भूमंडलोत्तर कहानी (६) : कायांतर (जयश्री रॉय) : राकेश बिहारी

Posted by arun dev on मार्च 25, 2015









भूमंडलोत्तर कहानी की विवेचना क्रम में इस बार आलोचक राकेश बिहारी ने जयश्री रॉय की कहानियों में कायान्तर का चयन किया है और उसकी व्याख्या करते हुए उसमें भारतीय समाज के अंतर्विरोधों की पड़ताल की है. उत्तर भारतीय ग्रामीण परिवेश के हाशिये से आने वाली कहानी की यह युवा स्त्री जहाँ घरलू हिंसा की शिकार है वहीँ परिवेश भी उसका आखेट करता है, बर्बरता और यौन शोषण की इंतिहा के बाद जब वह कायांतरित होती है तब क्या होता है यह कहानी बताती है और क्यों होती है इसके लिए आपको यह आलेख पढना चाहिए.  

इससे पहले आप लापता नत्थू उर्फ दुनिया न माने (रवि बुले), शिफ्ट+कंट्रोल+आल्ट=डिलीट (आकांक्षा पारे), नाकोहस (पुरुषोत्तम अग्रवाल), अँगुरी में डसले बिया नगिनिया (अनुज), पानी (मनोज कुमार पांडेय) पर राकेश बिहारी के आलोचनात्मक आलेख पढ़ चुके हैं.

जेंडर और जाति : काया के भीतर, काया से बाहर          
(संदर्भ: जयश्री रॉय की कहानी कायान्तर’)
राकेश बिहारी

माज में स्त्रियॉं की भागीदारी और स्थिति को ठीक से समझने के लिए सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विन्यास के अंतर्संबंधों को समझना बहुत जरूरी है. जेंडर का संबंध वर्ग और जाति दोनों से है. जैविक बनावट में भिन्नता के कारण स्त्री और पुरुष को पहचानना भले आसान हो पर वर्ग चरित्र की विशेषताएँ पूरे संदर्भ को एक जटिल स्वरूप प्रदान करती हैं. पितृसत्ता समाज और व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए जाति, वर्ग और जेंडर को न सिर्फ परस्पर आबद्ध करती है बल्कि अपनी जड़ों को मजबूत बनाए रखने हेतु इनके लिए खास तरह की व्यवहार-संहिताएँ भी निर्मित करती है.  लैंगिक पदानुक्रम में स्त्रियाँ दूसरे पायदान पर तो रखी ही जाती हैं, जातिगत वरीयता के अनुक्रम की निर्मिति में भी उनका खासा इस्तेमाल होता है. जाति, वर्ग और जेंडर के अंतर्संबंधों की संरचनाओं की ऐतिहासिकता तलाशते हुये 3 अप्रैल, 1993 के इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली में प्रकाशित अपने लेख Conceptualising, Brahmanical Patriarchy in Early India में उमा चक्रवर्ती कहती हैं - Although the subordination of women is a common feature of all stages of history and is prevalent in large parts of the world, the extent and form of that subordination has been conditioned by the social and cultural environment in which the woman have been placed.  

तथाकथित ऊंची जाति और उच्च वर्ग की महिलाओं के लिए एक सुनियोजित पर्दा-व्यवस्था के समानान्तर समाज में गरीब की मेहरारू गाँव भर की भौजाई के जबरिया व्यवहार का फलना-फूलना जातीय और वर्गीय व्यवस्था के पोषण में स्त्रियॉं के सुनियोजित इस्तेमाल को ही दर्शाता है. जयश्री रॉय की कहानी कायांतर वर्ग, जाति और जेंडर के इन्हीं अंतर्संबंधों की पड़ताल करते हुये एक निम्नवर्गीय स्त्री के प्रतिरोध और प्रतिकार को मजबूती से दर्ज करती है. फूलमती, ललिता और उन दोनों की सासों की भिन्न सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के बीच वर्ग और जाति के दोहरे संजाल में घिरे स्त्री-जीवन की विडंबनाओं को यह कहानी बहुत बारीकी से बुनती-उघाड़ती है. अस्मिता-संघर्ष के इस दौर में जब समाज और साहित्य दोनों जगहों पर स्त्री-विमर्श एक खासा पहचान अर्जित कर चुका है, इस कहानी में फूलमती का प्रतिरोध स्त्री विमर्श के चालू मुहावरों और प्रारूपों का अतिक्रमण करते हुये स्त्री मन की आवाज़ को एक अलग कोण से उठाता है. इस तरह कई अर्थों में यह कहानी स्त्री-विमर्श की लगभग रूढ हो चुकी मान्यताओं-अवधारणाओं का प्रतिपाठ भी रचती है. रेडिकल फेमिनिज़्म की तरह सामाजिक परम्पराओं से मुक्ति की बात करने की बजाय परम्पराओं में मुक्ति के मार्ग और अवसरों का संधान करना भी इस कहानी को स्त्री सरोकारों वाली अन्य कहानियों से अलग ला खड़ा करता है.

बनना-संवरना और साज-श्रृंगार हमेशा से स्त्रियों की प्राकृतिक इच्छा-अभिलाषा से जुड़े रहे हैं. लेकिन पितृसता ने इन स्त्रीसुलभ व्यवहारों को सांस्कृतिक अनुष्ठान और सामाजिक कर्मकांड का रूप देने का एक सुनियोजित काम किया है. समाज में श्रृंगार-प्रसाधनों के बड़े हिस्से को सुहाग चिह्न की तरह स्वीकार लिया जाना पितृसत्ता की उसी योजना की सफलता है. प्राकृतिक को सामाजिक का रूप देना ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का सुचिन्तित खेल रहा है. पारंपरिक स्त्रीवाद पितृसत्ता द्वारा थोप दिये गए सुहाग चिह्नों को गुलामी और बंधन का प्रतीक मानते हुये नकारता है, उनका बहिष्कार करता है. ‘कायांतर’ की फूलमती इन चिह्नों-प्रतीकों बहिष्कार नहीं करती, बल्कि सिंगार-चिह्न की तरह हमेशा अपने जीवन में बने देना रहना चाहती है, वैधव्य के बाद भी. सिंदूर-बिंदी-वेणी आदि को वह सुहाग से जोड़ कर नहीं देखती, ये उसके लिए शुद्ध सिंगार-प्रसाधन हैं, इसलिए इनका स्त्री की वैवाहिक स्थिति से कोई लेना देना नहीं. वैधव्य को प्राप्त होने के बाद भी फूलमती रंग और उमंग को अपने जीवन से नहीं निष्कासित करना चाहती है, यह पितृसत्ता के प्रति उसका बड़ा विद्रोह है. स्त्रीसुलभ व्यवहारों और स्त्रीत्त्व की अवहेलना करनेवाले प्रतिक्रियावादी स्त्रीवाद से उलट फूलमती का यह विद्रोह आत्मनिर्भरता प्रेरित स्त्रीवाद से जुड़ता है जो स्त्री-पुरुष के बीच की प्राकृतिक और जैविक भिन्नताओं को अस्वीकार करने के बजाय उसकी विशिष्टता की स्थापना करता है. उग्र  लेकिन विद्रोह की आवाज़ इतनी आसानी से कहाँ सुनी जाती है? पहला प्रतिरोध तो अपने घर से ही शुरू होता है. लीक तोड़ कर चलाने वाली औरतें बुरी औरतों की श्रेणी में आती हैं.

ललिता अपने कमरे में बैठी-बैठी फूलमती की सास का गालियों का पथार बिछाना सुनती रहती- "रांड होकर भी इ खचरी का सौक कम नहीं होता.छापा का साड़ी चाहिये, केश में गमकौ तेल चाहिये! चटोरिन का जीभ भी कम लम्मा नहीं है. पूरा डेढ़ गज का है! लपलपाता रहता है रात-दिन!"

फूलमती की सास पितृसता से अनुकूलित है जबकि फूलमती आधुनिक चेतना सम्पन्न है. उसे मनुष्य और मनुष्य के बीच का अंतर स्वीकार नहीं. अपने पति बिगेसर की मौत को वह अपने जीवन से उमंग-उछाह के निष्कासन का बहाना नहीं बनाने देना चाहती. रंग-और सिंगार पर वह अपना स्वाभाविक हक समझती है और उसे वह हर हाल में हासिल करना चाहती है. फूलमती पितृसत्ता का प्रतिरोध ही नहीं करती उसकी कमजोरियों कों भी पहचानती है. उसे ठीक-ठीक पता है कि ब्राह्मणवादी पितृव्यवस्था ने स्त्रियॉं को देवी कह-कह कर भले उसे उसके मानवीय अधिकारों से दूर रखा हो पर वह अपने ही द्वारा गढ़ी गई दैवीसत्ता में बहुत ज्यादा विश्वास करता है, उससे डरता है. तभी तो वह बिगेसर की मौत के तुरंत बाद डायन, चुड़ैल कह कर प्रताड़ित किए जाने के बावजूद अपने दावे से टस से मस नहीं होती बल्कि पितृसत्ता की उन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाते हुये खुद पर देवी आने का विभ्रम फैलाकर न सिर्फ अपने लिए उन समस्त कामनाओं की प्राप्ति का मार्ग सुगम करती है बल्कि उसी बहाने उन सब से बदला भी लेती है जिन्होने जीते जी उसकी ज़िंदगी को जैसे मृत्युशय्या में बदल   दिया था -

सास ने बताया था, फूलमती पर देवी आने लगी है! दूर-दूर से लोग उसके दर्शन करने आते हैं…… ललिता की सास ने बताया था फूलमती मैया के आशीर्वाद देने का ढंग भी निराला होता है. ना फल ना भभूत! बस लात और गालियां. ऐसी-ऐसी गंदी गालियां कि सुनने वालों के कान लाल हो जाते हैं. सबको माई के सामने जा कर साष्टांग लेटना पड़ता है. जिस पर माई प्रसन्न होती है उसके माथे, पीठ, कंधे पर धमाधम लात मारते हुये गाली-गलौज से उसके सात पुस्तों का श्राद्ध करती है फिर उसका झोंटा पकड़कर अपने आंगन से बाहर निकाल देती है.

गौरतलब है कि धर्मभीरू समाज जहां देवी आगमन की सूचना को सच मान कर फूलमती के आगे नतसिर खड़ा है वहीं ललिता दूर से ही वस्तुस्थिति भाँप जाती है और मन ही मन फूलमती की इस उपलब्धि पर न सिर्फ खुश होती  बल्कि यह भी चाहती है कि वह कहीं से कमजोर न पड़े. देवी आने का स्वांग रच कर खुद के लिए सिंगार प्रसाधन जुटाने की लगभग इसी तरकीब का इस्तेमाल जयश्री रॉय की ही एक अन्य कहानी स्वर्ण चम्पा की छवि भी करती है. लेकिन तब उसके इस रूप को ताड़ने वाली कोई स्त्री नहीं थी, एक पुरुष था जिसे यह उसकी दमित इच्छाओं का प्रकटीकरण भर लगा था उयर वह उसे ज्यादा छेड कर उसे लज्जित नहीं करना चाहता था. कुछ हद तक फूलमती की तरह का ही भाव होने के बावजूद छवि का वह प्रतिरोध अपेक्षाकृत इकहरा था. लेकिन ‘कायांतर’ में फूलमती के रूप में वही छवि जैसे और परिपक्व हो गई है. वह यहाँ सिर्फ सिंगार प्रसाधन ही नहीं जुटाती बल्कि सामंती पितृसता को अपने हिसाब से दंडित भी करती है.

अपनी ही कहानी के एक पात्र का किसी दूसरी कहानी में यह संष्लिष्ट विस्तार खुद कहानीकार के भी परिपक्व  होने का सूचक है. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है की छवि के समक्ष एक पुरुष था जबकि फूलमती के आगे ललिता, यानी एक स्त्री. स्त्री मन की जो बात पुरुष प्रत्यक्षतः पूछ के भी नहीं समझ पाया था उसे ललिता बिना कुछ पूछे ही समझ जाती है. ‘नारी न मोहे नारी के रूपा’ के पुरुषवादी फतवे के विरुद्ध भिन्न आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बावजूद ललिता और फूलमती के बीच पल रहा एक सहज बहनापा यही बताता है कि दुनियाँ की हर स्त्री के दुख एक से होते हैं जिसे एक से दूसरे तक पहुंचाने के लिए किसी शब्द की नहीं अनुभूति की उन अतल गहराइयों मे उतरने की जरूरत होती है, जिसका दूसरा नाम स्त्री-मन है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि देवी होने का विभ्रम फैला कर फूलमती न सिर्फ प्राकृतिक को सामाजिक बना देने वाली पितृसत्ता के खेल को चुनौती देती है बल्कि अपने पति के हत्यारों से एक तरह का प्रतिशोध भी लेती है. ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को उसी के बनाए औज़ार से काटने का यह तरीका स्त्री चिंताओ को लेकर प्रतिरोध का प्रतीक संघर्ष तो रचता है लेकिन धार्मिक अंधविश्वास और कूपमंडूकता से समाज को बाहर निकलने का रास्ता नहीं खोज पाता. लेकिन यह कहानी या कहानीकार की नहीं उस पात्र और परिवेश की सीमा है जो कथानक के केंद्र में है.

फूलमती जिस आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आती है, और जिस तरह के कुचक्रों  से घिरी है उसमें उसकी यह चेतना और उसका यह प्रतिरोध सीमित भले दिखे लेकिन उसके प्रतीकार्थ बहुत गहरे हैं. हाँ, एक अकेली फूलमती का प्रतिरोध कल को पूरे समाज के लिए एक नई सुबह ले कर आए इसके लिए फूलमतियों की संवेदनात्मक चेतना और ललिताओं की बौद्धिक प्रखरता को एक साथ मिल कर आगे बढ़ना होगा. ललिता के निजी जीवन की सीमाएं उसे वर्तमान स्थिति में  फूलमती के साथ मिलकर किसी बड़े संघर्ष की तरफ तो नहीं बढ़ने देतीं, लेकिन संवेदना के स्तर पर फूलमती के लिए उसके भीतर पल रहा बहनापा और देवी होने के सामाजिक विभ्रम के बीच फूलमती के मन का सच समझ कर उसे एक भावनात्मक संबल देना सच्चे अर्थों में स्त्री मुक्ति  के लिए फूलमतियों और ललिताओं के साझे संघर्ष की जरूरतों और संभावनाओं की तरफ ही इशारा करता है.

जयश्री रॉय आज भले गोवा में रहती हों, पर हैं बिहार मूल की. हमारी निर्मिति में स्थानीयता के अवदान का सही मूल्यांकन जड़ों से दूर जाने के बाद की हमारी अभिक्रियाओं से ही तय होता है. जड़ों से दूर जाना हर बार जड़ों से कटना नहीं होता. जयश्री रॉय अपनी जड़ों से दूर भले रहती हों, लेकिन उनसे कटी नहीं हैं. लंबे समय के प्रवास और विस्थापन के बावजूद, हमारी जड़ें हमारी सोच और चिंतन प्रक्रिया में कैसे उपस्थित होती हैं इसे किस्से-कहानियों या लोक कथाओं में सहज ही देखा-परखा जा सकता है. व्यक्ति और उसकी जमीन के बीच याददाश्त बहुत हद तक कनेक्टिंग थ्रेड की भूमिका में होता है. कहानियाँ याददाश्त को स्मृति में बदल कर लोक और मूल से व्यक्ति के जुड़ावों का दस्तावेजीकरण करती हैं. कहानी की विनिर्मिति में स्मृतियां दो तरह से सहयोगी होती हैं- एक कच्चे माल की तरह तो दूसरी कथायुक्ति की तरह. कई बार स्मृतियाँ कथानक और कथायुक्ति की परस्पर आबद्धता के रूप में भी सामने आती हैं, जिन्हें स्मृति की कथात्मक परिणति का श्रेष्ठ स्वरूप कहा जाना चाहिए. जयश्री रॉय इस कहानी में स्मृतियों के सहारे बिहार के ग्रामीण परिवेश को जीवंत तो करती हैं, लेकिन स्मृतियों की भी एक सीमा होती है. यह स्मृति की तकनीक के इस्तेमाल का ही नतीजा है कि इस कहानी में आया गाँव कोई बीस-पच्चीस साल पहले के परिवेश में ठहरा हुआ सा लगता है. सूचना, संचार की क्रान्ति और आर्थिक बदलावों के बाद गाँव में जो बहुत कुछ बदला है, वह इस कहानी की पहुँच से दूर रह जाता है. लेकिन बावजूद इसके यह कहानी लोक पर्व और व्यवहारों  की स्वाभाविक स्मृति और बोली-बानी के बहाने कहानी में स्थानीयता को बहुत ही प्रभावी और प्रामाणिक तरीके से उपस्थित करती है.

दुनिया के मजदूरों एक हो और वसुधेव कुटुंबकम की अवधारणाएँ भी एक तरह का अभूमंडलीकरण ही हैं. लेकिन वर्तमान आर्थिक परिवेश में प्रयुक्त होते पद ग्लोबलाइज़ेशन की अर्थ संवेदना से यह बहुत भिन्न है.  ग्लोबलाइज़ेशन में छिपी भूमंडलीकरण की अवधारणा स्थानीयता को क्षतिग्रस्त करने के लिए सबसे पहले हमारी स्मृतियों पर ही आक्रमण करती है. लोक कथा, लोक गीत, लोकोक्तियाँ, लोक भाषा, लोक पर्व आदि  हमारी स्मृतियों को सहेजने में सबसे ज्यादा प्रभावकारी भूमिकाएँ निभाती हैं. किस्से-कहानियां और आख्यान दरअसल ऐसी स्मृतियों को बचाने की ही कोशिशें हैं. स्मृतियों का बचना स्थानीयता के रूप-रस-गंध का बचना भी है. कहानी में उद्धृत छठ पर्व का बहुश्रुत गीत- ‘ऊ जे केरवा जे फरले घवोद से ओ पर सुगा मेरराए’ परंपरा के बहाने अपनी जड़ों को पुनराविष्कृत और पुनर्व्याख्यायित करने का ही एक उपक्रम है जो न सिर्फ हमारी स्मृतियों का दस्तावेजीकरण करता है बल्कि जड़ और फुनगियों के बीच पसरे शिराओं के संजाल में कभी धड़कतीं तो कभी शिथिल-सी पड़तीं संवेदनाओं को सींचता भी है.

मैंने बार-बार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की बात की है. यह कहानी परम्पराओं के बीच रहते हुये भी उस व्यवस्था के स्याह पाक्षों का विरोध करती है. यह कहानी लोक रंग और त्योहारों का उपयोग किस बारीकी से करती है, उसे समझने की जरूरत है. यह कथाकार की दृष्टिसंपन्नता है कि वह लोक रंग और पर्व के नाम पर पितृसत्ता को मजबूत करने वाले बहुतेरे व्रतों यथा, हरितालिका, जीवित पुत्रिका या वट सावित्री के उदाहरण नहीं रखती बल्कि छठ पर्व के दृश्य रचती है. उस छठ का, जो सही मायने में लोकपर्व है, जिसमें सबका बराबरी का हिस्सा होता है और जिसमें दूसरे त्योहारों की तरह बाभनों या ऊंची जात वालों की बपौती नहीं चलती. परम्पराओं के भीतर त्याज्य और ग्राह्य का यह विवेक बहुत जरूरी है. पितृसत्ता की बनावट और उसके प्रतिरोध के समानान्तर कहानी जाति व्यवस्था की गहरी जड़ों को भी बखूबी पहचानती है. सभी जाति-वर्ण के लोगों के समान सहयोग से पूर्ण होनेवाले छठ पर्व के इस प्रगतिशील लोक-पक्ष को उद्घाटित करने के बावजूद, कहानीकार को यह पता है कि जाति की जकड़न अभी टूटी नहीं है. उसी छठ पर्व के दौरान एक दिन फूलमती  के काम पर नहीं आने पर ललिता के सास की उच्च जाति–बोध से भरी प्रतिक्रिया हो या फिर राम सिंहासन का बिगेसर के प्रति व्यवहार या फिर बिगेसर की मृत्यु के बाद फूलमती की सामाजिक स्थिति, जातिगत व्यवस्था, वर्गीय संरचना और स्त्री-जीवन के त्रिकोणीय सच को उजागर करता है.

जाति, वर्ग और जेंडर के प्रश्नों को मुखरता से संबोधित करती इस कहानी का एक सिरा खेती बनाम उद्योग के द्वंद्व को भी सामने लाता है. केले के बगान में काम करना छोड कर दवा फैक्ट्री में काम करने का निर्णय बिगेसर के प्राण तक ले लेता है. अर्थाभाव से लड़ते मजदूरों के पलायन के समांतर सामंती ठसक और क्रूरता के आज भी मजबूत होने की यह स्थिति भयावह है. बिगेसरों को हर स्थिति में मरना ही है, चाहे वह भूख से स्वयमेव मर जाये या फिर अपनी मर्जी से अपना निर्णय लेने के जुर्म में राम सिंहासनों द्वारा मार दिया जाये. दरअसल जेंडर और जाति के तन्तु एक दूसरे में इस तरह गुथे हुये हैं कि फूलमती और बिगेसर की त्रासद विडंबनाओं को  एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता. देवी के रूप में कायांतरित होने के बाद राम सिंहासन को पीटते हुये फूलमती का सिंदूर, वेणी और लाल साड़ी मांगना किसी सावित्री द्वारा सत्यवान के प्राण लौटाने की गुहार नहीं, बल्कि आत्मचेतना से लैस एक स्त्री की ऐसी आवाज़ है जिसमें उसकी स्वायत्तता और सामंती व्यवस्था की भेंट चढ़ गए बिगेसर की जिंदगी दोनों के दावे मौजूद हैं. कथा-कहानी में गाँव की लगातार कम होती उपस्थिति के बीच ग्रामीण यथार्थ और उसकी जटिलताओं को रेखांकित करती ऐसी कहानियों को रेखांकित किया जाना बेहद जरूरी है.
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