परख : हलंत (हृषीकेश सुलभ): राकेश बिहारी

Posted by arun dev on फ़रवरी 15, 2015












वरिष्ठ कथाकार और रंगकर्मी हृषीकेश सुलभ ने आज अपने सक्रिय जीवन के साठ वर्ष पूरे किये हैं. इसी वर्ष उनका नया कहानी संग्रह भी प्रकशित हुआ है. इस संग्रह की छह कहानियों में उनके अपने जीवन की ही तरह विविधता और रचनात्मकता है. इस संग्रह पर विस्तार से कथा-आलोचक राकेश बिहारी ने लिखा है. समालोचन की ओर से जन्म दिन की बहुत बधाई.


स्वप्नों के स्थगन से संकल्पों के उत्सव तक         
राकेश बिहारी 

क ऐसे समय में जब विधा के तौर पर कहानी की केन्द्रीयता लगातार बनी हुई है और कथाकारों की एक नई पीढ़ी अपनी स्पष्ट पहचान अर्जित कर चुकी है, किसी वरिष्ठ कथाकार के नए संग्रह का प्रकाशित होना जहां पाठकों को कई तरह की उत्सुकताओं-उम्मीदों से भर देता है, वहीं अपने समय के यथार्थ और उसके साथ होनेवाली रचनात्मक अभिक्रियाओं की परिसीमा से बाहर निकल कर समय के समकालीन बहाव की अंतर्धाराओं के साथ एक युगीन संगति बैठाना खुद लेखक के लिए भी बड़ी चुनौती होती है. सुखद है कि वधस्थल से छलांग’, ‘वसंत के हत्यारे और हवि जैसी कई अन्य बहुमूल्य कहानियों के शिल्पी हृषीकेश सुलभ के नए कहानी-संग्रह हलंत की कहानियाँ न सिर्फ इन चुनौतियों का मजबूत प्रतिपक्ष रचते हुये अपना विकास दर्ज कराती हैं बल्कि अपनी समग्रता में नए कहानीकारों के लिए किसी प्रभावी कार्यशाला की तरह भी उपस्थित होती हैं.

ह संग्रह जीवन-लय के आरोह-अवरोहों का जीवंत दस्तावेज है. लय दो क्रियाओं के बीच का अंतराल है, जिसमें गति और विश्रांति दोनों ही परस्पर आबद्ध होते हैं. इस संग्रह की कहानियाँ गति और विश्रांति के इन्हीं दो छोरों के बीच रचनात्मक सेतु की विनिर्मिति का व्यावहारिक व्याकरण रचती हैं. बहाव और ठहराव के अंतर्संबंधों को विश्लेषित करते इस संग्रह की कुल छः कहानियाँ किसी इकहरे मूल्यबोध की प्रतिष्ठा नहीं करतीं बल्कि परस्पर विपरीतधर्मी यथार्थों के साथ संगत करते विविधवर्णी मूल्यों की टकराहटों से उत्पन्न अंतर्ध्वनियों को एक सधी हुई कलात्मकता के साथ दर्ज करती चलती हैं.

रंपरा और आधुनिकता के बहुश्रुत रचनात्मक द्वंद्व से दो कदम आगे आधुनिक चेतना की विभिन्न छवियों के बीच फैले संवेदना के भूगोल को बिना वाचाल हुये स्वीकृति और अस्वीकृति की गहरी लकीर से अलग कर देना हृषीकेश सुलभ के कथाकार की बड़ी विशेषता है. भाषा और शिल्प के प्रयोगों का कोई आडंबर किए बिना यथार्थ की अलग-अलग अर्थ-छवियों और उनके बहुवर्णी राग-रंग को मर्मभेदी विस्तार देते हुये ये कहानियाँ जिस तरह रचनाशीलता के कई बने बनाए घेरों का अतिक्रमण करती हैं वह इन्हें कहानियों की भीड़ में अलग और विशिष्ट पहचान देता है. दृश्य को संवाद में बदल देने का अद्भुत कौशल हो या संगीत की शब्दावलियों से संवेदना की नई संदर्भ-छवियों का उकेरा जाना, कला की विभिन्न विधाओं का रचनात्मक उपयोग इन कहानियों में सहज ही महसूस किया जा सकता है. साहित्येतर अनुशासन की बारीकियों के उपयोग की यह खूबसूरती तब और बढ़ जाती है जब एक सामान्य पाठक के आस्वादन में इस कारण कोई अवरोध या व्यवधान उत्पन्न नहीं होता. हाँ, यदि पाठक को उस अनुशासन की उन बारीकियों की जानकारी हो तो वह उन्हीं संदर्भों का एक अलग पाठ भी ग्रहण कर सकता है.

दाहरणार्थ संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी ‘द्रुत विलंबित’ के उस दृश्य को देखा जा सकता है जब शुभा फ्रेशर्स डे के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में राग यमन में एक गीत गाती है. उल्लेखनीय है कि कार्यक्रम शाम के समय हो रहा है और यमन शाम के वक्त गाया जानेवाला राग ही है. एक आम पाठक को इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता कि कहानी में किस समय कौन सा राग गाया जा रहा है. पर तकनीकी शुद्धता से और आगे जैसे ही हम उस गायन को शुभा के जीवन पर पड़ने वाली सांध्य-छाया और रात की कालिमा के आगमन की पगध्वनि से जोड़ कर देखते हैं, इस छोटे-से दृश्य का एक बड़ा और नया अर्थ-संसार हमारे भीतर खुलने लगता है. साहित्येतर अनुशासनों के रचनात्मक इस्तेमाल की यह कलात्मक प्रविधि पाठबहुलता के लिए तो जगह बनाती ही है यथार्थ की पुनर्रचना को भी बहुपरतीय समृद्धि प्रदान करती है. उदाहरण के लिए एक बार फिर कहानी `````````’`द्रुत विलंबित’ का उल्लेख समीचीन होगा जहां लय के दो रूप द्रुत और विलंबित कहानी के दो पात्रों क्रमश: पारुल और शुभा के जीवन का प्रतीक बन जाते हैं. उल्लेखनीय है कि द्रुत और विलंबित का अर्थ यहाँ सिर्फ गति और विश्रांति तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि इसके सहारे दो जीवन-दृष्टियाँ अपनी-अपनी उपस्थिती दर्ज करा जाती हैं. द्रुत और विलंबित के अलग-अलग संवेदना-क्षेत्रों की यह कश्मकश संग्रह की लगभग सभी कहानियों में मौजूद है, चाहे वह सुवन्ती स्नेहा और माधुरी देवी (अगिन जो लागी नीर में) की जीवन-दृष्टियों का अंतर हो या फिर ‘मैं’ और रज्जो (हलंत) की जीवन-दृष्टियों का. लेकिन यहीं यदि द्रुत और विलंबित के अलग-अलग अर्थ-संदर्भों से इतर इसे एक शब्द युग्म ‘द्रुत-विलंबित’ या ‘विलंबित द्रुत’ की तरह पढ़ा जाये तो? ’`द्रुत विलंबित’ की शुभा हो या ‘हलंत’ की रज्जो, ‘अगिन जो लागी नीर में’ की माधुरी देवी हो या ‘उदासियों का वसंत‘ की बिन्नी या फिर ‘हबी डार्लिंग’ की ‘वह’ इन सबका जीवन कहीं न कहीं ‘विलंबित द्रुत’ ही तो है. इसे हम स्थगित स्वप्न भी कह सकते हैं.  लेकिन स्थगित स्वप्नों की ये स्वामिनियाँ अपने सपनों के स्थगन का शोक नहीं मनातीं बल्कि अपनी अलग-अलग भूमिकाओं से अपने जीवन के विलंबित द्रुत या विश्रांत गति को संकल्पों के उत्सव में बदल देती हैं. वर्षों बाद पति के आगमन की खबर सुनने के बाद अपने सुहाग चिह्न मिटाती माधुरी देवी हो या फिर फोन बुक में हबी डार्लिंग के सुरक्षित नाम से डार्लिंग हटाती अय्याशी और प्यार के अंतर को समझने वाली स्त्री, उदासी को वसंत के उत्सव में तब्दील करने का सपना देखती बिन्नी हो या खुद से अर्जित जीवन की जिम्मेवारियों को निभाने के बाद बिना याचक बने अपने प्रेमी के जीवन से चुपचाप निकल जानेवाली रज्जो, सब के सब स्व्प्नों के स्थगन को संकल्पों के उत्सव में बदलने का हुनर जानती हैं, यही इनकी और इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता है.

गौरतलब है कि ऊपर संग्रह की अलग-अलग कहानियों के जिन पात्रों का उल्लेख किया गया वे सब की सब न सिर्फ स्त्री हैं बल्कि इन कहानियों का मुख्य चरित्र भी  हैं. कहने की जरूरत नहीं कि हृषीकेश सुलभ की पीढ़ी और उसके आसपास के पुरुष कथाकारों की स्त्री-दृष्टि बहुधा कैसी रही है. भूमंडलोत्तर कथा पीढ़ी के अधिकांश पुरुष कथाकारों की कहानियों में वर्णित कैरियरिस्ट और अपौर्चुनिस्ट स्त्री चरित्रों से भी हम भली-भांति वाकिफ हैं. ऐसे में बिना किसी शोर-शराबे के बदलावों की नई इबारत लिखनेवाली ये मजबूत स्त्रियाँ किसी सुखद आश्चर्य की तरह हमें एक नई आश्वस्ति से तो भरती ही हैं हृषीकेश सुलभ को अपने पूर्ववर्ती, समकालीन और परवर्ती कथाकारों के बीच अलग और विशिष्ट भी बनाती हैं. बदलते स्त्री-यथार्थ के नाम पर स्त्रियॉं को  सिर्फ ऑब्जेक्ट की तरह ट्रीट करने वाले पुरुष कथाकारों और नाटकीय क्रान्तिधर्मिता की ध्वजवाहिकाओं या अराजक स्त्री छवि को ही स्त्री अस्मिता का असली चेहरा मानने वाली स्त्री कथाकारों की कहानियों का सार्थक और दृष्टिसम्मत प्रतिपक्ष भी रचती हैं ये कहानियाँ.

हृषीकेश सुलभ आधुनिक दृष्टि और चेतना से संपन्न कथाकार हैं. ये न सिर्फ बदलते यथार्थ की वर्णमाला को चीन्हते-समझते हैं बल्कि आधुनिक और उत्तरआधुनिक  यथार्थों के अलग-अलग रूपाकारों के अंतर और अंतर्द्वंद्वों पर भी अपनी बारीक नज़र रखते हैं. स्वीकार और अस्वीकार के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा खींचने की सलाहियत और साहस से भरा यह कथाकार हर नए को नकार, संशय या हिकारत की छातीकूट दृष्टे से भी नहीं देखता. युग-संदर्भों के बहाव, ठहराव और दुरभिसंधियों को एक चौकन्नी दृष्टि से देखने की सलाहियत इन कहानियों की बड़ी ताकत है.

किसी तरह के सूत्र या फार्मूलों का अनुसरण करने के बजाय उनका अतिक्रमण इन कहानियों की एक और विशेषता है. जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि ये कहानियाँ साहित्य रचना की कई बनी-बनाई मान्यताओं का अतिक्रमण भी करती है. उदाहरण के लिए ‘निजता से सामाजिकता तक की यात्रा’ के सूत्र को लिया जा सकता है. ये कहानियाँ इन अर्थों में भी अलग हैं कि ये ‘व्यष्टि से समष्टि की ओर’ के सूत्र का किसी अनिवार्य फार्मूले की तरह इस्तेमाल नहीं करतीं बल्कि निजता और सामाजिकता के बीच आवाजाही का एक बेहद आत्मीय नैरंतर्य कायम करते हुये निजता और  सामाजिकता की चौहद्दियों को आपस में मिला देती हैं. यही कारण है कि सारी संभावनाओं और आशंकाओं के बावजूद संग्रह की शीर्षक कहानी ‘हलंत’ क्रांतिकारी कहानी के फार्मूले में न उलझ कर व्यष्टि और समष्टि की दुरभिसंधि पर भीतर और बाहर के मारक संवाद का रूप ले लेती है.

ह टिप्पणी अधूरी होगी यदि इन कहानियों में मौजूद ग्राम्यगंधी भाषा-परिवेश की बात न की जाये. बिहार की बोली और परिवेश के जीवन्त माहौल के बीच स्त्री चेतना की प्रखर अभिव्यक्ति के कारण कुछ अध्येता इनकी कुछ कहानियों पर रेणु की कहानियों का प्रभाव बताते हैं. लेकिन मेरी दृष्टि में ऐसा कहना हड़बड़ी का निष्कर्ष है. अव्वल तो यह कि आंचलिकता के आवरण के बावजूद रेणु और हृषीकेश सुलभ की कहानियों के यथार्थ की जमीन नितांत भिन्न है और फिर आधुनिक चेतना और अस्मिता बोध की लग-अलग छवियों के बीच स्वीकार और नकार का निर्णयात्मक संघर्ष भी इन कहानियों को रेणु की कहानियों से बहुत अलग ला खड़ा करता है. उदाहरण के तौर पर ‘अगिन जो लागी नीर में’ की माधुरी देवी के सुहाग चिह्न मिटाने में रसप्रिया (रेणु) के इंकार की अनुगूँज सुनाई पड़ सकती है, लेकिन गौर किया जाना चाहिए कि माधुरी देवी की स्त्री चेतना अपनी ही बेटी सुवन्ती स्नेहा की स्त्री चेतना के अस्वीकार का प्रकटीकरण है. अस्मिताबोध की दो अलग-अलग चेतनाओं के बीच विभाजन का यह सामाजिक मनोविज्ञान हृषीकेश सुलभ की जमीन को रेणु की कथा-भूमि से अलग करता है. हाँ, यह जरूर है कि रेणु की कथा-प्रविधि से अलग होकर भी उनके लोक-संवेदना के युगीन विस्तार के कारण ऐसी कहानियों को रेणु की परंपरा की कहानियों के विस्तार के रूप में जरूर देखा जा सकता है. इन अर्थों में हर लेखक कहीं न कहीं तमाम भिन्नताओं के बावजूद अपने पूर्वज लेखकों की परंपरा का वाहक सह विस्तारक ही होता है.

(हलंत (कहानी-संग्रह) / लेखक – हृषीकेश सुलभ/ प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली / पृष्ठ संख्या – 107 / मूल्य – 250 रुपये)
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