मंगलाचार : गौतम राजरिशी

Posted by arun dev on अक्तूबर 25, 2014















ग़ज़ल कविता का ऐसा ढांचा है जो ब-रास्ते फारसी से होते हुए दुनिया की अधिकतर भाषाओँ में मकबूल है. हिंदी को यह तोहफा उर्दूं की सोहबत से हासिल है या यूँ  कहें की जब हिंदी और उर्दूं एक थे और हिन्दवी आदि नामों से उन्हें जाना जाता था, तब शेरों और ग़ज़लों को दोनों एक साथ गाते-गुनगुनाते थे. यह लत तभी की है. हिंदी में गजलें खूब कही जा रही हैं.

पेशे  खिदमत है गौतम राजरिशी  की गज़लें



गौतम राजरिशी की गज़लें                                                                          



बात रुक-रुक कर बढ़ी, फिर हिचकियों में आ गई
फोन पर जो हो न पायी, चिट्ठियों में आ गई

सुब्‍ह दो ख़ामोशियों को चाय पीते देख कर
गुनगुनी-सी धूप उतरी, प्यालियों में आ गई

ट्रेन ओझल हो गई, इक हाथ हिलता रह गया
वक़्ते-रुख़सत की उदासी चूड़ियों में आ गई

अधखुली रक्खी रही यूँ ही वो नॉवेल गोद में
उठ के पन्नों से कहानी सिसकियों में आ गई

चार दिन होने को आये, कॉल इक आया नहीं
चुप्पी मोबाइल की अब बेचैनियों में आ गई

बाट जोहे थक गई छत पर खड़ी जब दोपहर
शाम की चादर लपेटे खिड़कियों में आ गई

रात ने यादों की माचिस से निकाली तीलियाँ
और इक सिगरेट सुलगी, उँगलियों में आ गई

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कुछ करवटों के सिलसिले, इक रतजगा ठिठका हुआ
मैं नींद हूँ उचटी हुई, तू ख़्वाब है चटका हुआ

इक लम्स की तासीर है तपती हुई, जलती हुई
चिंगारियाँ सुलगी हुईं, शोला कोई भड़का हुआ

इक रात रिमझिम बारिशों में देर तक भीगी हुई
इक दिन परेशां गर्मिए-जज़्बात से दहका हुआ

कुछ वहशतों की वुसअतें, पहलू-नशीं कुछ उलफतें
है उम्र का ये मोड़ आख़िर इतना क्यूँ बहका हुआ

ये जो रगों में दौड़ता है इक नशा-सा रात-दिन
इक उन्स है चढ़ता हुआ, इक इश्क़ है छलका हुआ

जानिब मेरे अब दो क़दम तुम भी चलो तो बात हो
हूँ इक सदी से बीच रस्ते में तेरे अटका हुआ

दिल थाम कर उसको कहा “हो जा मेरा !” तो नाज़ से
उसने कहा “पगले ! यहाँ पर कौन कब किसका हुआ ?”


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हवा ने चाँद पर लिखी जो सिम्फनी अभी-अभी
सुनाने आई है उसी को चाँदनी अभी-अभी

कहीं लिया है नाम उसने मेरा बात-बात में
कि रोम-रोम में उठी है सनसनी अभी-अभी

अटक के छज्जे पर चिढ़ा रही है मुँह गली को वो
मुँडेर से गिरी जो तेरी ओढनी अभी-अभी

थी फोन पर हँसी तेरी, थी गर्म चाय हाथ में
बड़ी हसीन शाम की थी कंपनी अभी-अभी

मचलती लाल स्कूटी पर थी नीली-नीली साड़ी जो
है कर गई सड़क को पूरी बैंगनी अभी-अभी

सितारे ले के आस्माँ से आई हैं ज़मीन पर
ये जुगनुओं की टोलियाँ बनी-ठनी अभी-अभी

है लौट आया काफ़िला जो सरहदों से फ़ौज का

तो कैसे हँस पड़ी उदास छावनी अभी-अभी
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gautam_rajrishi@yahoo.co.in