रंग - राग : सनी लिओने : विष्णु खरे

Posted by arun dev on अक्तूबर 27, 2014




























किसी भी व्यस्क समाज में यौन – विषयों को सहजता से लेने की नैतिकता रहती है. कामसूत्र के देश से इतने साहस की उम्मीद आज भी किया जाना चाहिए कि वह कला के किसी भी ऐसे विषय से आखँ नहीं चुराएगा. विष्णु खरे ने सनी लिओने के होने से भारतीय समाज में उठ रहे सवालों पर लिखा है – उम्मीद है कि कभी वह इस पर और विस्तार से लिखेंगे.


सनी लिओने से खड़े होते सवाल                      

विष्णु खरे 




क्या मेरे अनेक भ्रमों में एक यह भी है कि सनी लिओने पर,जिन्हें आप उघड़ेपन की एक पराकाष्ठा के साथ अपनी हिन्दू-भारतीय पसंद, रुझान या मौक़े के मुताबिक़ ‘’भाभी’’,’’दीदी’’,’’आंटी’’ या ‘’साली-सलहज’’ आदि कहने-मानने को स्वतंत्र हैं, अपने देश और समाज में ढंग से कोई बात ही नहीं हुई है ?


अधिकांश लोग पलटकर पूछ सकते हैं कि यह सनी लिओने कौन है और मुल्क व जनता उस पर चर्चा क्यों करें ? यह कोई नाराज़गी-भरा नहीं,बल्कि सच्चा और मासूम सवाल भी हो सकता है क्योंकि आप उम्मीद नहीं कर सकते कि अपने फिल्म-दीवाने देश में भी सभी सवा-सौ करोड़ बाशिंदे सभी फ़िल्में देखते हों, उनके एक्टरों की फिल्मेतर, निजी ज़िंदगी के ब्यौरे जानते हों.

लेकिन भारतीय सिनेमा, क्रिकेट और राजनीति के मामलों में ऐसी नाउम्मीदगी से काम नहीं चलता. यहाँ सब-कुछ पब्लिक है, प्राइवेट कुछ भी नहीं. सिनेमा की दुनिया तो अब खुद एक ऐसी फिल्म बन गयी है जो बड़े-छोटे परदे के सीमित संसार से परे कभी ख़त्म नहीं होती और जिसमें कभी इंटरवल नहीं होता. बीच में से छोड़कर चले जाइए, जब भी आप लौटेंगे लगेगा वहीं से गए थे. यह फिल्म जितनी चलती है उतनी ही पिछली-जैसी होती जाती है.

जिन्हें पहले हिंदी में ब्ल्यू फ़िल्में या ‘’नीले फ़ीते का ज़हर’’ कहा जाता था अब वह ‘पोर्नोग्राफ़िक’ फिल्मों या उनके संक्षिप्त नाम ‘’पॉर्न’’ से जानी जाती हैं. उन दिनों उन्हें रखना, देखना अपराध तो था ही, अनैतिक और शर्मनाक कर्म भी था, हालाँकि करोड़ों भारतीय उन्हें देखना चाहते थे और किसी तरह विदेश पहुँच गए तो उनका सबसे पहला ‘’एडवेंचर’’ ब्ल्यू फिल्म या ‘’लाइव सेक्स’’ शो देखना ही होता था. भारत में लाइव सैक्स शायद अब भी अत्यंत निजी महफ़िलों में मुमकिन हो, पॉर्न किसी भी शहर में किलो के भाव से खरीदना संभव है.

सनी अमेरिका की इसी पॉर्न इंडस्ट्री की प्रॉडक्ट है. उसके माता-पिता दोनों भारतीय सिख थे और वह ख़ुद, जिसका असली पंजाबी नाम करनजीत कौर वोहरा है,स्वयं को सिखणी कहती है लेकिन वह 1981 में कनाडा में पैदा हुई, पली-बढ़ी और जब किशोरी थी तभी से उसके यौन-रुझान उभयलिंगी थे और चौदह वर्ष की उम्र में उसका कौमार्य-भंग हो चुका था. संकोच और लज्जा के कारण उसने पहले सिर्फ़ समलैंगिक ‘लैस्बियन’ फिल्मों में काम किया और कुछ वर्षों के बाद ही वह पूर्णतः पॉर्न फ़िल्मों में आई. वह इस फ़ील्ड में सफल होनेवाली पहली भारतीय-पंजाबी नवयुवती थी. करोड़ों कद्रदानों के लिए सनी लिओने एक अभूतपूर्व ‘एक्सोटिक’ जिस्म थी. पंजाबी-सिख-भारतीय विवस्त्र माँसलता और भफाती हुई ‘सैक्सुएलिटी’ का ऐसा उन्मुक्त प्रदर्शन  पहले कभी देखा नहीं गया. भारत में पहले कुछ जानकार प्रशंसकों ने उसे एक ‘रिएलिटी शो’ में आमंत्रित किया और फिर बम्बइया सिनेमा के  एक नव-नैतिकतावादी बाप-बेटी ने उसे एक फिल्म में ‘’एक्टिंग’’ का ऑफर दे ही डाला. लगता है यह सब एक रणनीति के तहत किया गया. तब से पॉर्न एक्टर सनी लिओने एक भारतीय हिन्दीभाषी अभिनेत्री है.

यह नहीं कि सनी ने अपना असली पेशा तर्क कर दिया है. वह सौ से भी अधिक पॉर्न फ़िल्मों में अदाकारा या निर्मात्री के रूप में आ चुकी है, हर वर्ष लौट कर वैसी फ़िल्में डायरेक्ट या प्रोड्यूस करती है और करोड़ों डॉलरों के अपने इस निजी धंधे के हर अंग से जुड़ी हुई है. वह यह मुफ़ीद पेशा छोड़ नहीं सकती. उसका अपना वेबसाइट भी है जिसकी पचास डॉलर वार्षिक सदस्यता लेकर आप उसके शरीर के अंतरंगतम लोमहर्षक गोशे-गोशे तक जा सकते हैं और पचासों स्त्री-पुरुषों के साथ ‘’कामसूत्र’’ और खजुराहो को बचकाना और शर्मिंदा करती हुई सभी अजाचारी, मार्की द सादीय, सोडोम और गोमोर्रा मुद्राओं में उसे देख सकते हैं. जब से वह भारत आई है, लाखों पॉर्न-प्रेमी हिन्दुस्तानी उसके नए दर्शक बनते जा रहे हैं. वह अब तीस वर्ष से ऊपर की होने को आई,जब इस तरह की महिलाएं अपने अधेड़ ढलान के पास पहुँचती समझी जाती हैं.

कैमरे के सामने खुल्लमखुल्ला कई अजनबी स्त्री-पुरुषों के साथ कई तरह से सम्भोग करना, फिर इस तरह बनाई गई फिल्मों की लाखों सी.डी. संसार भर में बेचना, उन्हें स्थायी रूप से किराए पर ब्लॉग पर डालना – क्या यह वेश्यावृत्ति नहीं कहा जाएगा ? क्या लाखों नाबालिग़ उन्हें रोज़ नहीं देखते ? क्या इसका बचाव किसी भी नैतिकता से किया जा सकता है ? क्या भारत में सनी को गिरफ़्तार किया जा सकता है ? यह ठीक है कि हर बालिग़ स्त्री-पुरुष को अपने शरीर का कोई भी इस्तेमाल करने का अधिकार है, लेकिन उसके भी क़ानून हैं. तब क्या हम सनी लिओने को एक ‘’सैक्स वर्कर’’ कह-मान सकते हैं ? लेकिन कौन-सी ऐसी असल सैक्स-वर्कर होगी जो अपने श्रम का वीडिओ बनाने देगी और उसे पालिका-बाज़ार में बेचने देगी ? बल्कि सारे संसार में ? क्या हम सनी लिओने को लाखों-करोड़ों ग़रीब और मजबूर सैक्स-वर्करों से अधिक चालाक, निर्लज्ज और ख़तरनाक वेश्या, या  बदतर न माने ? उधर विडंबना यह है कि सनी के स्तर की कुछ भारतीय तारिकाएँ वेश्यावृत्ति के आरोप में पकड़ी गई हैं.

हमारे समाज की ‘’थर्ड पेजक्रीमी लेयर’’ में और याहू-इन्टरनैट पर ऐसे प्रि- और पोस्ट-पेड  दलाल-तत्व सक्रिय हैं जो सनी लिओने को एक प्रतिभा-संपन्न भद्रमहिला और अभिनेत्री बनाने पर आमादा हैं जैसे शबाना आज़मी और तब्बू के बाद सनी का ही नंबर हो. अभी उसकी किसी  ‘’पारिवारिक’’ फिल्म को भी सशुल्क तूल दिया जा रहा है मानों निरूपा राय या मीना कुमारी की रूह की वापिसी होने वाली है. लेकिन सभी जानते हैं कि वह तीसरे दर्ज़े की एक्ट्रेस भी नहीं है और उसके साथ कोई भी इज्ज़तदार ‘’फर्स्ट रेट’’ अदाकार काम नहीं करना चाहते, उसके साथ फ़ोटो खिंचवाने से भी कतराते हैं. लेकिन ‘’सनी इज़ लाफ़िंग ऑल द वे टु द बैंक’’.

यदि सनी को भारतीय समाज ने आत्मसात् कर लिया है तो उससे कुछ जटिल प्रश्न उठते हैं. हमारे मध्यवर्गीय परिवारों ने उसे कैसे लिया है ? क्या बच्चियाँ बड़ी होकर सनी आंटी जैसी बनना चाहती हैं ? क्या भारतीय  नैतिक ‘लिबरलिज़्म’ हर ऐसे मामले को लेकर अलग-अलग है? यदि हम एक पोर्नोग्राफ़िक ऐक्ट्रेस को लेकर इतने खुले हैं तो पॉर्न को अपने फ्री मार्किट में आने देने में देर या संकोच कैसा ? हर शहर में दो-तीन पॉर्न-शॉप और सिनेमा क्यों नहीं हो सकते ? सनी से बेहतर उपलब्ध फ़्रेंचाइज़ और ब्रांड-एम्बेसेडर कौन हो सकता है ?

सनी लिओने के मसले पर, यदि वह कोई मसला है तो, देश के, विशेषतः पुरुष और महिला स्त्रीवादी, चिंतक चुप क्यों हैं ? क्या उस पर कोई भी सवाल उठाना स्त्री-विरोधी प्रतिक्रियावाद,या कुछ इससे भी बुरी चीज़ है ? प्राचीन हिन्दू संस्कृति नगरवधुओं को लेकर बहुत उदार थी. क्या आज वह उदारता और खुलापन निरपवाद संभव हैं? सनी-जैसियों की आमद हिन्दू समाज और भारतीय सिनेमा को बदल भी सकती है.
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