रंग - राग : एक छपे रिसाले के लिए विलम्बित मर्सिया : विष्णु खरे

Posted by arun dev on मई 04, 2015













‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ग्रुप की मुंबई से 1951 में शुरू हुई अंग्रेजी की फ़िल्म – पत्रिका ‘स्क्रीन’ के प्रिंट संस्करण के बंद होने की खबर है. ‘स्क्रीन’ कुछ उन पुरानी पत्रिकाओं में है जो धीरे- धीरे  परिवार का हिस्सा बन जाती हैं, तय समय पर उनके आने के प्रतीक्षा और पढने की बेकरारी रहती है. 
किसी पत्रिका का बंद होना उसके किसी पाठक के लिए क्या मायने रखता है इसका अंदाज़ा बिना इस लेख को पढ़े नही लगाया जा सकता है. फिल्मों के मर्मग्य कवि विष्णु खरे ने  आत्मीयता और लगाव से इस पत्रिका से अपने सम्बन्धों के विषय में लिखा है. दरअसल यह भारत में फिल्मी पत्रकारिता के युग पर एक बेचैन कर देने वाला मर्सिया है.


एक छपे रिसाले के लिए विलंबित मर्सिया                
विष्णु खरे 



ज से साठ वर्ष पहले अपने पैदाइशी कस्बे छिन्दवाड़ा में गोलगंज से छोटीबाज़ार जाने वाले रास्ते के नाले की बगल में एक नए खुले पान-बीड़ी के ठेले पर उसे झूलते देख कर मैं हर्ष विस्मित रह गया था. घर पर (एक दिन पुराना डाक एडीशन) ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, ’इलस्ट्रेटेड वीकली’ और ‘धर्मयुग’ नियमित आते थे, हिंदी प्रचारिणी लाइब्रेरी में और कई हिंदी-अंग्रेज़ी पत्र-पत्रिकाएँ देखने-पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त था, लेकिन वह अंग्रेज़ी अखबार-सा दीखनेवाला जो एक रस्सी से लटका फड़फड़ा रहा था, एक युगांतरकारी, नई चीज़ थी. क्या किसी दैनिक से लगनेवाले इंग्लिश साप्ताहिक का नाम ‘’स्क्रीन’’ हो सकता था ? और जिसके हर एक पन्ने पर सिवा फिल्मों, सिनेमा, उनके इश्तहार ,एक्टर, एक्ट्रेस, उनके एक-से-एक शूटिंग या ग़ैर-शूटिंग फोटो वगैरह के और कुछ न हो ? खुद जिसका नाम सेल्युलॉइड की रील के टुकड़ों की डिज़ाइन में छपा हुआ हो ? मुझे पूरा यकीन है कि उसे सबसे पहले हासिल करने के लिए जिस रफ़्तार से दौड़ कर मैं घर से चार आने लाया था उसे तब रोजर बैनिस्टर या आज ओसैन बोल्ट भी छू नहीं पाए होंगे.

स्बे के कुतबखाने में 1950 के दशक में हिंदी-अंग्रेज़ी की कोई ‘’चालू’’ पत्रिका नहीं आती थी, फ़िल्मी मैगज़ीन का तो कोई प्रश्न ही नहीं था. यह एक रहस्य है कि किसने कब बाबूराव पटेल की अत्यंत विवादास्पद, ’’आपत्तिजनक’’ कार्टूनों, लेखों, टिप्पणियों वाली, आर्ट-पेपर पर छपनेवाली वज़नी, बेहद महँगी, अंग्रेज़ी सिने-पत्रिका ‘’फिल्मिन्डिया’’ को वहाँ मँगाना  शुरू कर दिया था, जिसे पढनेवाले बहुत कम जानकार और शौकीन लोग थे. लेकिन ‘’स्क्रीन’’ के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी. लाइब्रेरी के संचालकों के लिए वह एक अजीब चीज़ रही होगी – अखबार-साइज़ के सोलह पेजों के बावजूद  न वह बाक़ायदा अखबार थी न रिसाला, फ़िल्मी फ़ोटो होने के बावजूद वह फिल्म पत्रिका लगती नहीं थी और तुर्रा यह कि अंग्रेज़ी में थी.सो वह कभी टेबिलों पर दिखाई न दी.

लेकिन कहा भी है कि मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है. 1950-60 का ज़माना वह था जिसमें हिंदी सिनेमा में ‘’आधुनिकता’’ का पहला दौर आया और, नाम गिनाने से क्या फ़ायदा, ऐसे निदेशक, हीरो, हीरोइनें, चरित्र-अभिनेता-अभिनेत्रियाँ,  खलनायक, कॉमेडियन, संगीत- निदेशक, गीतकार, गायक-गायिकाएँ और सभी विभागों के तकनीशियन भी उभरे कि फ़िल्में हमेशा के लिए बदल गईं. उनमें अद्भुत वैविध्य दिखाई देने लगा. इसी ‘’क्रांति’’ ने जुनूबी एशिया में सिनेमा के पहले करोड़ों दर्शक पैदा किए जिनमें, ज़ाहिर है, बहुमत हम-जैसे तत्कालीन किशोरों-नवयुवकों का था. युगांतरकारी परिवर्तन यह था कि हमारी दिलचस्पी महज़ सिनेमा देखने में नहीं थी, वह बनता कैसे है इसे जानने में भी ख़ूब थी ; सिर्फ़ हिन्दुस्तानी फिल्मों में नहीं थी बल्कि अंग्रेज़ी फिल्मों से गुज़रते हुए सारे संसार के सिनेमा की कोई भी झलक देख लेने में थी.तब न कोई विदेशी सिने-पत्रिका देखने को नसीब होती थी और न फ़िल्म पर कोई देशी-विदेशी किताब.(आज भी हिंदी में सिनेमा पर कोई स्तरीय पत्रिका नहीं है और न फिल्म पर किताबों का एक पूरा शैल्फ़.) इस भयावह, पंगुकारी निर्वात को यदि कोई भरता था तो अंग्रेज़ी का ‘’स्क्रीन’’.सब इस बात की बहुत डींग हांकते हैं कि सिनेमा ने हिंदी को बहुत लोकप्रिय और स्वीकार्य बनाया है, लेकिन इस पर कोई खोज नहीं हुई है कि सिनेमा पढ़ने-जानने की भूख हमें कितनी अँग्रेज़ी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों की ओर ले गई,ले जा रही है.

स्क्रीन’’ की देखा-सीखी 1950 के दशक में हिंदी सहित कई भारतीय भाषाओँ में वैसे ही पत्र-पत्रिकाएँ निकले. वह ज़माना अंग्रेज़ी ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’, हिंदी ‘धर्मयुग’ और उर्दू ‘शमा’ में आनेवाली वर्ग-पहेली  (Crossword-puzzles) प्रतियोगिताओं का भी था जिनमें लाखों पाठक करोड़ों रुपयों का शुल्क भर कर हिस्सा लेते थे. ’’स्क्रीन’’ में वर्ग-पहेली नहीं होती थी लेकिन उसकी नक़ल करनेवाली कई छोटी पत्रिकाओं ने इसे भी बिक्री का एक हथकंडा बनाया मगर न उनकी वर्ग पहेलियाँ चलीं, न वह स्वयं.’’स्क्रीन’’ का बाल भी बाँका न हुआ बल्कि उसने सारे देश की पत्रकारिता में एक अद्वितीय स्थान बना लिया. वह भारतीय सिनेमा के केंद्र मुम्बई से निकलती थी यानी उसे अपने लिए अनिवार्य सारा कच्चा और पका-पकाया माल कुछ ही मीलों और घंटों के भीतर मिल जाता था. लोग देख नहीं पाते हैं कि अखबार निकालने और फिल्म बनाने में अद्भुत समानता है. फिर ‘’स्क्रीन’’ को अपने प्रकाशन-कुल इंडियन एक्सप्रेस समूह का भी मज़बूत सहारा हासिल था. शायद ’’स्क्रीन’’ की सफलता को देखकर टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह ने भी अपनी फिल्म-पत्रिका ‘’फ़िल्मफेयर’’ शुरू की लेकिन होशियारी यह की कि उसे ‘’स्क्रीन’’ से बिलकुल अलग आकार-प्रकार में निकाला. दोनों के बीच कमोबेश एक शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व बना रहा. यह संयोग नहीं था कि जब बी.के.करंजिया ‘’फ़िल्मफ़ेयर’’के सम्पादक-पद से रिटायर हुए तो एक्सप्रेस-स्वामी रामनाथ गोयनका ने तत्काल उन्हें ‘’स्क्रीन’’ की संपादकी सौंप दी.

‘स्क्रीन’’ ने बुद्धिमानी यह की कि उसने एक सरल, सहज, लोकप्रिय पत्र बने रहने का फैसला किया क्योंकि उसका विषय भारतीय सिनेमा था, रूसी, फ्रेंच, इतालवी या जर्मन सिनेमा नहीं. उसका पाठक अंग्रेज़ी से परिचित पाठक था,फ़िल्म-थ्योरी का जानकार या अध्येता नहीं. मुझे कुछ याद आता है कि उसमें नैट डैलिंजर नामक फ़ोटोग्राफ़र के चित्रों के साथ  हॉलीवुड की एक कॉलमिस्ट लूएला पार्सन्स का साप्ताहिक स्तम्भ छपा करता था लेकिन अधिकांशतः दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद जैसे युवा-ह्रदय सम्राटों के खेमों में बंटे हुए लाखों नौजवानों की तसल्ली का सहारा ‘’स्क्रीन’’ की हिन्दी फिल्मों की सचित्र कवरेज ही हुआ करती थी.वह शुक्रवार को बाज़ार में आता था लेकिन इतवार तक युवा हाथों में लुग्दी बन जाता था. फिल्मों के विज्ञापनों तक को काट कर रख लिया जाता था. दिलीप,राज और देव पर निकाले गए ‘’स्क्रीन’’ के विशेषांक तो सोने की मोहरों में तोले जाने लायक थे.

बसे बड़ी बात यह थी कि जब तक वह अखबार की साइज़ में,ब्लैक-एंड-वाइट निकला तब तक ‘स्क्रीन’ एक ‘डेमोक्रेटिक’,यहाँ तक कि ‘प्रोलेतारिअत’ रिसाला था. उसने फिल्म-उद्योग के हर किमाश के छोटे-बड़े के बीच कोई भेद-भाव नहीं किया. उसके संपादकों, लेखकों और पत्रकारों ने आम पाठक को डराया-धमकाया नहीं, उन्हें कोई ‘इन्फ़ीरिओरिटी कॉम्प्लेक्स’ नहीं दिया.साफ़ दीखता था कि उसे निकालने वालों को भी उतना ही मज़ा आ रहा था जितना उसे पढ़नेवालों को.उसकी अंग्रेज़ी स्तरीय थी, जिससे लिखना सीखा जा सकता था. उसके लाखों पाठकों के पास अब भी उसकी कतरनें और फोटो सहेजे हुए होंगे. उसमें स्कैंडल, अफवाहें, रंगीन रातों, गर्भाधान, गर्भपात, प्रसूति, कुच-नितम्ब-जंघा शल्य-क्रिया,नींवि-कंचुकी-बंधन-बाधा,बलात्कार,कास्टिंग-काउच आदि के खोजी,’स्टिंग’,अन्तरंग समाचार नहीं दीखते थे.

सुना है अंतिम दिनों में अपने अतिरंजित टैब्लॉइड अवतार में वह सिर्फ पद्रह-सोलह हज़ार छपने लगा था. 1955-90 के अपने स्वर्णकाल और हिंदी फिल्म-उद्योग की कल्पनातीत ‘’उन्नति’’ के बावजूद इस नियति को वह क्यों प्राप्त हुआ यह कहना कठिन है. उसी के साथ का ‘’फिल्मफ़ेयर’’ अब भी कैसे डटा हुआ है ? कानून की सीमाओं के भीतर हर मालिक को अधिकार है कि वह अपने माल को जैसा चाहे तैयार करे, जिसे चाहे बेचे या बनाना ही बंद कर दे. लेकिन आपका टमाटर बेचनेवाला यदि यह कहे कि सुविधा के लिए मैं उनका कचूमर निकाल कर आपको  सीधा कैचप ही दे रहा हूँ तो आप उसके चेहरे में अपना चेहरा ढूँढते रह जाने के सिवा और कर भी क्या सकते हैं ? 

पिछले दिनों जब लगातार दो हफ्ते ‘’स्क्रीन’’ नहीं आया तो हमने पारिवारिक स्तर पर अखबारवाली एजेंट-बाई को बुलाकर पूरे साठ वर्ष के तपोबल के साथ कई किस्म की धमकियाँ और चेतावनियाँ दीं. वह इतना बोली कि मैं किदर से लाऊँ,’’स्क्रीन’’ अबी बंद हो गई. हमने डपटकर कहा कि उसमें ऐसा कहीं नहीं छपा था, तुम हमारा ‘’स्क्रीन’’ किसी और को बेच रही हो.उसने कहा काकासाहेब, आप तो पढ़े-लिखे हो,कंपनी से तपास करो ना.कंपनी से क्या करते,गूगल किया.

‘स्टार इंडिया नामक कंपनी के अफ़सरद्वय उदय शंकर- संजय गुप्ता ने बताया कि हाँ हमने ‘’स्क्रीन’’ को खरीद लिया है और हम इसे ऑनलाइन डिजिटल बनाने जा रहे हैं जहाँ वह बहुत कामयाब रहेगा’’. ऑव, कम ऑन बॉयज़, गैट रियल.
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(यह आलेख रविवार के नवभारत टाइम्स मुंबई में प्रकाशित है.संपादक और लेखक के प्रति आभार के साथ)
विष्णु खरे 
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