बात - बेबात : कवि जी : राहुल देव

Posted by arun dev on अक्तूबर 26, 2014












एक सीधे -सादे नागरिक से जब स्थानीय 'महाकवि' मिलता है तब उसकी क्या दशा (दुर्दशा) होती है ?
उम्मीद (आशंका) है  कि ऐसे महाकवि आपके नगर- कस्बे में भी होगे - आप बच कर रहे - 'खुदी' हाफिज़.
राहुल देव का एक जोरदार व्यंग्य .



छुट्टी का दिन और एक महाकवि का साथ

राहुल देव


ल कविनगर में रहने वाले एक कवि मित्र राह चलते मिल गये. वैसे हमारे यह मित्र अभियांत्रिकी में परास्नातक हैं और कमाऊ विकास प्राधिकरण में इंजिनियर हैं. कविता से इनका दूर दूर तक कोई नाता नहीं था. गलती से एक बार यह मेरे साथ एक कवि सम्मलेन में चले गये. लौट कर आए, सोये और अगली सुबह कवि हो गये. पाश कालोनी में बड़ा सा फ्लैट, पांच अंकीय वेतन, दो नटखट बच्चे और पतिव्रता पत्नी संग बहुत मौज से जीवन चल रहा था कि एकाएक इनके परिवार में हिंदी साहित्य का नया अध्याय शुरू हुआ.

हमारे इन कवि मित्र का असली नाम है चिरौंजीलाल लेकिन शहर की टूटपूंजिया काव्य परिषद् द्वारा साहित्य भूषण सम्मान से अपमानित किये जाने के बाद से जनाब साहित्य शिरोमणि साहित्य भूषण महाकवि चिरंजीव कुमार उर्फ़ ‘चिंटू’ कहाए जाते हैं. कुछ लोगों ने इनको चढ़ाचढ़ा कर इतना ऊपर चढ़ा दिया है कि अब शहर का कोई भी आयोजन इनके बिना अधूरा ही रहता है. चिंटू जी को भी यह ग़लतफ़हमी हो गयी है कि अब इनके बिना हिंदी साहित्य का काम नहीं चल सकता.

चिंटू जी उच्च पद पर होने के कारण पहले ही शहर के सम्मानित व्यक्तियों में से थे . महाकवि बनने के बाद उन्होंने अपने आप को और महत्त्वपूर्ण दिखाना शुरू कर दिया है. मुझे देखते ही उन्होंने अपनी चिरपरिचित मुस्कान फेंकी बदले में मैंने भी मुस्करा कर कहा- और भाई चिरौंजी क्या हालचाल हैं ? यह सुनते ही वह पगलाए सांड की तरह बिदक गये, बोले- यार हद करते हो, पूरा शहर जानता है कि मेरा नाम बदल गया है और एक आप है जो कि हमारे मित्र होने के बावजूद चलते फिरते हमारी मिट्टी पलीद किया करते हैं. मैंने उन्हें शांत करते हुए कहा, क्षमा करना आदरणीय भाई चिरंजीव जी, और सब कुशल-मंगल ! नाम रुपी सम्मान का यह छोटा डोज पाकर उनका मुरझाया हुआ चेहरा फिर से खिल उठा.

मैं अपने घर से किसी जरूरी काम के लिए निकला था. मैं मन ही मन डर रहा था कि कहीं यह मुझे अपने घर की ओर न घसीट ले जाए. मैं जैसा सोच रहा था ठीक वैसा ही हुआ. उन्होंने कहा- चलो आओ, घर चलते हैं बहुत दिन हुए आपके साथ बैठकर चाय पिए हुए. मैं कहा- फिर कभी, आज थोड़ा जल्दी में हूँ. लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी और मेरी बांह पकड़कर अपने घर की ओर यूँ चल दिए जैसे कोई कसाई बकरे को जिबह करने कसाईबाड़े की ओर ले जाता है. मैंने मन ही मन सोचा आज बुरे फंसे ! लगता है गया आज का पूरा दिन. वह मानो मेरे मनोभावों को ताड़ गये और बोले क्या बताऊं आज छुट्टी का दिन था मैं किसी को ढूंढ ही रहा रहा अपनी कवितायेँ सुनाने के लिए कि घर से निकलते ही आप मिल गये. मैं मरता क्या न करता. मैं चिंटू जी को चाहकर भी मना भी नही कर पाया था क्योंकि मुफ़लिसी के इस कठिन दौर में उनके प्राधिकरण में बड़ी मुश्किल से ख़रीदा गया मेरा प्लाट पिछले एक महीने से लटका हुआ था. एक उनको छोड़कर मेरा उस कार्यालय में जानने वाला है ही कौन. और आजकल किसी भी सरकारी कार्यालय में बिना जान पहचान के कोई भी काम जल्दी नहीं होता.

घर आकर चिंटू जी अन्दर वाले कमरे में अपनी डायरी लेने चले गये. उनकी श्रीमती जी मेरे सामने चाय का प्याला रख गयीं. मैंने उन्हें देखकर नमस्ते भाभी जी का जुमला उछाल मारा. उन्होंने भी बदले में एक कुटिल मुस्कान फेंकी मानो कहना चाहती हों वाह बच्चू तो आप हैं आज के मुर्गें. मैंने चाय पीने के लिए प्याला उठाया ही था कि चिंटू जी अपनी कविताओं की पांडुलिपि के साथ प्रकट हुए. मैंने उनकी प्रशंसा में कहा, आजकल तो खूब छाए हुए हैं आप. हर गोष्ठी, पत्रिका और अखबार में जहाँ नज़र उठाओ आप ही आप नज़र आते हैं बस. वह गद्गद होते हुए बोले, अरे खाली चाय पी रहे हैं आप. अरी सुनती हो... कुछ नमकीन वगैरह भी हो तो ले आओ. भाई साहब हमारे बहुत ख़ास मित्रों में से हैं. कुछ देर बाद उनकी नौ वर्षीय लाडली आँख मिचमिचाते हुए एक प्लेट में नमकीन लेकर आ गयी. मैंने कहा- कितनी प्यारी बच्ची है. किस कक्षा में पढ़ती है.

उन्होंने कहा अरे भाई साहब क्या बताएं एडमिशन तो इसका फ़लाना कान्वेंट में कराना चाहता था लेकिन कम्बखत पढ़ने में मन ही नहीं लगाती. बड़ी मुश्किल से कह सुन के ढमाका कान्वेंट में डाला. आजकल की महंगाई में बच्चों को कान्वेंट में पढ़ाना किसी तपस्या से कम नहीं. स्कूल की फीस दो फिर ट्युशन की फीस दो. तुम्हारी भाभी को भी मेरठ के एक कॉलेज से बीएड का फॉर्म डलवा दिया है. हालांकि तुम्हारी भाभी जी मैनेजमेंट में पोस्टग्रेजुएट हैं लेकिन अब इस उम्र में कहाँ प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करेगी यह सोचकर बीएड कराना सही समझा. पूरे एक लाख दिए तब जाकर प्रबंधन कोटे से एडमिशन हुआ. लग रहा है अब यह भी घर बैठे बैठे सरकारी मास्टरनी हो जायेगी. यों कहकर वह दांत निकालकर खीं खीं खीं कर हंसने लगे. फिर अपने अल्सेशियन कुत्ते को पुचकारते हुए मेरी तरफ देखकर बोले- क्या कहते हो, तुम भी अपनी मैडम को ऐसे ही कुछ क्यों नहीं करवा देते. आजकल घर में एक जने की कमाई से होता क्या है. मैंने गरदन हिलाते हुए कहा- हाँ, क्यों नहीं, जरूर देखूंगा. फिर मुझे कुछ असहज देखकर उन्होंने कहा कि अगर आपको गरमी लग रही हो तो अन्दर कमरे में चलें. एसी है अपने यहाँ अभी पिछले सीजन में ही तुम्हारी भाभी की जिद पर लगवाया है. वो क्या है न कि इसके पिता यानि मेरे ससुर जब भी अमेरिका से आते हैं तो बगैर एसी और बिजली के उनका बुरा हाल हो जाता है. सब अपना अपना शौक है वरना हम तो दिन भर दफ्तर में पैसों की गर्मी के बीच बेचारे कूलर से ही अपना काम चला लेते हैं. ही...ही..ही.. अब आप तो घर के ही हैं, आप से क्या छुपाना. आप को तो सब मालूम ही है. ही...ही..ही. बिजली बैकअप के लिए इन्वर्टर भी रख छोड़ा है. इन बिजली वालो का भी कोई भरोसा नहीं .

हाँ तो भाई जी अब बाकी बेकार की बातों को छोड़ो और कुछ साहित्य-वाहित्य हो जाए. आप को तो पता ही होगा कि आजकल अच्छे साहित्य की कदर करने वाले न तो प्रकाशक रहे और न ही संपादक. सब तरफ कूड़ा ही कूड़ा बिखरा पड़ा है. पिछले डेढ़ साल से मेरे 4 महाकाव्य, 6 खंडकाव्य और 5 प्रबंधकाव्य की पांडुलिपियाँ अप्रकाशित पड़ी हुईं हैं. इनके प्रकाशन के लिए मैंने राजधानी के कई प्रकाशकों से बात की लेकिन सबने काम अधिक होने का बहाना करके एक स्वर में मना कर दिया. मैं भी कहाँ हार मानने वाला था. मैंने अपनी पांडुलिपियों में दर्ज अपनी कालजयी रचनाओं को लोकल साप्ताहिक ‘जन-जन की आवाज़’ में उन्हें धारावाहिक छपवाया. आपने भी देखा हो शायद. आखिर लोगों को भी तो पता चले कि उनके शहर में कैसी हस्ती रहती है. वो बात अलग है कि इसके एवज में उस अखबार में संपादक को प्राधिकरण का सालाना विज्ञापन दिलाना पड़ा. लेकिन आप ही बताइए क्या गलत किया मैंने आखिर ताली एक हाथ से तो बजती नहीं. संपादक काइयां था तो मैं क्या कम चालाक था. मैंने तो पहले ही सोच रखा था. मैंने अपना सम्पूर्ण साहित्य उसके पेपर में छपवा डाला. उनको टोकते हुए बीच में मैंने आग में घी डालते हुए कहा- लेकिन भाई साहब आप तो अपनी किताबें किसी नामी प्रकाशक से छपवाने वाले थे. उन्होंने एक लम्बी साँस लेकर कहा अमा तुमने क्या मुझे कच्चा खिलाड़ी समझ रखा है. मैं इधर अपने नेताजी पर एक प्रशस्ति ग्रन्थ लिख रहा हूँ. एक राज़ की बात आपको बता रहा हूँ किसी से कहिएगा नहीं दरअसल पिछली दफा जब मैं प्रदेश की दूसरी राजधानी गया था तो मैं वहां नेता जी से मिला. उनके एक करीबी ने मुझे यह सुझाव दिया था कि अब मेरी किताबें नेताजी ही स्पांसर कर सकते हैं. उनको खुश कर सकूँ तो इस दुनिया में कुछ भी मिलना नामुमकिन नहीं. बस इस प्रशस्ति ग्रन्थ का आईडिया वहीं से आया. अब तो बस आप देखते जाओ आगे-आगे होता है क्या. मैंने भी कुछ आश्चर्य भाव दिखाते हुए अपना दायाँ हाथ हवा में घुमाकर कहा- भई वाह, आपका भी जवाब नहीं.

चिंटू जी अपनी झूठी प्रशंसा सुन के बहुत खुश थे. मैंने सुन रखा था कि एक बार एक गोष्ठी में एक आलोचक ने उनकी आलोचना कर दी थी तब क्रोधित होकर उन्होंने उसके सिर पर अपना माइक दे मारा था, बेचारा डेढ़ महीने अस्पताल में रहा. इसलिए भी मैं सावधान था. इस ख़ुशी में अपने छप्पन इंच के सीने को फुलाकर महाकवि चिंटू जी आगे बोले- वैसे मैंने इधर के दो हफ़्तों में कुछ नई कुण्डलियाँ, 45 घनाक्षरी, 56 रोले, 36 सोरठा, 24 छप्पय, 16 ग़ज़लें, 15 गीत और 84 दोहे लिखे हैं जिन्हें मैं आज आपको सुनाऊंगा. वो क्या है न की मैं किसी एक विधा में ठहर कर नहीं लिख पाता और नई कविता यानि कि फ्री वर्स मैं तो बिलकुल नहीं लिख पाता. दरअसल बुरा न मानिएगा लेकिन फ्री वर्स को मैं कविता ही नहीं मानता. मैंने मन ही मन में सोचा आपके मानने न मानने से क्या फर्क पड़ता है. उन्होंने आगे कहा- मेरी इन बेशकीमती काव्य रचनाओं में भगवान् की भक्ति हैं, श्रृंगार है, प्रकृति का मनभावन चित्रण है, भारतीय सभ्यता और राष्ट्रीय संस्कृति है, हर तरह के रस, छन्द और अलंकार को साधने की मैंने कोशिश की है. अब ज्यादा क्या कहूँ. 

मेरी कविताओं की धार से तो आप भलीभांति परिचित ही हैं. यह तो कहो अपनी पारी कुछ देर बाद शुरू हुई नहीं तो कब के साहित्य अकादेमी वाले घर आके पुरस्कृत कर दिए होते. अभी पिछले ही दिनों अपने संस्कृति मंत्री के रिश्तेदारों के 6 फ्लैट वसुंधरा कालोनी में एलाट करवाए तो मंत्री जी भी बड़ा खुश हुए और बोले की चिरौंजी इस बार हिंदी संस्थान का साहित्य श्री पुरस्कार तुमको, हमारी तरफ से. इसे कहते हैं कवियों की इज्जत और नहीं तो क्या समझ लिए. एक आप अपने को देख लो क्या उखाड़ लिए आप मजदूर, किसान और बोले तो प्रगतिशील कविता लिख लिख के भला. आप से बाद में हम आए इस फील्ड में और आप खुद ही देख लीजिये आज मैं कहाँ हूँ और आप कहाँ ? सब माता लक्ष्मी और माता सरस्वती जी की कृपादृष्टि का परिणाम है वरना मैं क्या हूँ, हे...हे..हे.... इस तरह चिंटू जी अपनी पिछले कई हफ़्तों से दबी हुई राजनीतिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और साहित्यिक भड़ास का वमन मेरे ऊपर नॉनस्टॉप करते चले गये. या यूँ कहिये कि बस आगे-आगे वह फेंकते गये और पीछे-पीछे मैं लपेटता गया . दिमाग और दिल के इस खेल में आख़िरकार मैंने दिमाग से काम लिया और चुपचाप उनकी काव्यरुपी अग्निवर्षा को सहता रहा. अंत में मैंने आसमान की ओर मुंहकर मन ही मन कहा, हे ईश्वर ! ये तू किस जन्म का बदला निकाल रहा है मुझसे.

अपनी प्रार्थना समाप्त कर मैंने देखा महाकवि चिंटू जी के श्रीमुख से उनके एकल काव्यपाठ का अंतिम दोहा अपनी पूरी रफ़्तार के साथ पर्याप्त मात्रा में थूक की फिचकार के साथ निकला और मेरे थोबड़े को ऊपर से नीचे तक भिगो गया. मैंने रूमाल से अपना चेहरा पोंछते हुए उन्हें धन्यवाद कहा. चिंटू जी ने अपने लड़के को आवाज़ लगाकर फ्रीज़ की ठंडी बोतल मंगवाई. पानी की पूरी बोतल गटागट गले से नीचे उतारने के बाद उन्होंने मेरी ओर देखा और निर्दयता से पूछा- कैसा लगा ? मैं गुस्से में अपनी मुट्ठियाँ भींच रहा था लेकिन फिर कुछ सोचकर मैंने समझदारी से काम लिया. मैंने चेहरे पर बनावटी मुस्कराहट लाते हुए कहा- भई वाह ! बहुत खूब ! मज़ा आ गया आज तो !! आपके चरण कहाँ हैं महाकवि !!! मैंने अपनी शारीरिक भावनाओं को नियंत्रित किया हुआ था लेकिन मन ही मन ही उनको खूब गरियाया. अगर प्लाट कन्फर्मेशन का चक्कर न होता तो कसम से मेरी चप्पल और चिंटू जी का उजड़ा चमन दोनों की जुगलबंदी आज हो ही गयी होती. कुल मिलाकार कहूँ तो बेबसी, गुस्सा और हंसी का मिलाजुला भाव था. उनकी दो कौड़ी की कविताओं को मैंने कैसे झेला इसका दर्द मैं ही जानता था. 

कुछ भी हो लेकिन उनके लिखने की स्पीड देखकर मैं दंग था हालाँकि इस धुआँधार स्पीड में वे क्या लिख रहे थे इसे वे शायद स्वयं नहीं जान पा रहे थे. हाँ आज अगर तुलसी, सूर, कबीर, बिहारी जीवित होते तो इनकी काव्यप्रतिभा को देखकर जरूर इन्हें अपना गुरु घोषित कर दिए होते. खैर लगभग दो घंटे भर की उनकी बकवास सुनते सुनते मेरा दिमाग सुन्न होने लगा था. जब रहा नहीं गया तो मैंने कह ही दिया- अच्छा तो अब आज्ञा दीजिये. किसी तरह जान छुड़ाकर मैं वहां से भागा और फिर कभी उनके घर के रास्ते से न गुजरने की कसम खाई. उन्होंने चलते-चलते यह भी कहा कि प्लाट कन्फर्म होने पर मैं उनकी मिठाई न भूलूं और गृहप्रवेश पर पूजा पाठ के साथ शाम को एक कवि गोष्ठी भी जरूर रखूं जिसकी अध्यक्षता वे करें. यह एक नया प्रयोग होगा. जाते जाते उन्होंने आवाज़ लगाई कि फिर कभी मैं सपरिवार भी उनके यहाँ तशरीफ़ लाऊं. लेकिन मैं वहां से ज्यों निकला कि फिर वापिस मुड़कर नहीं देखा, सीधा घर आकर ही दम लिया.

इस भागमभाग में मैं किस काम से निकला था यह भी भूल चुका था. घर लौटकर पत्नी ने मेरा हाल-बेहाल देखा तो पूछा कहाँ चले गये थे ? क्या ओलम्पिक में दौड़ लगा रहे थे क्या. मैंने कहा अरी भागवान जा अन्दर जाकर एक गिलास ठंडा पानी ला और कुछ मत पूछ तेरे इस मकान के चक्कर में मुझे आजकल क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ रहे हैं. राम बचाए ऐसे कवि और उनकी कविताओं से. मारा बेड़ागर्क कर डाला ऐसे नामुरादों ने हिंदी कविता का. वैसे ऐसे कवि इस देश के अमूमन हर गाँव-कस्बों-शहर में पाए जाते हैं जिन्हें उनके क्षेत्र के दायरे से बाहर कोई नहीं जानता. इनकी साहित्य की समझ पर मुझे तो तरस आता है और आपको !
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