सबद भेद : समकालीन कविता : राहुल राजेश

Posted by arun dev on दिसंबर 22, 2014

पेंटिंग : के. रवीन्द्र 
हिंदी कविता के लोकतंत्र में तरह तरह के कवि और काव्य प्रवृतियाँ सक्रिय हैं. असल और नकल  के कई असली नकली संघर्ष हैं. नवीन और पुरातन की तनातनी है. ऐसे में पूरे परिदृश्य को देखना रोचक हो जाता है. राहुल राजेश के इस आलेख में समकालीन कविता पर कुछ मानीखेज़ बाते कही गयी हैं.
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जीवन या कविता इकहरी और एक-अर्थी नहीं होती          
(समकालीन कविता की दशा-दिशा पर चंद बातें)
राहुल राजेश



(एक)

कुछ वर्षों पहले तक यह खूब कहा जा रहा था कि आजकल कविता एक जैसी या इस जैसी या उस जैसी लिखी जा रही है. अब इधर यह लगातार कहा जाने लगा है या कहें समझाया जाने लगा है कि आजकल हिंदी की अधिकांश कविताएँ इकहरी और एक-अर्थी होती जा रही हैं. आशय और संकेत यह कि हिंदी में रचनारत अनेकानेक युवा कवियों में मात्र और मात्र कुछेक युवा कवि ही ऐसे हैं जिनकी कविताएँ बहुअर्थी हैं, इकहरी नहीं हैं, किन्हीं की छोड़ी हुई 'जूठन' नहीं हैं, 'अलग-अद्भुत-अनूठी-अद्वितीय' हैं आदि-आदि. बाकी सब तो बेकार, बकवास और इकहरी-एकअर्थी कविताएँ लिख रहे हैं. लेकिन मुझे यह समझ में नहीं रहा है कि किन अर्थों-आयामों और मानकों को आधार बनाकर किसी की कविता को बहुअर्थी और किसी की कविता को एकअर्थी कहा जा रहा है!

क्या कोई भी जीवन इकहरा होता है? क्या कोई भी जीवन एकअर्थी होता है? क्या कोई भी वाक्य, कोई भी कथन इकहरा, एकअर्थी होता है? क्या गाँधी जी का कहा यह नीति-कथन या सूत्र-वाक्य 'सत्य ही ईश्वर है' बिना किसी जटिल विन्यास, बिना किसी चमत्कारी बिम्ब, बिना किसी गहन गुंफन के बावजूद इकहरा है? क्या इस सरल और स्पष्ट कथन में कर्म, धर्म, योग, अध्यात्म, संतोष, संयम, सदाचार, सदविचार, सदमार्ग, प्रेम, मानवीयता, त्याग और अहिंसा आदि के संदेश निहित और परिलक्षित नहीं है? क्या धूप में तपे, पसीने से लथपथ, कृशकाय और इकहरी कदकाठी वाले मजूर या किसान का जीवन इकहरा या एकअर्थी होता है? क्या उसकी पेट-पीठ सटी, पिचकी देह केवल मजूरी या किसानी की ही द्योतक है? क्या वह देह या वह जीवन मनुष्य की भूख, भूख मिटाने के लिए किए जाने वाले श्रम, 'पेटी' नहीं वरन् पेट भर लेने का संतोष और संयम, धूप, धरती, मिट्टी, बारिश, बाढ़, सूखे, अकाल, विपन्नता, प्रकृति और खेत-खलिहान-गाँव-जवार-परिवार से उसके कई-कई रिश्तों का द्योतक नहीं है? क्या इन सबसे उसके इन रिश्तों को स्पष्ट करने के लिए उसकी देह को किसी अतिरिक्त और आयतित बिम्ब या बहुअर्थी वाक्य की आवश्यकता है? क्या किसी अलग-अनोखे-अद्भुत-अद्वितीय-अप्रतिम चित्रण-वर्णन की आवश्यकता है? क्या निराला की पंक्ति 'पेट-पीठ दोनों मिलकर हुए एक, चल रहा लकुटिया टेक' जैसी स्पष्ट, बिना किसी चमत्कारी बिम्ब वाली सीधी-सादी पंक्ति दीनहीन भिक्षुक और उसके देस-काल-समाज और राज की स्थिति को स्पष्ट करने में असमर्थ रह गई है?

क्या बिना चमत्कारी बिम्बों, बिना गूढ़ अमूर्तनों, बिना जटिलताओं, बिना कृत्रिमताओं के, किसी कविता का आस्वाद या संवेदन कम हो जाता है? क्या निराला की उक्त पंक्ति या 'भिक्षुक' शीर्षक पूरी कविता में कविता का आस्वाद या संवेदन तनिक मात्र भी कम रह गया है? क्या सादगी और सरलता कविता की पोशाक नहीं बन सकती? क्या कविता को हरदम और अनिवार्यत: भारी-भरकम और तड़क-भड़क वाले चमकीले-चमकदार परिधान ही पहनने होंगे? तब जाकर पाठकों को वह कविता का आस्वाद देने और संवेदित करने में समर्थ हो पाएगी? अन्यथा नहीं? क्या कविता की आत्मा भावों और संवेदनाओं में नहीं बसती है? या फिर वह शिल्प, कहन, भाषा, शैली, बिम्बों, शब्दाडंबरों आदि का गठ्ठर मात्र है? क्या कविता केवल कुछ कहने का कौशल मात्र है? क्या कविता पाठकों को चकित-विस्मित करना मात्र है? या फिर यह पाठकों के अंतस में अनुभूतियों का पुनर्सृजन भी है? क्या कविता का आस्वादन मात्र और मात्र कविता कहने के कौशल में ही निहित और सीमित है? क्या कविता अंतत: प्रयोग, तकनीक, कौशल, औजार, उपकरण आदि का उत्पाद और प्रतिफल मात्र है?

यदि सचमुच ऐसा ही होता तो फिर सूर-तुलसी-कबीर आदि के काव्य लोकमानस की स्मृतियों में सदियों-सदियों तक जीवंत-जाग्रत रहते ही नहीं! कहने की जरूरत नहीं कि इनके पद, इनके दोहे किसी उक्ति-चमत्कार, किसी उक्ति-वैचित्र्य या किसी गूढ़-जटिल काया-कलेवर के बूते नहीं वरन् अपनी सरलता, अपनी सादगी और लोकमानस से सीधे-सीधे जुड़ने और संवाद करने के सामर्थ्य के बूते ही आज भी इतने जनप्रिय हैं.



(दो)

कहा जा रहा है कि आज की कविता समाज से कटती जा रही है. इसका सीधा-सीधा अर्थ यही है कि समाज ही आज की कविता से जुड़ नहीं पा रहा है. लेकिन आज की कविता अगर जनमानस को नहीं भा रही है या आज की कविता लोक-समाज से कटती जा रही है तो क्या इसके पीछे के कारणों में कविता का अत्यधिक अभिजात्यपूर्ण, अत्यधिक कृत्रिम, अत्यधिक परायी और परदेशी होते जाना नहीं है? जब कविता सीधे संवाद करती थी, जब कविता जनमानस की भाषा बोलती थी, जब कविता जनमानस को चीन्हती थी, तब जनमानस भी, समाज भी कविता को सिर आँखों में उठाता था, उसको सुनने-गुनने-समझने का प्रयास करता था, कविता में आनंदित-आह्लादित होता था. जब कविता जनसाधारण का वरण करती थी तो जनसाधारण भी कविता का वरण करता था. तब जनसाधारण भी कविता सुनने-गुनने-समझने को उत्सुक-लालायित रहता था. यही कारण था कि तब लोग, गाँव के गाँव बैलगाड़ियों में सवार होकर भी दूर-दूराज से मीलों-मील सफर कर भवानी प्रसाद मिश्र, केदारनाथ अग्रवाल, नीरज, नेपाली आदि जैसे जनकवियों को सुनने आया करते थे.

आज की कविता जन का पक्षधर होने का दावा तो करती है लेकिन उनकी बोली-बानी में कुछ नहीं कहती! कहने के लिए वह सात समंदर पार झाँकती है, यहाँ से नहीं, वहाँ से कहने की अदा सीखती है! फिर काहे को यहाँ के जन, यहाँ के गण आज की कविता को अपना मानें, अपना कहें, कान देकर सुनें-गुनें? आज तो कविता एक दायरे और एक खाँचे में सीमित-संकुचित हो गई है. अब मंच से पढ़ा जाना न तो उसे सुहाता है और न तो उसके संरक्षकों को सुहाता है. एक मिथ्या धारणा बहुप्रचारित कर दी गई है कि मंच से पढ़ी जाने वाली कविता यानी मंचीय कविता स्तरीय कविता नहीं होती बल्कि स्तरीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में छपने और एक खास किस्म के साहित्यिक वर्ग के द्वारा पढ़ी-सराही-समझी जाने वाली कविता ही असल में उम्दा-उत्कृष्ट कविता है.

कहा यह भी जा रहा है कि आज की कविता में प्रकृति गौण हो गई है. सच है कि आज की कविता में प्रकृति गौण तो क्या, एकदम निष्कासित-तिरस्कृत-बहिष्कृत हो गई है. कविता से लय, ताल, छंद, गीतात्मकता आदि जैसे कर्णप्रिय और चित्ताकर्षी काव्य-तत्वों को तो कब का निष्कासित-निषिद्ध किया जा चुका था और कविता पद्य की देहरी लाँघकर कब की गद्य के मैदान में चौके-छक्के लगाने लगी थी. पर संतोष की बात यह थी कि कविता मुक्तछंद में रची जाने तक कम से कम कविता तो लगती थी क्योंकि मुक्त के साथ छंद तो कम से कम साथ थे! लेकिन अब कविता इससे बहुत आगे की चीज हो गई है और वह न सिर्फ अपनी जुबान बल्कि अपनी काया भी बदल चुकी है क्योंकि अब तो आयताकार, वर्गाकार, चतुर्भजाकार, चौकोर कविताएँ लिखी जाने लगी हैं! ऐसे में कविता का कृत्रिम हो जाना और प्रकृति से दूर, बहुत दूर हो जाना तो स्वभाविक ही है!

एक दौर में कविता में प्रेम को निषिद्ध किया गया था. दूसरे दौर में प्रकृति निषिद्ध हो रही है. एक दौर में कविता एक विशेष विचारधारा की पोषक-वाहक बनकर जन की जुबान कहने का दावा करते रहने के बावजूद जन से कट गई, अपनी मौलिकता-नैसर्गिकता और जनमानस से कट गई, हट गई. इस नए दौर में कविता शिल्प, शैली और तकनीक के आग्रह और कलात्मकता के लोभ-लालच और जनप्रियता से अधिक यश-कामना की शिकार होकर लोक और प्रकृति से कट गई है, कृत्रिम यानी 'सिंथेटिक' हो गई है! बिल्कुल 'सिंथेटिक मिल्क' की तरह! लेकिन भला हरी-हरी घास चरकर गायों के थन में शनै:-शनै: उतरे दूध के स्वाद और गुणों के सामने इस 'सिंथेटिक मिल्क' की क्या बिसात? क्या औकात? सिर्फ प्राचीन आर्युवेद ही नहीं, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी कहता है कि हरी-हरी घास चरकर गायें जो दूध देती हैं, उस नैसर्गिक दूध से 'कोलेस्ट्रॉल' की बीमारी नहीं होती, जिसकी यह पूरी की पूरी खायी-अघायी सभ्यता ही शिकार हुई जा रही है! उल्टे हरी-हरी घास से उतरे दूध से अनपच, दम्मा आदि जैसी जानखाऊ बीमारी भी दूर भागती है!

लेकिन इस 'सिंथेटिक मिल्क' के लुभावने विज्ञापनों और कारोबारी समर्थकों-प्रचारकों की तरह, इस 'सिंथेटिक' कविता के भी लुभावने विज्ञापन और भरमाने वाले समर्थक-प्रचारक भी कम नहीं हैं कविता के बाजार में! हाँ, बाजार में, क्योंकि अब कविता को भी एक 'प्रॉडक्ट' के रूप में ही 'रिड्यूस' कर दिया गया है, जिसकी जितनी चमकदार 'फिनिसिंग' और जितनी चमकीली 'पैकेजिंग' होगी, वह उतनी ही अधिक बिकेगी, उसकी उतनी ही अधिक माँग बढ़ेगी!


(तीन)
   
दरअसल एक जैसी या इस जैसी या उस जैसी रची जा रही कविता जैसे जोर-शोर से बारंबार लगातार दुहराये-सुनाये जा रहे जुमलों से अकबकाये-घबराये सैकड़ों सृजनशील खासोआम युवा कवियों के बीच कुछ अलग हटकर रचने की हड़बड़ाहट भरी चाह और उत्साह ने कई क्रांतिकारी कवियों को एक ऐसी भाषा, शिल्प, शैली और कहन की दहलीज पर ला खड़ा कर दिया जहाँ कुछ भी देशज नहीं था, सबकुछ आयतित था. जहाँ कुछ भी सरल-सहज नहीं था, सबकुछ जटिल और दुरूह था. जहाँ सबकुछ चमचमाता-चमकीला था, कुछ भी धूसर-मटमैला नहीं था. जहाँ सबकुछ तराशा-माँजा था, कुछ भी अनगढ़ नहीं था. यहाँ तक कि जहाँ दुख और उदासी भी स्वर्णजड़ित काया में कमनीय प्रतीत होती थी! ऐसे में कुछ कवियों को लगा कि कविता की काया का चकमक-चमकीला, चमत्कारी-विस्मयकारी-मुग्धकारी होना अत्यंत अनिवार्य था, तभी उनकी कविता अलग-अदभुत-अनूठी-अद्वितीय लगेगी! उन्होंने यह माना कि कविता के मन की सादगी से कहीं बहुत ज्यादा जरूरी है कविता की देह पर चकित करने वाले शब्दों, बिम्बों, वाक्यों और सूत्र-वाक्यों की मीनाकारी!

ऐसे में यह जरूरी हो गया कि कविता (रचने) में अनुभवों और अनुभूतियों से ज्यादा ध्यान कविता की काया और कविता की माया पर लगाया जाए! कवियों ने कविता को संवेदनाओं का कैनवास बनाने की बजाय विचित्र से विचित्रतर बिम्बों और अमूर्तनों का अबूझ कैनवास बनाना शुरू कर दिया. मेधावी कवियों ने कविता को औजार, उपकरण, तकनीक और कौशल की आजमाईश के मैदान में तब्दील कर दिया. कवियों की मेधा कविता को बारीकी से तराशने लगी और कुछ इस तरह तराशने लगी कि वह देशी नहीं, 'इम्पोर्टेड' दिखे, 'एक्सपोर्ट क्वालिटी' की दिखे! इसके लिए उन्होंने सात समंदर पार तक की श्रमसाध्य, समयसाध्य, धैर्यसाध्य और दुरूह यात्राएँ कीं और वहाँ से कविता में समृद्धि और सामर्थ्य लाने की जहमत उठाई. फलत: कविता में कहन और लिखन की जादूगरी पैदा करने की होड़ लग गई. कविता खेत में ठेहुने भर पानी में धान रोपती स्त्री नहीं रही, वह शीशमहल में इठलाती-इतराती परी-सुंदरी हो गई! हर तरफ तालियों की गड़गड़ाहट हुई! कविता धन्य हुई! कवि धन्य हुए! आलोचक धन्य हुए, प्रसन्न हुए! कविता के आकाश में कुछ कवि शुक्र तारा की तरह चमचमाने लगे, कुछ ध्रुव तारा की तरह. कुछ कवियों का समूह सप्तऋषि की तरह चमकने-चमचमाने लगा!

लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि सूचना (इन्फॉर्मेशन), बुद्धि (इंटेलेक्ट), ज्ञान (नॉलेज) और विवेक (विजडम) में फर्क होता है. सूर-तुलसी-कबीर के काव्य में पांडित्य-प्रदर्शन नहीं था, सूचनाओं का अंबार नहीं था. वहाँ केवल सादगी थी और जीवन जीने के लिए आवश्यक विवेक और ज्ञान का सरल संप्रेषण और विवेचन था. यहाँ यह भी जानना जरूरी है कि कविता क्या औजार, उपकरण, तकनीक, कौशल और पांडित्य-प्रदर्शन का उत्पाद/प्रतिफल है? कविता क्या केवल और केवल विरोधाभासों, प्रतिलोम-युग्मों, विरोधाभासी एवं असंगत कथनों (पाराडॉक्सों), असदृशों (एंटी-पैरेलल्स), मति-विलास (विट), विचित्र उपमाओं (कंसीट), अमूर्त बिंबों (एब्सट्रैक्ट इमेजरी) और अतिबौद्धिकता (हाइपरइंटेलेक्चुअलिज्म) आदि का ही संगुंफन मात्र है? या फिर कविता वह होती है जो सीधे-सीधे दिल में उतर जाए? यह कविता का दुर्भाग्य रहा कि वह पहले एक खास तरह की विचारधारा से आक्रांत हुई और धीरे-धीरे नारों में तब्दील हुई; फिर भाषा, शैली, कहन, अमूर्त बिंबों और अंतत: अति अमूर्तन की शिकार हुई. और इस तरह जन-जवार, लोक-समाज से दूर हुई कविता....

सच तो यह है कि सत्रहवीं सदी में चंद दशकों के लिए परवान चढ़ी और उतरी और फिर बीसवीं सदी में कुछ दशकों के लिए पुन: लोकप्रिय हुई और फिर दुरूहता और कृत्रिमता के कारण अंतत: दरकिनार कर दी गई अंग्रेजी 'मेटाफिजीकल पोएट्री' की तर्ज पर नकल कर रची जा रही कविता चमकाती-चौंकाती जरूर है लेकिन जेहन में ठहरती कहाँ है? क्या यह सच नहीं कि इस तरह रची जा रही कविता एक सम्मोहन तो जरूर पैदा करती है पर ऐसी कविता प्राय: अति गद्य और अति गुंफन का शिकार हो जाती है और एक ही कैनवास पर एक ही साथ एक ही बार में ढेर सारे रंगों और शेडों का प्रयोग करने से तसवीर धुंधली हो जाती है! ढेर सारे संदर्भों, सूचनाओं, आख्यानों, उपाख्यानों, कथाओं, उपकथाओं आदि के जबरन समावेश से पैदा हुई कविताई करिश्मा (और इस प्रकार प्रदर्शित पांडित्य) के बावजूद कविता में बोझिलता आ जाती है और कविता पढ़ने के बाद मन, चित्त और दिलो-दिमाग पर महज कुछ सूत्र-वाक्य तैरते बच जाते हैं और कविता फिसल जाती है. तो क्या यह मान लिया जाए कि कुछ सूत्र वाक्य ही कविता हैं?

यहाँ अंग्रेजी के महान कवि-आलोचक सैमुअल जॉनसन द्वारा सत्रहवीं सदी के मेटाफिजीकल कवियों के बारे में की गई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी पर ध्यान देना उचित और प्रासंगिक होगा- "The metaphysical poets were men of learning, and, to show their learning was their whole endeavour; but, unluckily resolving to show it in rhyme, instead of writing poetry, they only wrote verses, and, very often, such verses as stood the trial of the finger better than of the ear; for the modulation was so imperfect, that they were only found to be verses by counting the syllables... The most heterogeneous ideas are yoked by violence together; nature and art are ransacked for illustrations, comparisons, and allusions; their learning instructs, and their subtilty surprises; but the reader commonly thinks his improvement dearly bought, and, though he sometimes admires, is seldom pleased." अर्थात् ''मेटाफिजीकल कविगण विद्वान लोग थे और, अपनी विद्वता का प्रदर्शन ही उनका एकमात्र उपक्रम था. लेकिन दुर्भाग्यवश, कविता लिखने की बजाय, इसे छंद में दर्शाने के निर्णय के कारण, उन्होंने सिर्फ पद्य लिखे और प्राय: ऐसे पद्य कर्णप्रिय लगने की बजाय अंगुलियों की कसरत बनकर ही रह गए; क्योंकि उनके आरोह-अवरोह इतने दोषपूर्ण थे कि उनके स्वरों/ध्वनियों/अक्षरों को गिनने पर ही वे पद्य लगते थे... जहाँ एकदम विषम, विजातीय, असदृश विचारों/भावों को जबरन जोड़ दिए जाते हैं; दृश्यों/दृष्टांतों/मिसालों/उदाहरणों, तुलनाओं/उपमाओं और संकेतों/इंगितियों के लिए प्रकृति और कला को तहस-नहस कर दिया जाता है. उनकी विद्वता निर्देशित करती है, और उनकी बारीकी चौंकाती है; लेकिन पाठक आम तौर पर यही सोचता है कि उनका यह विकास बड़ी मशक्कत से अर्जित किया गया है; और हालाँकि वह कभी-कभार इसकी प्रशंसा कर देता है लेकिन इसपर वह शायद ही प्रसन्न होता है.''


(चार)

यह प्राय: कहा जाता है कि यदि अच्छा साहित्य लिखना है तो खूब साहित्य पढ़ना, साहित्य का खूब अध्ययन करना आवश्यक है. लेकिन देशी-विदेशी साहित्य का खूब अध्ययन करना और पढ़े-सुने-देखे के स्पष्ट सीधे प्रभाव में जाना एवं अपने लेखन में उनकी सीधी या परोक्ष, स्थूल या सूक्ष्म नकल करना : दोनों अलग-अलग बातें हैं. विश्व साहित्य का अध्ययन और आस्वाद और उसके स्पष्ट प्रभाव में आकर लगभग अनुकरण करते हुए आयतित बिंबो के साथ कविताई करना : दोनों अलग-अलग बातें हैं. इस बात से इंकार करना असंभव है कि कोई भी लेखक या कवि अपने रचना-कर्म में पूर्व में किसी पढ़ी-सुनी-देखी कृति से कभी प्रभावित हुआ ही नहीं हो. कविता और कवियों पर उसके पढ़े-सुने-देखे की जाने-अनजाने छाया तो पड़ती ही है. लेकिन यहाँ यह समझने की जरूरत है कि किसी कृति/कवि/लेखक से कुछ समय या फिर लंबे समय तक प्रभावित होना अलग बात है और उसके प्रभाव से ऊपर उठकर, बाहर आकर और मुक्त होकर नए धरातल पर पहुँचकर नई और मौलिक रचना करना बिल्कुल अलग बात है. इसके उलट, किसी कविता या कवि की चालाकी भरी नकल करना बिल्कुल ही अलग बात है!

जब हम अपन बच्चे का नाम रखने तक में यह सोचते हैं कि इसका नाम बिल्कुल अलग-अनूठा, नया-सा हो, यह जानते हुए भी कि ऐसा संभव नहीं है क्योंकि वह नाम कहीं--कहीं या तो जेहन/अवचेतन में ही पूर्व से मौजूद रहता है या किसी का पहले से ही वह नाम होता है. इतना ही नहीं, हम तो अपने रंग-रूप में, अपने पोशाक में, अपने घर की साज-सज्जा और वास्तु-बनावट आदि में भी चाहते हैं कि कुछ अलग लगे, तो फिर कविता में तो अनुकरण से सायास बचना ही चाहिए. जहाँ हम किसी दूसरे की तरह दिखना-पहनना-सजनना-संवरना-बनना-बनाना चाहते भी हैं तो वहाँ यह तो साफ ही होता है कि हम फलां की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं! कविता के बारे में तो महान ग्रीक दार्शनिकों प्लेटो और अरस्तु ने बहुत पहले ही यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित कर दिया था कि कविता अनुकरण ही है (Poetry is imitation.). इतना ही नहीं, यहाँ तक कहा गया कि कविता अनुकरण का अनुकरण है! (Poetry is imitation of imitation!) क्योंकि हम जो देखते हैं, वह स्वयं एक छवि (image/impression) है! फिर इस छवि का पुन: चित्रण अनुकरण का ही पुन: अनुकरण ही हुआ! ऐसे में हमें किसी कवि या कविता के प्रभाव में आकर कोई कविता लिखने से तो सायास, सावचेत बचना ही होगा ताकि हमारी कविता न्यूनतम अनुकरण लगे!

प्रसंगवश, यहाँ विश्व साहित्य की नकल की प्रवृति पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी द्वारा दशकों पहले ही दी जा चुकी चेतावनी को उद्धृत करना माकूल होगा. वह कहते हैं- ''हमारा यह तात्पर्य नहीं कि योरोप के साहित्य के क्षेत्र में उठी हुई बातों की चर्चा हमारे यहाँ न हो. यदि हमें वर्तमान जगत के बीच से अपना रास्ता निकालना है तो वहाँ के अनेक 'वादों' और प्रवृत्तियों तथा उन्हें उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों का पूरा परिचय हमें होना चाहिए. उन वादों की चर्चा अच्छी तरह हो, उन पर पूरा विचार हो और उनके भीतर जो थोड़ा बहुत सत्य छिपा हो, उसका ध्यान अपने साहित्य के विकास में रखा जाए. पर इसमें से कभी इसको, कभी उसको यह कहते हुए सामने रखना कि वर्तमान विश्व साहित्य का स्वरूप यही है, जिससे हिंदी साहित्य अभी बहुत दूर है, अनाड़ीपन ही नहीं, जंगलीपन भी है.'' इतना ही नहीं, वह यहाँ तक कहते हैं कि- ''किसी साहित्य में केवल बाहर की भद्दी नकल उसकी अपनी उन्नति या प्रगति नहीं कही जा सकती. बाहर से सामग्री आए, खूब आए, पर वह कूड़ा-करकट के रूप में न इकट्ठी की जाए. उसकी कड़ी परीक्षा हो, उस पर व्यापक दृष्टि से विवेचन किया जाए, जिससे हमारे साहित्य के स्वतंत्र और व्यापक विकास में सहायता पहुँचे.'' यहाँ उनके द्वारा बलपूर्वक और खिन्नतापूर्वक कहे गए दो शब्दों- 'जंगलीपन' और 'भद्दी नकल' पर गौर करें तो उस समय से ही हिंदी साहित्य में घुसपैठ कर चुकी नकल की बीमारी और उस दौर में भी इस बीमारी की भयावहता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है!

लेकिन यह प्राय: कम ही होता है कि हम अनुकरण से बचें! इसके उलट अब तो अलग-अद्वितीय-अनूठा-अद्भुत दिखने-लिखने की आकांक्षा में विश्व कविता, लातीन अमरीकी कविता, मध्यपूर्व देशों की कविता खूब पढ़ी जा रही है और उनके जैसी लिखने-दिखने की सायास कोशिश की जा रही है. इस प्रकार लिखी गई कविता पहले-पहल बहुत मौलिक, बहुत अनूठी, बहुत सूक्ष्म, बहुत महीन, बहुत अव्वल जरूर लगती है. लेकिन यदि कोई दस-बीस लातीन अमरीकी कवियों, दस-बीस मध्यपूर्व देशों और यूरोपीय देशों के कवियों को पढ़ ले, दस-बीस विश्व कवियों को पढ़ ले तो उसे सहज ही अनुमान हो जाएगा कि बहुत मौलिक, बहुत अनूठी, बहुत सूक्ष्म, बहुत महीन, बहुत अव्वल प्रतीत हो रही और जोर-शोर से बतौर बानगी पेश की जा रही अधिकांश कविताएँ बहुत सूक्ष्म या स्थूल, कलात्मक या भौंड़ी नकल या अनुकरण के सिवा और कुछ नहीं हैं और इनमें चमकते-चौंकाते अधिकांश बिम्ब इन्हीं विश्व कवियों की भाषा में बरते-खरचे जा चुके, 'जुठाए' और आयतित बिम्ब ही हैं! वस्तुत: हिंदी में अभी जो चमत्कारी और चकित कर देने वाली कविता लिखी जा रही है, उनका आस्वाद दस बीस लातीन अमरीकी, मध्यपूर्वी, इतालवी, जर्मन कवियों आदि यानी विश्व कवियों को पढ़ लेने से सचमुच बासी हो जाता है क्योंकि इनपर उन्हीं विश्व कवियों का सीधा-सीधा आयतित प्रभाव प्रतीत होता है!

यहाँ यह भी उल्लेख करना मानीखेज होगा कि जावेद अख्तर और यहाँ तक कि गुलजार जैसे बड़े कद के शायरों-गीतकारों के बारे में भी यह कहा-सुना जाता है कि उर्दू के कई शायर, गजलगो और आलोचक उनपर यह आरोप लगाते हैं कि उनकी नज्मों और शेरों में उर्दू शायरी से चुराये गए अनेक मुखड़े, शेर और बिंब इस्तेमाल हुए हैं! इस बात में कितनी सच्चाई है, यह तो शोध और बहस का मामला है. लेकिन सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की 'बतूता का जूता' कविता की गुलजार द्वारा एक फिल्मी गीत में की गई सीधी नकल का हालिया मामला तो सबको याद होगा ही! हिंदी के ही एक युवा कवि पर पिछले वर्ष लखनऊ से निकलने वाली एक पत्रिका 'समकालीन सरोकार' में एक कवि-आलोचक ने भी नकल और पैरोडी के कुछ ऐसे ही आरोप लगाते हुए एक लंबा आलेख लिखा था! 'वागर्थ' के कुछ महीने पहले के किसी अंक में भी एक युवा कवि पर हिंदी के वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज ने उदाहरणों-उद्धरणों के साथ यह आरोप लगाया था कि उक्त युवा कवि की समस्त कविताएँ उनकी ही कविताओं की सीधी-सीधी नकल हैं! इधर-उधर से चुराकर और सीधे-सीधे नकलकर फेसबुक पर अपने नाम के साथ चस्पां की जा रही शेरो-शायरी पर भी हाल में 'शुक्रवार' पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी! उपन्यास के मामले में भी महुआ माजी का मामला ज्यादा पुराना नहीं है.

यह सच है कि इस बात की पूरी संभावना रहती है कि किसी कविता या कहानी या रचना की कोई पंक्ति अवचेतन में आपके मन में बैठ जाए और लंबे समय बाद वह आपके लेखन में मिलते-जुलते रूप में या हू--हू ही उतर जाए! यह तमाम नामी-गिरामी विदेशी लेखकों के मामले में भी सच पाया गया है. लेकिन यह उनकी एकाध रचना या रचना-अंश के संदर्भ में ही सही पाया गया है. इसलिए उनपर नकल के आरोप कभी नहीं लगे और इन्हें रचनात्मक संयोगों (Creative co-incidents) के रूप में ही देखा गया. यहाँ तक कि यह भी अनुमान लगाया गया कि विश्व के विभिन्न कोनों-अतरों में रचनारत लेखक-कविगण किसी एक विषय या किसी एक मन:स्थिति में एक जैसा ही सोचते हैं! पर यदि पूरी की पूरी किताब या सारी की सारी कविताओं पर नकल का आरोप लगे तो रचना की मौलिकता और लेखक या कवि की रचनात्मक मौलिकता संदेह के घेरे में तो ही जाती है!


(पाँच)

दरअसल अभी हिंदी कविता में दो तरह की प्रवृत्तियों का तीव्र प्रभाव दिखाई दे रहा है. पहली प्रवृत्ति तो यह कि कविता में अभी बस कहन और लिखन के स्तर पर एक प्रकार की जादूगरी पैदा करने का उपक्रम खूब किया जा रहा है या फिर मैंने इतना पढ़ा, फलां को पढ़ा, वगैरह-वगैरह बघारने की बहुत ही जहीन और महीन कला काम में ली जा रही है. कह सकते हैं, जैसा कि सैमुअल जॉनसन ने भी कहा था, कविता में कविता कम, अकादमिकता ज्यादा पिरोयी जा रही है. और दूसरी प्रवृत्ति यह कि हिंदी कविता अभी गहन प्रयोगधर्मिता से गुजर रही है और वह अतिशीघ्रातिशीघ्र अंतराष्ट्रीय फलक पर फैल जाने को फड़फड़ा रही है. ऐसे में उसका विश्व साहित्य (अर्थात् वर्ल्ड लिटरेचर) से आक्रांत और आवृत होते जाना स्वभाविक है. लेकिन इसमें असल खतरा यह पैदा हो गया है कि इस उपक्रम में कविता अनजाने अथवा सायास अतिअनुकरण और अतिअमूर्तन का शिकार होती जा रही है. इतना ही नहीं, इस कारण कविता की भाषा, शिल्प, शैली, कहन और बिम्बों आदि में किंचित कृत्रिमता आने लगी है और कविता की नैसर्गिक सहजता समाप्त होने लगी है. मुझे लगता है, कला के दायरे में रहकर सृजन करना तो ठीक है लेकिन यदि सृजन तकनीक में तब्दील हो जाए तो वह सृजन का ही संहार करने लगती है. कहने की जरूरत नहीं कि तकनीक आरंभ में आकर्षित तो करती है लेकिन अंत में उबाती ही है!

इन सब बातों के बावजूद, यह तो स्वीकारना ही पड़ेगा कि हरेक कवि सर्वप्रथम एक व्यक्ति होता है; और हरेक कवि (चाहे वह टुच्चा हो या महान, बड़ा हो या छोटा, लोकल हो या ग्लोबल) के सोचने, देखने, विचारने के साथ-साथ कल्पना करने, स्वप्न देखने तथा अनुभव एवं अनुभूति की क्रियाएँ, प्रक्रियाएँ एवं प्रतिक्रियाएँ और अंतत: इनकी अभिव्यक्तियाँ एवं परिणतियाँ प्रथमत: एक स्वतंत्र मनुष्य होने के नाते अलग-अलग ही होती हैं. इसलिए उनकी निजी अनुभूति-अभिव्यक्ति की तरह ही उनकी रचना और रचना-प्रक्रिया भी प्रथमत: निजी ही होती है. कविता चाहे जितनी ही निर्वैयक्तिक (इम्पर्सनल) हो, कवि तो हमेशा व्यक्ति (इंडिविजुअल) ही होता है! इसलिए कह सकते हैं कि हरेक व्यक्ति का (चाहे वह कवि हो, चित्रकार हो या संगीतकार) का नितांत अपना चयन और गमन होता है. जैसे मैं अपनी कविता को विदेशी या विश्व कविता के प्रभाव और छाया से सायास बचाता हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि कविता को अपने रंग-रूप और स्वाद में विदेशज नहीं, देशज होना चाहिए. और यह भी कि कविता को कविता ही रहने देना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे प्यार को प्यार ही रहने देना बेहतर है. इस बात को इस तरह भी कहा जा सकता है कि कोई पॉप-रैप-जैज में रमता है तो कोई कबीर के पदों में ही खोया रहता है! किसी को महानगर पसंद आता है तो किसी को गाँव ही सहज लगता है! किसी को अमरीका रास आता है तो किसी को अपना देश भारत ही न्यारा लगता है! अर्थात् यह नितांत निजी और वैयक्तिक चयन और गमन और अंततोगत्वा नितांत निजी और वैयक्तिक सृजन-अण्वेषण ही है! यहाँ महत्वपूर्ण बात बस यह है कि यह सृजन-अण्वेषण मौलिक हो और यदि शतप्रतिशत मौलिक नहीं भी हो तो इसमें न्यूनतम अनुकरण हो.

ठीक इसी तरह और इसलिए किसी कवि की कविता को इकहरी और 'जूठन' करार देना और किसी कवि की कविता को एकदम 'अलग-अद्भुत-अनूठी-अद्वितीय' घोषित कर देना उचित नहीं है क्योंकि ऐसी घोषणाएँ या ऐसे निर्णय हमेशा संदिग्धता के ही शिकार होंगे. हाँ, अपनी निजी पसंद-नापंसद और कविता से अपनी अपेक्षाएँ जाहिर करना एक सहज-स्वभाविक-स्वतंत्र क्रिया है और इसका सदैव स्वागत किया जाना चाहिए. इस शाश्वत सत्य के बावजूद कि जो रचेगा, वही बचेगा, यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि हरेक कवि अपने समय की कविता में कुछ कुछ योगदान करता है- चाहे वह एकदम टुच्चा, एकदम औसत, एकदम बकवास कवि ही क्यों नहीं हो! इसलिए उस काल की कविता के इतिहास में अदने से अदने कवि का भी योगदान दर्ज किया जाएगा, भले ही उस काल के प्रतिनिधि कवियों का चयन स्वयं काल करे. अंग्रेजी के महत्वपूर्ण कवि-आलोचक टी. एस. इलियट ने भी अपने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आलोचनात्मक निबंध (Tradition and Individual Talent) में इस बात को गंभीरतापूर्वक स्वीकार किया है.

आज हिंदी कविता में सैकड़ों कवि सक्रिय हैं. ब्लॉगिया और फेसबुकिया कवियों, शायरों, गजलकारों, आलोचकों, समीक्षकों और टिप्पणीकारों की भी भरमार है. उनके हजारों-हजार साहित्यिक-गैरसाहित्यिक, गंभीर-अगंभीर, नियमित-अनियमित पाठक भी हैं. यह सच है कि इन सब के सब फेसबुकिया-ब्लॉगिया कवियों, सबके सब स्वीकृत-अस्वीकृत, चर्चित-अचर्चित, पुरस्कृत-अपुरस्कृत, पुस्तकीकृत-अपुस्तकीकृत, प्रतिनिधि-अप्रतिनिधि कवियों में से ऐसे अनेकानेक कवि होंगे जिनको पाठक स्वत: नापसंद कर देंगे. लेकिन इसके बावजूद यह भी तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि इनमें से प्रत्येक कवि का एक ऐसा पाठक-वर्ग तो होगा ही, जो उसकी कविताओं का प्रशंसक होगा- चाहे वह पाठक वर्ग बिल्कुल छोटा ही क्यों नहीं हो!
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राहुल राजेश
सहायक प्रबंधक (राजभाषा),
भारतीय रिज़र्व बैंक, ला गज्जर चैंबर्स, आश्रम रोड,
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मो.09429608159/ईमेल: rahulrajesh2006@gmail.com