मंगलाचार : सुदीप सोहनी की कविताएँ

Posted by arun dev on जुलाई 17, 2015











हर नया स्वर, हर नई कविता और कवि उम्मीद होते हैं, न सिर्फ भाषा के लिए, जहाँ भाषाएँ बोली जाती हैं उस दुनिया के लिए भी. सुदीप, कवि के रूप में अपनी पहचान की यात्रा शुरू कर रहे हैं. रचनात्मक तो वह हैं हीं. संवेदना और शिल्प को सहेजने और बरतने का उनका तरीका भी आश्वस्त करता है.





सुदीप सोहनी की कविताएँ                       





1)
कितना अजीब है मेरे लिए
एक कस्बे से महानगर की त्वचा में घुस जाना.

ये कोई बहस का मुद्दा नहीं
पर अक्सर चाय के अकेले गिलासों और बसों ट्रेनों की उदास खिड़कियो पर
पीठ टिकाये चलती रहती है ये कश्मकश
कि शामों को अक्सर हो ही जाती है तुलना उन शहरों की
जहां चप्पल घिसटने और निकर खिसकने से लेकर
ब्रांडेड जूतों कपड़ों और सूट टाई का सफर चंद सालों में तय किया मैंने.

पर बात सिर्फ चमक-दमक की नहीं 
बात उन जगहों की है जो मेरे दिमाग में गंदी जगहें नाम से बैठी थी.

वो सिनेमाघर या दारू के अड्डे
हाँ यही तो कहा जाता था उन्हें
            लंपटों के आरामगाह, जूएँ-सट्टे के घर
            दारुकुट्टे जाते हैं वहाँ, पीना-खाना होता है यहाँ
कहकर जिन्हें बड़ी उम्र के दोस्त, भाई अक्सर साथ चलते दिखाते हुए आगे ले जाते थे
और रेशमा की जवानी वाले सिनेमाघर केवल यह बताते थे
कि किस दिशा में जाकर किस गली मुड़ना है फलां के यहाँ जाने के लिए यहाँ से.
आज वो ही जगहें मेरी पहुँच में हैं
बेधड़क आया जाया जा सकता है.

कॉलेज के दिनों में गया था टॉकीज में
और रेस्टो-बार तो मिलने बैठने की ही जगह है अब
वो ही बियर-बार जिनके बारे में
घुट्टी की तरह पिलाया गया था ओढ़ाया हुआ सच.

तब मन होता था एक बार अंदर घुसने का
पर अब वो थ्रिल नदारद है इन जगहों की
मेरे लिए न डर बड़े भाई का
न रिश्तेदार माँ-बाप चाचा ताऊ का 
इन शहरों में मेरा कोई नहीं जहां आने जाने पर लगी हो कोई रोक.

जिंदगी कितनी बदल जाती है,
जब बदल जाती है पहचान.

महानगर डर को बदल देते हैं आदतों में.



2)
छोटे शहर – तीन दृश्य
ट्रेन में से शहर
पहले बहुत से देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और मस्जिदों की मीनारें शहर-गाँव के आसपास होने की ताकीद करती थी. आज उनकी जगह मोबाइल टावरों ने ले ली है. दूर से ही समझ आ जाता है बस्ती आने को है.
दोपहरें
अलसाई-सी धूप में घर की छत पर बाल बनातीं और पापड़ सुखाती स्त्रियों को देख कर लगता है दोपहरें छोटे शहरों में अब भी आती हैं.
शामें
शामें अंधेरे के साथ उदासी साथ लाती हैं. इसलिए शायद झुंड बनाकर गप्पें हांकना कभी लोगों का शगल हुआ करता था. आज न वो लोग हैं, न ही झुंड और न ही गप्पें.
कभी-कभी उदास होना कितना सुखद होता है न !



3)
अकेलापन कुछ कुछ वैसा ही होता है
जैसे किसी अकेली चींटी का दीवार पर सरकना.

अकेलापन रात भर में
चुपचाप किसी कली पर फूल के खिलने जैसा है.

हम मृत्यु हो जाने के बाद अकेले नहीं होते
होते हैं हम अकेले सांस लेते लेते ही.

किसी बर्तन में निष्क्रिय पड़े पानी जितनी लंबी उदासी वाला अकेलापन
घड़ी की घंटे वाली सुई जितना सुस्त होता है.

अकेलेपन को भोगना ही होता है
वैसे ही जैसे भोगना पड़ता है
मिट्टी को बारिश की बूंदों के स्वाद के पहले
भीषण गर्मी का एक लंबा अंतराल.

(
शाम का अकेलापन खिड़की से दिखते और धीरे-धीरे डूबते सूरज के साथ क्षितिज पर बनी लंबी रेखा जैसा ही तो होता है....देर तक रहता है)




4)
ग़ुस्सा एक ज़रूरी शर्त है  प्रेम की.

जब हिसाब करेंगे अंत में हम,
तय होंगे ग़ुस्से से ही प्रेम के प्रतिमान.
रुठने,  मनाने,  मान जाने की हरकतों में ही
छिपे होंगे प्रार्थनाओं के अधूरे फल.

कड़वाहटों, शिकवों-शिकायतों की धमनियों में
रिस रहा होगा प्रेम धीरे-धीरे,
जब बिखरी होगी ज़िन्दगी
किताब से फट पड़े पन्ने की तरह.

छन से टपक पड़ेगी ओस इक,
जब गुज़रा मुंह चिढ़ा रहा होगा.

आँखों में जब नहीं होगी तात दूर तक देखने की,
आवाज़ में भी जब पड़ने लगेंगे छाले,
देखना तुम,
यही ग़ुस्सा साबित होगा निर्णायक
अंत में.



5)
याद को याद लिख देना जितना आसान है
उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है
उस क्षण को जीना और उसका बीतना.

जैसे हो पानी में तैरती नाव
आधी गीली और आधी सूखी.

जिये हुए और कहे हुए के बीच
झूलता हुआ पुल है एक
याद.


6)
रेल जादू का एक खिलौना है
पल में खेल
और
जगह, आदमी
सब ग़ायब.
हिलते हाथ केवल यह बताते रह जाते
कि आदत साथ की गई नहीं.
बेचारगी में रह जाते कुछ वहीं प्लेटफ़ार्म पर
ये सोच कर कि शायद लौट आये इंजन दूसरी दिशा में.
यूं तो यात्रा का नियम यही,
जो गया वो पलटा नहीं.
जादू का सिद्धांत भी है चौंकाना.
रेल खेलती है खेल.
साथ के साथ ही ले जाती है याद भी
और उल्टा कर देती है न्यूटन का सिद्धांत भी
कि किसी क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया होती है.
रेल में आने और जाने के होते हैं अलग-अलग असर.
(याद – वाद यात्रा की इक) 



7)
वही बेसब्री
वही इंतज़ार
वही तड़प.
अकेलापन प्रेम पत्र की तरह होता है
जिसे पढ़ा, समझा और जिया जा सकता है
चुप्पेपन में ही
कई कई बार.


8)
मैं प्रार्थना की तरह बुदबुदाना चाहता हूँ
प्रेम को
पर चाहता हूँ सुने कोई नहीं इसे
मेरे अलावा.
तकना चाहता हूँ आसमान को बेहिसाब
और मौन रहकर देखना चाहता हूँ
करवट लेते समय को.
शाम का रात होना चुप्पियों का आलाप है.


मैं कविता के एकांत में रोना चाहता हूँ
और वहीं बहाना चाहता हूँ
अधूरी इच्छाओं के आँसू
और छू मंतर हो जाना चाहता हूँ खुद से
कुलांचे मारते हिरण की तरह जंगल में
अचानक से.

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सुदीप सोहनी (29 दिसंबर 1984, खंडवा)
भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान पुणे से स्क्रीनप्ले राइटिंग में डिप्लोमा

भोपाल स्थित कला संस्थान 'विहान' के संस्थापक, फीचर फिल्म लेखन तथा डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माण में सक्रिय,विभिन्न कला संबंधी पत्रिकाओं में नाटक, फिल्म समीक्षा, साक्षात्कार,आलेख लेखन

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