रंग -राग : ईदा (Ida) : विष्णु खरे

Posted by arun dev on अप्रैल 05, 2015















विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में इतिहास और भूगोल की यात्रा करती 2013 के आस्कर से सम्मानित पावेल पाव्लिकोस्की की पोलिश फिल्म ‘’ईदा’’ कई कारणों से चर्चा में है. इस फ़िल्म के सभी पहलुओं को टटोलता विष्णु खरे का लेख.  



ऑस्कर ऐसी फ़िल्मों को मिलता है, स्टुपिड               
विष्णु खरे



स्तालिन-युग के बाद के पोलैंड की एक युवती है अन्ना, जो यतीम थी और 1960 के बाद के बरसों में में एक कॉन्वेंट में पली-बढ़ी है. उसे चर्च में ‘नन’ या ‘सिस्टर’ बनना ही है लेकिन अंतिम दीक्षा के पहले उसकी वरिष्ठ पुरोहितानियाँ उसे बताती हैं कि वह पैदाइशी ईसाई नहीं, यहूदी है और उसका असली नाम ईदा था. अब सिर्फ़ उसकी असली मौसी वान्दा ग्रूज़ जिंदा है और अन्ना उर्फ़ ईदा चाहे तो नन बनने-न बनने का फ़ैसला लेने से पहले उससे कुछ दिनों के लिए पहली और आख़िरी बार मिल सकती है. मौसी वान्दा स्तालिन-युग में एक जज थी, अभी भी है और उसने कई पोलिश देशभक्तों को फाँसी दी थी. वह अब एक अधेड़ अल्कोहलिक और सैक्स-विक्षिप्त हो चुकी है. ईदा जानना चाहती है कि उसके माता-पिता हिटलर, स्तालिन और दूसरे विश्व-युद्ध के ज़माने के पोलैंड में कैसे मारे गए थे और उनकी कब्रें अगर हैं तो कहाँ हैं. के भान्जी के साथ मौसी वान्दा भी यह मालूम करना चाहती है. यह जटिल और जोखिम-भरी तलाश उन्हें पोलैंड के अंदरूनी गाँवों में ले जाती है और आखिरकार उनका सामना इस सचाई से होता है कि जिस ईसाई पोलिश किसान ने जान का ख़तरा उठाकर ईदा के माँ-बाप को पनाह दी थी उसी ने उनकी ज़मीन-जायदाद की लालच में उनकी ह्त्या कर दी थी. ईदा और वान्दा उस किसान का क्या फैसला करें ? ईदा कैथलिक-ईसाई नन बने या अपनी ‘’असली’’ यहूदियत में लौट जाए ? मौसी जिस शहराती दुनिया में रहती है उसमें जवान लड़के हैं, नाइट क्लब हैं, नाच-गाना-नशा है, आलिंगन-चुम्बन हैं, ’लाइफ़’ है. ईदा लौट कर गिरजाघर की सन्यासिन बन जाए या रुक कर मौसी के भौतिक ‘सुखों’ के संसार को गले लगा ले ?
स बरस का विदेशी फिल्म ऑस्कर जीतनेवाली निदेशक पावेल पाव्लिकोस्की की पोलिश फिल्म ‘’ईदा’’ सिर्फ़ इतनी-ही चुनौतियाँ पेश करती तब भी कोई बात थी - तत्कालीन इतिहास, समाज, संस्कृति और राजनीति के जो प्रश्न वह उठाती है उन्होंने पोलैंड और यूरोप, ईसाइयों और यहूदियों, दक्षिणपंथियों और वामपंथियों के बीच एक गहरा विवाद खड़ा कर दिया है जिसकी छाया सैकड़ों वर्षों और लाखों वर्ग-किलोमीटरों  तक पहुँचती है. एक कैथलिक-समर्थक प्रतिक्रियावादी वैबसाइट ने उसे ‘देश-विरोधी’ कहा है. यूरोपीय संसद के एक पोलिश सदस्य ने कहा है कि यह एक अजीब फिल्म है जिसमें यहूदी-संहार Holocaust तो है, जर्मन नहीं हैं, यहूदियों को नात्सी नहीं मारते, लालची और घिनौने पोलिश किसान मारते हैं. ’पोलिश मानहानि-विरोधी लीग’ ने हज़ारों दस्तखतों के साथ माँग की है कि ‘ईदा’ के प्रोड्यूसर फिल्म की शुरूआत में यह प्रति-वक्तव्य (‘डिस्क्लेमर’) दें कि पोलैंड पर उन दिनों नात्सी जर्मनी का कब्जा था, जर्मनों ने पोलिश यहूदियों की हत्याएँ कीं, हज़ारों पोलिश नागरिकों को यहूदियों को शरण देने के कारण मार डाला गया फिर भी वह बाज़ नहीं आए, पोलैंड की तत्कालीन  ‘देशभक्त भूमिगत सरकार’ ने यहूदियों को संकट में डालनेवाले पोलिश नागरिकों को सज़ा दी, और इजराइल के ‘याद वाशेम संस्थान’  ने नात्सियों के ज़माने में यहूदियों की मदद करने के लिए सबसे अधिक पदक पोलिश नागरिकों को ही दिए हैं.
धर वामपंथियों ने ’ईदा’ को यहूदी-विरोधी क़रार दिया है. वर्षावा के ‘यहूदी ऐतिहासिक संस्थान’ की हेलेना दात्नर ने कहा है कि इस फिल्म की सह-नायिका यही बतलाना चाहती है जो पोलिश लोग उन लोगों के बारे में सोचते हैं जो कभी सच्चा समाजवाद लाना चाहते थे : कि एक वैसी यहूदिन (वान्दा ग्रूज़) रंडी और पियक्कड़ थी. वामपंथी प्रकाशन ‘क्रितीका पोलीतीचना’ की नारीवादी संपादिका आग्निएश्का ग्राफ़ का मानना है कि ‘ईदा’ सिर्फ एक इन्तकाम की कहानी है जिसमें एक यहूदिन जज को अपने बहन-बहनोई को मारने के जुर्म में  पोलिश लोगों को फाँसी की सज़ा देते दिखाया गया है.
च तो यह है कि सदियों के पारम्परीण यहूदी-ईसाई द्वेष, हिटलर, दूसरे विश्व युद्ध, स्तालिन तथा पूर्व सोवियत संघ और ब्लॉक ने  मिलकर  सभी यूरोपीय देशों के बहुआयामीय इतिहासों को शायद हमेशा के लिए बहुत जटिल बना डाला है और उनकी सारी गुत्थियों को सुलझाने के लिए सामूहिक संतुलित मन-मस्तिष्क  की दरकार है. ’ईदा’ यह कहीं नहीं कहती कि सभी ईसाई पोलिश नागरिक या किसान लालची हत्यारे थे या सभी यहूदी और वामपंथी वास्तविक या काल्पनिक अपराधों के लिए ईसाई पोलिश नागरिकों से हिसाब बराबर कर रहे थे. ईदा जैसे सैकड़ों बच्चों को करीब एक हज़ार कैथलिक कान्वेंट की सिस्टरों ने ही तो बचाया था. यदि ’ईदा’ पर यहूदी-विरोधी होने का आरोप है तो समनाम नायिका सभी को क्षमा करती हुई, सारे प्रलोभनों का त्याग करती हुई सन्यासिनी बनती है. वान्दा ग्रूज़ का चरित्र भले ही एक वैसी वास्तविक महिला हेलेना वोलिंस्का पर आधारित है, पर फिल्म में अपने गहरे अपराध-बोध के कारण न्यायाधीश वान्दा आत्महत्या पर विवश होती है.
समें संदेह नहीं कि दक्षिणपंथियों, साम्यवादियों और तटस्थों तीनों के द्वारा ‘ईदा’ पर जो आपत्तियाँ उठाई गई हैं उनमें से भले ही बहुत कम लेकिन कुछ सही ज़रूर हैं. लेकिन निदेशक पाव्लिकोव्स्की का कहना है कि मेरी फिल्म का का मक़सद न तो इतिहास पढ़ाना है और न दर्शकों को अतीत के बारे में ज्ञान या उपदेश देना.  इसे आप चाहें तो एक आध्यात्मिक कहानी कह सकते हैं.  ईदा की तलाश  यह है कि वह ख़ुद है कौन – ईसाई,यहूदी या एक मानवी ? क्या वह सचमुच एक कैथलिक सन्यासिन बनना चाहती है ? शराब और उच्छ्रंखल सैक्स के माध्यम से अपनी आध्यात्मिक मृत्यु को निमंत्रण देने वाली उसकी मौसी वान्दा उसे अपनी-ही जैसी ज़िंदगी की ओर ले जाना चाहती है लेकिन अंत में शास्त्रीय संगीत सुनते हुए पश्चात्ताप की मृत्यु का ही वरण करती है, और वह किसान, जिसने ईदा के माता-पिता को लोभवश मार डालने के लिए ही अस्थायी रूप से बचाया था, क्या रोते हुए उनकी कब्र खोदकर उनकी बची हुई करुण अस्थियाँ भांजी-मौसी को नहीं सौंपता ?
ह सच है कि एक ठोस, ऋजु कथानक होते हुए भी ‘ईदा’ सही, सर्वोच्च अर्थों में एक ‘कला फिल्म’ है. इसे देखना उतना आसान नहीं है और इसकी व्यापारिक कामयाबी तो नामुमकिन है. इसे जान-बूझकर काले-सुफ़ेद में बनाया गया है ताकि सेपिआ भी दिखे और हमें अस्तित्व के ‘ग्रे’ यानी धूसर-संसार में ले जाए. इसे देखकर 1950-60 के दशकों के महान निदेशकों की महान फ़िल्में याद आती हैं. ऐसा नहीं है कि प्रबुद्ध भारतीय दर्शक को इसमें कुछ न मिलेगा लेकिन यदि आप यूरोप के पिछले सौ वर्षों के इतिहास को कमोबेश जानते हैं, अंदरूनी यूरोप के भूदृश्य से यत्किंचित् परिचित हैं,तो आप मनाते रहते हैं कि ऐसी फ़िल्में कभी ख़त्म न हों.फिर आपको यह याद आता है कि हमारे देश में ही पिछले हज़ारों वर्षों के कितने दलित-हिन्दू-मुसलमान-सिख कंकाल गड़े हुए हैं, हमने और हमारे पुरखों ने कितनी हत्याएँ की हैं, हमारे जीवन, दिल और दिमाग़ किस किस्म के श्मशान और कब्रस्तान हैं, हमारे बीच कितने हत्यारे इसी वक़्त मौजूद हैं और होते रहेंगे, तो आप पूछते हैं हमारे यहाँ ‘ईदा’ जैसी एक भी फिल्म क्यों नहीं है ?
जबकि हमारे दो कौड़ी के ‘’डायरेक्टर’’ अपनी टुच्ची फिल्मों को हॉलीवुड ले जाकर अपने पालतू ‘’फिल्म-विशेषज्ञों’’ के साथ रिरियाते-घिघियाते घूमते हैं कि हमें ऑस्कर क्यों नहीं मिलता.
(यह आलेख नवभारत टाइम्स में आज  प्रकाशित है, लेखक और संपादक के प्रति आभार के साथ.)
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विष्णु खरे
८ कविता संग्रह, १ आलोचना, २ सिने- समीक्षा, २१ अनुवाद (हिंदी, अंगेजी, जर्मन) और ८ संपादित आदि पुस्तकें प्रकाशित.
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