सबद - भेद : मुक्तिबोध की नई प्रवृत्तियाँ : नंद भारद्वाज

Posted by arun dev on अगस्त 29, 2015















कवि –आलोचक नंद भारद्वाज सघन उपचार के बाद घर लौटे हैं, मुक्तिबोध पर लिखी दूधनाथ की आलोचना पुस्तक –‘साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ' पर आलेख  पूरा किया है. यह आलेख संवाद है मुक्तिबोध और मुक्तिबोध पर विचार करने वाले उनके विवेचकों से. मुक्तिबोध का गद्य महत्वपूर्ण है, ऐसे में यह अनिवार्य ही है कि मुक्तिबोध को मुकम्मिल तौर से पढ़ा जाए तभी उनकी कुछ ‘नई प्रवृत्तियां’’ अनावृत हो सकती हैं.

नंद जी के स्वास्थ्य लाभ की कामना के साथ यह आलेख आपके लिए.




‘पिस गया वह, भीतरी औ बाहरी दो कठिन पाटों बीच’                    
(मुक्तिबोध पर दूधनाथ सिंह की नयी पुस्तक पर विचार के बहाने)

नंद भारद्वाज 


मुक्तिबोध की जन्‍म-शताब्‍दी से तीन वर्ष पहले और उनके देहावसान की पचासवीं पुण्‍य-तिथि पर उन्‍हें याद करने के बहाने इधर हिन्‍दी की पत्र-पत्रिकाओं और संस्‍थानों में मुक्तिबोध के साहित्य-सृजन पर शोध,  अध्‍ययन और विवेचन की जो सक्रियता बढ़ी है, वह इस कालजयी रचनाकार के समग्र मूल्‍यांकन की दृष्टि से निश्‍चय ही स्‍वागतयोग्‍य है. 
         
हिन्‍दी में मुक्तिबोध की छवि एक प्रगतिशील और संघर्षशील संश्लिष्‍ट कवि के रूप में अधिक प्रचलित रही है, जबकि उनके रचनात्‍मक विधाओं में लेखन के अनुरूप कथाकार, आलोचक और साहित्यिक डायरी लेखक के साथ-साथ सम-सामयिक राजनीतिक विष्‍यों पर टिप्‍पणी करने वाले एक सजग विचारक की छवि भी उतनी ही महत्‍वपूर्ण रही है. हिन्‍दी में मुक्तिबोध के रचनात्‍मक साहित्‍य पर अब तक जो आलोचनात्‍मक काम हुआ है, वह उनकी कविताओं‍ पर अधिक केन्द्रित रहा है, उनके कथा-साहित्‍य, डायरी लेखन या आलोचनात्‍मक गद्य के भीतर उतरकर उसका विवेचन करने का साहस कम ही लोग दिखा पाए हैं. हिन्‍दी के समकालीन रचना परिदृश्‍य में एक कवि, कथाकार और नाटककार के रूप में अपनी विशिष्‍ट पहचान रखने वाले संजीदा रचनाकार दूधनाथसिंह हिन्‍दी आलोचना के क्षेत्र में भी अपने उल्‍लेखनीय योगदान के लिए याद किये जाते हैं, खास तौर से निराला, महादेवी और समकालीन रचनाकर्म पर अपने संजीदा विवेचन के लिए. अपने आलोचनात्‍मक अध्‍ययन की निरन्‍तरता में उनकी नयी आलोचना कृति ‘मुक्तिबोध साहित्‍य में नई प्रवृत्तियां’ ने अनायास ही हिन्‍दी के संजीदा पाठकों का ध्‍यान आकर्षित किया है. यह पुस्‍तक उन्‍होंने भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान, शिमला के सहयोग से मुक्तिबोध के साहित्‍य पर एकाग्र रहकर तैयार की है.      

वरिष्‍ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने अपने अध्‍ययन का नाम बेशक ‘मुक्तिबोध साहित्‍य की नई प्रवृत्तियां’ दिया हो लेकिन यह जानकर आश्‍चर्य हुआ कि 144 पृष्‍ठ के इस विवेचन में मुक्तिबोध के काव्‍येतर साहित्‍य को वे आंशिक तौर पर ही स्‍पर्श कर पाए हैं. यानी पुस्‍तक के 12 अध्‍यायों में मात्र 11 पृष्‍ठ का एक अध्‍याय है - ‘ब्रह्मराक्षस की तीसरी पीढ़ी’, जो उनकी कुछेक कहानियों की अन्‍तर्वस्तु और उनके विलक्षण शिल्‍प की ओर इंगित भर कर पाया है. डायरी लेखन के मामले में मुक्तिकबोध उस दौर में अकेले ऐसे जीनियस लेखक के रूप उभर कर सामने आए थे, जिनके माध्‍यम से रचना-प्रक्रिया के अन्‍तसूत्रों को समझने और रचनात्‍मक आलोचना का एक नया स्‍वरूप सामने आया था, लेकिन दूधनाथ जी के विवेचन में इस आलोचनात्‍मक गद्य के हवाले महज उनकी कविताओं के विवेचन में प्रसंगवश ही आ पाए हैं, उन पर अलग से कोई स्‍वतंत्र विश्‍लेषण यहां नहीं दिखाई देता.
        
अपने अध्‍ययन के प्रारंभ में मुक्तिबोध का संक्षिप्‍त जीवन-परिचय देते हुए वे लिखते हैं कि “वे (मुक्तिबोध) वस्‍तु और शिल्‍प के एक बिलकुल नए आविष्‍कारक हैं. वे सिर्फ कवि ही नहीं, अपने समय के बड़े आलोचक भी हैं. रचना-प्रक्रिया को लेकर उन्‍होंने तीसरा क्षण नाम से एक नया सिद्धान्‍त प्रस्‍तुत किया, जो समस्‍त भारतीय काव्‍य-शास्‍त्र और पश्चिमी आलोचना सिद्धान्‍त के लिए एक चुनौती है." याकि उनके वैचारिक-संघर्ष के बारे में महज इतनी-सी बात कि  “मुक्तिबोध का लेखन-संघर्ष कई स्‍तरों पर है. दखिणपंथियों और परम्‍परावादियों से एक ओर, कठमुल्‍ला मार्क्‍सवादियों से दूसरी ओर, अपने लाभ-लोभ के लिए खेमा बदल लेने वाले वामपंथियों से तीसरी ओर और अन्‍तत: स्‍वयं अपनी कला-साधना के संशयों से चौथी ओर."  
     
अपने इस संजीदा अध्‍ययन में दूधनाथ सिंह ने मुक्तिबोध की कविताओं पर काफी  विस्‍तार से अपना विवेचन प्रस्‍तुत किया है, जिसमें उनकी प्रारंभिक कविताओं, तार सप्‍तक की कविताओं और उनकी प्रेम कविताओं का जैसा बारीक और सटीक विवेचन प्रस्‍तुत किया है, वह पहली बार उनके लेखन के कई अनछुए पक्षों को उजागर करता है. ‘तार सप्‍तक’ में मुक्तिबोध के कवि-व्‍यक्तित्‍व और उनकी कविताओं को लेकर अज्ञेय ने एक विचित्र-सी धारणा व्‍यक्‍त की थी कि ‘’वह एक खरे और तेजस्‍वी चिन्‍तक तो रहे हैं और उनमें बराबर सही ढंग से सोचने की छटपटाहट भी दीखती है, लेकिन अन्‍त तक वह समर्थ कवि नहीं बन पाए, उनकी एकाध को छोड़कर कोई भी पूरी कविता नहीं हुई." दूधनाथ सिंह ने अज्ञेय जी की इस धारणा का सटीक और तार्किक खंडन करते हुए यह स्‍पष्‍ट किया है कि “मुक्तिबोध की कविताई के बारे में यह गलत वक्‍तव्‍य है. कविता के जो मान अज्ञेय तैयार करते हैं, उनके आधार पर भी यह कथन अनुचित और अतिरेक का शिकार है. खरा चिन्‍तन और सामाजिक चिन्‍ता ही मुक्तिबोध को एक ‘समर्थ कवि’ और हिन्‍दी कविता के इतिहास में एक अलग तरह का कवि बनाती है. --- ‘तार सप्‍तक’ उनकी काव्‍य-रचना की पहली सीढ़ी है, जिसमें वे अपने एक निजी शिल्‍प, एक निजी भाषिक दायित्‍व और कथ्‍य की खोज करते हैं." ‘तार सप्‍तक’ में ही छपी मुक्तिबोध की कविता ‘पूंजीवादी समाज के प्रति’ का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि “यह एक ऐसी कविता है, जिसकी झंकृति उनके काव्‍य–विकास में अन्‍त तक बनी रही. --- मुक्तिबोध इसे अपने वक्‍तव्‍य में और स्‍पष्‍ट करते हुए कहते हैं कि “इससे मेरा झुकाव मार्क्‍सवाद की ओर तीव्र हुआ. अधिक वैज्ञानिक, अधिक मूर्त और अधिक तेजस्‍वी दृष्टिकोण मुझे प्राप्‍त हुआ.“ जो लोग मुक्तिबोध की राजनीतिक सोच और प्रतिरोधी स्‍वर वाले कवि के रूप में उनकी प्रेम कविताओ को अनदेखा करते हैं, दूधनाथ सिंह ने अपने विवेचन में उन लोगों की इस धारणा का भी सप्रमाण खंडन किया है. उनकी लंबी कविता ‘मालव निर्झर की झर-झर कंचन रेखा’ और अन्‍य प्रेम कविताओं का  विवेचन करते हुए वे लिखते हैं कि “मुक्तिबोध केवल वैचारिक श्रृंखला के चितेरे ही नहीं, प्रेमानुभव के भी कवि हैं. हालांकि कविताओं के विशाल ढेर में ऐसी कविताएं कम हैं और सामान्‍यतौर पर उतनी महत्‍वपूर्ण भी नहीं."
      
उनके इस विवेचन का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण पक्ष मुक्तिबोध की वे लंबी और महत्‍वाकांक्षी राजनीतिक कविताएं हैं, जिन पर (‘अंधेरे में’ को छोड़कर) कविता के आलोचक अब तक कुछ भी ठीक से कहने से बचते रहे हैं. ऐसी कविताओं में जमाने का चेहरा, अन्‍त:करण का आयतन, दिमागी गुहान्‍धकार का औरांग-ओटांग, काव्‍यात्‍मन् फणिधर, ब्रह्मराक्षस, एक अरूप शून्‍य के प्रति, भूल-ग़लती, लकड़ी का रावण, चांद का मुंह‍ टेढ़ा है, एक अन्‍तर्कथा, चम्‍बल की घाटी आदि प्रमुख हैं, जिन्‍हें हिन्‍दी के आलोचक मुक्तिबोध के संदर्भ में महत्‍वपूर्ण तो मानते हैं, लेकिन उनकी काव्‍य–संरचना और उनके भीतर व्‍यक्‍त कवि के आत्‍म-संघर्ष को विश्‍लेषित करने का जोखिम कम ही उठा पाए हैं. इस‍ मामले में दूधनाथसिंह की अंतर्दृष्टि, जीवन-विवेक और अध्‍यवसाय निश्‍चय ही वरेण्‍य है कि उन्‍होंने इन अधिकांश लंबी कविताओं की विषय-वस्‍तु और उनकी काव्‍य-संरचना को समकालीन जीवन-यथार्थ के वृहत्‍तर संदर्भों के साथ जोड़कर उनकी विस्‍तृत व्‍याख्‍या प्रस्‍तुत की है, जो इन कविताओं‍ के ऐतिहासिक महत्‍व और मुक्तिबोध के आत्‍मसंघर्ष के मर्म को ठीक तरह से उजागर करती हैं. ‘जमाने का चेहरा’ जैसी वृहद महत्‍वाकांक्षी कविता के ऐतिहासिक महत्‍व को रेखांकित करते हुए उन्‍होंने जो विश्‍लेषण प्रस्‍तुत किया है, वह वाकई उनकी काव्‍य-जिजीविषा का जीवंत प्रमाण है. वे लिखते हैं “हिन्‍दी में लिखी गई द्वितीय महायुद्ध पर संभवत: ‘जमाने का चेहरा’ सबसे लंबी और सबसे महत्‍वपूर्ण कविता है. कई-कई अन्‍तर्कथाएं, घटनाएं, सामान्‍य लोक-मिथकों और आत्‍म के वैचारिक संश्‍लेषण से यह कविता तैयार की गई है. इसकी उठान और इसके भीतर आए वृतान्‍त एक संक्षिप्‍त महाकाव्‍य का रूप लेते जान पड़ते हैं. मुक्तिबोध की सारी राजनीतिक कविताओं से यह कविता थोड़ी अलग है, क्‍योंकि इसका आधार बाकायदा इतिहास की एक परिघटना (द्वितीय विश्‍वयुद्ध) है.“ (पृ 50)
       
इसी कविता के हवाले से वे मुक्तिबोध की काव्‍य-प्रकृति, उनके काव्‍य–शिल्‍प और काव्‍य-रंग की विशेषताओं को उजागर करते हुए कहते हैं कि मुक्तिबोध की सारी कविताएं जमाने के इसी चेहरे का विशद चित्रण हैं. इस चेहरे को वे तरह-तरह से उकेरते-आंकते हैं. तरह–तरह की फंतासियों, तरह-तरह के स्‍वप्‍न-चित्रों का निर्माण करते हैं. जमाने का यह जो विशद चेहरा है, उसे पूरी तरह सामने लाने के लिए कविता का अब तक का पारंपरित ढंग पूरा नहीं पड़ रहा है, अत: मुक्तिबोध नई-नई बोध-कथाओं, स्‍वरचित मिथकों को गढ़ते हुए कविता का ताना-बाना फैलाते हैं और जमाने के इस विशाल, राक्षसी चेहरे को अंकित करते हैं. इस तरह मुक्तिबोध का काव्‍य-रंग हिन्‍दी में (और संभवत: संपूर्ण भारतीय काव्‍य में) अनूठा है.“ और इसी सदंर्भ में वे हिन्‍दी की काव्‍य-परम्‍परा और अन्‍य समकालीन कवियों से मुक्तिबोध को अलग करते हुए एक और महत्‍वपूर्ण बात जोड़ते हैं कि जहां हिन्‍दी कविता में सभी कवियों के लिए एक आधार है, वहीं मुक्तिबोध के लिए ऐसा कोई आधार या मॉडल नहीं है. वे न किसी पूर्व परम्‍परा का अनुगमन करते दीखते हैं और न उनकी कविता की अपनी कोई परम्‍परा आगे जाती दीखती.   इस संदर्भ में वे दो तरह के कवियों और उनकी काव्‍य-परम्‍परा का हवाला देते हुए कहते है, “महान् कवि दो तरह के होते हैं. एक – जिसकी एक परम्‍परा निर्मित हो और दो – जिसकी कोई‍ परम्‍परा न बन सके. अज्ञेय पहली कोटि में आते हैं और मुक्तिबोध दूसरी कोटि के उदाहरण हैं. उनका काव्‍य-कर्म हिन्‍दी कविता की परम्‍परा में आगे-पीछे किधर से भी नहीं अंटता. इसीलिए उनकी सारी प्रसिद्धि और बौद्धिक वर्ग में लोकप्रियता होने के बावजूद, अपने अन्‍तर्कथ्‍य में वर्ग-संघर्ष का सबसे पुष्‍ट उदाहरण होने के बावजूद उनकी कविता का एकान्‍तीकरण हुआ है." 
     
‘जमाने का चेहरा’ कविता पर केन्द्रित अपने इस विवेचन के साथ ही दूधनाथ सिंह ने इस पुस्‍तक के अगले पांच अध्‍यायों में मुक्तिबोध की इन्‍हीं लंबी कविताओं की विशद व्‍याख्‍या की है और इसमें सबसे महत्‍वपूर्ण है ‘अंधेरे में’ कविता की पुनर्व्‍याख्‍या. यह बात दोहराने की आवश्‍यकता नहीं है कि ‘अंधेरे में’ मुक्तिबोध की सबसे महत्‍वपूर्ण और महत्‍वाकांक्षी एपिक कविता है, जिसे नामवरसिंह सहित हिन्‍दी के अनेक वरिष्‍ठ आलोचकों ने अपने ढंग से व्‍याख्‍यायित किया है. नामवर सिंह ने जहां इस कविता को ‘अस्मिता की खोज’ के रूप में व्‍याख्‍यायित किया है, वहीं दूधनाथसिंह का विवेचन उससे थोड़ा अलग है. वे इसके लिए मुक्तिबोध द्वारा इसी कविता में ही अपनाए गये प्रतीकों और शब्‍द-प्रयोगों का उपयोग करते हुए कहते हैं, कि अंधेरे में’ आजादी के बाद के भारतीय जीवन के कुहरे में एक ‘रक्‍तालोक स्‍नात पुरुष’ की खोज की कविता है. ऐसा व्‍यक्तित्‍व जो भारतीय जीवन और समाज और राजनीति के अन्‍तर्विरोधों को सही और सकारात्‍मक दिशा में मोड़ सके. वह व्‍यक्ति हम सब के भीतर है. वह बार-बार तरह-तरह से हमारे सामने प्रकट होता है और हमारी अपनी ही भीतरी कमजोरियों की वजह से ओझल हो जाता है. उसी की खोज इस कविता का लक्ष्‍य है. कवि मुक्तिबोध के लिए यह खोज उनकी ‘परम अनिवार आत्‍म–संभवा अभिव्‍यक्ति की खोज भी है.“ और इस अर्थ में यह विवेचन पूर्ववर्ती विवेचनों से अधिक मूर्त और वस्‍तुपरक है. हालांकि एक जमाने में महाकाव्‍यों का अपना महत्‍व माना जाता था, और एक तरह से वही उस युग विशेष के समाज के सांस्‍कृतिक दस्‍तावेज भी माने गये, लेकिन आधुनिक युग में जब से उपन्‍यास जैसी विधा का प्रच‍लन बढ़ा है, महाकाव्‍यों की सर्जना में स्‍वयं कवियों की दिलचस्‍पी बहुत कम रह गई थी. उस अर्थ में प्रसाद की कामायनी को अंतिम महाकाव्‍य माना जाता है. नयी कविता के शिल्‍प में महाकाव्‍य की यह संज्ञा सिर्फ मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अंधेरे में’ के लिए ही सटीक मानी जाती है. शायद इसी निकष की ओर संकेत करते हुए दूधनाथ सिंह को अपने विवेचन के अंत में यह लिखना जरूरी लगा कि “अंधरे में’ कुल आठ खंडों में लिखी गई कविता है. यह ठीक वैसे ही जैसे किसी उपन्‍यास के आठ अध्‍याय या किसी महाकाव्‍य के आठ सर्ग. अपने आप में यह कविता आधुनिक जीवन का संक्षिप्‍त तम महाकाव्‍य है."   
     
मुक्तिबोध के वैचारिक संवाद से निकले एक बहु-प्रचारित सूत्र - ‘पार्टनर, तुम्‍हारी पॉलिटिक्‍स क्‍या है’ की पृष्‍ठभूमि और उसके इर्द-गिर्द की खरपतवार की सफाई करते हुए दूधनाथ सिंह ने उनके आत्‍म-संघर्ष की बहुत सटीक व्‍याख्‍या की है. वे मुक्तिबोध के इस प्रश्‍न का आशय स्‍पष्‍ट करते हुए कहते हैं, “जब भी वे ‘पार्टनर, तुम्‍हारी पॉलिटिक्‍स क्‍या है’ का प्रश्‍न उठाते हैं तो अपने पक्ष को दृढ़, सत्‍य का पक्षधर और निस्‍संदेह साबित करने के लिए. ज्ञानात्‍मक बहस में तलवार नहीं चलती, तर्क चलता है. --- लेकिन इस पूरी बहस में मुक्तिबोध हम देखते हैं कि चारों ओर से घिरे हुए हैं. दक्षिणपंथियों और स्‍वायत्‍ततावादियों से एक ओर, कठमुल्‍ला मार्क्‍सवादियों से दूसरी ओर और लाभ-लोभ की समझदार दीखनेवाले, अपना रास्‍ता छोड़कर स्‍वायत्‍ततावादी लेखकों के खेमे में शामिल हो जाने वाले प्रगतिशीलों से तीसरी ओर, और जीवन की घनघोर विपत्तियों से चौथी ओर. यही चौतरफा घेरेबंदी – वैचारिक और जैविक – उन्‍हें धीरे-धीरे त्रस्‍त-ध्‍वस्‍त करती है. इन्‍हीं के बीच अपनी वैचारिक व्‍यूह-रचना बनाता हुआ कवि भारतीय मनुष्‍य की त्रासदियों के चित्रण के लिए अनेक प्रकार की बिम्‍ब–रचनाएं करता है."
        
दूधनाथ सिंह ने मुक्तिबोध के साहित्‍य पर केन्द्रित अपने इस अध्‍ययन में कहने के लिए भले उनकी कहानियों, डायरी और आलोचनात्‍मक निबंधों का प्रसंगानुरूप हवाला दे दिया हो,  एक छोटा-सा अध्‍याय कहानियों पर अलग से लिखा भी हो, लेकिन उसमें लेखक की सभी प्रमुख कहानियों, उनकी कथा-संवेदना, रचना-शिल्‍प और उस दौर की कहानियों के बीच मुक्तिबोध की कहानियां किस मायने में अलग और महत्‍वपूर्ण रहीं, उस पर बहुत गहराई से विचार करने का प्रयत्‍न यहां नहीं दीखता. इस संदर्भ में उनके विवेचन की यही पंक्तियां जरूर ध्‍यान आकर्षित करती है, जिसमें उन्‍होंने मुक्तिबोध की दो कहानियों के हवाले से उन्‍हें एक अलग दर्जे का कथाकार साबित करने का प्रयास किया है. वे लिखते हैं – “मुक्तिबोध की दो कहानियां ऐसी हैं, जो लिखे जाने के लगभग पचास वर्ष बाद और ज्‍यादा ‘वैलिड’ और ज्‍यादा प्रामाणिक हो गई हैं. ये हैं – ‘पक्षी और दीमक’ और ‘क्‍लॉड ईथरली’. --- ‘क्‍लॉड ईथरली’ तो आज की पूरी भगवाधारी राजनीति और अमरीकी साम्राज्‍यवाद की पोषक राजनीति का आईना बनकर और अधिक गहराई से अपनी अर्थवत्‍ता को प्रमाणित करती-सी लगती है.“ विचारणीय बात यह है कि ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के 400 पृष्‍ठ के तीसरे खंड में उनकी 23 कहानियां, एक लघु उपन्‍यास ‘विपात्र’ और लगभग सौ पृष्‍ठों में उनकी अधूरी कहानियां संकलित हैं, जिनमें ‘क्‍लॉड ईथरली’ और ‘पक्षी और दीमक’ के अलावा ‘काठ का सपना’, ‘सतह से उठता आदमी’, ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्‍य’, जि़न्‍दगी की कतरन, समझौता आदि कितनी ही ऐसी कहानियां हैं, जिन पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है. अभिव्‍यक्ति की जिस बेचैनी से मुक्तिबोध सर्वाधिक पीड़ित थे, ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्‍य’ उसी की कहानी है, जो लेखक की कला-अवधारणा को जानने-समझने की दृष्टि से एक बेजोड़ कहानी मानी जाती है. इसी कहानी के बारे में श्रीकान्‍त वर्मा का कहना था कि “चेखव की ‘घोड़ा’ यदि साधारण आदमी के दर्द की अभिव्‍यक्ति की सबसे उम्‍दा कहानी है तो ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्‍य’ कलाकार की अभिव्‍यक्ति की बेचैनी की सबसे अर्थगर्भित कहानी है.“ दूधनाथ सिंह स्‍वयं उनकी कहानियों और आलोचनात्‍मक अवदान के लिए इस बात को तो स्‍वीकार करते हैं कि “उनकी जिन कहानियों पर चर्चा होनी चाहिए, वे है – ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्‍य‘, ‘समझौता’, ‘पक्षी और दीमक’, ‘क्‍लॉड ईथरली’ और ‘काठ का सपना’. मुक्तिबोध संपूर्ण सृजन-क्रम को ही ज्ञानात्‍मक संवेदन से उत्‍पन्‍न एक फैंटेसी मानते हैं. आत्‍मपरकता में निर्वैयक्तिकता और निर्वैयक्कितकता में आत्‍मपरकता – उनको समझने का मूल-मंत्र यही है." (पृ 120) लेकिन स्‍वयं उस उत्‍तरदायित्‍व से यहां किनारा करते-से नजर आते हैं.  
   

मुक्तिबोध की कविताओं और कथा-साहित्‍य के समानान्‍तर उनका डायरी लेखन, वैचारिक गद्य और साहित्यिक आलोचना उनके रचनात्‍मक साहित्‍य के मुकाबले कहीं कम महत्‍वपूर्ण नहीं है. अगर कोई अध्‍येता मुक्तिबोध साहित्‍य में नई प्रवृत्तियों पर अपना विवेचन प्रस्‍तुत करता है और उनके आलोचनात्‍मक और वैचारिक गद्य पर महज कुछ सूत्रों में मूल्‍य-निर्णय देकर अपने काम की इतिश्री समझ लेता है तो न वह मुक्तिबोध के साथ न्‍याय कर पाता है और न उनके अध्‍येताओं के साथ. ऐसे में उस विलक्षण कवि की वह अन्‍तपीड़ा रह-रहकर मन को कचोटती रहती है - “पिस गया वह, भीतरी / औ बाहरी / दो कठिन पाटों बीच / ऐसी ट्रेजेडी ही नीच.“  
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नंद भारद्वाज : 
71/247, मध्‍यम मार्ग/ मानसरोवर, जयपुर – 302020
मोबा – 09829103455/Email : nandbhardwaj@gmail.com