़इय्यों के प्रतीक को एक प्रभावी कथा-युक्ति की तरह प्रयुक्त करता है. इस तरह लड़इय्यों के प्रतीक में हम भेंड़िए के प्रचलित मुहावरे का अर्थ विस्तार भी देख सकते हैं.

लड़इय्यों के अतिरिक्त जिस दूसरे उपकरण की चर्चा मैंने ऊपर की है, वह है- हंसी. बाबूजी द्वारा  हंसोड़ों की एक जमात तैयार करना आए दिन बड़े शहरों मे चल रहे लाफटर क्लबों से कई अर्थों में भिन्न है. बाबू जी द्वारा प्रचारित यह हंसी उनके झूठ और हत्या के व्यापार को ढंकने या यूं कहें कि उसे पकड़ मे आने से बचाने हेतु तैयार किए गए एक क्रूर सुरक्षा कवच की प्रस्तावना है. एक ऐसी झूठी और भायावह हंसी जिसका कुहासा हकीकत के आसमान को ढँक ले.  लेकिन जैसा कि मैंने ऊपर कहा है, इस उपन्यास में हंसी के इस क्रूर नियोज के साथ-साथ उसकी शिनाख्त और उसके मूलोच्छेद का भी एक जतन दिखाई देता है. रामा के चरित्र को इस जतन के प्रतिनिधि चेहरे की तरह देखा जाना चाहिए. रामा एक साहसी और सतर्क नौजवान है. वह असली और नकली हंसी के अंतर को ही नहीं समझता बल्कि वह परिवेश में बिखरे साक्ष्यों को समायोजित कर घटना के आखिरी तह तक पहुँचने का विवेक भी रखता है. तभी तो जंगल में अपनी मां की हँसुली और शास्त्री के एक मुखी रुद्राक्ष को आस पास पाकर इस सती को समझ पाता है कि उसकी मान की हत्या किसी और ने नहीं बल्कि शास्त्री ने ही की थी. ईमानदारी और प्रतिरोध की ऊष्मा से धधकती उसकी छाती बट्टू की हंसी और उस हंसी के पीछे छिपी चालाकियों को बहुत गहराई से पहचानती है. रामा न सिर्फ असली और नकली हंसी के अंतर को पहचानता है बल्कि सच को छुपाने की साजिश में हंसी गई सुनियोजित हंसी का जवाब अपनी उन्मुक्त, ईमानदार और निडर हंसी से देता है. बाबू जी द्वारा यह कहने पर कि 'ई लड़ईय्या बड़ परेशान करे है रे रामा. शास्त्री जी सरीखे धरम पुरुष को चबा गया', रामा की हंसी को हम सीधे उपन्यास के पन्नों में देखें- " दबाते-दबाते भी रामा की हंसी छूट गई. छाती गुदगुदान हंसी. हंसी जो घास छीलकर पगड़ण्डी बनती है. हंसी का रास्ता जी जंगल की पगड़ण्डी से होकर मां की हँसुली तक जाता है. जंगल की महुआ टपकान हंसी. हंसी दारू है- ठप्प, ठप्प. बेसरम की झाड़ी में डुबकी हंसी जिसे उसने लड़ईय्या जाना. छूये के पानी में काही के नीचे दुलान हंसी  दुबक, सुब्ब, दुबक... दुनाली की धाय के साथ आकाश की ओर फड़फड़ाकर उड़ती सफेद और काली हंसी. " रामा की यह हंसी बाबू जी की सत्ता को सीधी चुनौती है. वह बाबूजी जो बट्टू को हंसने की रणनीति सिखाते रहे, रामा की हंसी से दरक-से जाते हैं. रामा की हंसी के साथ बाबू जी के घर और तखत ही नहीं उनकी छाती और पेट के काँपने की बात कहकर उपन्यासकार ने हंसी के विरुद्ध हंसी को खड़ा कर के हंसी की परस्पर प्रतिरोधी छवि उकेरी है.

रामा न सिर्फ कुटिल हंसी के प्रतिरोध में `छाती गुदगुदान' हंसी हँसना जानता है बल्कि `रावण वाली रामलीला हंसी' की हकीकत भी जानता-पहचानता है. उसे इस बात की अच्छी पहचान है कि हंसी में कब गुदगुदाहट छिपी होती है और कब कपट. वह इस तथ्य से भी भली भांति परिचित है कि हंसी कैसे ऐतिहासिक तथ्यों का सृजन और आखेट करती है. समय के गर्भ में यकीन रोपने का उपक्रम हो या किसी बने-बनाए सत्य को विखंडित करने का कुत्सित खेल, रामा हंसी और उसके पीछी की सारी कूटनीति से परिचित है. तभी तो जब बट्टू बाबूजी की सीख पर उसके आगे मिसरी बाई की हत्या के सच को छुपाने की कोशिश में 'रावण की रामलीला हंसी' हँसता होता है, रामा उसे भीतर तक ताड़ जाता है. वह बट्टू की हंसी में बढ़ते कच्चेपन और आदमीयत के महीन रेशों को पहचानता है. लेकिन बट्टू की नकली हंसी की पहचान उसे गहरे उदास कर जाती है. उसकी इस उदासी में भी निश्छल हंसी के विलुप्त होते जाने का शोकगीत छिपा है. जब सब आपको चिढ़ा रहे हों, आपका मज़ाक उड़ा रहे हों ठीक उसी वक्त असली और नकली हंसी के अंतर को पहचाना जाना एक ऐसी विडम्बना की तरफ इशारा करता है जिसके एक छोर पर विवशता है तो दूसरे छोर पर उदासी.  उदासी और विवशता का यही विरल पर दुखद संयोग 'हंसोड़ हँसुली' की स्मृति के बहाने विकल्पहीन विवशता के करुण विद्रूप को हमारे सामने उजागर कर जाता है. रामा न सिर्फ बट्टू का दोस्त है बल्कि वह उसकी मजबूरी को भी कहीं न कहीं समझता है. यही कारण है कि बट्टू की हंसी का झू उसे क्रोधित नहीं करता बेतरह उदास कर जाता है. इस तरह यह उपन्यास इस बात को भी रेखांकित करता है कि लगभग एक सी ही अलग-अलग परिस्थितियों में एक ही व्यक्ति भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करता है जिसके पीछे सम्बन्धों की ऊष्मा और तटस्थता दोनों ही काम करती हैं. यही कारण है कि रामा जहां बाबूजी के आगे उन्हें भीतर तक कंपा देनीवाली हंसी हँसता है तो बट्टू के आगे उदास हो जाता है. रामा की हंसी और उदासी के इन्हीं दो छोरों के बीच ही सम्बन्धों के रसायन से निर्मित विकल्पहीन विवशता का करुण विद्रूप किसी सन्नाटे की तरह चीख रहा है.

अभी जिस विकल्पहीन विवशता की बात हमने की उसका एक और दृष्टांत उपन्यास में मौजूद है- बट्टू के द्वारा रामा को जंगल जाने से बार-बार रोकना. जिस तरह रामा असली और नकली हंसी का अंतर समझता है, उसी तरह बट्टू अपने बाबू जी की हकीकत को. उसे पता है कि वक्त आने पर बाबू जी रामा को भी नहीं छोड़ेंगे. बाबू जी की इन क्रूर और कुत्सित हरकतों की आशंका के तले दबा बट्टू बार-बार रामा को जंगल जाने से रोकता है. लेकिन बाबू जी की क्रूरताओं को ठीक ठीक जानने से ही उसके भीतर एक ऐसी विवशता जड़ जमा चुकी है कि वह रामा को बार-बार उसकी जरूरतों के पूरा करने का तो भरोसा दिलाता है पर जंगल में होनेवाली हत्याओं और लड़ईय्यों की हकीकत के बारे में साफ-साफ नहीं कह पाता. एक तरफ मित्र की चिंता और दूसरी तरफ यह विवशता दोनॉ मिलकर बट्टू को आत्महत्या की कोशिश के कगार तक पहुंचा देते हैं. पिता की अमानुषिक क्रूरता और मित्र की ज़िंदगीद के प्रति स्वभाविक चिंताओं के बीच एक खास तरह की किंकर्तव्यविमूढता की स्थिति बट्टू को एक संवेदनात्मक आघात की स्थिति में ले जाता है. परिणामत: ऊपर-ऊपर बाबूजी की आज्ञा मानता दीखता बट्टू मानसिक और भावनात्मक स्तर पर बाबूजी से बहुत दूर चला जाता है. बट्टू की इस मन:स्थिति से पर्दे हटाता उसी की डायरी का एक अंश- " मुझे यह गुमान न होगा, उस समय भी जब मैं मरूँगा कि मैंने सबको खोया. मैंने पिता को खोया. जब पिता खड़े होते हैं मेरे सामने तो मुझे लगता है, जैसे मैं किसी अजनबी के सामने खड़ा हूँ. जब मैं अपने पिता के साथ खिलखिलाकर हँसता हूँ, मुझे लगता है जैसे मैं पापी हूँ. उनके साथ हँसना अपने प्यार को, अपने जीवन को धोखा देना है. मुझे याद है, जब मैं छोटा था पिता अपनी मूंछ-दाढ़ी मेरे गालों और गले पर रगड़ते थे और मैं उनके साथ खिलखिलकर हँसता था. मैं पिता के साथ उसी तरह से फिर से हंसना चाहता हूँ. एक निश्छल बेलौस हंसी. पिता और पुत्र की हंसी. पता नहीं यह कौन-सी हंसी है, जो मेरे और पिता के बीच आकार खड़ी हो गई है. यकीन करो मैं अपने पिता को खो चुका हूँ. मैं इस अजनबी के साथ जाने क्यों हँसता रहता हूँ?" गौर किया जाना चाहिए कि बट्टू की डायरी का यह अंश रामा को ही संबोधित है. अपने पिता के अजनबी में बदल जाने की यह त्रासदी किसी के लिए कितनी दुखद हो सकती है, इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बट्टू यह बात किसी से कह भी नहीं सकता, सीधे-सीधे अपनी डायरी से भी नहीं. यही कारण है कि डायरी लिखते हुये भी इन बातों को बाहर लाने के लिए वह अपने सबसे करीबी दोस्त रामा का सहारा लेता है. काश! वह अपनी ये बातें रामा से प्रत्यक्षत: कह पाता. बतौर पाठक इस तरह की कचोट उस समय भी हमारे भीतर पैदा होती है जब रामा बट्टू की हंसी का सच समझने के बावजूद उससे कुछ कहता नहीं, उदास होकर रह जाता है. आखिर क्या कारण है कि बट्टू के भीतर का मनुष्य अपनी नियति पर जार-जार रोना चाहता है लेकिन बाबू जी से विद्रोह नहीं कर पाता? आखिर वह कौन सी विवशता है जो रामा को बट्टू के आगे मुंह नहीं खोलने देती? दोनों एक दूसरे को प्यार तो करते हैं पर मित्रता की परीक्षा में खरे नहीं उतरते. कहने की जरूरत नहीं कि यदि रामा और बट्टू ने आपस में अपने मन की पीड़ा और दुविधाएँ बांट ली होती तो न रामा की हत्या होती न बट्टू की. लेकिन लेखक ऐसा नहीं होने देता. क्या यह सिर्फ एक प्रत्याशित परिस्थितिजन्य विवशता है? या फिर एक सुव्यवस्थित लेखकीय निष्कर्ष से अलग न हट पाने का लेखकीय आग्रह जो रामा और बट्टू को एक खास तरह की विवशता में धकेल एक भावनात्मक विकल्पहीनता की स्थिति रचना चाहता है, जो अंतत: एक के बाद एक कई हत्याओं का कारण बनता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि लेखक ने सबकी हत्या करने/कराने के बाद बाबूजी के भीतर उत्पन्न भावनात्मक शून्य की परिकल्पना पहले कर ली थी और यह उपन्यास उसी नियोजित अंत का पीछा करने की कोशिश भर है?

ध्यान दिया जाना चाहिए कि ऊपर बट्टू की डायरी  के जिस अंश का उल्लेख हुआ है, उसे पढ़ते हुये बाबू जी के भीतर बट्टू के लिए घृणा का भाव भरा हुआ है. आखिर किस रसायन से बना है बाबूजी का हृदय कि वे सच से वाकिफ होने के बावजूद एक झूठ को ही सच की तरह आत्मसात कर लेना चाहते हैं? उल्लेखनीय है कि डायरी के इस अंश में बट्टू बाबूजी को एक अजनबी की तरह उल्लिखित करता है, और उस अंश को पढ़ते हुये बाबूजी को भी वह अपना बेटा नहीं लगता. मतलब यह कि पिता पुत्र दोनों एक दूसरे के लिये कहीं न कहीं अजनबीपन के भाव से भरे हैं. लेकिन ऊपर से लगभग एक-सा दिखने वाला यह भाव भावनात्मक स्तर पर विपरीतधर्मी गुण-धर्म से बना है. बट्टू जिस तरह बाबूजी को अजनबी कहता है कहीं न कहीं वह उसके भीतर बाबूजी के प्रति पल रहे एक गहरे लगाव को ही दिखाता है. वह बाबूजी को मन प्राण से मानता है लेकिन उनकी स्वभावगत क्रूरताएं उसे एक अलग तरह की मन:स्थिति  में ले जाती हैं, जिसके मूल में सिर्फ और सिर्फ दुख है – अपने प्रिय पात्र की मनुष्योचित संवेदनाओ के सूखते जाने को दर्शक की भांति देखते रहने की विवशता से उत्पन्न दुख! लेकिन बाबू जी के भीतर उत्पन्न बट्टू के लिए अजनबीयत के भाव के मूल में उनके भीतर उसके लिए पल रहा घृणा का वह भाव है जो उनके सपनों के धराशायी हो जाने के कारण पैदा लिया है. इस तरह यह उपन्यास पिता-पुत्र के संबंधों में दिन-ब दिन हो रहे एक बेहद ही चिंतनीय परिवर्तन का द्योतक है जो भूमंडलोत्तर आचारगत जटिलताओं को बहुत ही सूक्ष्म तरीके से उभारता है – वे जानते थे कि बट्टू बहुत कुछ जानता है. वे जानते थे कि वे और बट्टू उस तरह से पिता और पुत्र नहीं हैं, जैसे कि दूसरे पिता-पुत्र होते हैं. उन दोनों के बीच नाउम्मीदी थी. वहाँ अविश्वास, दुख और अंधेरा था. इतना अंधेरा कि बट्टू ने खुद को खत्म कर लेना ही श्रेयस्कर समझा. इतना अंधेरा कि बाबू जी को अब डर लग रहा है. बाबू जी को कभी डर नहीं लगा. पर यह डायरी, इस डायरी के शब्द उन्हें डरा रहे हैं.  पिता-पुत्र के नैसर्गिक रिश्तों के बीच फैला यह अंधेरा, अविश्वास और नाउम्मीदी किस हद तक सफल और प्रभावोत्पादक है यह एक बहस का विषय हो सकता है लेकिन इस तथ्य से तो नहीं इंकार किया जा सकता न कि सत्ता के सपनों का सफर बहुत सारे रस-रसायनों को सोखता चलता है?

सामाजिक राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए एक  तरफ जहां बाबूजी जैसे लोग हर प्रकार की मासूमियत और मनुष्यता के मूल्यों की हत्या करते चलते है, वहीं उपन्यास में रामू की मां मिसरी बाई और बट्टू की मां भी हैं, जिनका होना न सिर्फ मां-बेटे के सम्बन्धों को एक अलग कोण से देखने का स्पेस मुहैया कराता है, बल्कि पारिवारिक ताने-बाने में स्त्री की हैसियत को भी रेखांकित कर जाता है. हर व्यक्ति, व्यवहार और रिश्ते का एक वर्गीय चरित्र भी होता है या यूं कहें कि हमारी वर्गीयता भी हमारे व्यवहार आदि को निर्धारित करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. बट्टू और रामा की मां के बीच के अंतर से भी इस सत्य को परखा जा सकता है. बट्टू की मां जहां एक लाचार और विवश स्त्री के रूप में सामने आते है वहीं रामा की मां का व्यक्तित्व एक दृढ़ और मजबूत महिला का है. इन दोनों चरित्रों के अंतर के पीछे कहीं न कहीं उनकी वर्गीय पृष्ठभूमि की भी भूमिका है. मिसरी बाई जहां एक निम्नवर्गीय आदिवासी महिला है वहीं बट्टू की मां एक उच्च मध्यमवर्गीय स्त्री. अभाव जहां हमें माँजता है वहीं मध्यमवर्गीय सुविधाभोगिता हमें लगातार चेतनाशून्य करती चलती है. यही कारण है कि मिसरी बाई जहां अपने बेटे को लगातार यह सीख देती है कि बट्टू चाहे जितना भी पैसा दे, लकड़हारी मत छोडना, वहीं रामा की मां लड़ईय्ये की हकीकत जानते हुये भी तबतक चुप रहती है जबतक कि खुद उसका बेटा उसका शिकार नहीं हो जाता. आस-पड़ोस और समाज में लगी आग से बेफिक्र मध्यवर्ग तबतक नहीं जागता जबतक कि खुद उसके घर में आग न लग जाये. लेकिन कई बार जागते-जागते बहुत देर चुकी होती है. बट्टू की मां के जागते-जागते यह देर हो चुकी थी. तभी तो उनकी चीख-पुकार घर की चाहारदीवारी से बाहर नहीं जाती और एक दिन वह चूहा मारने के लिए लाई संखिया खाकर अपनी जान दे देती है. इसके विपरीत जब बट्टू रामा से जंगल न जाने को बार-बार कहते हुये उसकी जरूरतों का ध्यान रखने की बात करने के बावजूद रामा उस बात नहीं मानता कारण कि उसके भीतर मां की सीखें गूँजती हैं – भले बट्टू लता रहे खाने का समान, दारू और पैसा, पर तू बिना नागा रोज लकड़ी बेचना. मिहनत और मिट्टी की आंच में तापी उस मां की सीख का ही नतीजा है कि बार-बार जंगल न जाने की हिदायत और जीवन की दुहाई देते बट्टू को रामा का एक ही जवाब है – तुम्हारे लिए
जीवन बड़ा है, मेरे लिए लकड़ियाँ काटना ध्वनि, रंग और पर्यावरण से हंसी की तुलना के बीच मिहनत का यही तेज है जिसकी रोशनी में एक लकड़हारे की यह जिजीविषा जीवन से भी बड़ी दिखने लगती है. जीवन और जिजीविषा का यही कदमताल इस उपन्यास को विशेष बनाता है.

(यह लेख आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य  राकेश बिहारी की  आलोचना पुस्तक 'भूमंडलोत्तर समय में उपन्यासमें शामिल है.)
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कथाकार और युवा आलोचक राकेश बिहारी द्वारा भूमंडलोत्तर कहानी पर  लिखी जा रही विवेचना- श्रृंखला को आप समालोचन पर पढ़ सकते हैं.