मेघ - दूत : गुंटर ग्रास : विष्णु खरे

Posted by arun dev on अप्रैल 19, 2015






महान जर्मन लेखक गुंटर ग्रास का (१६ अक्तूबर १९२७ - १३ अप्रैल २०१५) भारत से गहरा रिश्ता था. उनकी विख्यात कृति त्सुंगे त्साइगेन (show your tongue) कोलकाता को केंद्र में रखकर रची गयी है. इसका अनुवाद विख्यात साहित्यकार और अनुवादक विष्णु खरे ने मूल जर्मन से हिंदी में किया है जो १९८४ में प्रकाशित हुआ.  इस पुस्तक की भूमिका के कुछ हिस्से और उनकी चार कविताओं के अनुवाद यहाँ आप पढ़ेंगे. इसके साथ ही गुंटर के उपन्यास ‘टीन का ढोल पर बनी फ़िल्म के माध्यम से सिनेमा और साहित्य पर एक समझ यहाँ आप देख सकेंगे.
जीभ दिखाना’ 1984 में राधाकृष्ण प्रकाशन, द्वारा मैक्स म्युलर भवन, दिल्ली के सहयोग से प्रकाशित हुई थी. तब तक ग्रास को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था. विष्णु खरे संभवतः हिंदी के एकमात्र कवि-अनुवादक हैं जिन्होंने 1990 के दशक में  गुंटर ग्रास के साथ मुलाक़ात की है और  लोठार लुत्से की मौजूदगी में उनके साथ एक सार्वजनिक काव्य-अनुवाद-पाठ कार्यक्रम में हिस्सा लिया है. एक विराट श्रोता-वर्ग द्वारा दिल्ली में हिंदी में ग्रास का गद्य और कविताएँ जिस तरह सराहे गए थे उससे खुद गुंटर चकित और हर्षित रह गए थे.



(‘जीभ दिखाना’) अनुवाद के बारे में 

यदि यह तथ्य उतना करुण और शोचनीय न होता जितना कि वह है तो सगर्व कहा जा सकता था कि यह अनुवाद गुंटर  ग्रास की किसी भी कृति का हिंदी में पहला सम्पूर्ण अनुवाद है. लेकिन ग्रास पिछले तीस वर्षों से अधिक से विश्वविख्यात है और उनका पहला उपन्यास 'टीन का ढोल' ('दि टिन ड्रम" : मूल जर्मन – ब्लेष्ट्रोमेल ) लगभग उसी समय से समसामयिक जर्मन और विश्व साहित्य की एक कालजयी कृति मान लिया गया है जबसे वह प्रकाशित (तथा तत्काल ही प्रमुख विश्व-भाषाओं के अनूदित) हुआ था. यह ठीक है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साहित्य का एक नोबेल पुरस्कार जर्मन उपन्यासकार हाहनरिष ब्योल को दिया गया किन्तु इस बात पर सर्वसम्पति सी है कि 1945 के बाद के जर्मन उपन्यास को अस्मिता देने वालों में ग्रास सर्वोपरि हैं. इसलिए अधिक उचित तो शायद यह होता कि ग्रास के कम से कम उस सर्वाधिक चर्चित उपन्यास का अनुवाद हिंदी में आज से एक चौथाई शताब्दी पाले हो गया होता---- या  इन हाल के वर्षों में उनके किसी भी अन्य उपन्यास का.

यहाँ यह भी स्मरण रखा जाना चाहिए कि ग्रास केवल उपन्यासकार ही नहीं कवि तथा नाट्यकार भी है और यदि वे न लिखते और सिर्फ अपने चित्रों और उत्कीर्णन आदि को ही समर्पित होते तो एक कलाकार के रूप में भी उनकी ख्याति शायद कम न रहती. फिर उनके राजनीतिक-सामाजिक लेख और (कम से कम विली ब्रांट की राजनीतिक सक्रियता तक) जर्मनी की सोशल डेमोक्रेट पार्टी के साथ उनके प्रणय-कलह सम्बन्ध भी कम महत्वपूर्ण नहीं : ग्रास अपनी जीवन-शैली, सर्जनात्मकता तथा विचारों को लेकर 67 वर्ष की उम्र में आज तक (कभी-कभी विवादास्पदता की सीमा तक भी) चर्चित हैं. उन्हें और उन जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण विश्व-लेखको को कभी का हिदी में आ जाना चाहिए था और लगातार आते रहना चाहिए. इसलिए ग्रास की इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करते हुए आत्माभिनंदन के स्थान पर अपराध-बोध अधिक अनुभव हो रहा है.

अपराध-बोध इसलिए भी होता है कि ग्रास की यह कृति अगस्त 1987 से जनवरी 1988 के बीच उनके तथा उनकी पत्नी के भारत (मुख्यत: कलकत्ता) प्रवास के बारे में है इसलिए अनुवाद के लिए उसे ही चुनने के पीछे ‘भारत-सम्बद्धता' का हीन-भाव भी पढा जा सकता है. यह सच है कि भारतीय पाठको के लिए "त्सुंगे त्साइगेनएक विशेष उत्सुकता और कुतूहल का विषय है लेकिन "भारत-सम्बद्ध' हर विदेशी पुस्तक न तो पठनीय होती है और न ही सार्थक. "भारत" को लेकर लिखे गए अधिकांश विदेशी सर्जनात्मक साहित्य का तो और भी शोचनीय हाल है. जर्मनी में भारत को लेकर एक रूमानी-रहस्यवादी सम्प्रदाय पिछले करीब दो सौ वर्षों से रहा है और आज भी पश्चिम का भारत के प्रति आकर्षण ग़लत कारणों से ज्यादा है, सहीं समझ या उत्सुकता से कम.  हम भारतीय भी, विशेषत: मक्स म्युलर और विवेकानंद के बाद, विदेशियों की भारत की 'ज़गदगुरु' छवि के शिकार होते गए है. एडवर्ड सईद ‘ओरिएंटलिज्म’ कहकर जिसकी उचित ही भर्त्सना करते हैं उसके निर्माण और अस्तित्व में हम ओरिएंटलों की विभाजित मानसिकता का भी कम हाथ नहीँ है  किन्तु काली की लपलपाती जीभ से अपना केन्दीय बिम्ब चुनने वाली ग्रास क्रो इस कृति पर शायद कोई और इल्ज़ाम लगाए जा सकते हैं भारत को हिंदूवादी-अध्यात्मवादी रूमानी दृष्टि से देखने का आरोप कतई नहीं. 
बल्कि विडम्बना यह है कि भारतीय और भारतविद् बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने, जिने 'त्सुगे त्साइगेन" को मूल जर्मन में या अंग्रेजी अनुवाद "शो युअर टंग' में पढा है, ग्रास पर भारत-विरोधी होने का वही आरोप लगाया है जो नीरद चौधुरी या वी.एस. नैपाल पर लगता रहा है. जो लोग बंगाल, रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा कलकत्ता से असामान्य गहरा लगाव महसूस करते हैं उनमें से कुछ को ग्रास की इस पुस्तक ने असमंजस में डाला है या निराश और कुपित किया है. यहाँ न तो चौधुरी. नैपाल और ग्रास का मूल्यांकन संभव या अभीष्ट है और नही उनकी तुलना लेकिन इस हिंदी अनुवाद से एक उम्मीद तो यह है ही कि वह पाठको को भारत के प्रति ग्रास के रुख को स्वयं बांचने-परखने का अवसर देगा, और शायद एक बुद्धिजीवी पर्यवेक्षक के रूप में स्वयं ग्रास के (भले ही आंशिक) मूल्यांकन का भी. 
जीभ दिखाना' को पढने के लिए किसी बड़ी तैयारी की ज़रूरत नही है लेकिन शायद उसके लेखक के बारे में कुछ प्रमुख बाते जान लेना सहायक होगा. ग्रास जर्मन मूल के है लेकिन दान्त्सिग में जन्मे थे. नात्सी जर्मनी की नृशंसत्ताओं और दूसरे विश्व युद्ध की विभीषिकाओं के वे गवाह और भुक्तभोगी रहे. जर्मनी का विभाजन तथा पूर्वी जर्मनी का. यथार्थ उन्होंने अपनी आँखों देखा. राष्ट्रवाद किस तरह नस्लवाद और फासिज्म में बदल सकते है इसके भी वे प्रत्यक्षदर्शी रहे. धर्मान्धता, अज्ञान अंधविश्वास, नायकपूजा, संकीर्णता, पूर्वग्रह, पाखंड, आलस्य, आदमी का अवमूल्यन किसी समाज को किस नरक में ले जा सकते है यह उनसे छिपा नहीं है. पश्चिम में रहते हुए भी वे पश्चिम के मानव-विरोधी सर्वउभोवतावाद के जुझारू विरोधी रहे और राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा प्रसार-माध्यमों के प्रतिवर्ष उनसे कभी भी प्रसन्न और आश्वस्त नहीं रहे. वे कभी बुर्ज्वा बैठकों के चहेते नहीं रहे और जर्मनी एकीकरण के राष्ट्रीय (और शायद वैश्विक) उत्सवोंमाद के विरुद्ध होने के कारण उन्हें तथा उनके नवीनतम पिछले  उपन्यास ‘उंकेनरूफ़े’ (मेढक पुकाऱ) को खासी अलोकप्रियता और आलोचना नसीब हुई है. इस समय भी (उन्होंने पत्र से सूचित किया है कि) वे बर्लिन की दीवार के पतन पर एक बड़ा उपन्यास लिख रहे हैं जो शायद मई-जून 1995 तक पूरा हो जाएगा. इसमें कोई शक ही नहीं कि उसके प्रकाशन पर फिर बावेला मचेगा. यह देखना दिलचस्प होगा कि लम्बी अवधि में कौन अधिक सिद्ध होता है- हेल्मूठ कोल, या गुंटर  ग्रास. 
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ग्रास ने इस पुस्तक का गद्य का हिस्सा 'यात्रा-वृतांत’ 'जर्नल' और डायरी शैली में लिखा है और उसमें कईं तरह की स्मृतियों और एक लगातार तीसरे की उपस्थिति की फंतासी मिली हुई है. ग्रास, उनकी पत्नी ऊटे और अदृश्य फोंटने की मौजूदगी सारे प्रकरण को एक अलग तनाव प्रदान करते हैं.  ग्रास ने अधिकार इंदराज-नुमा संक्षिप्त शैली का प्रयोग किया हालाँकि कभी कभी वे लम्बा आख्यायिका का  रूपाकार भी अपना लेते हैं. अनुवाद में इस शैली और लय को बचाए रखने की कोशिश की गई है. लेकिन ग्रास की यह पुस्तक एक त्रिफलक (ट्रिप्टीश) है जिसे प्रारंभिक और बाद के चित्र, तथा कविताएँ पूरा करते हैं. पहले गद्य –चित्र अनुवादक भी पुस्तक की इस योजना को एक विलासी सनक समझा था लेकिन घीरे-धीरे गद्-चित्र-पद्य की अन्विति का अनुशासित सौन्दर्य उस पर खुला. ग्रास की पुस्तक से आप सहमत हों या असहमत, जब आप उसे ख़त्म करते है तो यह खयाल बारर-बार आता है कि काश, ग्रास उसे इतने जल्दी समाप्त न करते. या फिर यह, जैसी हसरत स्वयं उन्होंने कई बार जाहिर की है कि वे दुबारा आएं और भारत के प्लेगोत्तर नवनिर्माण पर फिर कुछ लिखे- काली और लक्ष्मी के बीच इस प्रतियोगिता के बारे में देखे उनकी जर्मनी सरस्वती क्या कहती है. 



गुंटर ग्रास की दो कविताएँ          
(जो विष्णु खरे द्वारा अनूदित तथा 1983 में प्रकाशित तत्कालीन पश्चिम जर्मन कविता संकलन ‘’हम चीखते क्यों नहीं’’ से ली गई हैं.)

मेरे पास जो भी था सब मैंने बेच दिया, सारा का सारा
चार मंजिल सीढियाँ चढ़कर वे आए,
दो बार घंटी बजाई, हाँफते रहे
और फर्श पर नकद भुगतान किया
क्योंकि टेबिल भी बिक गई थी.

जब मैं सब कुछ बेच रहा था
तो पाँच या छ: गलियाँ छोड़कर
उन्होंने सारे संबंधसूचक सर्वनामों को हथिया लिया
और छोटे निरीह इंसानों की
व्यक्तिगत परछाइयों को आरे से काट दिया.
     
मेरे पास जो भी था, सब मैंने बेच दिया, सारा का सारा
मुझसे अब कुछ भी नहीं लिया जा सकता.
मेरे आखिरी और सबसे छोटे संबंधसूचक अव्यय को भी-
एक निशानी जिसे मैंने भक्तिभाव से बहुत देर तक सँजो कर रखा
                                                       था-
आखिरकार अच्छी कीमत मिल गई.

जो भी मेरा था अब बिक चुका है, सारा का सारा.
मेरी पुरानी कुर्सियां-  मैंने उन्हें ठिकाने लगाया.
कपडों की अलमारी को बर्खास्त किया.
बिस्तरेउन्हें नंगा किया, उघाड़ा
और उनके बाजू में सो गया, संयम से.

आखिर तक जो भी मेरे पास था बिक चुका था.
कमीजों की न कालर थी न उम्मीद
पतलूनों को अब तक बहुत ज्यादा मालूम हो चुका था;
एक कच्ची और शर्मीली जवान बोटी को
मैंने अपना तवा नजर किया

और बचा हुआ अपना नमक.


पाबंदी से                              

एक तल्ले नीचे
हर आध घंटे
एक जवान औरत
अपने बच्चे को पीटती है.
इसलिए
मैंने अपनी घड़ी बेच दी है
और पूरी तरह से
नीचे वाले
सख्त हाथ पर
आश्रित हूँ,
मेरे नज़दीक
गिनी हुई सिगरेटें;
मेरा वक्त सुव्यवस्थित है.



एक                                                  
(‘जीभ दिखाना’ के काव्य-खंड से )

यहाँ तक जीवन ले ही आता है स्वयं को देर-सबेर :
आड़ी- टेढ़ी डालियों का बिस्तरा, टहनियों से ढका हुआ,
तौली गई टहनियां जैसे (बही खाते नुमा)
आखिरी फैसले में इस्तेमाल की जीने वाली हों.
अपनी कीमत है ललछौंही जलाऊ लकडी की
जिसे भफाते हुए सुंदरबन में काटा गया था,
लकडियों लाश से लम्बी होनी चाहिए.

विभिन्न शमशान घाटों पर- जो
गंगा की बहती हुई धारा के बराबर
हुगली के किनारे तक तक चले गए हैँ
बेजान आग पर धुँआते हैं ढेर लकडियों के, जो पानी से
अभी तक सीली हैं, बार बार पैदा की गई
जैसे अचानक प्रसूति में (और शहर को
दुनिया भर के अखबारों में सुर्खियाँ बनाते हुए)
अभी भी हिचकिचाती है कीमती लकडी
और उसे उकसाना पड़ता है धान के पुआल से
उकसाना पड़ता है भले शब्दों से
पुनर्जीवित करना होता है.

धी शवों को चिकनाता है.
ऊपर से फूल, सांस में सुगंधित,
  
सामान्यत: प्रसन्न अवसर के लिए.
अस्तव्यस्त 'पैरों के तलुओं पर लाल आलता.
मृत आँखों पर पत्तियां. (लेकिन वे मुहावरे
जो हम यूरोपियों को मृत्युलेख के लिए आसानी से मिल जाते है---,
दिवंगत, चिरनिद्रा, श्रेष्ठतर संसार को निमंत्रित----
उपलब्ध नहीं है.) मृतक यहाँ
गंभीरता से मृत हैं.
लकडी शवों को पकडे रखती है.
ठूठों के दाँतों से आग भकोस डालती है,
आत्मा शायद कहीं और नई,
राख और जले हुए हिस्से नदी के है
जिसमें सभी कुछ मिलता है : मल,
     पंखुड़ियों, रसायन, स्नानार्थियों की नाजुक
नग्नता, फीके कपडों का पसीना.

लेकिन आज दुर्गा और लक्ष्मी और जाने कौन
भजन-कीर्तन और ढोल-ताशे के साथ हुगली ले जाए जाएँगे
त्यौहार समाप्त हो गया है. सात दिन तक
देवता उतरे : पुआल के पुतले जिन्हें (सूखी
और रंगी हुई) मिट्टी ने शरीर दे दिया है.

प्रदर्शन के लिए पशुलोक प्रस्तुत है : सिंह और उलूक
मूषक, हंस, मयूर. और दस भुजाओं पर
दमकती है शक्ति ताकि पुण्य पाप पर
तथा अन्य मूर्खतापूर्ण कहानियाँ.

हर गंदी बस्ती में : गरीब से ग़रीब भी
अपनी वेदी ऊँची उठाते है.
देखो जैसे खुर्राट मार्क्सवादी
छः हजार भिखारियों को निगाह से परे
शहर के बाहर खदेड़ देते है जब तक कि
पूजा उत्सव समाप्त न हो जाए.

पूजाओं और पुजारियों की, हर जगह की तरह
एक कीमत होती है; भय मुफ्त में बँटता है. काश
गुस्सा भी आए और ठहरे.
  

दो                                
देखीं तीन झाडुएँ, नहीं, चार
खाली कमरे में नाचती हुई, या
कमरे खाली करती हुई नाच रही थी
एक अकेली झाडू
और फिरती हुई दिखाती थी
तस्वीर पर तस्वीर
कैसे रद्दोबदल से परे
उसने करवाई थी कवायद
जिस दौरान हँसते हुए अछूत
अपनी गंदगी खुद साफ़ करो
हैंसते हुए भाग जाते हैं अपने रास्ते.

शहर का पेट उल्टा हुआ. देखा
स्मारकों को सिर के बल खड़े हुए. जो रेंगता है,
पैरों पर था. देखा पवित्रों को
और कुलीन पुत्रियों की पवित्रता को चीथडों में
कबाड़ को समर्पित (और अब न खिलखिलाते हुए).

देखा ब्राह्मणों के दस्तों को पखाने साफ करते हुए
अपने पवित्र यज्ञोंपवीत से पहचाने गए. देखा
प्रेम  पगी हिंदी फिल्मों के नायकों को
खदेड़ा गया पर्दे से निर्वासित जीवन में
जो उनपर डकार लेता है और सिखाता है उन्हें
सूरज के नीचे पतला गूं हंगना.
देखा बही पूँजी को

चिल्लर के लिए भीख माँगते

धीरज अपनी पराकाष्ठा पर बिफरा हुआ,
नारियल के ढेर धडों से कटे सिरों से मिले हुए

जैसे जैसे हिंदू और मुस्लिम कभी (आखिरी ब्रिटिश
मेहरबानी की सुनहरी भौंह वाली निगाह के नीचे) .
चाकुओं से ठीक-ठीक काटे गए थे और
उस देवी के अनुष्ठान के काम में आए थे
जो शिव के बैंगनी उदर पर
उकडूं काली बैठी हुई है : उसकी दृष्टि
निर्निमेष
देश पर लगी है.

काली पूजा आने वाली थी. मैंने देखा
कलकत्ता को हम पर आते हुए,
तीन हजार मलिन बस्तियां
जो अक्सर अपने आप में मगन रहती थीं, दीवारों के
पीछे दुबकी हुई या सीवर के गंदे पानी से सटी हुई
दौड़ पड़ती है बगटूट पूर्णिमा;
रात्रि और देवी उनके पक्ष में है.

अनगिनत मुखविवरों में देखी मैने
कली देवी की लाख वाली जीभ
लाल लपलपाती हुई । मैंने उसे होंठ
चटखारते हुए सुना : मैं,
अनगिनत मैं, सारी नालियों और
डूबे हुए तलघरों से, पाँतों पर से :
मुक्त की गई हैसिए जैसी धारदार- मैं.
जीभ दिखाना : मैं हूँ.
मैं तट पार करती हूँ. . .
मैं करती हूँ निरस्त सीमाएँ.
मैं करती हूँ
अंत. 

सो हम चले गए (तुम और मैं) हालाँकि
अखबार आता रहा और ख़बरें लाता रहा
केरोसीन की किल्लत हाकी के गोलों गोरखालैंड
बुलेटप्रूफ काँच के पीछे विधवा के बेटे
और पानी की; जो धीरे-धीरे मिदनापुर में
और हुगली जिले में धीरे धीरे
 उतर रहा था. 
(और काली देविका के पूजन का त्यौहार
शांतिपूर्वक सम्पन्न हो गया,
कहता है 'दि टेलीग्राफ़')


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जर्मन ज़मीर का नक्कारची
विष्णु खरे

अक्सर ठीक ही कहा जाता है कि किसी फिल्म के कथानक को तो एक स्वीकार्य या बेहतर कहानी-उपन्यास में बदला जा सकता है, एक विख्यात कहानी या उपन्यास को बड़ी फिल्म में रूपांतरित कर पाना हमेशा संभव नहीं होता. इसके उदाहरणों और कारणों पर सिनेमा के विदेशी अध्येताओं में लगातार बहस होती आई है. कहा जाता है कि एक महान कथा अपने-आप में एक बड़ी फिल्म भी होती है, वह मनोवैज्ञानिक ही क्यों न हो, पाठकों की सभी ज्ञानेन्द्रियों तथा कल्पनाशीलता पर वह इतना गहरा निजी असर छोड़ चुकी होती है कि वह  उनके किसी भी दूसरे रूपांतर को स्वीकार नहीं करते. उधर कुछ उपन्यास अपने विस्तार और गहराई में इतने जटिल होते हैं कि घुटने टेक कर क़ुबूल कर लिया जाता है कि उन पर अच्छी फिल्म बन ही नहीं सकती.

एक ऐसा ही उपन्यास था और है जर्मनी के महान, नोबेल-पुरस्कार विजेता लेखक और उत्कीर्णक गुंटर ग्रास (16.10.1927 – 13.4.2015) का 1959 में प्रकाशित मूल जर्मन-शीर्षक उपन्यास ‘डी ब्लेख्ट्रोमेल’,जो अपने अनूदित अंग्रेज़ी नाम ‘दि टिन ड्रम’ (‘’टीन का ढोल’’) से संसार-भर में विख्यात है,और विश्व की अनेक बड़ी भाषाओँ में उपलब्ध है. हिंदी में न होने के लिए यहाँ अप्रासंगिक किन्तु कुछ अंतर्कथात्मक ज़िम्मेदारी इस लेखक की भी है. इसमें शक नहीं कि पाठक (गाब्रीएल गार्सीआ) मार्केस और उनके उपन्यास ‘दि हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ को ज्यादा जानते होंगे लेकिन वह ग्रास के शाहकार से न सिर्फ आठ बरस बाद छपा था बल्कि ‘जादुई यथार्थवाद’ के जनक माने जाने वाले मार्केस ने हमेशा स्वीकार किया कि उनपर ग्रास का इतना गहरा असर है कि शायद उसके बिना उनका उपन्यास जैसा है वैसा संभव न होता.

किसी भी उपन्यास पर अक्षरशः वैसी ही फिल्म बनाना असंभव है, वैसी कोशिश करना सिनेमा और साहित्य दोनों का अपमान करने जैसा है. टीन का ढोल’ वैसे भी कोई आसान उपन्यास नहीं है, वह शुरू 19वीं सदी के अंत में में होता है और ख़त्म यदि होता भी है तो हिटलर और नात्सियों के ज़माने और दूसरे विश्व युद्ध के बाद के 1945 में. लेकिन यह दर्शकों और शायद स्वयं ग्रास का सौभाग्य था कि 1970 के जर्मनी में तब राइनर वेर्नर फस्बिंडर, वेर्न्रर हेर्त्सोग और विम वेंडर्स सरीखे प्रतिभावान युवा फिल्म निदेशकों की पीढ़ी मौजूद थी जिसके एक अन्यतम सदस्य थे फोल्केर श्लोएन्डोर्फ़, जिन्होंने ‘तीन का ढोल’ पर फिल्म बनाने की जोखिम-भरी चुनौती स्वीकार की. 1978 तक श्लोंडोदोर्फ़ ‘यंग टोएर्लेस’,’ए डिग्री ऑफ़ मर्डर’,’मिखाइल कोल्हस’,’दि लॉस्ट ऑनर ऑफ़ काठारीना ब्लूम’ तथा ‘कू द ग्रास’ सरीखी साहित्यिक कृतियों पर आधारित फ़िल्में बनाकर अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि हासिल कर चुके थे.श्लोंदोर्फ़ कभी मार्गारेठे फ़ोन ट्रोटा सरीखी महान फिल्म-निदेशिका से विवाहित भी रहे. ग्रास इन सब युवतर फिल्मकारों के काम से वाक़िफ थे.

श्लोंडोर्फ़ की फिल्म का, जो बहुत दूर तक ग्रास के उपन्यास का साथ निभाती है, खुलासा यह है कि वह शुरू होती है 1899 में नायक ओस्कर मात्सेराठ के पोलैंड में रहने वाले जर्मन नाना, पिता,नानी, माँ, के जीवन से. उसका पिता आल्फ्रेड मात्सेराठ, जो पहले विश्व युद्ध में पुरुष नर्स था. बाद में आग्नेस से शादी करता है और एक पंसारी की दूकान चलाता है. ओस्कर पैदाइश से ही एक बालिग़ दिमाग़ लेकर जनमता है और जब उसे मालूम पड़ता है की बड़ा होकर उसे विरसे में वही दूकान मिलेगी तो वह तीन साल की उम्र के बाद और बड़ा न होने का फैसला कर लेता है. इसके लिए वह एक शारीरिक दुर्घटना को अंजाम देता है. उसके तीसरे जन्मदिन पर उसे वही टीन का ढोल तोहफे में मिलता है जो उपन्यास और फिल्म का शीर्षक है. ओस्कर उसे ज़िंदगी भर नहीं छोड़ता. वह हमेशा के लिए बौना हो जाता है लेकिन उसकी चीख़ इतनी ज़ोरदार और तीखी है कि उससे बड़े-बड़े शीशे चकनाचूर हो जाते हैं. अपने इस चीत्कार और नक्कारे का वह तभी इस्तेमाल करता है जब नाराज़ होकर वह किसी जगह घटना में बड़ा खलल पैदा करना चाहता है.जर्मन में ‘तीन का ढोल बजाना’ मुहाविरे का अर्थ यही है. 

यहाँ तक तो कहानी फिर भी आसान है.इसके बाद ओस्कर के प्रेम और परिवार प्रसंग हैं,दूसरे विश्व युद्ध के ज़माने के उसके कारनामे है, नात्सी हैं, हिटलर की मौजूदगी है.इससे ज़्यादा अष्टावक्र उपन्यास और फिल्म बहुत कम होंगे लेकिन आप न तो उपन्यास बीच में छोड़ सकते हैं और न फिल्म. दोनों के अंत में एक अचम्भा भी है जिसे यहाँ बतलाया नहीं जा सकता.कई विवादास्पद बालिग़ ‘अश्लील’ किन्तु अनिवार्य सीन तो हैं ही. कनाडा में इसके कुछ सीन काटे गए, फिर बच्चों की पोर्नोग्राफी दिखने के जुर्म में इसे प्रतिबंधित ही कर दिया गया. अमेरिका में ओक्लाहोमा ज़िले में भी इसी इल्ज़ाम पर फिल्म पर मुक़दमा चला और शहर में उसके कई प्रिंट जब्त कर लिए गए. दोनों जगह सरकार अदालत में हार गई और फिल्म खूब चली. ओक्लाहोमा काण्ड पर एक डाक्यूमेंट्री ही बना ली गई जो फिल्म की तरह अब भी देखी जा सकती है.

इस फ़िल्म का एक दृश्य
ओस्कर नामक ‘हीरो’ वाली इस फिल्म को 1979 की सर्वश्रेष्ठ विदेशी ऑस्कर मिला और उसी वर्ष फ्रांसिस फ़ोर्ड कोप्पोला की अमरीकी फिल्म ‘अपोकैलिप्स नाउ’ के साथ कान का सर्वोच्च सम्मान ‘पाम द’ओर’.ग्रास के उपन्यास की पहले भी लाखों प्रतियां बिकती थीं, ऑस्कर के बाद और लाखों बिकने लगीं और अभी, मृत्यु के बाद, फिर और लाखों बिक रही हैं और श्लोंडोर्फ़ की फिल्म संसार ,विशेषतः जर्मनी, के सिनेमाघरों और अखबारों में लौट आई है.लेकिन जब वह बन रही थी तब शीत-युद्ध का युग था,जर्मनी का एकीकरण कल्पनातीत था,सो सोवियत रूस और अन्य समर्थक साम्यवादी देशों की आपत्तियों के कारण उसकी शूटिंग असली जगहों और देशों में लगभग न हो सकी,वहाँ उसका प्रदर्शन भी प्रतिबंधित कर दिया गया और खुद ( तत्कालीन पश्चिम ) जर्मनी में प्रतिक्रियावादी तत्वों ने उसका विरोध किया – सबको मालूम था कि ग्रास और श्लोंडोर्फ़ घोषित रूप से समाजवादी हैं.दोनों की सारी कृतियाँ इसी तरह की हैं.ग्रास तो आजीवन ईर्ष्या और निंदा के केंद्र में रहे.जर्मनी और यूरोप के एक सबसे बड़े साहित्य-आलोचक आक्सेल राइष-रानित्स्की ने एक बार ग्रास की एक पुस्तक को बीच से फाड़ते हुए अपना एक चित्र जर्मनी के सबसे बड़े साप्ताहिक ‘डेअर श्पीगल’ के मुखपृष्ठ पर छपाया था.कुछ ही वर्षों पहले यूरोप में यह गंभीर विवाद पैदा हुआ था कि ग्रास ने हिटलर की फ़ौज में अपने सैनिक होने को साठ वर्ष तक क्यों छुपाया.उधर कुछ कुछ ओस्कर मात्सेराठ की ज़िंदगी की याद दिलाते हुए ग्रास की बहन ने बुढ़ापे में अत्यंत मर्मान्तक रहस्योद्घाटन यह किया कि अपने बच्चों को बचाने के लिए ग्रास की माँ को दूसरे विश्व युद्ध में कभी फौजियों की वेश्या भी होना पडा था.

यदि उपन्यास के रूप में ‘टीन का ढोल’ अजर-अमर है तो फिल्म के रूप में उसका नक्कारा अब भी संसार-भर में गड़गड़ा रहा है.यह अंग्रेज़ी सब-टाइटल्स के साथ दो संस्करणों में उपलब्ध है – एक 142 मिनट का है और दूसरा स्वयं डायरेक्टर ने अपना ‘कट’ 162 मिनट का तैयार किया है.यह सही है की श्लोंडोर्फ़ सारे उपन्यास को फिल्म में न समेट सके, उसके लिए उसकी लम्बाई तीन-चार घंटे से कम न होती और यह महँगी फिल्म थी जिसे अब बनाना तो लगभग असंभव है.पैंतीस बरस बाद भी श्लोंडोर्फ़ की फिल्म कतई पुरानी नहीं पड़ी है,बल्कि वर्तमान भारत के समूचे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता बढ़ ही रही है.उसे देख कर सीखा जा सकता है कि भारत पर और समूचे दक्षिण एशिया पर किस तरह की फिल्म कैसे बनाई जा सकती है.उसे आप देखते क्यों नहीं ? साथ में ग्रास को भी अनिवार्यतः पढ़िए और देखिए कि वह भारतीय समाज और साहित्य के लिए क्या  नहीं कर सकता है.
(यह आलेख आज के नवभारत टाइम्स मुंबई में प्रकाशित है.संपादक और लेखक के प्रति आभार के साथ)

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विष्णु खरे 
9833256060
 ईमेल  vishnukhare@gmail.com